स्वप्रेम-1
स्वप्रेम क्या है?
पहले स्व का अर्थ -
स्व का अर्थ है "आप" यानि चैतन्य जो आपके भीतर मौजूद है। चैतन्य यानि परमात्मा का अंश। यह एक तरह से बूंद और सागर सा संबंध है। तुलसीदास ने इसे ही कहा है - "ईश्वर अंस जीव अविनासी।" किंतु आप सिर्फ आत्मा नहीं हैं। आत्मा का एक आवरण है आपका शरीर। यद्यपि आप शरीर ही नहीं हैं। शरीर एक आवरण मात्र है किंतु है महत्त्वपूर्ण। इसी शरीर के माध्यम से ही आप अपने आत्मतत्व को जान पायेंगे। अर्थात प्रथम दृष्ट्या आप शरीर और आत्मा दो तल पर हैं।
मनुष्य अपने जन्म के समय शरीर के तल पर शून्य होता है वह आत्मा के तल पर जीता है। जैसे-जैसे उसका विकास होता जाता है, सामाजीकरण की प्रकिया के तहत वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है और शरीर के तल पर प्रविष्ट होता जाता है। एक समय के बाद वह आत्मा को भूल ही जाता है सिर्फ वह देह रह जाता है। इस प्रक्रिया में ज्यों-ज्यों वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है उसके अंदर विकारों के विकृति की आवृत्ति बढ़ती जाती है। ये विकार जैसे - काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद आदि मूलतः न तो बुरे हैं और न ही अच्छे। ईश्वर द्वारा निर्मित कोई भी तत्व अच्छा बुरा नहीं है, उसे अच्छा या बुरा बनाती है हमारी दृष्टि और हमारे संस्कार। ये ऊर्जा के स्रोत हैं।
जब हम आत्मा के तल पर जीते हैं तब यही काम की ऊर्जा परमात्मा के लिए, क्रोध की ऊर्जा करुणा में, मोह ऊर्जा प्रेम में, लोभ ऊर्जा दान में, मद की ऊर्जा दया में परिणत हो जाती है। वहीं जब हम शरीर के तल पर जीते तब काम के ऊर्जा अतिशय संभोग में, क्रोध ऊर्जा विनाश में, मोह ऊर्जा बंधन में, लोभ ऊर्जा भ्रष्टाचार में, मद की ऊर्जा परपीडन में बदल जाती है।
जब मनुष्य एकदम देह के तल पर पहुंचता है तब वह समस्त विकारों से ग्रस्त एक दानव के रूप में बदल जाता है। ऐसा दानव जो पूरी मनुष्यता के लिये खतरा है। ऐसा सहस्राब्दियों में कभी कभार घटता है। जैसे रावण, हिटलर, मुसलोलिनी आदि। सामान्य मनुष्य इन दोनों के मध्य जूझता रहता है। आधा मानव आधा दानव। यदि हमें स्व से प्रेम करना है तब सबसे पहले हमें अपने मूल रूप को पहचानना होगा। हमारे व्यक्तित्व का झुकाव किधर है।
(क्रमशः)
@विनय नमन
Wednesday, 23 December 2020
संसार क्या है?
यह संसार हमारी ही निर्मिति है। हमारे विचार, हमारी इच्छाएं, हमारी वासनाएं इसे निर्मित करती हैं। आपको क्या लगता है कि कोई स्त्री या पुरुष सुंदर है? नहीं हमारी वासना उसे सुंदर या असुंदर बनाती है। एक ही वस्तु किसी को अच्छी या बुरी लगती है। क्या वह वस्तु अच्छी या बुरी है? नहीं हमारी धारणा उसे वह गुण प्रदान करती है। अर्थात जो वस्तु जैसी है हम उसे वैसा नहीं देख पाते। हमारे इंद्रिय रूपी प्रोजेक्टर संसार रूप परदे पर फिल्म भरते हैं और यह प्रोजेक्टर वह फिल्म दिखाता है जैसा हमारे विचार, संस्कार हैं। अगर हमारे सामने कोई बुरा या अच्छा दृश्य दिखता है या हमें कोई चीज़ बुरी या अच्छी लगती है तो इसका अर्थ है कि उस वस्तु में उक्त गुण हम प्रविष्ट करा रहे हैं। वह वस्तु तो जैसी है बस वैसी है।
एक पत्थर में किसी ईसाई मूर्तिकार को जीसस दिखेगा तो हिंदू को राम या कृष्ण, बौद्ध को बुद्ध तो जैन को महावीर। मुस्लमान को उसमें कुछ न दिखेगा। वह उससे मस्जिद बनाने की सोचेगा। अगर कोई बहेलिया उस पत्थर को देखेगा तो उसे चिड़िया मारने वाले कंकड़ में बदल लेगा लेकिन सड़क बनाने वाले को वही पत्थर सड़क निर्माण की कच्ची सामग्री प्रतीत होगा। मकान बनाने वाला उसी से मकान बनायेगा। आपको क्या लगता है वह पत्थर इनमें से क्या है? सच तो यह है कि पत्थर सिर्फ पत्थर है। उसे नाना प्रकार का आकार और कार्य सिर्फ हम देते हैं। यह संसार हमारी ही कल्पना, वासना, विचार और इच्छा का विस्तार है।
@विनय नमन🙏
एक पत्थर में किसी ईसाई मूर्तिकार को जीसस दिखेगा तो हिंदू को राम या कृष्ण, बौद्ध को बुद्ध तो जैन को महावीर। मुस्लमान को उसमें कुछ न दिखेगा। वह उससे मस्जिद बनाने की सोचेगा। अगर कोई बहेलिया उस पत्थर को देखेगा तो उसे चिड़िया मारने वाले कंकड़ में बदल लेगा लेकिन सड़क बनाने वाले को वही पत्थर सड़क निर्माण की कच्ची सामग्री प्रतीत होगा। मकान बनाने वाला उसी से मकान बनायेगा। आपको क्या लगता है वह पत्थर इनमें से क्या है? सच तो यह है कि पत्थर सिर्फ पत्थर है। उसे नाना प्रकार का आकार और कार्य सिर्फ हम देते हैं। यह संसार हमारी ही कल्पना, वासना, विचार और इच्छा का विस्तार है।
@विनय नमन🙏
पीढियों का अंतर्द्वंद
हमारे माता-पिता अपने माता-पिता के सपनों, अरमानों को जी रहे थे, हम अपने माता-पिता के और हमारे बच्चे हमारे सपनों और अरमानों को ढोयेंगे। लोग अपने ही सपनों को नहीं जी पाते फिर दूसरों के सपनों की कौन कहे। यह समस्या हजारों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी हम ढोते चले आ रहे हैं। हमारे माता-पिता के माता-पिता अपने समय के सपने 20-30 साल बाद अपने बच्चों से पूरा करवाने की जिद पाले थे। यही अपेक्षा हमारे माता-पिता हमसे करते हैं और यही हम अपने बच्चों से करेंगे। हम अपने पुराने सपने नये दौर में देखने की जिद करते हैं जो कि अप्रासंगिक हैं।
आज से 50 साल पहले का समय और उसकी मांग आज के समय से भिन्न थी। आज के 50 साल बाद समय और उसकी मांग भिन्न होगा ही। हम क्यों अपने बच्चों को 50 साल पुराने सपने देखने पर मजबूर करते हैं। हर आदमी के अपने सपने होते हैं, उन्हें खुद पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर न हो पाये तो नियति मानकर भूल जाना चाहिए किंतु नयी फसल को पुराने मौसम के नाम पर कुर्बान नहीं करना चाहिए। जब हम दूसरे से अपने सपने पूरा करने का सपना संजोते हैं तो अक्सर इसकी परिणति विषाद पूर्ण ही होती है। इसी कारण हर माता-पिता अपने बच्चों से दुखी होते हैं। इसीलिये दोनों के बीच वैमनस्य, कलह और अन्तर्द्वन्द चलता रहता है। इस समस्या से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, खुद को दूसरे के अरमानों और सपनों से मुक्त करो और अपनी संतानों को उनके अपने सपने और अरमान जीने दो। मत थोपो उनपर अपने जीर्ण सपने।
©विन्ध्येश्वरी
आज से 50 साल पहले का समय और उसकी मांग आज के समय से भिन्न थी। आज के 50 साल बाद समय और उसकी मांग भिन्न होगा ही। हम क्यों अपने बच्चों को 50 साल पुराने सपने देखने पर मजबूर करते हैं। हर आदमी के अपने सपने होते हैं, उन्हें खुद पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर न हो पाये तो नियति मानकर भूल जाना चाहिए किंतु नयी फसल को पुराने मौसम के नाम पर कुर्बान नहीं करना चाहिए। जब हम दूसरे से अपने सपने पूरा करने का सपना संजोते हैं तो अक्सर इसकी परिणति विषाद पूर्ण ही होती है। इसी कारण हर माता-पिता अपने बच्चों से दुखी होते हैं। इसीलिये दोनों के बीच वैमनस्य, कलह और अन्तर्द्वन्द चलता रहता है। इस समस्या से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, खुद को दूसरे के अरमानों और सपनों से मुक्त करो और अपनी संतानों को उनके अपने सपने और अरमान जीने दो। मत थोपो उनपर अपने जीर्ण सपने।
©विन्ध्येश्वरी
Sunday, 29 November 2020
विराट पूजा
उस परमात्मा की पूजा करने की आवश्यकता क्या है? प्रतिपल प्रतिक्षण उस परमात्मा की पूजा हो ही रही है। सूरज, चांद और तारे उसकी आरती कर रहे हैं। पृथ्वी और ग्रह उपग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं। फूल उस पर सुगंध अर्पित कर रहे हैं। संसार भर के अन्न और फल उसे नैवेद्य अर्पित कर रहे हैं। नीला अंबर उसका परिधान है। नरम नरम बादल रूई के पाहे हैं। इंद्रधनुष उसका यज्ञोपवीत है। पक्षी कलरव करके उसकी स्तुति गा रहे हैं। मोर नाच कर उसे रिझा रहे हैं। नदियां उसको स्नान करा रही हैं। बारिस की फुहारें उसे आचमन दे रही हैं। मस्त बसंती हवा उसे पंखा कर रही है। यह विराट पूजा अनन्त अनन्त काल से चल ही रही है। क्या है हमारे भीतर यह सामर्थ्य की ऐसी विराट पूजा कर सकें? नहीं है और न ही हो सकती है। और ऊपर से यह हम जो तुच्छ पूजा करते भी हैं उसमें अपनी तुच्छ मांग रख देते हैं। हमें इस पूजा के बदले यह दो, वह दे दो। उस परम आत्मा को अपने हृदय के मंदिर में बसा न सके और उसे चार दीवारी के भीतर पत्थर में चिनवा कर सलाखों के पीछे कैद कर दिया। फिर उस कैदी परमात्मा से अपने सुखी जीवन की दुआएं मांगते हैं! वह परमात्मा हमें क्या खाक देगा? मांग सको तो मांग लो उस प्यारे से एक प्यारी सी झप्पी, एक परम सुख का आलिंगन। और फिर शरीक हो जाओ उस विराट की परम पूजा में। हर पल हर क्षण निहारो उस विराट पूजा को। जीते जी मुक्त हो जाओगे। नहीं रहेगा मृत्यु का भय, नहीं रहेगी वासना की दीवार। शरीर के साथ रहने पर भी जीवित रहोगे और न रहने पर भी जीवित रहोगे। सदा अमर।
@विन्ध्येश्वरी
@विन्ध्येश्वरी
विराट दर्शन
अर्जुन के बहुत कहने पर कृष्ण ने उसे अपना विराट रूप दिखाया। उसकी योग्यता न थी विराट-दर्शन की, साधना नहीं थी उसकी, उसने अपनी आंखों को परमात्मा के दर्शन के वियोग में रो रो कर लाल न किया था। उस राजकुमार अर्जुन की आंखें चुधिया गयीं। उसने कहा- हे प्रभु आप अपने इस विराट रूप को समेट लो मैं न देख पाऊंगा अब। क्या था उस विराट रूप में? पूरा ब्रह्मांड ही था। पृथ्वी, आकाश, नौ ग्रह, तारे, वृक्ष, पक्षी, देव, राक्षस, मनुष्य, प्रलय, सृजन, सुख, दुख, जीवन, मृत्यु सब कुछ था उसमें।
इस तथ्य का दूसरा पहलू यह भी है कि यदि यह सब कुछ परमात्मा में है तो क्या परमात्मा यही नहीं है? सच तो यही है यह सब परमात्मा के ही विभिन्न रूप हैं। अगर हम जन्म लेते हैं तो परमात्मा ही जन्म ले रहा है, हमारी मृत्यु में परमात्मा ही मरता है। हम सुखी हैं तो यह परमात्मा का ही सुख है और दुख भी परमात्मा ही है। सूरज का उगना और प्रकाश, पृथ्वी का घूर्णन और इस पर जीवन, पूर्णिमा का प्रकाश और चंद्रमा की शीतलता या अमावस्या की गहन रात्रि, वृक्षों का शांत स्थिर भाव से खड़े रहना या मस्ती से लहराना, पक्षियों की चहचहाहट, नदी का कलकल, भौरों का गुंजन, बच्चे की प्यारी मुस्कान या रुदन, प्रियतम का मधुर स्पर्श या दो घड़ी शुकून की नींद या सुबह की ताजगी। सब कुछ ही परमात्मा है। परमात्मा प्रतिपल हमारे पास है, उसे देखना सीख लो बस। उसे देखने के लिये अपनी नजर को निर्दोष रखना होगा। यानि उसमें किसी धर्म-मजहब, गुरु का मोतियाबिन्द न हुआ हो। वह चश्मा उतारना होगा जो किसी खास रंग का हो। उसे देखने के लिये निर्मल-अमल और शांत नजर चाहिए बस।
@विन्ध्येश्वरी
इस तथ्य का दूसरा पहलू यह भी है कि यदि यह सब कुछ परमात्मा में है तो क्या परमात्मा यही नहीं है? सच तो यही है यह सब परमात्मा के ही विभिन्न रूप हैं। अगर हम जन्म लेते हैं तो परमात्मा ही जन्म ले रहा है, हमारी मृत्यु में परमात्मा ही मरता है। हम सुखी हैं तो यह परमात्मा का ही सुख है और दुख भी परमात्मा ही है। सूरज का उगना और प्रकाश, पृथ्वी का घूर्णन और इस पर जीवन, पूर्णिमा का प्रकाश और चंद्रमा की शीतलता या अमावस्या की गहन रात्रि, वृक्षों का शांत स्थिर भाव से खड़े रहना या मस्ती से लहराना, पक्षियों की चहचहाहट, नदी का कलकल, भौरों का गुंजन, बच्चे की प्यारी मुस्कान या रुदन, प्रियतम का मधुर स्पर्श या दो घड़ी शुकून की नींद या सुबह की ताजगी। सब कुछ ही परमात्मा है। परमात्मा प्रतिपल हमारे पास है, उसे देखना सीख लो बस। उसे देखने के लिये अपनी नजर को निर्दोष रखना होगा। यानि उसमें किसी धर्म-मजहब, गुरु का मोतियाबिन्द न हुआ हो। वह चश्मा उतारना होगा जो किसी खास रंग का हो। उसे देखने के लिये निर्मल-अमल और शांत नजर चाहिए बस।
@विन्ध्येश्वरी
Thursday, 26 November 2020
सखी री! पनघट कितनी दूर
मनुष्य अपने परम स्वरूप के साक्षात्कार से कितना दूर है?
बहुत दूर नहीं है। उसे अपने सभी नाटक छोड़ने होंगे या नाटक में अभिनय का साक्षी होना होगा, बस। हम आप नाटक देखते हैं। नाटक में कई सारे पात्र होते हैं। हर पात्र की अलग अलग भूमिका होती है, अलग अलग संवाद होता है, अलग अलग कहानी होती है। वह अपने अभिनय में शादी, विवाह, बच्चे, नौकरी, मारकाट सब करता है। कल्पना कीजिये कि वह अपने अभिनय में गहरे तक डूब जाये। वह अपने को वही मान बैठे जिस भूमिका में है। फिल्म में सीन है कि अभिनेता को अपने सहअभिनेता की पिटाई करनी है। वह सचमुच उसे पीटने लगे। शादी हुई, सुहागरात है, अभिनेता अभिनेत्री सचमुच सुहागरात मनाने लगे। अभिनेता मर गया और अपने को सचमुच मरा मान बैठे। क्या होगा? आप कहेंगे ऐसा नहीं होता। हां! मैं भी यही कहता हूँ ऐसा नहीं होता और न ही ऐसा होना चाहिए।
हम भी इस संसार में एक नाटक खेल रहे हैं। हम भी वही सब कर रहे हैं जो परदे पर अभिनेता करता है। लेकिन हमारी भूल यह है कि हम अपने अभिनय को सच्चा मान ले रहे हैं। जिस प्रकार अभिनेता अभिनय के दौरान अपने वास्तविक स्वरूप को ध्यान रखता है, मार पीट, शादी, विवाह, बच्चे सब दिखावटी होते हैं, वह मरकर भी मरता नहीं। उसे पता होता है कि यह सब एक खेल है। उसी प्रकार हमें अपने निज स्वरूप का ज्ञान रहना चाहिए। सब कुछ करते हुए भी अकर्ता का भाव होना चाहिए। पत्नी को पत्नी, पति को पति, बच्चों को बच्चा, माता-पिता को माता-पिता, नौकरी को नौकरी, मृत्यु को मृत्यु, जीवन को जीवन मान कर नहीं चलना चाहिए। यह सब सांसरिक अभिनय के एक घटक मात्र हैं। कहानी खत्म अभिनय खत्म। अभिनय कीजिये उसमें उलझिये नहीं।
अभिनेता को अपने वास्तविक स्वरूप में आने के लिए अपने अभिनय से निकलना होगा। उसे वह होना होगा जो वह वास्तव में है। प्रश्न उठता है - "हम क्या हैं?" हम वही हैं जिस रूप में हम पैदा हुए हैं, नग्न, भाषा विहीन, सांसारिक ज्ञान से हीन, छल-छ्द्म विहीन, प्यारी सी मुस्कान के साथ सहज भाव और वर्तमान में जीने की ललक। न आने वाले कल की चिंता न गुजरे कल का मलाल। बस आज और सिर्फ़ आज। कभी आपने विचार किया कि कोई बच्चा इतना प्यारा क्यों लगता है? यही ऊपर कहे गये कारण हैं। और ज्यादा कुछ नहीं। वह परमात्मा के अधिक करीब है। हम भी परमात्मा के करीब पहुंच सकते हैं। हम भी अपने आपको जान सकते हैं। तरीका यही कि जैसा प्रभु ने हमें भेजा हम वैसा हो जायें।
@विन्ध्येश्वरी
बहुत दूर नहीं है। उसे अपने सभी नाटक छोड़ने होंगे या नाटक में अभिनय का साक्षी होना होगा, बस। हम आप नाटक देखते हैं। नाटक में कई सारे पात्र होते हैं। हर पात्र की अलग अलग भूमिका होती है, अलग अलग संवाद होता है, अलग अलग कहानी होती है। वह अपने अभिनय में शादी, विवाह, बच्चे, नौकरी, मारकाट सब करता है। कल्पना कीजिये कि वह अपने अभिनय में गहरे तक डूब जाये। वह अपने को वही मान बैठे जिस भूमिका में है। फिल्म में सीन है कि अभिनेता को अपने सहअभिनेता की पिटाई करनी है। वह सचमुच उसे पीटने लगे। शादी हुई, सुहागरात है, अभिनेता अभिनेत्री सचमुच सुहागरात मनाने लगे। अभिनेता मर गया और अपने को सचमुच मरा मान बैठे। क्या होगा? आप कहेंगे ऐसा नहीं होता। हां! मैं भी यही कहता हूँ ऐसा नहीं होता और न ही ऐसा होना चाहिए।
हम भी इस संसार में एक नाटक खेल रहे हैं। हम भी वही सब कर रहे हैं जो परदे पर अभिनेता करता है। लेकिन हमारी भूल यह है कि हम अपने अभिनय को सच्चा मान ले रहे हैं। जिस प्रकार अभिनेता अभिनय के दौरान अपने वास्तविक स्वरूप को ध्यान रखता है, मार पीट, शादी, विवाह, बच्चे सब दिखावटी होते हैं, वह मरकर भी मरता नहीं। उसे पता होता है कि यह सब एक खेल है। उसी प्रकार हमें अपने निज स्वरूप का ज्ञान रहना चाहिए। सब कुछ करते हुए भी अकर्ता का भाव होना चाहिए। पत्नी को पत्नी, पति को पति, बच्चों को बच्चा, माता-पिता को माता-पिता, नौकरी को नौकरी, मृत्यु को मृत्यु, जीवन को जीवन मान कर नहीं चलना चाहिए। यह सब सांसरिक अभिनय के एक घटक मात्र हैं। कहानी खत्म अभिनय खत्म। अभिनय कीजिये उसमें उलझिये नहीं।
अभिनेता को अपने वास्तविक स्वरूप में आने के लिए अपने अभिनय से निकलना होगा। उसे वह होना होगा जो वह वास्तव में है। प्रश्न उठता है - "हम क्या हैं?" हम वही हैं जिस रूप में हम पैदा हुए हैं, नग्न, भाषा विहीन, सांसारिक ज्ञान से हीन, छल-छ्द्म विहीन, प्यारी सी मुस्कान के साथ सहज भाव और वर्तमान में जीने की ललक। न आने वाले कल की चिंता न गुजरे कल का मलाल। बस आज और सिर्फ़ आज। कभी आपने विचार किया कि कोई बच्चा इतना प्यारा क्यों लगता है? यही ऊपर कहे गये कारण हैं। और ज्यादा कुछ नहीं। वह परमात्मा के अधिक करीब है। हम भी परमात्मा के करीब पहुंच सकते हैं। हम भी अपने आपको जान सकते हैं। तरीका यही कि जैसा प्रभु ने हमें भेजा हम वैसा हो जायें।
@विन्ध्येश्वरी
Tuesday, 24 November 2020
परमात्मा का दर्शन
कृष्ण गीता में कहते हैं- "स्व धर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मों भयावहः।" बुद्ध कहते हैं- "धम्मं शरणं गच्छामि।" जीसस कहते हैं- "प्रेम ही धर्म है।" महावीर कहते हैं- "एष धम्मो सनातनो।" आखिर ये लोग किस धर्म के बारे में कह रहे हैं? क्या कृष्ण हिंदू, बुद्ध बौद्ध, जीसस ईसाई या महावीर जैन धर्म के बारे में कह रहे हैं। मेरा मानना है - "नहीं"।दरअसल हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम, पारसी, सिक्ख आदि धर्म ही नहीं हैं। ये परमात्मा को देखने के चश्मे मात्र हैं। जो व्यक्ति जिस चश्मे में पला बढ़ा उसे परमात्मा उसी रंग में दिखने लगा। ईसाई का परमात्मा जीसस जैसा है, हिंदू के लिये करोड़ों भगवानों जैसा, बौद्ध के लिये बुद्ध जैसा, जैन के लिये महावीर जैसा, मुस्लमान के लिये देवदूत मुहम्मद जैसा और निराकार, सिक्ख के लिये नानक और गुरुग्रंथ जैसा आदि। लेकिन ये सभी रामपुर गांव के चार अंधों से अधिक नहीं हैं जिन्होंने गांव में आये हुए हाथी को अलग-अलग तरह से अनुभव किया। जिस अंधे ने हाथी का पैर छुआ उसे हाथी खंभे जैसा लगा, जिसने कान छुआ उसे हाथी सूप जैसा लगा, जिसने पूंछ छुआ उसे हाथी झाड़ू जैसा लगा और जिसने पेट छुआ उसे नगाड़े जैसा लगा। अब चारों आपस में झगड़ रहे हैं। हाथी ऐसा है, हाथी वैसा है। आपको क्या लगता है इसमें से कौन सही और कौन गलत है? क्या आप इनमें से किसी अंधे को यह प्रतीति दिला सकते हैं कि हाथी हाथी जैसा है। संभवतः नहीं।
दरअसल सभी सही हैं और कोई भी सही नहीं है। हाथी को समग्रता में जानने के लिए दृष्टि चाहिए लेकिन दुर्भाग्य है वे सभी अंधे हैं। अब हाथी को समझने के दो तरीके हो सकते हैं चारों अंधे यह मान लें कि जो अनुभव चारों को हुआ है हाथी वैसा है। या फिर ऐसी दृष्टि विकसित किया जाये जिससे हाथी समग्रता में दिखे। हाथी तो सिर्फ हाथी जैसा है। उसकी कोई परिभाषा नहीं है। कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। सभी परिभाषाएं, सभी सिद्धांत, सभी परिकल्पनाएं द्वंद पैदा करेंगी।
परमात्मा भी ऐसा ही है। अपरिभाषेय, अपरिकल्पनीय, असैद्धांतिक। परमात्मा सिर्फ परमात्मा जैसा है। उसे सभी धर्मों की सार बातों को मिलाकर भी नहीं जाना जा सकता क्योंकि फिर भी कुछ छूट जाता है, कुछ कसक रह जाती है, कुछ कमी बच जाती है। परमात्मा को जानने के लिए अपनी दृष्टि चाहिए। जो निर्दोष हो, शांत हो। क्या आपको लगता है कि यदि हमारी आंख में दोष होगा तो परमात्मा पूर्ण रूप से दिख जायेगा या अगर हमारी आंख किसी दूसरी चीज को देख रही होगी तो परमात्मा दिख जायेगा? नहीं। बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि अगर हम सिनेमा देख रहे और उस समय कोई हम से बात कर रहा हो या हमें कोई दूसरी चीज दिखा रहा हो तब हमारी आंख उस चीज को न तो देख पायेगी और कान उस बात को न सुन पायेगा। फिर हम उसे जान भी नहीं पायेंगे। इसी प्रकार परमात्मा भी शांत और निर्दोष चित्त में घटता है, यहीं उतरता है। या यूं कहें यहीं दिख जाता है। जैसे ही हम शांत होंगे, निर्दोष होंगे परमात्मा प्रकट हो जायेगा।परमात्मा का प्राकट्य, परमात्मा का साक्षात्कार "स्व धर्म" यानि स्वयं को जानने से होता है। इनमें से कोई भी धर्म स्वयं से साक्षात्कार करवाने में असमर्थ है। स्वयं को जानना के लिये हमें स्वयं पर भरोसा करना होगा और स्वयं उद्यम करना होगा। संसार में रहकर, सांसरिक कृत्य करते हुए भी संसार में उलझना नहीं है। जब हम सब कुछ देखते हुए भी अपनी प्रिय चीज को देख रहे होंगे तब सब कुछ देखते करते हुए भी हमें वही चीज दिखेगी। परमात्मा से प्रिय इस संसार में क्या हो सकता है? सब कुछ देखते हुए भी हमारी निर्दोष और शांत नजर बस उसी प्रियतम को ढूंढे। वह हमें दिखेगा ही दिखेगा।
@विन्ध्येश्वरी
दरअसल सभी सही हैं और कोई भी सही नहीं है। हाथी को समग्रता में जानने के लिए दृष्टि चाहिए लेकिन दुर्भाग्य है वे सभी अंधे हैं। अब हाथी को समझने के दो तरीके हो सकते हैं चारों अंधे यह मान लें कि जो अनुभव चारों को हुआ है हाथी वैसा है। या फिर ऐसी दृष्टि विकसित किया जाये जिससे हाथी समग्रता में दिखे। हाथी तो सिर्फ हाथी जैसा है। उसकी कोई परिभाषा नहीं है। कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। सभी परिभाषाएं, सभी सिद्धांत, सभी परिकल्पनाएं द्वंद पैदा करेंगी।
परमात्मा भी ऐसा ही है। अपरिभाषेय, अपरिकल्पनीय, असैद्धांतिक। परमात्मा सिर्फ परमात्मा जैसा है। उसे सभी धर्मों की सार बातों को मिलाकर भी नहीं जाना जा सकता क्योंकि फिर भी कुछ छूट जाता है, कुछ कसक रह जाती है, कुछ कमी बच जाती है। परमात्मा को जानने के लिए अपनी दृष्टि चाहिए। जो निर्दोष हो, शांत हो। क्या आपको लगता है कि यदि हमारी आंख में दोष होगा तो परमात्मा पूर्ण रूप से दिख जायेगा या अगर हमारी आंख किसी दूसरी चीज को देख रही होगी तो परमात्मा दिख जायेगा? नहीं। बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि अगर हम सिनेमा देख रहे और उस समय कोई हम से बात कर रहा हो या हमें कोई दूसरी चीज दिखा रहा हो तब हमारी आंख उस चीज को न तो देख पायेगी और कान उस बात को न सुन पायेगा। फिर हम उसे जान भी नहीं पायेंगे। इसी प्रकार परमात्मा भी शांत और निर्दोष चित्त में घटता है, यहीं उतरता है। या यूं कहें यहीं दिख जाता है। जैसे ही हम शांत होंगे, निर्दोष होंगे परमात्मा प्रकट हो जायेगा।परमात्मा का प्राकट्य, परमात्मा का साक्षात्कार "स्व धर्म" यानि स्वयं को जानने से होता है। इनमें से कोई भी धर्म स्वयं से साक्षात्कार करवाने में असमर्थ है। स्वयं को जानना के लिये हमें स्वयं पर भरोसा करना होगा और स्वयं उद्यम करना होगा। संसार में रहकर, सांसरिक कृत्य करते हुए भी संसार में उलझना नहीं है। जब हम सब कुछ देखते हुए भी अपनी प्रिय चीज को देख रहे होंगे तब सब कुछ देखते करते हुए भी हमें वही चीज दिखेगी। परमात्मा से प्रिय इस संसार में क्या हो सकता है? सब कुछ देखते हुए भी हमारी निर्दोष और शांत नजर बस उसी प्रियतम को ढूंढे। वह हमें दिखेगा ही दिखेगा।
@विन्ध्येश्वरी
Sunday, 8 November 2020
सुख और शांति
लोग कहते हैं - "सुख नहीं है, शांति नहीं है।"
मैं कहता हूँ - "न है और तब न ही हो सकती जब तक कि अपने घर नहीं लौटोगे। अपने घर लौट आओ। वहाँ सर्वत्र सुख, शांति, प्रेम, आनन्द और विश्राम लबालब है।"
आप कहेंगे कि "क्या हम घर नहीं आये हैं या आते हैं? हम तो रोज शाम को अपने घर लौटते हैं, काम से थके-मांदे और कुछ कमाकर।"
"सच कहते हैं लेकिन एक आपका भौतिक घर है दूसरा आपकी आत्मा का घर है।"
"जिस प्रकार काम से थक-मांद कर आप घर लौटते हैं। वहां पत्नी, मां-पिता और बच्चों का प्यार मिलता है, पीने को एक गिलास पानी, खाने को खाना मिलता है, सुख से सोने के लिए बिस्तर मिलता है। ठीक उसी प्रकार जब आप अपने भीतर प्रवेश करते हैं तब वहां आपको चिरशांति, प्रेम, आनन्द और रस आदि प्राप्त होता है।"
"इसके लिये आपको कुछ खास नहीं कर होता है। बैठ कर या लेट कर बस अपने आपको ढीला छोड़ देना है। सांस शिथिल, शरीर शिथिल। फिर विचारों को भी ढीला छोड़ देना है। विचार थोड़े हठी होते हैं। जब आप इनका साथ देते तब ये आपके साथ रहते हैं। बस इन्हें आने दीजिये और जाने दीजिये। इन्हें आता-जाता देखिये। कोई इनसे मिलिये मत। सिर्फ़ विचारों को देखिये। आप पायेंगे कि विचार एकदम शांत हो गये हैं। जिस क्षण शरीर, मन और विचार शांत होगें, उसी क्षण आप अपने भीतर प्रविष्ट हो जायेंगे। आपको अपना असली घर मिल जायेगा।"
मैं कहता हूँ - "न है और तब न ही हो सकती जब तक कि अपने घर नहीं लौटोगे। अपने घर लौट आओ। वहाँ सर्वत्र सुख, शांति, प्रेम, आनन्द और विश्राम लबालब है।"
आप कहेंगे कि "क्या हम घर नहीं आये हैं या आते हैं? हम तो रोज शाम को अपने घर लौटते हैं, काम से थके-मांदे और कुछ कमाकर।"
"सच कहते हैं लेकिन एक आपका भौतिक घर है दूसरा आपकी आत्मा का घर है।"
"जिस प्रकार काम से थक-मांद कर आप घर लौटते हैं। वहां पत्नी, मां-पिता और बच्चों का प्यार मिलता है, पीने को एक गिलास पानी, खाने को खाना मिलता है, सुख से सोने के लिए बिस्तर मिलता है। ठीक उसी प्रकार जब आप अपने भीतर प्रवेश करते हैं तब वहां आपको चिरशांति, प्रेम, आनन्द और रस आदि प्राप्त होता है।"
"इसके लिये आपको कुछ खास नहीं कर होता है। बैठ कर या लेट कर बस अपने आपको ढीला छोड़ देना है। सांस शिथिल, शरीर शिथिल। फिर विचारों को भी ढीला छोड़ देना है। विचार थोड़े हठी होते हैं। जब आप इनका साथ देते तब ये आपके साथ रहते हैं। बस इन्हें आने दीजिये और जाने दीजिये। इन्हें आता-जाता देखिये। कोई इनसे मिलिये मत। सिर्फ़ विचारों को देखिये। आप पायेंगे कि विचार एकदम शांत हो गये हैं। जिस क्षण शरीर, मन और विचार शांत होगें, उसी क्षण आप अपने भीतर प्रविष्ट हो जायेंगे। आपको अपना असली घर मिल जायेगा।"
@विन्ध्येश्वरी
Wednesday, 14 October 2020
प्रेम के स्तर
प्रेम के तीन स्तर होते हैं-शारीरिक(भौतिक), मानसिक और आत्मिक।
शारीरिक प्रेम(?):- इसके तीन स्तर हैं-
1- शारीरिक भूख को शांत करने के लिये किसी से संबध बनाते हैं तब यह भी क्षणिक ही होता है, अस्थायी। जैसे वेश्या के साथ बनाया गया संबंध।
2- जब हम बिना एक दूसरे को समझे - जाने मात्र बड़े बुजुर्गों की सहमति से मिलते हैं तब एक समझौता होता है- लोगों से, अपने आप से। समाज क्या कहेगा, चार लोग क्या कहेंगे, शादी तो करनी पड़ती है आदि। इसमें हम केवल सामाजिक दबाव में बंधे पड़े रहते हैं और जैसे तैसे जीवन को काट रहे होते हैं।
3- और जब हम किसी के रूप-रंग, बोली, कटीले नयन नक्श आदि से प्रभावित होकर प्रेम करते हैं तब यह भी शारीरिक ही होता है। यानि यह भी स्थायी नहीं हो सकता क्योंकि शारीरिक आकर्षण ज्यादा दिन बना नहीं रह सकता है।
इस प्रकार शारीरिक प्रेम (?) को प्रेम मानना मूढ़ता है।
भारतीय समाज ने "समझौता से मिलन" को स्वीकार किया। इसलिए यहाँ बड़े बुजुर्गों की सहमति से विवाह प्रचलित है। इसका नतीजा यह हुआ कि सामाजिक दबाव के कारण विवाह स्थायी तो हुआ लेकिन हर व्यक्ति अंदर से घुट रहा होता है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। हर स्त्री-पुरुष को हम यह कहते सुनते हैं कि "तुम्हारे साथ पड़ कर मेरी जिंदगी बर्बाद हो गयी" "मेरे करम फूटे थे जो तुम मिले/मिली" आदि। और साथ ही लगभग हर स्त्री-पुरुष हर स्त्री-पुरुष को संभावित अच्छे जीवनसाथी के रूप में देखता है और अपने वाले को कमतर नजर से। यह पिंजरे में बंद पक्षी जैसा हाल है न उड़ सकता है न पिंजरे में रह सकता है।
इसके विपरीत कुछ समाजों में "शारीरिक आकर्षण" से विवाह को स्वीकार किया गया है जैसे पश्चिमी देश। दुर्भाग्य यह है कि कोई भी सुंदरता पूर्ण नहीं होती। आज ये अच्छा लग रहा/रही है, कल कोई और, परसों कोउ और। यहाँ व्यक्तिगत उच्छृंख्लता/वासना की पूर्ति तो हो गयी लेकिन समाज अस्थिर हो गया।
मानसिक प्रेम:- जब शारीरिक आकर्षण मन के स्तर पर उतर जाता है तब यह मानसिक प्रेम में परिणत हो जाता है। मानसिक प्रेम कहीं न कहीं शारीरिक स्तर से ही शुरू होता है किंतु इसे भी स्थायी नहीं माना जा सकता क्योंकि मन चंचल है क्या पता कब किस पर मर मिटे। हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद आदि इसी श्रेणी के प्रेमी-प्रेमिका हैं।
आत्मिक प्रेम:- यह प्रेम चित्त की अवस्था है। यहाँ कोई अपना पराया नहीं होता। हर किसी के लिए प्रेम छलकता है। निर्जन-सजन हर जगह, जीव-अजीव हर किसी पर। संतों का प्रेम इसी कोटि का होता है। एक अर्थ में माता का प्रेम भी आत्मिक प्रेम होता है। यह प्रेम की पूर्णावस्था है।
प्रेम की पूर्णावस्था तक पहुंचने की यात्रा शारीरिक और मानसिक स्तर से होकर ही गुजरती है (किंतु सदैव ऐसा अपेक्षित नहीं है)। तुलसी का राम के प्रति अनुराग अपनी पत्नी रत्नवली से दुत्कार खाने के बाद जगा। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम सुयोग्य पति और ससुराल न मिलने के कारण जगा। सूर का कृष्ण के प्रति सख्य भाव समाज में अपेक्षित सम्मान/सखा न मिलने के कारण हुआ।
स्त्री अपने पति से शारीरिक स्तर पर ही प्रेम कर पाती है। कुछेक स्थितियों में मानसिक भी हो सकता है किंतु आत्मिक स्तर पर वह सिर्फ़ अपनी संतान से जुड़ती है। इसलिये अक्सर देखा जाता है कि माँ बनने के बाद स्त्री का पुनर्जन्म होता है। वह पहले से अधिक आकर्षक और शांत हो जाती है। लेकिन आत्मिक प्रेम को उपलब्ध हो जाने के बाद शारीरिक प्रेम में उसकी रूचि कम होने लगती है। पति को यह महसूस होने लगता है कि वह उसकी तरफ पहले जितना ध्यान नहीं दे रही है।
शारीरिक प्रेम(?):- इसके तीन स्तर हैं-
1- शारीरिक भूख को शांत करने के लिये किसी से संबध बनाते हैं तब यह भी क्षणिक ही होता है, अस्थायी। जैसे वेश्या के साथ बनाया गया संबंध।
2- जब हम बिना एक दूसरे को समझे - जाने मात्र बड़े बुजुर्गों की सहमति से मिलते हैं तब एक समझौता होता है- लोगों से, अपने आप से। समाज क्या कहेगा, चार लोग क्या कहेंगे, शादी तो करनी पड़ती है आदि। इसमें हम केवल सामाजिक दबाव में बंधे पड़े रहते हैं और जैसे तैसे जीवन को काट रहे होते हैं।
3- और जब हम किसी के रूप-रंग, बोली, कटीले नयन नक्श आदि से प्रभावित होकर प्रेम करते हैं तब यह भी शारीरिक ही होता है। यानि यह भी स्थायी नहीं हो सकता क्योंकि शारीरिक आकर्षण ज्यादा दिन बना नहीं रह सकता है।
इस प्रकार शारीरिक प्रेम (?) को प्रेम मानना मूढ़ता है।
भारतीय समाज ने "समझौता से मिलन" को स्वीकार किया। इसलिए यहाँ बड़े बुजुर्गों की सहमति से विवाह प्रचलित है। इसका नतीजा यह हुआ कि सामाजिक दबाव के कारण विवाह स्थायी तो हुआ लेकिन हर व्यक्ति अंदर से घुट रहा होता है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। हर स्त्री-पुरुष को हम यह कहते सुनते हैं कि "तुम्हारे साथ पड़ कर मेरी जिंदगी बर्बाद हो गयी" "मेरे करम फूटे थे जो तुम मिले/मिली" आदि। और साथ ही लगभग हर स्त्री-पुरुष हर स्त्री-पुरुष को संभावित अच्छे जीवनसाथी के रूप में देखता है और अपने वाले को कमतर नजर से। यह पिंजरे में बंद पक्षी जैसा हाल है न उड़ सकता है न पिंजरे में रह सकता है।
इसके विपरीत कुछ समाजों में "शारीरिक आकर्षण" से विवाह को स्वीकार किया गया है जैसे पश्चिमी देश। दुर्भाग्य यह है कि कोई भी सुंदरता पूर्ण नहीं होती। आज ये अच्छा लग रहा/रही है, कल कोई और, परसों कोउ और। यहाँ व्यक्तिगत उच्छृंख्लता/वासना की पूर्ति तो हो गयी लेकिन समाज अस्थिर हो गया।
मानसिक प्रेम:- जब शारीरिक आकर्षण मन के स्तर पर उतर जाता है तब यह मानसिक प्रेम में परिणत हो जाता है। मानसिक प्रेम कहीं न कहीं शारीरिक स्तर से ही शुरू होता है किंतु इसे भी स्थायी नहीं माना जा सकता क्योंकि मन चंचल है क्या पता कब किस पर मर मिटे। हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद आदि इसी श्रेणी के प्रेमी-प्रेमिका हैं।
आत्मिक प्रेम:- यह प्रेम चित्त की अवस्था है। यहाँ कोई अपना पराया नहीं होता। हर किसी के लिए प्रेम छलकता है। निर्जन-सजन हर जगह, जीव-अजीव हर किसी पर। संतों का प्रेम इसी कोटि का होता है। एक अर्थ में माता का प्रेम भी आत्मिक प्रेम होता है। यह प्रेम की पूर्णावस्था है।
प्रेम की पूर्णावस्था तक पहुंचने की यात्रा शारीरिक और मानसिक स्तर से होकर ही गुजरती है (किंतु सदैव ऐसा अपेक्षित नहीं है)। तुलसी का राम के प्रति अनुराग अपनी पत्नी रत्नवली से दुत्कार खाने के बाद जगा। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम सुयोग्य पति और ससुराल न मिलने के कारण जगा। सूर का कृष्ण के प्रति सख्य भाव समाज में अपेक्षित सम्मान/सखा न मिलने के कारण हुआ।
स्त्री अपने पति से शारीरिक स्तर पर ही प्रेम कर पाती है। कुछेक स्थितियों में मानसिक भी हो सकता है किंतु आत्मिक स्तर पर वह सिर्फ़ अपनी संतान से जुड़ती है। इसलिये अक्सर देखा जाता है कि माँ बनने के बाद स्त्री का पुनर्जन्म होता है। वह पहले से अधिक आकर्षक और शांत हो जाती है। लेकिन आत्मिक प्रेम को उपलब्ध हो जाने के बाद शारीरिक प्रेम में उसकी रूचि कम होने लगती है। पति को यह महसूस होने लगता है कि वह उसकी तरफ पहले जितना ध्यान नहीं दे रही है।
@विन्ध्येश्वरी
Wednesday, 23 September 2020
लिंग परिवर्तन करने वाली मछलियां
लिंग परिवर्तन करने वाली मछलियां-
1- ब्लूहेड रेस्से- यह कैरेबियाई क्षेत्र में प्रवाल भित्तियों में छोटे सामाजिक समूहों में निवास करती है। केवल नर का सिर नीला होता है, जो पीली धारीदार मादाओं के समूह पर इसके सामाजिक प्रभुत्व का संकेत देता है। यदि नर मछली समूह से निकल/मर जाता है तब कुछ असाधारण घटित होता है। समूह की सबसे बड़ी मादा मछली लिंग परिवर्तित कर नर बन जाती है। उसका व्यवहार कुछ मिनटों में ही बदल जाता है। दस दिनों के भीतर उसके अंडाशय, शुक्राणु उत्पन्न करने वाले वृषण में बदल जाते हैं। 21 दिनों के भीतर वह पूर्णतया नर हो जाती है।
1- ब्लूहेड रेस्से- यह कैरेबियाई क्षेत्र में प्रवाल भित्तियों में छोटे सामाजिक समूहों में निवास करती है। केवल नर का सिर नीला होता है, जो पीली धारीदार मादाओं के समूह पर इसके सामाजिक प्रभुत्व का संकेत देता है। यदि नर मछली समूह से निकल/मर जाता है तब कुछ असाधारण घटित होता है। समूह की सबसे बड़ी मादा मछली लिंग परिवर्तित कर नर बन जाती है। उसका व्यवहार कुछ मिनटों में ही बदल जाता है। दस दिनों के भीतर उसके अंडाशय, शुक्राणु उत्पन्न करने वाले वृषण में बदल जाते हैं। 21 दिनों के भीतर वह पूर्णतया नर हो जाती है।
ब्लूहेड रेस्से मछली
2- क्लाउनफिश- इस मत्स्य समूह के शीर्ष पर हमेशा कोई मादा मछली होती है। जब उसकी मृत्यु हो जाती तब समूह का सबसे प्रभावशाली नर लिंग परिवर्तित कर मादा बन जाता है और उसका स्थान ले लेता है।
2- क्लाउनफिश- इस मत्स्य समूह के शीर्ष पर हमेशा कोई मादा मछली होती है। जब उसकी मृत्यु हो जाती तब समूह का सबसे प्रभावशाली नर लिंग परिवर्तित कर मादा बन जाता है और उसका स्थान ले लेता है।
गोबी मछली
©विन्ध्येश्वरी
©विन्ध्येश्वरी
Saturday, 19 September 2020
मानव विकास रिपोर्ट और तुंबाड प्रभाव
मानव विकास रिपोर्ट (human development report) - में कहा गया कि विश्व में दो तरह के देश हैं एक वे जिनकी आय 100 डाॅलर/वर्ष से भी कम है (जैसे- जिंबाब्वे, नाइजीरिया, घाना आदि) जबकि कुछ देश ऐसे जहाँ प्रतिव्यक्ति आय 125000 डाॅलर/वर्ष से भी अधिक है (जैसे - लक्जमबर्ग, स्वीडन, कतर आदि)। किंतु इसके बावजूद HDR में अधिकतम प्रतिव्यक्ति आय 75000 डाॅलर/वर्ष ही माना गया है। क्योंकि UNDP (HDR जारी करने वाला) का मानना है कि प्रतिव्यक्ति आय 75000 डाॅलर/वर्ष से अधिक होने के बावजूद मनुष्य के औसत कल्याण स्तर में कोई वृद्धि नहीं होती।
निष्कर्ष फिर मनुष्य हाय धन हाय धन के पीछे क्यों मरा जा रहा है? क्योंकि नहीं एक औसत आय के बाद वह अन्य लोगों के बारे में सोंचना शुरु करता? इसका एक ही कारण नजर आता है "तुंबाड प्रभाव" (तुंबाड फिल्म में हस्तर नामक देवता ने सोने और धन के लालच में अपनी माँ के खजाने से धन चुरा लिया जिसके दंड स्वरूप उसे कभी न पूजे जाने का श्राप मिला। आगे चलकर फिल्म का नायक सदाशिव राव, विनायक राव इसी हस्तर से सोने के सिक्के प्राप्त करता है लेकिन अंततः वह अपने इस लालच में अपने प्राण को त्याग देता है। किंतु उसका बेटा इससे कोई सीख न लेकर इसी राह पर चल निकलता है। यानि पूरी दुनिया बार बार एक ही गलती को दुहरा रही है और अपना जीवन नर्क बना रही है)। मनुष्य अपने लालच और अहंकार की तुष्टि में धन के पीछे मरा जा रहा है।
©विन्ध्येश्वरी
निष्कर्ष फिर मनुष्य हाय धन हाय धन के पीछे क्यों मरा जा रहा है? क्योंकि नहीं एक औसत आय के बाद वह अन्य लोगों के बारे में सोंचना शुरु करता? इसका एक ही कारण नजर आता है "तुंबाड प्रभाव" (तुंबाड फिल्म में हस्तर नामक देवता ने सोने और धन के लालच में अपनी माँ के खजाने से धन चुरा लिया जिसके दंड स्वरूप उसे कभी न पूजे जाने का श्राप मिला। आगे चलकर फिल्म का नायक सदाशिव राव, विनायक राव इसी हस्तर से सोने के सिक्के प्राप्त करता है लेकिन अंततः वह अपने इस लालच में अपने प्राण को त्याग देता है। किंतु उसका बेटा इससे कोई सीख न लेकर इसी राह पर चल निकलता है। यानि पूरी दुनिया बार बार एक ही गलती को दुहरा रही है और अपना जीवन नर्क बना रही है)। मनुष्य अपने लालच और अहंकार की तुष्टि में धन के पीछे मरा जा रहा है।
©विन्ध्येश्वरी
Saturday, 8 August 2020
जीवन और मृत्यु
जीवन और मृत्यु
जीवन क्या है? और मृत्यु क्या है? दरअस्ल दोनों ही भ्रम है। जीवन की अनुपस्थिति ही मृत्यु है। जैसे प्रकाश की अनुपस्थिति अंधकार है। स्वास्थ्य की अनुपस्थिति अस्वास्थ्य है। मैं दोनों को भ्रम क्यों कह रहा हूँ। क्योंकि जिसे हम जीवन कहते हैं वह जीवन नहीं है और जिसे मृत्यु कहते हैं वह मृत्यु नहीं है। जिसे हम जीवन कहते हैं वह मृत्यु की तैयारी है और जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह नये जीवन की तैयारी है। असली जीवन हमारे द्वारा गढ़े गये जीवन और मृत्यु के बीच मौजूद है। हम शरीर के बनने को जीवन को कहते हैं और शरीर के नष्ट होने को मृत्यु। यह सरासर भ्रामक धारणा है।
वस्तुतः मृत्यु जैसा कुछ होता ही नहीं है, होता है सिर्फ़ जीवन। शरीरी रूप में भी वह जीवन मौजूद है और मृत्यु की भी अवस्था में। उसे हम आत्मा, रूह, soul, sprit आदि नामों से जानते हैं। यह अनन्त ब्रह्मांड जो ऊर्जा ही है से निर्मित ऊर्जा का लघु कण है। विज्ञान भी सिद्ध करता है ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। लेकिन जब हम अपने सुंदर शरीर और संसार की कृत्रिमता में फंस जाते हैं तब हम सत्य को भूल जाते हैं और शरीर तथा संसार को वास्तविक मानने लगता है। जब हम शरीर और संसार को ही वास्तविक मानते हैं तब शुरु होता है, अपने होने का भान, स्वयं को प्रतिष्ठित करने की होड़, अपना-पराया, छल-छद्म, ईर्ष्या-द्वेष, पाप-पुण्य, युद्ध-शांति, समाज-राष्ट्र, परिवार-कुल आदि की अवधारणाएं। फिर शुरू होता है सब प्रपंच और फिर इसका अंतहीन सिलसिला………………
फिर इससे निकलने के अनेकानेक उपाय और उपायों का जाल। फिर मनुष्य इसी में फंसा रह जाता है। पुनरपि जननं पुनरपि मरणं।
इससे बचने का मुझे जो एकमात्र उपाय सूझता है (जो मेरा अनुभव भी है) वह है मरने की कला का ज्ञान। चौंकिए नहीं। सच कह रहा हूँ। मैं आचार्य रविशंकर की तरह से आर्ट आफ लाइफ नहीं जानता। मैं जानता हूँ "आर्ट आफ डाइंग"। क्योंकि मेरा मानना है कि जो मरना जान गया वह जीना खुद ब खुद जान जायेगा। असल में मरना कुछ नहीं है। सिर्फ़ दुनिया की नजर में यह मृत्यु है। हकीकत में यह जीवन, स्वयं के अस्तित्व तथा अपने महद रूप को जानना है। निश्चिंत रहिये इसके लिए हमें फांसी लगाना, जहर खाना, रेलगाड़ी के नीचे कट मरना, नदी में डूब मरना आदि नहीं है। अभ्यास द्वारा अपनी सारी प्राण ऊर्जा को एकत्रित करना है और उसे इस भौतिक शरीर से बाहर निकालना है। यह न तो कठिन है, न ही नामुमकिन और न ही कष्टप्रद। बल्कि इसका रस इतना आनन्ददायक है कि संसार के सारे रस तुच्छ लगेंगे।
इस रस को कैसे पाया जा सकता है? कैसे जीते जी मृत्यु को समझें………………
(अगले लेख में)
@विन्ध्येश्वरी
जीवन क्या है? और मृत्यु क्या है? दरअस्ल दोनों ही भ्रम है। जीवन की अनुपस्थिति ही मृत्यु है। जैसे प्रकाश की अनुपस्थिति अंधकार है। स्वास्थ्य की अनुपस्थिति अस्वास्थ्य है। मैं दोनों को भ्रम क्यों कह रहा हूँ। क्योंकि जिसे हम जीवन कहते हैं वह जीवन नहीं है और जिसे मृत्यु कहते हैं वह मृत्यु नहीं है। जिसे हम जीवन कहते हैं वह मृत्यु की तैयारी है और जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह नये जीवन की तैयारी है। असली जीवन हमारे द्वारा गढ़े गये जीवन और मृत्यु के बीच मौजूद है। हम शरीर के बनने को जीवन को कहते हैं और शरीर के नष्ट होने को मृत्यु। यह सरासर भ्रामक धारणा है।
वस्तुतः मृत्यु जैसा कुछ होता ही नहीं है, होता है सिर्फ़ जीवन। शरीरी रूप में भी वह जीवन मौजूद है और मृत्यु की भी अवस्था में। उसे हम आत्मा, रूह, soul, sprit आदि नामों से जानते हैं। यह अनन्त ब्रह्मांड जो ऊर्जा ही है से निर्मित ऊर्जा का लघु कण है। विज्ञान भी सिद्ध करता है ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। लेकिन जब हम अपने सुंदर शरीर और संसार की कृत्रिमता में फंस जाते हैं तब हम सत्य को भूल जाते हैं और शरीर तथा संसार को वास्तविक मानने लगता है। जब हम शरीर और संसार को ही वास्तविक मानते हैं तब शुरु होता है, अपने होने का भान, स्वयं को प्रतिष्ठित करने की होड़, अपना-पराया, छल-छद्म, ईर्ष्या-द्वेष, पाप-पुण्य, युद्ध-शांति, समाज-राष्ट्र, परिवार-कुल आदि की अवधारणाएं। फिर शुरू होता है सब प्रपंच और फिर इसका अंतहीन सिलसिला………………
फिर इससे निकलने के अनेकानेक उपाय और उपायों का जाल। फिर मनुष्य इसी में फंसा रह जाता है। पुनरपि जननं पुनरपि मरणं।
इससे बचने का मुझे जो एकमात्र उपाय सूझता है (जो मेरा अनुभव भी है) वह है मरने की कला का ज्ञान। चौंकिए नहीं। सच कह रहा हूँ। मैं आचार्य रविशंकर की तरह से आर्ट आफ लाइफ नहीं जानता। मैं जानता हूँ "आर्ट आफ डाइंग"। क्योंकि मेरा मानना है कि जो मरना जान गया वह जीना खुद ब खुद जान जायेगा। असल में मरना कुछ नहीं है। सिर्फ़ दुनिया की नजर में यह मृत्यु है। हकीकत में यह जीवन, स्वयं के अस्तित्व तथा अपने महद रूप को जानना है। निश्चिंत रहिये इसके लिए हमें फांसी लगाना, जहर खाना, रेलगाड़ी के नीचे कट मरना, नदी में डूब मरना आदि नहीं है। अभ्यास द्वारा अपनी सारी प्राण ऊर्जा को एकत्रित करना है और उसे इस भौतिक शरीर से बाहर निकालना है। यह न तो कठिन है, न ही नामुमकिन और न ही कष्टप्रद। बल्कि इसका रस इतना आनन्ददायक है कि संसार के सारे रस तुच्छ लगेंगे।
इस रस को कैसे पाया जा सकता है? कैसे जीते जी मृत्यु को समझें………………
(अगले लेख में)
@विन्ध्येश्वरी
Friday, 31 July 2020
एक अनुभव : मृत्यु का अनुभव
एक अनुभव : मृत्यु का अनुभव
आज रात (30 जुलाई 2020) एक महीने के बाद एक ऐसा शानदार अनुभव हुआ जो संभवतः अब मिले न मिले। वह अनुभव है, मृत्यु का अनुभव। सच परम अनुभव था।
मैं विगत एक महीने से भौतिक शरीर से सूक्ष्म शरीर को निकालने का अभ्यास कर रहा था। प्रायः रात में। कभी-कभी दिन में भी। लेकिन अभी तक आंशिक सफलता ही मिलती थी। सूक्ष्म शरीर निकलने की कोशिश करता था किंतु नहीं कर पाता था। इसका नतीजा यह होता था कि काफी देर तक सिर और शरीर में दर्द रहता था। मगर आज तो कमाल ही हो गया।
आज रात जब मैं लेटकर अभ्यास कर था। मुझे अनुभव हुआ कि शरीर से आत्मा पृथक हो गयी है और यह भौतिक शरीर अचेत पड़ा हुआ है। मेरा सूक्ष्म शरीर उसे देख रहा है।*
आज रात (30 जुलाई 2020) एक महीने के बाद एक ऐसा शानदार अनुभव हुआ जो संभवतः अब मिले न मिले। वह अनुभव है, मृत्यु का अनुभव। सच परम अनुभव था।
मैं विगत एक महीने से भौतिक शरीर से सूक्ष्म शरीर को निकालने का अभ्यास कर रहा था। प्रायः रात में। कभी-कभी दिन में भी। लेकिन अभी तक आंशिक सफलता ही मिलती थी। सूक्ष्म शरीर निकलने की कोशिश करता था किंतु नहीं कर पाता था। इसका नतीजा यह होता था कि काफी देर तक सिर और शरीर में दर्द रहता था। मगर आज तो कमाल ही हो गया।
आज रात जब मैं लेटकर अभ्यास कर था। मुझे अनुभव हुआ कि शरीर से आत्मा पृथक हो गयी है और यह भौतिक शरीर अचेत पड़ा हुआ है। मेरा सूक्ष्म शरीर उसे देख रहा है।*
अच्छा तो यह है मेरा शरीर!………
अच्छा तो अब यह अचेत पड़ा है!……
ठीक है!……
और फिर मैं आगे बढ़ गया। जहाँ तक मेरा अनुमान है लगभग एक घंटा मैं इसी अवस्था में रहा फिर वर्तमान अवस्था में वापस आ गया।
यह एक घंटा अविस्मरणीय क्षण है। इतना आनन्द, इतना शुकून, इतनी शांति, इतना निर्विकार, इतना निर्अहंकार। सचमुच अवर्णनीय। फिर यह ज्ञात हुआ कि
1- मृत्यु जैसा कुछ नहीं है। जीवन एक भ्रम है। ठीक वैसे जैसे समुद्र से एक गिलास पानी निकाल कर हम उसको फ्रीजर में रखकर जमा दें और उसे बर्फ मानकर खुश हो लें। ऐसे अनन्त ऊर्जा के समुद्र से थोड़ी सी ऊर्जा निकालकर अलग - अलग पिंडों (शरीरों) में रखकर जीवन बना है। जीवन बर्फ बनाना है और मृत्यु उस गिलास से मुक्त होना।
2- तुलसीदास ने लिखा है कि "जनमत मरत दुसह दुख होइ।" जन्म के समय का तो याद नहीं है लेकिन कम से कम आज मुझे तो मृत्यु में आनन्द, नहीं परमानन्द आया। शायद तुलसी की बात उनके लिए सच हो जो मरना नहीं चाहते। जिन्हें मरने से डर लगता है। ठीक वैसे ही जैसे गिलास में बना हुआ बर्फ बाहर न निकलना चाह रहा हो। और जब उसे जबर्दस्ती निकालना पड़े तो ठोक पीटकर निकाला जाये।
3- अब मैं सोंचता हूँ कि काश! मरने का यह अनुभव हर किसी को हो। संभव है पृथ्वी पर मृत्यु का भय न रह जाये।
4- मैंने महसूस किया कि इस ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जाएं मौजूद हैं। और उनका किसी से कोई बैर विरोध नहीं। सब स्वतंत्र और मुक्त हैं। काश ऐसी ही यह दुनिया भी हो पाती। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे - समुद्र से पानी निकाल कर अलग अलग पात्रों में रख दिया जाये। लोटा, गिलास, चम्मच, थाली, कढ़ाही, भगोना, भदेली, टब आदि। अब इन्हें अगर बर्फ बनाया जायेगा तो अलग अलग आकार-प्रकार में बर्फ बनेगा। कौन सा बर्फ श्रेष्ठ है, कौन सा घटिया कौन बता सकता है? अब यह प्रक्रिया अगर बार बार दुहरायी जाये। यानी इस बर्फ को फिर से पानी बनाकर फिर से विभिन्न बर्तनों में भरकर बर्फ बनाया जाये तो कौन बता सकता है कि किस बर्तन का पानी कहाँ है? मुझे महसूस हुआ कि इस अनन्त ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जा का समुद्र है। इसी में से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, मुस्लमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, ऊँचा, नीचा, गरीब, अमीर, स्त्री, पुरुष, जानवर, वृक्ष सब बनते हैं। यही प्रक्रिया अनन्त कालों से जारी है पता नहीं कौन सा व्यक्ति क्या था, क्या है और आगे क्या होगा। अगर मरने का सच सब अनुभव कर लें तो दुनिया का वितंडा ही खत्म हो जायेगा।
4- एक कसक बाकी रह गयी कि अगर इस दौरान किसी अन्य सूक्ष्म आत्मा से मुलाकात हो जाती तो कम से कम उसका भी अनुभव पूछ लिया जाता।
यह एक घंटा अविस्मरणीय क्षण है। इतना आनन्द, इतना शुकून, इतनी शांति, इतना निर्विकार, इतना निर्अहंकार। सचमुच अवर्णनीय। फिर यह ज्ञात हुआ कि
1- मृत्यु जैसा कुछ नहीं है। जीवन एक भ्रम है। ठीक वैसे जैसे समुद्र से एक गिलास पानी निकाल कर हम उसको फ्रीजर में रखकर जमा दें और उसे बर्फ मानकर खुश हो लें। ऐसे अनन्त ऊर्जा के समुद्र से थोड़ी सी ऊर्जा निकालकर अलग - अलग पिंडों (शरीरों) में रखकर जीवन बना है। जीवन बर्फ बनाना है और मृत्यु उस गिलास से मुक्त होना।
2- तुलसीदास ने लिखा है कि "जनमत मरत दुसह दुख होइ।" जन्म के समय का तो याद नहीं है लेकिन कम से कम आज मुझे तो मृत्यु में आनन्द, नहीं परमानन्द आया। शायद तुलसी की बात उनके लिए सच हो जो मरना नहीं चाहते। जिन्हें मरने से डर लगता है। ठीक वैसे ही जैसे गिलास में बना हुआ बर्फ बाहर न निकलना चाह रहा हो। और जब उसे जबर्दस्ती निकालना पड़े तो ठोक पीटकर निकाला जाये।
3- अब मैं सोंचता हूँ कि काश! मरने का यह अनुभव हर किसी को हो। संभव है पृथ्वी पर मृत्यु का भय न रह जाये।
4- मैंने महसूस किया कि इस ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जाएं मौजूद हैं। और उनका किसी से कोई बैर विरोध नहीं। सब स्वतंत्र और मुक्त हैं। काश ऐसी ही यह दुनिया भी हो पाती। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे - समुद्र से पानी निकाल कर अलग अलग पात्रों में रख दिया जाये। लोटा, गिलास, चम्मच, थाली, कढ़ाही, भगोना, भदेली, टब आदि। अब इन्हें अगर बर्फ बनाया जायेगा तो अलग अलग आकार-प्रकार में बर्फ बनेगा। कौन सा बर्फ श्रेष्ठ है, कौन सा घटिया कौन बता सकता है? अब यह प्रक्रिया अगर बार बार दुहरायी जाये। यानी इस बर्फ को फिर से पानी बनाकर फिर से विभिन्न बर्तनों में भरकर बर्फ बनाया जाये तो कौन बता सकता है कि किस बर्तन का पानी कहाँ है? मुझे महसूस हुआ कि इस अनन्त ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जा का समुद्र है। इसी में से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, मुस्लमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, ऊँचा, नीचा, गरीब, अमीर, स्त्री, पुरुष, जानवर, वृक्ष सब बनते हैं। यही प्रक्रिया अनन्त कालों से जारी है पता नहीं कौन सा व्यक्ति क्या था, क्या है और आगे क्या होगा। अगर मरने का सच सब अनुभव कर लें तो दुनिया का वितंडा ही खत्म हो जायेगा।
4- एक कसक बाकी रह गयी कि अगर इस दौरान किसी अन्य सूक्ष्म आत्मा से मुलाकात हो जाती तो कम से कम उसका भी अनुभव पूछ लिया जाता।
*चेतावनी- यदि आप यह अभ्यास कर रहे हैं तो कृपया ध्यान दें कि यदि आप अपने आपको संभाल न पाये तो दुनिया की नजर में आप मृत भी घोषित हो सकते हैं क्योंकि यह एक मृत्यु जैसा अनुभव ही है। अतः आप इसे अपने रिस्क पर करें। संभव है कि सूक्ष्म शरीर को आपका भौतिक शरीर पूरी तरह स्वीकार न कर सके अतः, पक्षाघात जैसी समस्या भी हो सकती है। क्योंकि कई बार यह करने पर मेरे शरीर में भिन्न-भिन्न अंगों में अनायास दर्द की समस्या हो चुकी है।
परम शांति- विन्ध्येश्वरी
परम शांति- विन्ध्येश्वरी
Thursday, 30 July 2020
इतिहास में संख्यात्मक व्यवस्था
1- नवरत्न- चंद्रगुप्त द्वितीय और अकबर के शासनकाल में (नवरत्न में राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सभी प्रकार के लोग शामिल)
2- अष्टदिग्गज- विजयनगर साम्राज्य में कृष्णदेव राय के शासनकाल में (केवल सांस्कृतिक लोग)
3- अष्टप्रधान- मराठा साम्राज्य में (प्रशासनिक लोग)
4- अष्टछाप- भक्तिकाल में कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवियों का समूह
5- सप्तांग सिद्धांत- आचार्य चाणक्य द्वारा वर्णित शासन व्यवस्था (1- राजा-सिर, 2- अमात्य-आंख, 3- जनपद-जंघा,4- दुर्ग-बांह, 5- कोष - मुख, 6- दंड/बल/सेना - मस्तिष्क, 7- मित्र - कान)
6- पंच प्रांत - अशोक कालीन प्रांत (1- उत्तरापथ - तक्षशिला, 2- अवंति राष्ट्र - उज्जयिनी, 3- कलिंग प्रांत - तोसली, 4- दक्षिणापथ - सुवर्णगिरि, 5- प्राची (मध्यदेश) - पाटलिपुत्र)
@विन्ध्येश्वरी
2- अष्टदिग्गज- विजयनगर साम्राज्य में कृष्णदेव राय के शासनकाल में (केवल सांस्कृतिक लोग)
3- अष्टप्रधान- मराठा साम्राज्य में (प्रशासनिक लोग)
4- अष्टछाप- भक्तिकाल में कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवियों का समूह
5- सप्तांग सिद्धांत- आचार्य चाणक्य द्वारा वर्णित शासन व्यवस्था (1- राजा-सिर, 2- अमात्य-आंख, 3- जनपद-जंघा,4- दुर्ग-बांह, 5- कोष - मुख, 6- दंड/बल/सेना - मस्तिष्क, 7- मित्र - कान)
6- पंच प्रांत - अशोक कालीन प्रांत (1- उत्तरापथ - तक्षशिला, 2- अवंति राष्ट्र - उज्जयिनी, 3- कलिंग प्रांत - तोसली, 4- दक्षिणापथ - सुवर्णगिरि, 5- प्राची (मध्यदेश) - पाटलिपुत्र)
@विन्ध्येश्वरी
अस्थायी वर्णव्यवस्था
वेद, पुराण और इतिहास से कुछ उदाहरण जहाँ वर्ण व्यवस्था स्थायी व्यवस्था नहीं थी। लोग एक वर्ण से दूसरे वर्ण में स्थानान्तरित हुए-
1- ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे। परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की। ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है।
2- ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे। जुआरी और हीन चरित्र भी थे। परन्तु बाद मेंं उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये। ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया। (ऐतरेय ब्राह्मण 2.19)
3- सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।
4- राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। (विष्णु पुराण 4.1.14)
5- राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए। पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। (विष्णु पुराण 4.1.13)
6- धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। (विष्णु पुराण 4.2.2)
7- आगे उन्हीं के वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए। (विष्णु पुराण 4.2.2)
8- भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए।
9- विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने।
10- हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए। (विष्णु पुराण)
11- क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। (विष्णु पुराण (4.8.1)
12- वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए। इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं।
13- मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने।
14- ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना।
15- राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ।
16- त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे।
17- विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया।
विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया।
18- विदुर दासी पुत्र थे तथापि वे ब्राह्मण हुए
और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया।
@विन्ध्येश्वरी
1- ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे। परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की। ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है।
2- ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे। जुआरी और हीन चरित्र भी थे। परन्तु बाद मेंं उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये। ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया। (ऐतरेय ब्राह्मण 2.19)
3- सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।
4- राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। (विष्णु पुराण 4.1.14)
5- राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए। पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। (विष्णु पुराण 4.1.13)
6- धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। (विष्णु पुराण 4.2.2)
7- आगे उन्हीं के वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए। (विष्णु पुराण 4.2.2)
8- भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए।
9- विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने।
10- हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए। (विष्णु पुराण)
11- क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। (विष्णु पुराण (4.8.1)
12- वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए। इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं।
13- मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने।
14- ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना।
15- राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ।
16- त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे।
17- विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया।
विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया।
18- विदुर दासी पुत्र थे तथापि वे ब्राह्मण हुए
और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया।
@विन्ध्येश्वरी
Wednesday, 29 July 2020
एलीफेंट बाॅण्ड
एलीफेंट बाॅण्ड
1 - सुरजीत एस. भल्ला की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय सलाहकार समूह द्वारा जारी करने का सुझाव।
2 - एलिफेंट बाॅण्ड के बारे में-
• एलिफेंट बाॅण्ड किसी राष्ट्र द्वारा जारी 25 वर्षीय - (20-30 वर्ष के रेंज में) सॉवरेन बाॅण्ड होते हैं।
• ये बाॅण्ड उन लोगों को जारी किये जाते हैं जो अपनी पहले से अघोषित आय को घोषित करते हैं।
• बाॅण्ड ग्राहक अपनी अघोषित आय का 40% एलिफेंट बाॅण्ड में निवेश करेंगे तथा उन्हें एक निश्चित कूपन प्रतिभूति (Fixed Coupon Security) जारी की जाएगी।
• बाॅण्ड से प्राप्त राशि का 45% जमाकर्त्ता के पास जमा की जाएगी तथा शेष 15% राशि सरकार द्वारा कर के रूप में वसूली जाएगी।
3 - सुझाव-
• इससे भारत का विदेशों में जमा काले धन का लगभग 500 बिलियन डॉलर तक प्राप्त किया जा सकता है।
• अवसंरचना परियोजनाओं को गति प्रदान किया जा सकता है।
• आय घोषित करने वालों को “विदेशी मुद्रा, काले धन कानूनों और कराधान कानूनों सहित सभी कानूनों से प्रतिरक्षा प्राप्त होगी।
• अघोषित संपत्ति वाले लोग केवल 15 प्रतिशत कर का भुगतान करेंगे और एलिफेंट बाॅण्ड के प्रावधानों के तहत उनके लिये कोई दंड नहीं होगा।
4- वैश्विक पहल
• इंडोनेशिया, पाकिस्तान, अर्जेंटीना और फिलीपींस जैसे देशों ने भी बिना किसी दंड के जोखिम के अघोषित आय का खुलासा करने वाले व्यक्तियों के लिये कर माफी योजनाएँ शुरू की हैं।
5- पूर्व में किया गया पहल-
• 1981 में कालेधन के लिए स्पेशल बियरर बांड अधिनियम 1981 को पेश किया गया था।
• मोदी सरकार ने 2016 में प्रधान मंत्री गरीब कल्याण डिपोजिट योजना (PMGKDS) को पेश किया था।
@विन्ध्येश्वरी
1 - सुरजीत एस. भल्ला की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय सलाहकार समूह द्वारा जारी करने का सुझाव।
2 - एलिफेंट बाॅण्ड के बारे में-
• एलिफेंट बाॅण्ड किसी राष्ट्र द्वारा जारी 25 वर्षीय - (20-30 वर्ष के रेंज में) सॉवरेन बाॅण्ड होते हैं।
• ये बाॅण्ड उन लोगों को जारी किये जाते हैं जो अपनी पहले से अघोषित आय को घोषित करते हैं।
• बाॅण्ड ग्राहक अपनी अघोषित आय का 40% एलिफेंट बाॅण्ड में निवेश करेंगे तथा उन्हें एक निश्चित कूपन प्रतिभूति (Fixed Coupon Security) जारी की जाएगी।
• बाॅण्ड से प्राप्त राशि का 45% जमाकर्त्ता के पास जमा की जाएगी तथा शेष 15% राशि सरकार द्वारा कर के रूप में वसूली जाएगी।
3 - सुझाव-
• इससे भारत का विदेशों में जमा काले धन का लगभग 500 बिलियन डॉलर तक प्राप्त किया जा सकता है।
• अवसंरचना परियोजनाओं को गति प्रदान किया जा सकता है।
• आय घोषित करने वालों को “विदेशी मुद्रा, काले धन कानूनों और कराधान कानूनों सहित सभी कानूनों से प्रतिरक्षा प्राप्त होगी।
• अघोषित संपत्ति वाले लोग केवल 15 प्रतिशत कर का भुगतान करेंगे और एलिफेंट बाॅण्ड के प्रावधानों के तहत उनके लिये कोई दंड नहीं होगा।
4- वैश्विक पहल
• इंडोनेशिया, पाकिस्तान, अर्जेंटीना और फिलीपींस जैसे देशों ने भी बिना किसी दंड के जोखिम के अघोषित आय का खुलासा करने वाले व्यक्तियों के लिये कर माफी योजनाएँ शुरू की हैं।
5- पूर्व में किया गया पहल-
• 1981 में कालेधन के लिए स्पेशल बियरर बांड अधिनियम 1981 को पेश किया गया था।
• मोदी सरकार ने 2016 में प्रधान मंत्री गरीब कल्याण डिपोजिट योजना (PMGKDS) को पेश किया था।
@विन्ध्येश्वरी
Monday, 27 July 2020
दुनिया में महिलाओं का सबसे बड़ा मेला (गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड के अनुसार)
दुनिया में महिलाओं का सबसे बड़ा मेला
गिनीज़ बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड के अनुसार भारत में केरल राज्य के थिरुवनंतपुरम में संसार में महिलाओं द्वारा आयोजित सबसे बड़ा धार्मिक अनुष्ठान होता है। जिसमे लाखों महिलाई जाति, धर्म, ऊँच नीच के भेदभाव को भुलाकर दूर दूर से चलकर थिरुवनंतपुरम के प्राचीन आट्टूकल भगवति (देवी) मंदिर के प्रांगण में बिना किसी बुलावे या निमंत्रण के एकत्रित होती हैं।
यहाँ इस मंदिर में प्रति वर्ष फरवरी मार्च के महीने में दस दिनों का उत्सव होता है। उत्सव भरणी /कृत्तिका नक्षत्र के दिन प्रारंभ होता है। नौवां दिन विशेष महत्त्व का रहता है जब सभी महिलाएं देवी के लिए नैवेद्य के रूप में वहीं चूल्हे जलाकर खीर पकाती हैं। इसलिए इस ख़ास अनुष्ठान का नाम है “पोंगाला” है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है उफनने तक उबालना। इस तरह के पोंगाला का प्रचलन तमिलनाडु में भी कई जगह है परन्तु जो बात आट्टूकल में है वह अन्यत्र नहीं।
पिछली बार यह संख्या 15 लाख थी। जहाँ देखो वहां चूल्हा, सड़क के दोनों ओर, स्थानीय निवासियों के घरों के कम्पाउंड, दफ्तरों के बाहर या कहें जहाँ जगह मिली वहीं। मंदिर के लगभग 5 किमी की परिधि में यत्र तत्र सर्वत्र परन्तु कतारबद्ध।
यह त्यौहार केवल महिलाओं के लिए है और पुरुष इसमें भाग नहीं ले सकते। मूलतः यह एक आदिम (अवैदिक) परंपरा रही है और समाज के निम्न वर्ग ही इसमें भाग लिया करते थे। परन्तु अब स्थितियां बदल गयी हैं। अब तो सभी वर्ण के लोग और बड़ी - बड़ी हस्तियां भी यहाँ देखी जा सकती हैं। इसलिए इस पोंगाला को महिलाओं की शबरीमला कहा जाता है।
गिनीज़ बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड के अनुसार भारत में केरल राज्य के थिरुवनंतपुरम में संसार में महिलाओं द्वारा आयोजित सबसे बड़ा धार्मिक अनुष्ठान होता है। जिसमे लाखों महिलाई जाति, धर्म, ऊँच नीच के भेदभाव को भुलाकर दूर दूर से चलकर थिरुवनंतपुरम के प्राचीन आट्टूकल भगवति (देवी) मंदिर के प्रांगण में बिना किसी बुलावे या निमंत्रण के एकत्रित होती हैं।
यहाँ इस मंदिर में प्रति वर्ष फरवरी मार्च के महीने में दस दिनों का उत्सव होता है। उत्सव भरणी /कृत्तिका नक्षत्र के दिन प्रारंभ होता है। नौवां दिन विशेष महत्त्व का रहता है जब सभी महिलाएं देवी के लिए नैवेद्य के रूप में वहीं चूल्हे जलाकर खीर पकाती हैं। इसलिए इस ख़ास अनुष्ठान का नाम है “पोंगाला” है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है उफनने तक उबालना। इस तरह के पोंगाला का प्रचलन तमिलनाडु में भी कई जगह है परन्तु जो बात आट्टूकल में है वह अन्यत्र नहीं।
पिछली बार यह संख्या 15 लाख थी। जहाँ देखो वहां चूल्हा, सड़क के दोनों ओर, स्थानीय निवासियों के घरों के कम्पाउंड, दफ्तरों के बाहर या कहें जहाँ जगह मिली वहीं। मंदिर के लगभग 5 किमी की परिधि में यत्र तत्र सर्वत्र परन्तु कतारबद्ध।
यह त्यौहार केवल महिलाओं के लिए है और पुरुष इसमें भाग नहीं ले सकते। मूलतः यह एक आदिम (अवैदिक) परंपरा रही है और समाज के निम्न वर्ग ही इसमें भाग लिया करते थे। परन्तु अब स्थितियां बदल गयी हैं। अब तो सभी वर्ण के लोग और बड़ी - बड़ी हस्तियां भी यहाँ देखी जा सकती हैं। इसलिए इस पोंगाला को महिलाओं की शबरीमला कहा जाता है।
@साभार अंतर्जाल
Saturday, 25 July 2020
नागपंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा
नागपंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा
उ. प्र. में नागपंचमी के दिन गुड़िया पीटने की प्रथा है। एक तरह से यह दासप्रथा और स्त्रियों के गौरव गरिमा के विरुद्ध प्रथा है। लेकिन हम इसे भी शान से मनाते आ रहे हैं।
इस संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। कुछ समय बाद तक्षक की चौथी पीढ़ी की बेटी/कन्या की शादी राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में हुई। जब वह शादी करके ससुराल में आई तो उसने यह राज एक सेविका को बता दिया और उससे कहा कि वह यह बात किसी से न कहें, लेकिन सेविका से रहा नहीं गया और उसने यह बात किसी दूसरी महिला को बता दी।
इस तरह बात फैलते-फैलते पूरे नगर में फैल गई। इस बात से तक्षक राजा को क्रोध आ गया और क्रोधित होकर उसने नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा होने का आदेश देकर कोड़ों से पिटवाकर मरवा दिया। उसके पीछे राजा को इस बात का गुस्सा था कि 'औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती'। माना जाता है कि तभी से गुड़िया पीटने की परंपरा मनाई जा रही है।
दूसरी कहानी यह है -
एक लड़की का भाई भगवान भोलेनाथ का परम भक्त था और वह प्रतिदिन मंदिर जाता था। उस मंदिर में उसे हर रोज 'नाग' देवता के दर्शन होते थे। वह लड़का हर दिन नाग देवता को दूध पिलाने लगा और धीरे-धीर दोनों में प्रेम हो गया। नाग देवता को उस लड़के से इतना प्रेम हो गया कि वो उसे देखते ही अपनी मणि छोड़ उसके पैरों में लिपट जाता था।
इसी तरह एक दिन श्रावण के महीने में दोनों भाई-बहन एकसाथ मंदिर गए। मंदिर में जाते ही 'नाग' देवता लड़के को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया और बहन ने जब यह नजारा देखा तो उसके मन में भय उत्पन्न हुआ। उसे लगा कि नाग उसके भाई को काट रहा है। तब लड़की ने भाई की जान बचाने के लिए नाग को पीट-पीटकर मार डाला।
इसके बाद जब भाई ने पूरी कहानी बहन को सुनाई तो वह रोने लगी। फिर वहां उपस्थित लोगों ने कहा कि 'नाग' देवता का रूप होते हैं इसीलिए तुम्हें दंड तो मिलेगा, चूंकि यह पाप अनजाने में हुआ है इसलिए कालांतर में लड़की की जगह गुड़िया को पीटा जाएगा। इस तरह गुड़िया पीटने की परंपरा शुरू हुई।
उ. प्र. में नागपंचमी के दिन गुड़िया पीटने की प्रथा है। एक तरह से यह दासप्रथा और स्त्रियों के गौरव गरिमा के विरुद्ध प्रथा है। लेकिन हम इसे भी शान से मनाते आ रहे हैं।
इस संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। कुछ समय बाद तक्षक की चौथी पीढ़ी की बेटी/कन्या की शादी राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में हुई। जब वह शादी करके ससुराल में आई तो उसने यह राज एक सेविका को बता दिया और उससे कहा कि वह यह बात किसी से न कहें, लेकिन सेविका से रहा नहीं गया और उसने यह बात किसी दूसरी महिला को बता दी।
इस तरह बात फैलते-फैलते पूरे नगर में फैल गई। इस बात से तक्षक राजा को क्रोध आ गया और क्रोधित होकर उसने नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा होने का आदेश देकर कोड़ों से पिटवाकर मरवा दिया। उसके पीछे राजा को इस बात का गुस्सा था कि 'औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती'। माना जाता है कि तभी से गुड़िया पीटने की परंपरा मनाई जा रही है।
दूसरी कहानी यह है -
एक लड़की का भाई भगवान भोलेनाथ का परम भक्त था और वह प्रतिदिन मंदिर जाता था। उस मंदिर में उसे हर रोज 'नाग' देवता के दर्शन होते थे। वह लड़का हर दिन नाग देवता को दूध पिलाने लगा और धीरे-धीर दोनों में प्रेम हो गया। नाग देवता को उस लड़के से इतना प्रेम हो गया कि वो उसे देखते ही अपनी मणि छोड़ उसके पैरों में लिपट जाता था।
इसी तरह एक दिन श्रावण के महीने में दोनों भाई-बहन एकसाथ मंदिर गए। मंदिर में जाते ही 'नाग' देवता लड़के को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया और बहन ने जब यह नजारा देखा तो उसके मन में भय उत्पन्न हुआ। उसे लगा कि नाग उसके भाई को काट रहा है। तब लड़की ने भाई की जान बचाने के लिए नाग को पीट-पीटकर मार डाला।
इसके बाद जब भाई ने पूरी कहानी बहन को सुनाई तो वह रोने लगी। फिर वहां उपस्थित लोगों ने कहा कि 'नाग' देवता का रूप होते हैं इसीलिए तुम्हें दंड तो मिलेगा, चूंकि यह पाप अनजाने में हुआ है इसलिए कालांतर में लड़की की जगह गुड़िया को पीटा जाएगा। इस तरह गुड़िया पीटने की परंपरा शुरू हुई।
Friday, 24 July 2020
क्या सांप दूध पीते हैं?
क्या सांप दूध पीते हैं?
जी नहीं, साँप दूध नहीं पीते ǀ आप कह सकतें हैं कि “आप क्या बात करतें हैं, हमनें कितनीं ही बार सपेरों (साँप पकडनें वाले) को दूध पिलाते देखा है”ǀ हाँ, आपनें अवश्य देखा होगा लेकिन उसकी वास्तविकता कुछ और ही हैǀ
पहले मैं आपको यह बता दूँ कि साँप दूध क्यों नहीं पीते? प्रकृति अपनें में ‘परफेक्ट’ और मितव्ययी हैǀ अर्थात वह प्राणियों में उन्हीं अंगों और रसायनों का निर्माण करती है जिसकी उस प्राणी को आवश्यकता होती हैǀ साँप के आमाशय या आँत में दूध को पचा सकनें वाले रसायन का निर्माण ही नहीं होता अतः दूध का पाचन संभव नहीं ǀ जिस भोजन का पाचन प्राणी नहीं कर पाता उसका सेवन भी नहीं करता ǀ अतः साँप भी दूध नहीं पीता ǀ
अब दूसरी बात कि क्या पी सकता है? तो उसका भी उत्तर है कि नहीं, क्यों कि लचीले गालों की अनुपस्थिति में वह तरल पदार्थों को मुँह में खींच नहीं सकता तथापि निचले जबड़े से जुडी बहुत सी त्वचा की सिकुड़न स्पंज की तरह पानीं को शोषित कर मुँह में डाल सकती है (Cundall, David. Drinking in Snakes: Resolving a Biomechanical Puzzel, 2012, Lehigh Univ , News Article), परन्तु दूध को नहीं क्यों कि दूध एक ‘कोल्याड़ल सल्यूशन’ होनें के कारण पानीं की सापेक्ष काफी गाढ़ा होता है/
सपेरे नाग पंचमी से एक महीने पहले से ही साँपों को पकड़ना प्रारम्भ कर देते है और इन्हे भूखा रखतेǀ साँप अपनीं पानी की जरूरत अपनें शिकार के शरीर में उपस्थित पानी से करता है और बहुत विवशता या फिर बहुत दिनों से शिकार न मिलनें पर प्यास से जूझ रहा हो तब ही वो किसी तरल पदार्थ की ओर आकर्षित होता है ǀ बहुत दिनों से भूखा-प्यासा साँप न केवल कमजोर हो जाता है वरन डिहाइड्रेशन का भी शिकार हो जाता हैǀ अब जब पीड़ित साँप के मुँह को दूध के पात्र में डाला जाता है तो ‘मरता क्या न करता’ की हालत में कुछ दूध वो पी लेता है लेकिन तुरंत ही अपना मुँह हटा लेता है ǀ लेकिन सपेरे को तो आज दिन भर उसी साँप को दूध पिलाना हैǀ तो वो क्या करता है, देखिये -
अब आता हूँ तीसरी बात पर कि फिर ये सपेरे क्या करतें है?उसका मैं चित्रों के माध्यम से बतानें का प्रयास करता हूँ -
चित्र संख्या ०१
चित्र संख्या ०२
पहले चित्र में ‘क्यू’ क्लिप के बीच में एक नली का खुला सिरा दिखाई दे रहा हैǀ यह ‘ग्लोटिस’ है और जो नली दिखाई दे रही है वह ‘ट्रैकिया’ या ‘विंड़ पाईप’ या स्वाँस नली हैǀ जैसा कि दोनों चित्रों में दिखाई दे रहा है कि ‘ग्लोटिस’ निचले जबड़े में सबसे आगे की ओर खुलता है और जब जबड़े बंद होते हैं तो खिंच कर बाहर तक पहुँच जाता हैǀ ‘ट्रैकिया’ या ‘विंड़ पाईप’ या स्वाँस नली एक लम्बी संरचना होती है और ह्रदय के पास पहुँच कर दो भागों में विभक्त हो जाती है – एक बाँया भाग और दूसरा दाहिना भागǀ दोनों भाग अपनी और के फेफड़ों से जुड़े रहते हैं ǀ बायाँ फेफड़ा छोटा और अविकसित होता है जब कि दाहिना पूर्ण विकसित और बहुत लम्बा होता हैǀ इसका हृदय की और का भाग स्वसन में भाग लेता है जब की पीछे वाला भाग एक गुब्बारे जैसा ही होता है जिसमे हवा भरी तो रह सकती है परन्तु उस भाग में स्वसन नहीं होता हैǀ वायु इसी क्रम में फेफड़ों में आती है और इसके विपरीत क्रम में बाहर जाती है ǀ नीचे दिया
चित्र संख्या ०३
अब जब सपेरे को दूसरी–तीसरी जगह साँप दूध पिलाना है तो वो साँप को नीचे दिखाये गये तरीके से पकड़ता है
चित्र संख्या ०४
चित्र संख्या ०५
स्वांस नली दबाव के कारण बंद हो जाती है ǀआठ-दस मिनट में उसके फेफड़े की ऑक्सीजन समाप्त होनें लगती है और अब जब सपेरा साँप के मुँह को दूध के पात्र में डालता है तो सांस खीचनें के साथ दूध उसके फेफड़ों में भर जाता है ǀ पात्र कुछ खाली हो जाता है और हम नाग देवता का आशीर्वाद मान खुश होतें है और अपनें ‘नाग देवता’ को धीमी परन्तु निश्चित मौत की ओर प्रयाण करनें के लिए हर्षित मन से बिदा कर देते हे ǀ
सपेरे जब साँपों को पकड़ते हैं तो सर्व प्रथम ज़हर के दाँत तोड़ देते है, उसकी पीड़ा, फिर भूख-प्यास की तड़प और अंत में जब दूध या तो पेट में गया या फिर फेफड़े मेंǀ पेट में जानें पर दूध की प्रोटीन और पानीं अलग हो गया ǀ पानीं से लाभ हुआ कि डिहाइड्रेशन की समस्या कुछ कम हुयी परन्तु प्रोटीन का पाचन तो संभव ही नहीं, क्योंकि दूध में पायी जानें वाली 'प्रोटीन' के पाचन के लिए जिस 'एंजाइम' की आवश्यकता होती है वह 'एंजाइम' साँप के आमाशय में नहीं पाया जाता है; और दूसरी ओर मुँह घायल अतः कुछ निगला भी नहीं जा सकता तो फिर कमजोर तो हो ही जाना है ǀ अब यदि दूध फेफेड़े में जमा हो गया जिसकी संभावना रहती ही रहती है, तो साँस भी नहीं ली जा सकती और तब उन नाग देवता को जिनकी हमनें 15-20 दिन पहले पूजा की थी हमनें ही स्वर्ग की राह दिखा दी ǀ अब यह तो आप ही निर्णय लें कि आपको श्राप मिला या आशीर्वादǀ मैनें इस प्रश्न के उत्तर के माध्यम से अपनीं बात आप सभी तक पहुँचानें का एक प्रयास किया है ǀ
©वेंकटेश शुक्ला
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
जीवविज्ञान विभाग
कानपुर
जी नहीं, साँप दूध नहीं पीते ǀ आप कह सकतें हैं कि “आप क्या बात करतें हैं, हमनें कितनीं ही बार सपेरों (साँप पकडनें वाले) को दूध पिलाते देखा है”ǀ हाँ, आपनें अवश्य देखा होगा लेकिन उसकी वास्तविकता कुछ और ही हैǀ
पहले मैं आपको यह बता दूँ कि साँप दूध क्यों नहीं पीते? प्रकृति अपनें में ‘परफेक्ट’ और मितव्ययी हैǀ अर्थात वह प्राणियों में उन्हीं अंगों और रसायनों का निर्माण करती है जिसकी उस प्राणी को आवश्यकता होती हैǀ साँप के आमाशय या आँत में दूध को पचा सकनें वाले रसायन का निर्माण ही नहीं होता अतः दूध का पाचन संभव नहीं ǀ जिस भोजन का पाचन प्राणी नहीं कर पाता उसका सेवन भी नहीं करता ǀ अतः साँप भी दूध नहीं पीता ǀ
अब दूसरी बात कि क्या पी सकता है? तो उसका भी उत्तर है कि नहीं, क्यों कि लचीले गालों की अनुपस्थिति में वह तरल पदार्थों को मुँह में खींच नहीं सकता तथापि निचले जबड़े से जुडी बहुत सी त्वचा की सिकुड़न स्पंज की तरह पानीं को शोषित कर मुँह में डाल सकती है (Cundall, David. Drinking in Snakes: Resolving a Biomechanical Puzzel, 2012, Lehigh Univ , News Article), परन्तु दूध को नहीं क्यों कि दूध एक ‘कोल्याड़ल सल्यूशन’ होनें के कारण पानीं की सापेक्ष काफी गाढ़ा होता है/
सपेरे नाग पंचमी से एक महीने पहले से ही साँपों को पकड़ना प्रारम्भ कर देते है और इन्हे भूखा रखतेǀ साँप अपनीं पानी की जरूरत अपनें शिकार के शरीर में उपस्थित पानी से करता है और बहुत विवशता या फिर बहुत दिनों से शिकार न मिलनें पर प्यास से जूझ रहा हो तब ही वो किसी तरल पदार्थ की ओर आकर्षित होता है ǀ बहुत दिनों से भूखा-प्यासा साँप न केवल कमजोर हो जाता है वरन डिहाइड्रेशन का भी शिकार हो जाता हैǀ अब जब पीड़ित साँप के मुँह को दूध के पात्र में डाला जाता है तो ‘मरता क्या न करता’ की हालत में कुछ दूध वो पी लेता है लेकिन तुरंत ही अपना मुँह हटा लेता है ǀ लेकिन सपेरे को तो आज दिन भर उसी साँप को दूध पिलाना हैǀ तो वो क्या करता है, देखिये -
अब आता हूँ तीसरी बात पर कि फिर ये सपेरे क्या करतें है?उसका मैं चित्रों के माध्यम से बतानें का प्रयास करता हूँ -
चित्र संख्या ०१
चित्र संख्या ०२
पहले चित्र में ‘क्यू’ क्लिप के बीच में एक नली का खुला सिरा दिखाई दे रहा हैǀ यह ‘ग्लोटिस’ है और जो नली दिखाई दे रही है वह ‘ट्रैकिया’ या ‘विंड़ पाईप’ या स्वाँस नली हैǀ जैसा कि दोनों चित्रों में दिखाई दे रहा है कि ‘ग्लोटिस’ निचले जबड़े में सबसे आगे की ओर खुलता है और जब जबड़े बंद होते हैं तो खिंच कर बाहर तक पहुँच जाता हैǀ ‘ट्रैकिया’ या ‘विंड़ पाईप’ या स्वाँस नली एक लम्बी संरचना होती है और ह्रदय के पास पहुँच कर दो भागों में विभक्त हो जाती है – एक बाँया भाग और दूसरा दाहिना भागǀ दोनों भाग अपनी और के फेफड़ों से जुड़े रहते हैं ǀ बायाँ फेफड़ा छोटा और अविकसित होता है जब कि दाहिना पूर्ण विकसित और बहुत लम्बा होता हैǀ इसका हृदय की और का भाग स्वसन में भाग लेता है जब की पीछे वाला भाग एक गुब्बारे जैसा ही होता है जिसमे हवा भरी तो रह सकती है परन्तु उस भाग में स्वसन नहीं होता हैǀ वायु इसी क्रम में फेफड़ों में आती है और इसके विपरीत क्रम में बाहर जाती है ǀ नीचे दिया
चित्र संख्या ०३
अब जब सपेरे को दूसरी–तीसरी जगह साँप दूध पिलाना है तो वो साँप को नीचे दिखाये गये तरीके से पकड़ता है
चित्र संख्या ०४
चित्र संख्या ०५
स्वांस नली दबाव के कारण बंद हो जाती है ǀआठ-दस मिनट में उसके फेफड़े की ऑक्सीजन समाप्त होनें लगती है और अब जब सपेरा साँप के मुँह को दूध के पात्र में डालता है तो सांस खीचनें के साथ दूध उसके फेफड़ों में भर जाता है ǀ पात्र कुछ खाली हो जाता है और हम नाग देवता का आशीर्वाद मान खुश होतें है और अपनें ‘नाग देवता’ को धीमी परन्तु निश्चित मौत की ओर प्रयाण करनें के लिए हर्षित मन से बिदा कर देते हे ǀ
सपेरे जब साँपों को पकड़ते हैं तो सर्व प्रथम ज़हर के दाँत तोड़ देते है, उसकी पीड़ा, फिर भूख-प्यास की तड़प और अंत में जब दूध या तो पेट में गया या फिर फेफड़े मेंǀ पेट में जानें पर दूध की प्रोटीन और पानीं अलग हो गया ǀ पानीं से लाभ हुआ कि डिहाइड्रेशन की समस्या कुछ कम हुयी परन्तु प्रोटीन का पाचन तो संभव ही नहीं, क्योंकि दूध में पायी जानें वाली 'प्रोटीन' के पाचन के लिए जिस 'एंजाइम' की आवश्यकता होती है वह 'एंजाइम' साँप के आमाशय में नहीं पाया जाता है; और दूसरी ओर मुँह घायल अतः कुछ निगला भी नहीं जा सकता तो फिर कमजोर तो हो ही जाना है ǀ अब यदि दूध फेफेड़े में जमा हो गया जिसकी संभावना रहती ही रहती है, तो साँस भी नहीं ली जा सकती और तब उन नाग देवता को जिनकी हमनें 15-20 दिन पहले पूजा की थी हमनें ही स्वर्ग की राह दिखा दी ǀ अब यह तो आप ही निर्णय लें कि आपको श्राप मिला या आशीर्वादǀ मैनें इस प्रश्न के उत्तर के माध्यम से अपनीं बात आप सभी तक पहुँचानें का एक प्रयास किया है ǀ
©वेंकटेश शुक्ला
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
जीवविज्ञान विभाग
कानपुर
Thursday, 23 July 2020
क्या मोहनजोदड़ो का विनाश परमाणु विस्फोट से हुआ था?
क्या मोहनजोदड़ो का विनाश परमाणु विस्फोट से हुआ था?
क- रूसी आर्कियोलाजिस्ट A. Gorbovsky अपनी पुस्तक "Riddles of ancient history" में दावा करते हैं -
1- "मोहनजोदड़ो में ऐसे मानव-कंकाल मिले हैं जो एक दूसरे का हाथ ऐसे पकड़े हुए हैं मानों प्रलय में साथ-साथ प्राण त्यागेंगे। इन कंकालों में सामान्य मानव - कंकालों की तुलना में 50 गुना अधिक रेडियोएक्टिव रेडिएशन मौजूद है।"
2- "मोहनजोदड़ो में कुछ स्थानों पर ऐसे काले पत्थर मिले हैं जो संभवतः बर्तन रहे होंगे लेकिन अत्यधिक तापमान पर एकदम कठोर और काले पड़ गये।"
ख- ब्रिटिश भारतीय पुरातत्वविद डेविड ड्वेनपोर्ट तथा इंट्टोर विंसेंटी ने अपने लेख "Atomic Destruction - 2000 BC" में दावा किया है-
1- "मोहनजोदड़ो में 50 यार्ड का एक ऐसा अधिकेंद्र (epicentre) मिला है जहाँ ग्लासीफाइड चट्टानें मिली हैं। यह चट्टाने कम से कम 1500 डि. से. पर ग्लासी चट्टान के रूप में परिवर्तित हुई होगी।"
ग- इसके अलावा राजस्थान के जोधपुर जिले के उत्तर-पश्चिम में रेडियोएक्टिव राख पाये गये हैं।
घ- महाभारत तथा अन्य ग्रंथों का साक्ष्य-
1- तदस्त्रं प्रज्ज्वाल महाज्ज्वालं तेजोमंडल संवृतम।
सशब्दम्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम।
चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा।। महाभारत ।। 8-10-14 ।।
अर्थात : वह अस्त्र (ब्रह्मास्त्र) छोड़े जाने के बाद भयंकर वायु जोरदार तमाचे मारने लगी। सहस्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे। प्राणिमात्र को भयंकर महाभय उत्पन्न हो गया। आकाश में घनघोर ध्वनि हुई। आकाश जलने लगा। पर्वत, अरण्य, वृक्षों के साथ समूची पृथ्वी हिल गई।
2- श्रीकृष्ण अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र छोड़े जाने पर उसके विनाश की तीव्रता के बारे में बता कर अर्जुन द्वारा उसे आकाश में नष्ट करने के लिये कहते हैं।
3- रामायण में जब लक्ष्मण मेघनाद को मारने के लिये ब्रह्मास्त्र चलाना चाहते हैं तब राम उन्हें उसकी भयावहता बताकर चलाने से रोक देते हैं।
@विन्ध्येश्वरी
क- रूसी आर्कियोलाजिस्ट A. Gorbovsky अपनी पुस्तक "Riddles of ancient history" में दावा करते हैं -
1- "मोहनजोदड़ो में ऐसे मानव-कंकाल मिले हैं जो एक दूसरे का हाथ ऐसे पकड़े हुए हैं मानों प्रलय में साथ-साथ प्राण त्यागेंगे। इन कंकालों में सामान्य मानव - कंकालों की तुलना में 50 गुना अधिक रेडियोएक्टिव रेडिएशन मौजूद है।"
2- "मोहनजोदड़ो में कुछ स्थानों पर ऐसे काले पत्थर मिले हैं जो संभवतः बर्तन रहे होंगे लेकिन अत्यधिक तापमान पर एकदम कठोर और काले पड़ गये।"
ख- ब्रिटिश भारतीय पुरातत्वविद डेविड ड्वेनपोर्ट तथा इंट्टोर विंसेंटी ने अपने लेख "Atomic Destruction - 2000 BC" में दावा किया है-
1- "मोहनजोदड़ो में 50 यार्ड का एक ऐसा अधिकेंद्र (epicentre) मिला है जहाँ ग्लासीफाइड चट्टानें मिली हैं। यह चट्टाने कम से कम 1500 डि. से. पर ग्लासी चट्टान के रूप में परिवर्तित हुई होगी।"
ग- इसके अलावा राजस्थान के जोधपुर जिले के उत्तर-पश्चिम में रेडियोएक्टिव राख पाये गये हैं।
घ- महाभारत तथा अन्य ग्रंथों का साक्ष्य-
1- तदस्त्रं प्रज्ज्वाल महाज्ज्वालं तेजोमंडल संवृतम।
सशब्दम्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम।
चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा।। महाभारत ।। 8-10-14 ।।
अर्थात : वह अस्त्र (ब्रह्मास्त्र) छोड़े जाने के बाद भयंकर वायु जोरदार तमाचे मारने लगी। सहस्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे। प्राणिमात्र को भयंकर महाभय उत्पन्न हो गया। आकाश में घनघोर ध्वनि हुई। आकाश जलने लगा। पर्वत, अरण्य, वृक्षों के साथ समूची पृथ्वी हिल गई।
2- श्रीकृष्ण अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र छोड़े जाने पर उसके विनाश की तीव्रता के बारे में बता कर अर्जुन द्वारा उसे आकाश में नष्ट करने के लिये कहते हैं।
3- रामायण में जब लक्ष्मण मेघनाद को मारने के लिये ब्रह्मास्त्र चलाना चाहते हैं तब राम उन्हें उसकी भयावहता बताकर चलाने से रोक देते हैं।
@विन्ध्येश्वरी
Tuesday, 21 July 2020
गुप्तकालीन वर्णव्यवस्था
गुप्तकालीन वर्णव्यवस्था
1- चार वर्णों में विभक्त
• ब्राह्मण
• क्षत्रिय
• वैश्य
• शूद्र
2- फाहियान के अनुसार - "गुप्तकाल में अस्पृश्य वर्ग था - अंत्यज तथा चांडाल।"
3- ह्वेनसांग के अनुसार - "शूद्रों की दशा में सुधार हुआ था। शूद्र बहुधा खेतिहर कृषक थे। वे सैनिक वृत्ति करते थे तथा उन्हें रामायण और महाभारत पढ़ने का भी अधिकार था।"
4- भूमि अनुदान प्रक्रिया के कारण "कायस्थ" जाति का उदय हुआ। "याज्ञवल्क्य संहिता" में पहली बार कायस्थ शब्द का उल्लेख मिलता है।
5- इस काल में वर्णव्यवस्था के आधार पर न्याय किया जाता था।
• मनुस्मृति के अनुसार चोरी करने वाले ब्राह्मण को सबसे अधिक दंड तथा शूद्र को सबसे कम दंड दिया जाता था जबकि हत्या करने पर शूद्र को सर्वाधिक दंड तथा ब्राह्मण को कम दंड मिलता था।
• ब्राह्मण मृत्युदंड से मुक्त था।
6- स्त्रियों का उपनयन संस्कार बंद हो गया था।
7- चांडाल समाज में सबसे निचला स्थान प्राप्त था। इनका मुख्य कार्य मछली मारना, शिकार करना और मांस बेचना था।
@विन्ध्येश्वरी
1- चार वर्णों में विभक्त
• ब्राह्मण
• क्षत्रिय
• वैश्य
• शूद्र
2- फाहियान के अनुसार - "गुप्तकाल में अस्पृश्य वर्ग था - अंत्यज तथा चांडाल।"
3- ह्वेनसांग के अनुसार - "शूद्रों की दशा में सुधार हुआ था। शूद्र बहुधा खेतिहर कृषक थे। वे सैनिक वृत्ति करते थे तथा उन्हें रामायण और महाभारत पढ़ने का भी अधिकार था।"
4- भूमि अनुदान प्रक्रिया के कारण "कायस्थ" जाति का उदय हुआ। "याज्ञवल्क्य संहिता" में पहली बार कायस्थ शब्द का उल्लेख मिलता है।
5- इस काल में वर्णव्यवस्था के आधार पर न्याय किया जाता था।
• मनुस्मृति के अनुसार चोरी करने वाले ब्राह्मण को सबसे अधिक दंड तथा शूद्र को सबसे कम दंड दिया जाता था जबकि हत्या करने पर शूद्र को सर्वाधिक दंड तथा ब्राह्मण को कम दंड मिलता था।
• ब्राह्मण मृत्युदंड से मुक्त था।
6- स्त्रियों का उपनयन संस्कार बंद हो गया था।
7- चांडाल समाज में सबसे निचला स्थान प्राप्त था। इनका मुख्य कार्य मछली मारना, शिकार करना और मांस बेचना था।
@विन्ध्येश्वरी
Monday, 20 July 2020
छोटी-छोटी मगर मोटी बातें
छोटी छोटी मगर मोटी बातें
1- रेप्को बैंक (Repco bank)
• बहुराज्यीय सहकारी समिति
• स्थापना 1969 में केंद सरकार द्वारा
• प्रशासनिक नियंत्रण गृहमंत्रालय
• म्यांमार और श्रीलंका से वापस आये लोगों के पुनर्वास के लिये
• चार राज्यों - आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में कार्यरत
2- उत्कर्ष 2022
• आर बी आई द्वारा प्रारंभ "मध्यम अवधि कार्य-नीतिगत रूपरेखा"
• उद्देश्य - अपने आदेशों के निष्पादन में उत्कृष्टता लाने और नागरिकों तथा अन्य संस्थाओं के विश्वास को दृढ़ करना
• तीन वर्षीय रोडमैप
• वैश्विक केंद्रीय बैंकों की योजना के अनुरूप
3- eBक्रय (eBkray)
• ई नीलामी मंच
• ई नीलामी हेतु संपत्तियों की जानकारी हेतु सिंगल विंडो सिस्टम
• सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ई नीलामी साइटों पर समान संपत्तियों की तुलना करने की सुविधा
• वित्त मंत्रालय द्वारा
4- आॅरेशन ट्विस्ट
• अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक की एक मौद्रिक नीति
• अर्थव्यवस्था में मौद्रिक तरलता प्रदान करने के लिये क्रय-विक्रय
• आर बी आई ने भी इसी के अनुरूप "ओपन मार्केट आॅपरेशंस (OMO)" प्रणाली के अंतर्गत सरकारी बाॅण्ड का क्रय-विक्रय करने की घोषणा की
@विन्ध्येश्वरी
1- रेप्को बैंक (Repco bank)
• बहुराज्यीय सहकारी समिति
• स्थापना 1969 में केंद सरकार द्वारा
• प्रशासनिक नियंत्रण गृहमंत्रालय
• म्यांमार और श्रीलंका से वापस आये लोगों के पुनर्वास के लिये
• चार राज्यों - आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में कार्यरत
2- उत्कर्ष 2022
• आर बी आई द्वारा प्रारंभ "मध्यम अवधि कार्य-नीतिगत रूपरेखा"
• उद्देश्य - अपने आदेशों के निष्पादन में उत्कृष्टता लाने और नागरिकों तथा अन्य संस्थाओं के विश्वास को दृढ़ करना
• तीन वर्षीय रोडमैप
• वैश्विक केंद्रीय बैंकों की योजना के अनुरूप
3- eBक्रय (eBkray)
• ई नीलामी मंच
• ई नीलामी हेतु संपत्तियों की जानकारी हेतु सिंगल विंडो सिस्टम
• सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ई नीलामी साइटों पर समान संपत्तियों की तुलना करने की सुविधा
• वित्त मंत्रालय द्वारा
4- आॅरेशन ट्विस्ट
• अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक की एक मौद्रिक नीति
• अर्थव्यवस्था में मौद्रिक तरलता प्रदान करने के लिये क्रय-विक्रय
• आर बी आई ने भी इसी के अनुरूप "ओपन मार्केट आॅपरेशंस (OMO)" प्रणाली के अंतर्गत सरकारी बाॅण्ड का क्रय-विक्रय करने की घोषणा की
@विन्ध्येश्वरी
Saturday, 18 July 2020
मौर्यकालीन स्त्रियों की स्थिति
मौर्यकाल में स्त्रियों की स्थिति-
1- स्मृति काल की तुलना में अधिक स्वायत्तता एवं सुरक्षा
2- विधवा पुनर्विवाह, पुनर्विवाह व नियोग (पति से संतान न उत्पन्न होने पर अन्य पुरुष से सहवास) की अनुमति
3- स्त्री और पुरुष दोनों को मोक्ष (वर्तमान संदर्भ में तलाक) का अधिकार
4- छंदवासिनी - वे विधवाएं जो स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करती थीं
5- रूपजीवा - स्वतंत्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाएं
6- अनिष्कासिनी - संभ्रांत कुल की स्त्रियां जो घर से बाहर नहीं निकलती थीं
7- स्त्रियों को प्रशासन में शामिल किया जाता था
@विन्ध्येश्वरी
1- स्मृति काल की तुलना में अधिक स्वायत्तता एवं सुरक्षा
2- विधवा पुनर्विवाह, पुनर्विवाह व नियोग (पति से संतान न उत्पन्न होने पर अन्य पुरुष से सहवास) की अनुमति
3- स्त्री और पुरुष दोनों को मोक्ष (वर्तमान संदर्भ में तलाक) का अधिकार
4- छंदवासिनी - वे विधवाएं जो स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करती थीं
5- रूपजीवा - स्वतंत्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाएं
6- अनिष्कासिनी - संभ्रांत कुल की स्त्रियां जो घर से बाहर नहीं निकलती थीं
7- स्त्रियों को प्रशासन में शामिल किया जाता था
@विन्ध्येश्वरी
मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था और वर्तमान स्थिति
मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था
1- सर्वप्रथम विशाल साम्राज्य (उत्तर-पश्चिम में फारस से लेकर पूर्व में बंगाल तथा उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक) का विभाजन चार प्रांतों में
• उत्तरापथ - राजधानी तक्षशिला
• दक्षिणापथ - राजधानी सुवर्णगिरि
• अवंति (पश्चिमी) - राजधानी उज्जयिनी
• प्राची (मध्य और पुर्वी समुद्र तटीय प्रदेश) - राजधानी पाटलिपुत्र
(यह व्यवस्था वर्तमान मारत में कमोबेश क्षेत्रीय परिषदों की तरह है। उत्तरी, मध्य - पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी तथा पूर्वोत्तर परिषद)
2- मौर्यकालीन प्रशासन का स्तरीकरण और वर्तमान स्थिति
• केंद्र (मौर्य शासन) - वर्तमान भारत सरकार
• प्रांत (राजकुमार या आर्यपुत्र) - वर्तमान में राज्य
• मंडल (प्रदेष्टा या प्रादेशिक) - मंडल
• आहार या विषय (विषयपति) - जिला
• स्थानीय (800 ग्रामों का समूह - स्थानिक) - तहसील
• द्रोणमुख (400 ग्रामों का समूह) - विकासखंड या क्षेत्रपंचायत
• खार्वटिक (200 ग्रामों का समूह) - न्याय पंचायत
• संग्रहण (10 ग्रामों का समूह) - ग्राम पंचायत
• ग्राम (प्रशासन की सबसे छोटी इकाई - ग्रामणी) - राजस्व ग्राम
• ग्राम सभा से राजस्व संग्रहण में सहायता हेतु एक अधिकारी - गोप - वर्तमान में ग्राम पंचायत अधिकारी
@विन्ध्येश्वरी
1- सर्वप्रथम विशाल साम्राज्य (उत्तर-पश्चिम में फारस से लेकर पूर्व में बंगाल तथा उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक) का विभाजन चार प्रांतों में
• उत्तरापथ - राजधानी तक्षशिला
• दक्षिणापथ - राजधानी सुवर्णगिरि
• अवंति (पश्चिमी) - राजधानी उज्जयिनी
• प्राची (मध्य और पुर्वी समुद्र तटीय प्रदेश) - राजधानी पाटलिपुत्र
(यह व्यवस्था वर्तमान मारत में कमोबेश क्षेत्रीय परिषदों की तरह है। उत्तरी, मध्य - पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी तथा पूर्वोत्तर परिषद)
2- मौर्यकालीन प्रशासन का स्तरीकरण और वर्तमान स्थिति
• केंद्र (मौर्य शासन) - वर्तमान भारत सरकार
• प्रांत (राजकुमार या आर्यपुत्र) - वर्तमान में राज्य
• मंडल (प्रदेष्टा या प्रादेशिक) - मंडल
• आहार या विषय (विषयपति) - जिला
• स्थानीय (800 ग्रामों का समूह - स्थानिक) - तहसील
• द्रोणमुख (400 ग्रामों का समूह) - विकासखंड या क्षेत्रपंचायत
• खार्वटिक (200 ग्रामों का समूह) - न्याय पंचायत
• संग्रहण (10 ग्रामों का समूह) - ग्राम पंचायत
• ग्राम (प्रशासन की सबसे छोटी इकाई - ग्रामणी) - राजस्व ग्राम
• ग्राम सभा से राजस्व संग्रहण में सहायता हेतु एक अधिकारी - गोप - वर्तमान में ग्राम पंचायत अधिकारी
@विन्ध्येश्वरी
Friday, 10 July 2020
काम - ऊर्जा (energy of sex)
मानव सभ्यता के इतिहास में विभिन्न दमनों में काम (sex) का दमन भी उतना ही घृणित है जितना कि दलित, स्त्री, दास आदि। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? कुछ बिंदुओं पर गौर करते हैं -
1- "पत्नी और पति शब्द"-
1- "पत्नी और पति शब्द"-
पत्नी का व्युत्पत्ति मूलक अर्थ है - पत् (गिरना) +नी (ले जाना)। यानि पतन की ओर ले जाने वाली। पति शब्द भी पत् धातु में ई प्रत्यय लगाकर बना इसका अर्थ है गिरने वाला। यह शब्द कितना सही? ऎसा क्यों कहा गया? दरअसल समाज में आम अवधारणा है कि पत्नी काम वासना में डुबाकर पति को ईश्वर से दूर करती है। यह मोक्ष के मार्ग में बाधक है। इसी लिये कबीरदास जैसे भक्त कवि व क्रांतिकारी समाज सुधारक भी कहते हैं -
कबीर नारि की प्रीति से, केते गये गरंत।
केते और जाहिंगे, नरक हसंत हसंत॥
अर्थात नारी को प्रेम करने से कितने ही लोग गर्त में जा चुके हैं और कितने ही लोग अभी हंसते-हंसते नरक में जायेंगे।
इसके अलावा वे कहते हैं कि नारी की छाया मात्र पड़ने से सांप तक अंधा हो जाता है। उनकी क्या गति होती होगी जो हमेशा स्त्री के साथ रहते हैं।
"नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।
कबीरा तिनकी का गति, जिन नित नारी संग॥"
वस्तुतः यहाँ नारी विरोध की जगह काम का विरोध अधिक है। अधिकांश समाजों और लोगों का मानना है कि स्त्री ही पुरुष को काम के गर्त में ढकेलती है। जबकि बायोलॉजिकली यह सरासर गलत है। हालांकि यह बात विषयेतर है तथापि यह जानना आवश्यक है कि स्त्री की कामेच्छा (Sexuality) पुरुषों की तुलना में दबी हुई होती है। एक स्त्री बिना संबंध बनाये कई दिनों तक रह सकती है लेकिन पुरुष नहीं। पत्नी (स्त्री) पति (पुरुष) को पतन की ओर नहीं ले जाती बल्कि पुरुष स्त्री को काम वासना की ओर उद्वेलित करता है। किंतु इसी बिना पर काम को ही, न केवल घृणास्पद, बुरा, बेकार सिद्ध करने का यत्न किया बल्कि समाज में इसकी चर्चा करना भी पाप करार दिया गया।
2- क्या काम वासना पाप है?
कबीर नारि की प्रीति से, केते गये गरंत।
केते और जाहिंगे, नरक हसंत हसंत॥
अर्थात नारी को प्रेम करने से कितने ही लोग गर्त में जा चुके हैं और कितने ही लोग अभी हंसते-हंसते नरक में जायेंगे।
इसके अलावा वे कहते हैं कि नारी की छाया मात्र पड़ने से सांप तक अंधा हो जाता है। उनकी क्या गति होती होगी जो हमेशा स्त्री के साथ रहते हैं।
"नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।
कबीरा तिनकी का गति, जिन नित नारी संग॥"
वस्तुतः यहाँ नारी विरोध की जगह काम का विरोध अधिक है। अधिकांश समाजों और लोगों का मानना है कि स्त्री ही पुरुष को काम के गर्त में ढकेलती है। जबकि बायोलॉजिकली यह सरासर गलत है। हालांकि यह बात विषयेतर है तथापि यह जानना आवश्यक है कि स्त्री की कामेच्छा (Sexuality) पुरुषों की तुलना में दबी हुई होती है। एक स्त्री बिना संबंध बनाये कई दिनों तक रह सकती है लेकिन पुरुष नहीं। पत्नी (स्त्री) पति (पुरुष) को पतन की ओर नहीं ले जाती बल्कि पुरुष स्त्री को काम वासना की ओर उद्वेलित करता है। किंतु इसी बिना पर काम को ही, न केवल घृणास्पद, बुरा, बेकार सिद्ध करने का यत्न किया बल्कि समाज में इसकी चर्चा करना भी पाप करार दिया गया।
2- क्या काम वासना पाप है?
लगभग सभी सभ्य समाजों में काम को पाप की दृष्टि से ही देखा जाता है। इसे गंदी बात माना जाता है। क्या ऐसा सचमुच है? मेरा मानना है कि हम एक बहुत बड़े छल और झूठ में जी रहे हैं। एक बच्चा सबसे पहले अपने आपको लैंगिक पहचान से ही जानता है कि वह क्या है। जो लोग इसे पाप समझते हैं वे भी दबी जुबान यह स्वीकार ही करेंगे कि अगर किसी एक चीज से इस सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन हो रहा है तो वह काम है। पशु - पक्षी, पेड़ - पौधे, मनुष्य सभी में यह एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसीलिए प्रकृति ने इसे केंद्रीय अंग के रूप में बनाया है।
इतना ही नहीं योगशास्त्र के अनुसार शरीर में सात चक्र होते हैं। इसमें तीन चक्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, मूलाधार, आज्ञा और सहस्रसार। मूलाधार का केंद्र बिल्कुल लैंगिक स्थान के एकदम समीप है। इस केंद्र में कुंडलिनी शक्ति स्थिति होती है। इसी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर योगी त्रिकालदृष्टि (भूत, भविष्य, वर्तमान को जानना) अष्टसिद्धियों (1-अणिमा-अणु की तरह छोटा होना, 2-महिमा- बहुत विशाल होना, 3-गरिमा - बहुत वजनी होना, 4-लघिमा - बहुत हल्का होना, 5-प्राप्ति - कुछ भी पाने की क्षमता, 6-प्रकाम्य - किसी के मन की बात जानना, 7-ईशिता - दुनिया पर शासन, 8-वशिता - किसी को वश में करना ) और नवनिधियों (पद्म, महापद्म, नील, नंद, मुकुंद, मकर, कच्छप, शंख और खर्ब ) को प्राप्त करता है। योगी इसी कुंडलिनी शक्ति को सहस्रसार चक्र में स्थापित कर ईश्वर से साक्षात्कार करता है। यानि यह केंद्र अथाह, अपार ऊर्जा का केंद्र है। फिर यह घृणित कैसे हो सकता है?
3- कामशास्त्र की कोई पाठशाला नहीं-
इतना ही नहीं योगशास्त्र के अनुसार शरीर में सात चक्र होते हैं। इसमें तीन चक्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, मूलाधार, आज्ञा और सहस्रसार। मूलाधार का केंद्र बिल्कुल लैंगिक स्थान के एकदम समीप है। इस केंद्र में कुंडलिनी शक्ति स्थिति होती है। इसी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर योगी त्रिकालदृष्टि (भूत, भविष्य, वर्तमान को जानना) अष्टसिद्धियों (1-अणिमा-अणु की तरह छोटा होना, 2-महिमा- बहुत विशाल होना, 3-गरिमा - बहुत वजनी होना, 4-लघिमा - बहुत हल्का होना, 5-प्राप्ति - कुछ भी पाने की क्षमता, 6-प्रकाम्य - किसी के मन की बात जानना, 7-ईशिता - दुनिया पर शासन, 8-वशिता - किसी को वश में करना ) और नवनिधियों (पद्म, महापद्म, नील, नंद, मुकुंद, मकर, कच्छप, शंख और खर्ब ) को प्राप्त करता है। योगी इसी कुंडलिनी शक्ति को सहस्रसार चक्र में स्थापित कर ईश्वर से साक्षात्कार करता है। यानि यह केंद्र अथाह, अपार ऊर्जा का केंद्र है। फिर यह घृणित कैसे हो सकता है?
3- कामशास्त्र की कोई पाठशाला नहीं-
यह कितना अद्भुत है कि कामशास्त्र सिखाने की कोई पाठशाला नहीं है और न ही कोई खास किताब। ऊपर से इतना कठोर प्रतिबंध भी है। लेकिन हर व्यक्ति यही करता है, हमारे पूर्वज भी और हम भी। आखिर यह कैसे हो जाता है। दरअसल काम और कामेच्छा प्राकृतिक है। हम इसका दमन करते हैं और यह मान लेते हैं कि इसका दमन करके हम इसे शांत कर देंगे। यह ठीक वैसे है जैसे ज्वालामुखी का चैंबर पृथ्वी के गर्भ में सैकड़ों किमी. मोटी चट्टानी परत से ढंका होता है लेकिन मैग्मा (पृथ्वी के भीतर द्रव और गर्म रूप में इक्ट्ठा पदार्थ) की अधिकता हो जाने पर यह धरती की छाती को फाड़कर बाहर आ जाता है। हम कथित संस्कारों और ब्रह्मचर्य के नाम पर इस विशाल ऊर्जा भंडार को झुठलाने और दबाने का अनावश्यक और निरर्थक यत्न करते हैं। नतीजतन हमारे माँ-बाप और समाज को लगता है कि बच्चा/बच्ची बिगड़ गया/गयी है। इस प्रकार बिगड़ने वाला बच्चा/बच्ची प्रकृति के हाथ से मजबूर है। बाकी वह बेकसूर है।
4- एक हास्यास्पद सामाजिक प्रथा-
4- एक हास्यास्पद सामाजिक प्रथा-
विवाह- समाज में काम और कामेच्छा को दबाने और चर्चा का विषय न बनाये जाने के बावजूद माता-पिता और समाज पूरे विधि-विधान और गाजे बाजे के साथ से अपने बच्चे/बच्ची की शादी करते हैं। वे सभी यह भी जानते हैं कि आज क्या होने वाला है। वह समाज जहाँ काम की बात करना भी पाप है उसी समाज में इतने धूमधाम से काम का उत्सव मनाना आश्चर्य में डालता है। तरीके से अतार्किक भी। क्योंकि बिना किसी जानकारी के किसी को किसी विशेष पद पर बैठा देना, बंदर के हाथ में उस्तरा देने जैसा है। अगर प्रयोगात्मक जानकारी न सही कम से कम सैद्धांतिक जानकारी होनी ही चाहिए ताकि न्याय-निर्णयन में सुगमता हो। मुझे लगता है कि हम सभ्य लोगों से ज्यादा वैज्ञानिक वे आदिवासी (बैगा जनजाति) हैं जो विवाह पूर्व अपनी संतानों को एक साथ रहने की अनुमति देते हैं। फिर जब दोनों को लगता है कि साथ में निबाह हो सकता है तब माता-पिता और समाज धूमधाम से विवाह संपन्न कर देते हैं।
5- गाली-
5- गाली-
समाज में माँ, बहन की गाली दी जाती है। लेकिन यह गाली माँ, बहन से ज्यादा जननेंद्रियां और मलेंद्रिय (private part) को दी जाती है। ऐसा क्यों? समझ से परे है। जहाँ तक मैं समझता हूँ यह भी काम और कामेंद्रिय को घृणित बताने का ही दुष्प्रयत्न है।
6- गोपनीयता-
6- गोपनीयता-
कामेंद्रियों के प्रति घृणा भाव के कारण इतनी गोपनीयता बरती जाती कि उसे छूना भी पाप माना जाता है। जब बच्चा अपने जननेंद्रिय को हाथ लगाता है तब माँ-बाप उसे गंदा और बुरा अंग बताते हुए छूने से मना करते हैं। इसका सर्वाधिक बुरा परिणाम बच्चियों को भुगतना पड़ता है। वे अपने उस अंग की साफ-सफाई को उपेक्षित करती हैं जिससे उन्हें अनेक यौन - संक्रमण को झेलना पड़ता है। बच्चे भी एक खास दुष्परिणाम भुगतते हैं- हस्तमैथुन। जो उन्हें शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से कमजोर करता है। हम लाख छुपाने के बावजूद दिनरात सिर्फ काम का ही चिंतन करते हैं। यहाँ तक कि हमारे सपने भी इससे अछूते नहीं रह जाते। यह हमारे चेतन मन से निकल कर अवचेतन मन में घर कर जाता है। यही कारण है कि समाज में दुष्कर्म की घटनाएँ अधिक होती हैं।
7- समस्या कहाँ है?
असल समस्या है काम की ऊर्जा के महत्त्व को न समझने में और बिना समझे ही दमन करने में। समाज में काम की ऊर्जा और कामेंद्रिय का केवल एक मतलब लगाया जाता है - कामक्रीड़ा (sexual act) और संतानोत्पत्ति। जो सरासर गलत है। यह इस पवित्र और अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा का केवल एकमुखी प्रयोग है। आप इसकी तुलना विद्युत ऊर्जा से कर सकते हैं। विद्युत ऊर्जा सही भी हो सकती है और गलत भी। अगर आप विद्युत के खुले तार को पकड लेंगे तो मृत्यु तय है या कम से कम मरने जैसी अवस्था में अवश्य पहुंच जायेंगे। किंतु इस एक उपयोग के अलावा आप इसका और भी कई तरीकों से उपयोग कर सकते हैं। जैसे- प्रकाश, ए. सी., फ्रिज, कूलर, पंखा, हीटर, ओवन, उद्योग, विद्युत बैट्री, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम इस महान ऊर्जा का उपयोग कैसे करें। हमारे भीतर मौजूद काम की ऊर्जा इससे भी कहीं अधिक शक्तिशाली है। इसके कई सारे प्रमाण भी उपलब्ध हैं। जैसे- हनुमान, परशुराम, कृष्ण, कबीर, बुद्ध, महावीर, जीसस आदि।
8- समस्या का उपाय-
7- समस्या कहाँ है?
असल समस्या है काम की ऊर्जा के महत्त्व को न समझने में और बिना समझे ही दमन करने में। समाज में काम की ऊर्जा और कामेंद्रिय का केवल एक मतलब लगाया जाता है - कामक्रीड़ा (sexual act) और संतानोत्पत्ति। जो सरासर गलत है। यह इस पवित्र और अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा का केवल एकमुखी प्रयोग है। आप इसकी तुलना विद्युत ऊर्जा से कर सकते हैं। विद्युत ऊर्जा सही भी हो सकती है और गलत भी। अगर आप विद्युत के खुले तार को पकड लेंगे तो मृत्यु तय है या कम से कम मरने जैसी अवस्था में अवश्य पहुंच जायेंगे। किंतु इस एक उपयोग के अलावा आप इसका और भी कई तरीकों से उपयोग कर सकते हैं। जैसे- प्रकाश, ए. सी., फ्रिज, कूलर, पंखा, हीटर, ओवन, उद्योग, विद्युत बैट्री, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम इस महान ऊर्जा का उपयोग कैसे करें। हमारे भीतर मौजूद काम की ऊर्जा इससे भी कहीं अधिक शक्तिशाली है। इसके कई सारे प्रमाण भी उपलब्ध हैं। जैसे- हनुमान, परशुराम, कृष्ण, कबीर, बुद्ध, महावीर, जीसस आदि।
8- समस्या का उपाय-
• ध्यान- बच्चों को समय से पहले (14 वर्ष की आयु पूरा करने से पहले) ही ध्यान में उतरने की प्रेरणा दी जाये। दरअसल काम (sex) के समय हमें आनन्द इसलिए मिलता है कि हम "समय शून्यता (timelessness)" और "घंमड शून्यता (egolessness)" की स्थिति में पहुंच जाते हैं। यह दोनों स्थितियां परमशांति की स्थिति हैं। सही से ध्यान लगाने पर हम इन्हीं दोनों स्थितियों में पहुंच जाते हैं। फिर कामेच्छा उतनी प्रबल नहीं हो पाती जितनी की ध्यान गहराई में न जाने पर।
• ब्रह्ममुद्रा- यह मुद्रा काम ऊर्जा के ऊर्ध्व प्रवाह का एक बेहतरीन उपकरण है। इसमें हम सांस को बाहर छोड़कर, गुदाद्वार को ऊपर खींचते हैं। फिर पेट को नाभि से पीठ की तरफ दबाकर ऊपर खींचते हैं। इसके बाद ठुड्डी को कंठ-कूप में लगाते हैं। यह क्रिया 10-15 मिनट प्रतिदिन करने पर काम ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होने लगता है।
• सादा भोजन- गरिष्ठ, मांसाहार और तामसी भोजन काम विकार को उद्दीप्त करता है। अतः सादा भोजन करना काम ऊर्जा के नियमन का एक शानदार तरीका है।
• रचनात्मक श्रम- हमारे भीतर मौजूद ऊर्जा को किसी न किसी माध्यम से निकलना चाहिये। संभोग के माध्यम से निकलता है तब वह हमारी जीवनी शक्ति का ह्रास करता है। अतः रचनात्मक कार्य जैसे- गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला, बागवानी, समाज सेवा आदि करने से वह ऊर्जा जो अधोमुखी गमन करती है ऊर्ध्वगमन करने लगती है।
• प्रार्थना - प्रार्थना एक ऐसी क्रिया है जो बड़े से बड़े संकट और समस्या का सरलतम निदान प्रस्तुत करती है। हमें अपने इस ऊर्जा के परम पवित्र और कल्याणकारी होने के बारे में सकारात्मक धारणा बनाने की आवश्यकता है। प्रार्थना के माध्यम से हम इसे शक्ति के रूप में बदल सकते हैं। "हे! शुद्ध, चैतन्य, दिव्य परमात्मा, मैं आपका अंश हूँ। आपसे ही मेरा जन्म हुआ है। आप मेरी शक्तियों को सकारात्मक, रचनात्मक दिशा प्रदान कीजिये। इसे ऊर्ध्वगामी बनाइये।"
• काम ऊर्जा के बारे में सही समय पर बच्चों को शुद्ध और सही जानकारी प्रदान करना। जैसे- यह क्या है?इसकी शक्ति क्या है? इससे क्या - क्या होता है? इसके साथ कौन सी अच्छाई या बुराई जुड़ी हुई है? इस ऊर्जा को कैसे सही दिशा दें? आदि।
©विन्ध्येश्वरी
• ब्रह्ममुद्रा- यह मुद्रा काम ऊर्जा के ऊर्ध्व प्रवाह का एक बेहतरीन उपकरण है। इसमें हम सांस को बाहर छोड़कर, गुदाद्वार को ऊपर खींचते हैं। फिर पेट को नाभि से पीठ की तरफ दबाकर ऊपर खींचते हैं। इसके बाद ठुड्डी को कंठ-कूप में लगाते हैं। यह क्रिया 10-15 मिनट प्रतिदिन करने पर काम ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होने लगता है।
• सादा भोजन- गरिष्ठ, मांसाहार और तामसी भोजन काम विकार को उद्दीप्त करता है। अतः सादा भोजन करना काम ऊर्जा के नियमन का एक शानदार तरीका है।
• रचनात्मक श्रम- हमारे भीतर मौजूद ऊर्जा को किसी न किसी माध्यम से निकलना चाहिये। संभोग के माध्यम से निकलता है तब वह हमारी जीवनी शक्ति का ह्रास करता है। अतः रचनात्मक कार्य जैसे- गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला, बागवानी, समाज सेवा आदि करने से वह ऊर्जा जो अधोमुखी गमन करती है ऊर्ध्वगमन करने लगती है।
• प्रार्थना - प्रार्थना एक ऐसी क्रिया है जो बड़े से बड़े संकट और समस्या का सरलतम निदान प्रस्तुत करती है। हमें अपने इस ऊर्जा के परम पवित्र और कल्याणकारी होने के बारे में सकारात्मक धारणा बनाने की आवश्यकता है। प्रार्थना के माध्यम से हम इसे शक्ति के रूप में बदल सकते हैं। "हे! शुद्ध, चैतन्य, दिव्य परमात्मा, मैं आपका अंश हूँ। आपसे ही मेरा जन्म हुआ है। आप मेरी शक्तियों को सकारात्मक, रचनात्मक दिशा प्रदान कीजिये। इसे ऊर्ध्वगामी बनाइये।"
• काम ऊर्जा के बारे में सही समय पर बच्चों को शुद्ध और सही जानकारी प्रदान करना। जैसे- यह क्या है?इसकी शक्ति क्या है? इससे क्या - क्या होता है? इसके साथ कौन सी अच्छाई या बुराई जुड़ी हुई है? इस ऊर्जा को कैसे सही दिशा दें? आदि।
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