एक पेड़ था। उसके पास एक बच्चा खेलने आता था। बच्चा उसकी डालियों से खेलता, फूल तोड़ता। पूरा दिन वह उस पेड़ के पास खेलता। कभी-कभी उसी की छांव में सो भी जाता। पेड़ बहुत आनन्दित होता। पेड़ को बच्चे से प्रेम हो गया था। जब कभी वह बच्चा उसके पास नहीं आता तब वह चिंतित हो जाता।
समय बीतता गया। बच्चा बड़ा हो गया। वह स्कूल जाने लगा। वहाँ उसे कई सारे यार दोस्त मिले। अब वह बच्चा पेड़ के पास कम ही आता। लेकिन जब भी आता तब वह पेड़ एक प्रमोद से भर जाता, आह्लादित हो जाता।
बच्चा अब जवान हो गया था। उसका पेड़ के पास आना एकदम कम हो गया। पेड़ प्रेम के वशीभूत निरंतर उसकी राह देखता था। वह चिंतित रहने लगा। एक दिन वह युवक उस पेड़ के पास से गुजर रहा था। पेड़ जोर से चिल्लाया- "आओ! मेरे पास आओ। मेरे पास बैठो, मेरी डालियों से खेलो।" उस युवक ने उत्तर दिया- "मैं बाजार जा रहा हूँ। मुझे रूपये चाहिये। क्या है तुम्हारे पास जो तुम मुझे दे सकते हो?" पेड़ ने कहा- "मेरे पास रूपये तो नहीं है, जो मैं तुम्हें दे सकूं। रूपये तो आदमी की ईज़ाद हैं।" उस युवक ने कहा- "फिर तुम्हारे पास आना व्यर्थ है।" पेड़ ने मन में विचार किया -" अहंकार हमेशा लेना जानता है। जबकि प्रेम देना जानता है। इस बच्चे को क्या हो गया है? कभी मेरे पास ही इसे स्वर्ग का सुख अनुभव होता था। आज यह पूछता है क्या है मेरे पास?" फिर पेड़ ने मुस्कुराते हुए कहा - "यद्यपि मेरे पास रूपये नहीं हैं लेकिन तुम मेरे फल तोड़ कर ले जा सकते हो। इसे बाजार में बेंचकर रूपये पा सकते हो।" युवक ने फल तोड़ लिया। जाते समय उसने मुड़कर पेड़ को देखा भी नहीं। धन्यवाद भी नहीं दिया।
युवक पैसे से और पैसे बनाने लगा। फिर वह खूब धनी हो गया। अब भी वह पेड़ के पास नहीं जाता था। लेकिन पेड़ निरंतर उसकी राह देखता रहता था। एक दिन जब वह उस पेड़ के पास से गुजर रहा था। पेड़ ने उसे देखा। उसने सोचा - "अब तो यह बच्चा मुझे पहचानता भी नहीं। अब बच्चा काफी बड़ा हो गया है? खैर मैं ही बुलाता हूँ।" पेड़ ने उसे पुकारा - "वो भाई, भूल गये मुझे। मैं वही पेड़ हूँ ।जिसके पास तुम बचपन में खेला करते थे। मेरे पास आओ। मेरे पास बैठो। मुझे छुओ। मुझसे खेलो।" युवक ने जवाब दिया - "मैं क्यों आऊं तुम्हारे पास? क्या तुम मुझे एक घर दे सकते हो?" पेड़ ने कहा - "नहीं, मेरे पास घर तो नहीं है। लेकिन तुम मेरी डाली और टहनियां ले जा सकते हो। इससे तुम घर भी बना सकते हो और दरवाजे खिड़की आदि भी।" युवक पेड़ काटने लगा। पेड़ जब काटा जा रहा था। उसे पीड़ा हो रही थी। उसकी आंखो से पानी बह रहा था। फिर भी वह खुश था, क्योंकि वह अपने प्रिय के काम आ रहा था। उसे पीड़ा में भी एक सुख था। युवक ने पेड़ की सभी डालियों और टहनियों को काट डाला। और बिना कुछ कहे चला गया। पेड़ अब एक ठूंठ बचा था। हवाएं उसे छू कर निकल जाती थीं। अब वह पहले की तरह लहरा नहीं सकता था। पक्षी भी उसके पास अब नहीं आते थे। फिर भी वह उस बच्चे की राह देखता था। एक दिन वह जरूर आयेगा………।
काफी समय बीत गया। वह दुबारा नहीं आया। एक दिन कुछ लोग एक शव ले जा रहे थे। पेड़ ने देखा, वह डर गया कि वह बच्चा जो आज के सत्तर - अस्सी साल पहले उसके पास खेला करता था, कहीं………। उसने हिम्मत करके एक व्यक्ति से पूछा - "भाई, यह कौन है? जो बिना हिले डुले जा रहा है, जिसको चार लोग कंधे पर उठाये हुए हैं?" किसी ने जवाब दिया - "यह वही लड़का है जो तुम्हारे पास खेलने आता था। अब खेलने नहीं आ पायेगा।" पेड़ ने सोचा - "खेलने को तो काफी समय से नहीं आ रहा था। लेकिन……" उसने कहा - "भाई, मेरा इनका बचपन से नाता है। अब न तो यह मुझसे कुछ मांग सकते हैं और न ही मैं इन्हें कुछ दे सकता हूँ। पर मेरे इस बचे ठूंठ को काटकर, इन्हीं के साथ जला दो।"
अनुवादक - विन्ध्येश्वरी
*अमेरिकी लेखक शेलडाॅन एलन सिलवरस्टीन की कहानी "द गिविंग ट्री" का हिंदी भावानुवाद
Sunday, 28 June 2020
दुनिया का सबसे कठिन काम
अगर सर्वे किया जाये तो सबकी अलग अलग राय होगी। किसी की राय में पढ़ाई करना, किसी की राय में बिजनेस करना, किसी की राय में नौकरी करना, किसी की राय में नेतागीरी करना और देश को चलाना, किसी की राय में घर संभालना और चलाना, किसी की राय में माँ का काम तो किसी राय में बाप का। मतलब यह है कि जो जैसा काम कर रहा है, उसे वह काम कठिन लगता है। लेकिन आश्चर्य यह है कि कोई न कोई व्यक्ति यह कार्य जरूर कर रहा है। यानि यह सारे काम बहुत कठिन नहीं हैं। क्योंकि अगर यह कठिन होते तो इन्हें कोई नहीं कर रहा होता।
मेरी राय है निठल्ला रहना। दुनिया का सबसे कठिन काम है कुछ न करना। क्योंकि ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो कुछ भी न कर रहा हो। यदि आप किसी को एकदम निठल्ला मान रहे हैं क्योंकि वह दिन भर आवारा दोस्तों के साथ बैठकर गप्पे मारता है, घूमता रहता है, सिगरेट और दारू पीता है। फिर वह कुछ कर रहा है। घूमना, सिगरेट पीना, गप्पे मारना भी एक काम है।
एकदम निठल्ला रहना। मतलब एकदम। कुछ भी नहीं करना है। अगर भरोसा न हो तो कोशिश करके देख लीजिए। आज, अभी, इसी वक्त। अगर आप 5 मिनट भी बिना कुछ किये रह पाये तो आप एक चमत्कारी आत्मा हैं। करके देखिये। ध्यान रहे कुछ भी नहीं करना है, यहाँ तक कि सोचना भी नहीं है क्योंकि सोचना भी एक काम है। बेस्ट आफ लक👍🏻👍🏻………
©विन्ध्येश्वरी
Friday, 26 June 2020
मौत का तोहफ़ा
मौत का तोहफ़ा*
तीन भाई थे।वे एक रास्ते से यात्रा कर रहे थे। उस रास्ते में एक नदी थी, जो बहुत ही भयावह और खतरनाक थी। उसे पार करने के चक्कर में सैकड़ों लोगों ने अपने प्राण गंवा चुके थे। इन भाइयों ने उस नदी पर जादू से एक पुल का निर्माण किया और आगे बढ़ने लगे। बीच पुल पर उनकी भेंट मृत्यु से हुई। मृत्यु उनके इस उद्यम और बुद्धिमानी से प्रसन्न थी। उसने पहले भाई से कहा - "तुम मुझसे वरदान में कोई एक चीज मांग सकते हो।" पहला भाई शक्तिशाली था। लेकिन उसे लगता था कि उसे अभी और शक्तिशाली होना चाहिए ताकि इस दुनिया में उसके मुकाबले कोई और न रहे, और वह अपने पुराने दुश्मन से बदला ले सके, उसे मृत्यु छू न सके। उसने मौत से कहा- "मुझे एक ऐसी चीज चाहिए जिससे मैं दुनिया में सबसे अधिक शक्तिशाली हो जाऊं। कोई मुझसे जीत न सके।" मृत्यु ने उसे एक शक्तिशाली जादुई "एल्डर छड़ी" दिया। वह आगे बढ़ गया। मृत्यु ने दूसरे भाई से भी कुछ मांगने के लिये कहा। दूसरा भाई अभिमानी था। वह मृत्यु को नीचा दिखाना चाहता था। उसने कहा -"मुझे कुछ ऐसा दीजिये जिससे मैं किसी को भी जीवित कर सकूं।" मृत्यु ने उसे एक पत्थर दिया, जिससे किसी को भी जीवित कर सकता था, कुछ भी पा सकता था। तीसरा भाई विनम्र और बुद्धिमान था। उसे मृत्यु के ऊपर भरोसा नहीं था। उसने कहा - "मुझे कोई ऐसी चीज दीजिये जिससे मैं दूसरे की नजर से छुप सकूं।" मृत्यु को न चाहते हुए भी अपना "अदृश्य चोंगा" देना पड़ा। तीनों भाई कुछ देर बाद अलग-अलग रास्ते पर चल पड़े।
पहला भाई एक गांव में गया जहाँ उसका पुराना दुश्मन जादूगर रहता था। उसने अपनी एल्डर छड़ी से उसे मार कर अपना पुराना बदला चुकता कर लिया। वह एक सराय में रुक गया। उसने दारू पिया, खाना खाया और सो गया। रात में एक चोर ने उसका गला घोंटकर मार दिया और वह एल्डर छड़ी चुरा ले गया। इस प्रकार मौत ने पहले भाई को अपने आगोश में ले लिया।
दूसरा भाई घर जाकर रहने लगा। उसने अपनी मरी हुई बहन को जिंदा कर दिया। लेकिन वह इस दुनिया में दुबारा आकर खुश नहीं थी। एक दिन वह फिर मर गयी। भाई ने उसे दुबारा जिंदा कर दिया। लेकिन इस बार वह पहले से भी ज्यादा दुखी थी। वह फिर उसे छोड़कर चली गयी। इससे दूसरा भाई बहुत दुखी हुआ। वह चिंता और तनाव में रहने लगा। एक दिन उसने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया। इस प्रकार मौत ने दूसरे भाई को भी मार दिया।
तीसरा भाई एक सूनसान जगह पर घर बनाकर रहने लगा। उसने शादी की बच्चे पैदा किये। और जब मौत उसके पास आती तो वह "अदृश्य चोंगा" पहनकर गायब हो जाता। मौत हर बार उसे मारने में नाकाम हो जाती। जब एक दिन तीसरे भाई को लगा कि अब वह पर्याप्त जीवन जी चुका है, उसने वह चोंगा उतार कर अपने बेटे को दे दिया और खुद ब खुद मृत्यु के पास चला गया।
कहानी का निष्कर्ष यह है कि हम सब भी अपनी इच्छा, वासना, अहंकार और शक्ति के गुलाम हैं। हम निरंतर इन्हें पाने का यत्न करते रहते हैं। हमें लगता है कि धन, शक्ति, पद, प्रतिष्ठा, परिवार, पत्नी, पुत्र, पति, माता-पिता आदि हमें सुख देंगे। हम इनके दम पर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेंगे। हम मृत्यु को चकमा दे लेंगे। लेकिन अंततः मृत्यु हमें किसी न किसी प्रकार से ग्रस ही लेता है। इनमें से कोई या इन जैसा कोई और, हमें मृत्यु से नहीं बचा सकता। सच तो यह है कि ये सब "हमें मृत्यु के द्वारा दिये गये तोहफे ही हैं।" हम इन्हीं के वशीभूत होकर एक दिन मृत्यु के आगोश में चले जाते हैं। छड़ी बल का प्रतीक है। इससे अहंकार उत्पन्न होता है। पत्थर वासना, इच्छा का प्रतीक है। इससे लालच, तनाव और चिंता आदि का जन्म होता है। अदृश्य चोंगा बुद्धि, विनम्रता, धर्म, कर्म, ईश्वर की आंड़ में छुपना है। इनमें से कोई भी उपकरण हमें मृत्यु से बचा नहीं सकता।
पहला भाई एक गांव में गया जहाँ उसका पुराना दुश्मन जादूगर रहता था। उसने अपनी एल्डर छड़ी से उसे मार कर अपना पुराना बदला चुकता कर लिया। वह एक सराय में रुक गया। उसने दारू पिया, खाना खाया और सो गया। रात में एक चोर ने उसका गला घोंटकर मार दिया और वह एल्डर छड़ी चुरा ले गया। इस प्रकार मौत ने पहले भाई को अपने आगोश में ले लिया।
दूसरा भाई घर जाकर रहने लगा। उसने अपनी मरी हुई बहन को जिंदा कर दिया। लेकिन वह इस दुनिया में दुबारा आकर खुश नहीं थी। एक दिन वह फिर मर गयी। भाई ने उसे दुबारा जिंदा कर दिया। लेकिन इस बार वह पहले से भी ज्यादा दुखी थी। वह फिर उसे छोड़कर चली गयी। इससे दूसरा भाई बहुत दुखी हुआ। वह चिंता और तनाव में रहने लगा। एक दिन उसने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया। इस प्रकार मौत ने दूसरे भाई को भी मार दिया।
तीसरा भाई एक सूनसान जगह पर घर बनाकर रहने लगा। उसने शादी की बच्चे पैदा किये। और जब मौत उसके पास आती तो वह "अदृश्य चोंगा" पहनकर गायब हो जाता। मौत हर बार उसे मारने में नाकाम हो जाती। जब एक दिन तीसरे भाई को लगा कि अब वह पर्याप्त जीवन जी चुका है, उसने वह चोंगा उतार कर अपने बेटे को दे दिया और खुद ब खुद मृत्यु के पास चला गया।
कहानी का निष्कर्ष यह है कि हम सब भी अपनी इच्छा, वासना, अहंकार और शक्ति के गुलाम हैं। हम निरंतर इन्हें पाने का यत्न करते रहते हैं। हमें लगता है कि धन, शक्ति, पद, प्रतिष्ठा, परिवार, पत्नी, पुत्र, पति, माता-पिता आदि हमें सुख देंगे। हम इनके दम पर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेंगे। हम मृत्यु को चकमा दे लेंगे। लेकिन अंततः मृत्यु हमें किसी न किसी प्रकार से ग्रस ही लेता है। इनमें से कोई या इन जैसा कोई और, हमें मृत्यु से नहीं बचा सकता। सच तो यह है कि ये सब "हमें मृत्यु के द्वारा दिये गये तोहफे ही हैं।" हम इन्हीं के वशीभूत होकर एक दिन मृत्यु के आगोश में चले जाते हैं। छड़ी बल का प्रतीक है। इससे अहंकार उत्पन्न होता है। पत्थर वासना, इच्छा का प्रतीक है। इससे लालच, तनाव और चिंता आदि का जन्म होता है। अदृश्य चोंगा बुद्धि, विनम्रता, धर्म, कर्म, ईश्वर की आंड़ में छुपना है। इनमें से कोई भी उपकरण हमें मृत्यु से बचा नहीं सकता।
मूल लेखक - बेडले द बार्ड
Tuesday, 23 June 2020
वासना की शक्ति
आपने महात्मा बुद्ध और अंगुलिमाल के बारे में तो सुना ही होगा। अंगुलिमाल एक खूंखार डाकू था। जो लोगों की हत्या कर उनका सामान लूट लेता था। राजा प्रसेनजित के राज्य में अंगुलिमाल का आतंक चारों ओर व्याप्त था। एकदिन महात्मा बुद्ध राजा प्रसेनजित के महल में ठहरे थे। जाते समय वे उसी रास्ते से जाने लगे जिधर अंगुलिमाल रहता था। राजा ने कहा - "उधर खूंखार डाकू अंगुलिमाल रहता है। आप उधर से न जायें।" बुद्ध ने कहा - "मैं तो उसी रास्ते पर चलता हूँ, जो मैंने तय कर लिया है।" और वे चल पड़े।
रास्ते में अंगुलिमाल एक ऊंचा मचान बनाकर रहता था ताकि दूर से आने वाले राहगीरों को देख सके। उसने दूर से बुद्ध को आते देखा तो चिल्लाया - "तुम वहीं से लौट जाओ। मैं लोगों की हत्या करता हूँ। तुम मुझे संयासी दिख रहे हो इसलिये मैं तुम्हें छोड़ दे रहा हूँ। लौट जाओ। नहीं तो मैं तुम्हें मार दूंगा।" बुद्ध ने कहा - "मैं तो इसी रास्ते पर जाऊंगा। और हत्या तो मैं भी तुम्हारी कर दूंगा।" अंगुलिमाल उनके सामने आ गया। उसने कहा - "मूर्ख संयासी मरने के लिये तैयार हो जाओ।" बुद्ध ने कहा - "तुम मुझे मार देना। लेकिन पहले एक काम कर दो। इस पेड़ से चार पत्ते तोड़ दो।" अंगुलिमाल ने अपनी तलवार से पेड़ की पूरी डाली ही काट दी। उसने कहा - "लो यह पूरी डाली मैंने काट दिया। अब पत्ते ले लो। फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।" बुद्ध कहा - "ठीक है। लेकिन एक काम और कर दो, इस डाली को पुनः वहीं जोड़ दो।" अंगुलिमाल ने कहा - "यह कैसे संभव है? यह टूटी हुई डाली फिर नहीं जोड़ी जा सकती।" बुद्ध ने कहा - "मैंने तुम्हारी शक्ति के बारे में बहुत सुना था। लेकिन तुम तो बहुत कमजोर निकले। काटने का काम एक निशक्त आदमी भी कर सकता था। तुम उससे भी गये गुजरे हो। कहां है तुम्हारी शक्ति, तुम्हारा पौरुष?" अंगुलिमाल चकित हो गया। उसे एहसास हो गया कि वह वास्तव में कमजोर है। असली शक्ति तो तब है जब काटने के साथ जोड़ने का भी काम किया जा सके। शक्ति तो तब है जब घृणा करने वाले पर भी करुणा बरसे। फिर वह बुद्ध का अनुगत हो गया।
दरअसल यह शारीरिक बल और क्रूरता की शक्ति का सदमार्ग की तरफ उन्मुख होना था। हमारी वासनाएं हमारे भीतर मौजूद कमजोरी भी हैं और शक्ति भी। आप इसे ऐसे समझिए जैसे घर के सामने घूर (गांवों में घर का कूड़ा, कचरा, सब्जी के छिलके, गोबर आदि को एक जगह फेंका जाता है, उसे देहाती में घूर कहते हैं)। घूर प्राथमिक तौर पर कूड़े और अपशिष्टों का ढेर है, जिससे बदबू आती है। निहायत ही गंदा। जब आप इसे रोज जाकर खोदते रहते तब यह बदबू, यह कचरा चारों ओर फैल जाता है। वातावरण को प्रदूषित कर देता है। लेकिन जब एक दिन हम इसे अपने खेत में ले जाकर फेंक देते हैं और फिर अच्छे से फैलाकर, खेत की जुताई-गुड़ाई, सिंचाई, बुआई कर देते हैं तब यही गंदा, बेकार घूर उसकी उर्वराशक्ति को कई गुना बढ़ा देता है। उसी खेत से जबर्दस्त पैदावार हासिल होती है या बाग में डाल देने पर वही बदबू खुशबू में बदल जाती है।
इसी प्रकार हमारी वासनाएं भी हैं। कूड़ा, कचरा, गंदा, बेकार। अगर हमें अधिक क्रोध आता है, अगर हम अधिक कामी हैं, अगर हम बेतहाशा लालची और हद दर्जे के घमंडी हैं। और यह हमें बार बार हो रहा है तब यह ठीक वैसे है जैसे हम घूर को रोज - रोज खोद कर छोड़ देते हैं। लेकिन यदि हम इसका सही इस्तेमाल जान ले तो फिर यह शक्ति में बदल जाती हैं जो हमारे जीवन को बदलने का सामर्थ्य रखती हैं। यही शक्ति संसार को सुवासित कर सकती है।
कल्पना कीजिए कि आप एक निहायत ही कमजोर आदमी है। लेकिन आपके सामने एक शेर आ जाता है। आप पूरी शक्ति से जान बचाने के लिए भागते हैं। इतनी तेज भागते हैं कि सामान्य दशा में यह असंभव था। इतनी शक्ति आपमें कहाँ से आ गयी?
मान लीजिए आप एक शांत - सौम्य व्यक्ति हैं। अचानक आपके सामने कोई ऐसा कृत्य हो जाता है, जब आप आगबबूला हो जाते हैं। चेहरा एक दम लाल - पीला हो गया है, दांत कटकटा रहे हैं, आंखें लाल लाल, नसें फूली हुई और शरीर तमतमा रहा है। यह क्या है? यह हमारे आपके भीतर मौजूद एक शक्ति है।
हम सामान्य दशा में काम के प्रति स्थिर चित्त होते हैं। लेकिन किसी सुंदर स्त्री या पुरुष को देखकर अंग-अंग रोमांच से भर जाता है। रोम-रोम में काम का संचार हो जाता है। जब मनुष्य कामोत्सुक हो जाता है फिर उसे कुछ नहीं सूझता। आखिर कहाँ से आयी यह शक्ति?
दरअसल यह वासनाएं हमारे भीतर मौजूद युरेनियम की गांठ जैसी हैं जिनमें अपार ऊर्जा भरी हुई है। जो एक रिएक्शन के द्वारा ऊर्जा में बदल जाती हैं। यदि यह किसी आतंकवादी विचारधारा वाले आदमी/देश (जैसे आई. एस. आई. एस./अमेरिका) के हाथ पड़ जाये तो सर्वनाश कर सकता है या उसी के बल पर दुनिया के ऊपर दादागीरी हांक सकता है। अथवा यदि यह किसी शांति प्रिय देश (जैसे भारत) के हाथ पड़ जाता है तब वह इसका उपयोग जनकल्याण के लिये ऊर्जा के उत्पादन में करेगा।
प्रथम द्रष्टया चाहे हमारे भीतर मौजूद वासना हो या प्रकृति में मौजूद परमाणु खतरनाक ही नजर आते हैं। अब तीन बातें हो सकती हैं। एक - इनके खतरे को भांप कर हम इनका दमन कर दें या इन्हें यूं ही पड़ा रहने देें। इस स्थिति में ऊर्जा से कोई खतरा तो नहीं है लेकिन यह अपार ऊर्जा बेकार हो गयी है। दूसरा - इन्हें घातक बम या पाप का माध्यम बना दें और विनाश करेें। तीसरा - हम इन्हें उचित प्रक्रिया के द्वारा ऊर्जा में बदल दें, अच्छे हाथों में जाने देंं, जिससे विकास हो सके। ध्यान रहे हमें इन शक्तियों का दमन नहीं करना है। जब हम अपने भीतर मौजूद शक्तियों का दमन करते हैं तब यह हमारे शरीर को ही नुकसान पहुंचाता है। हमारे शरीर को विषाक्त कर देता है। हमारे शरीर में विकारों को जन्म देता है। अत्यधिक चिंतित रहने वाले आदमी के चेहरे पर झुर्रियां जल्दी पड़ती हैं, वह जल्दी बीमार पड़ता है। अत्यधिक क्रोधी आदमी की भौंहै हमेशा तनी रहती है। आंखें निकली रहती हैं। काम केे वेग को रोकनेे से नपुंसकता आती है। या अत्यधिक कामी व्यक्ति जल्दी वृद्ध होता है। हमें इन शक्तियों को सही मार्ग देना है, दबाना नहीं है।
हमारे समाज में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने ऊर्जा का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों किया है। हिटलर के पास बुद्धि, वाकपटुता, नेतृत्वकौशल था उसने इस शक्ति का उपयोग लाखों लोगों का संहार करने और विश्व को महायुद्ध में झोंकने में किया। यही शक्ति गांधी के पास भी थी। उन्होंने इससे विश्व को एक नयी दिशा देने का काम किया। अकबर के पास काम की शक्ति अधिक थी, उसने अपने हरम को सुंदर स्त्रियों से सजा रखा था। यही ऊर्जा तुलसीदास के पास भी थी। उन्होंने पत्नी से दुत्कार खाने के बाद इसे राम की तरफ मोड़ दिया। ऐसे ही नेपोलियन, सिकंदर, मुसोलिनी, ओसामा, तैमूर, चंगेज आदि ने भी अपनी शक्ति को गलत दिशा देकर समाज को पीड़ित, प्रताड़ित किया। यही ऊर्जा बुद्ध, महावीर, आचार्य शंकर, कबीर, मीरा, सूर, अरस्तू, प्लेटो, मुहम्मद और जीसस आदि के पास भी थी। इन्होंने इसे सही दिशा देकर संसार को सुंदर बनाने का प्रयत्न किया।
प्रश्न उठता है कि इन शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाये कि यह हमारे लिए सकारात्मक परिणाम देने वाली हों? कुछ तरीके इस प्रकार हैं-
ऊर्जा को बाहर निकलना-
1- हफ्ते में एक आध दिन आप एक बंद कमरे में वह करिये जो आप सभ्य समाज में नहीं कर सकते। जैसे- अपने कमीने बाॅस या पति/पत्नी या पड़ोसी या टीचर का कार्टून या स्केच बनाकर उसे गंदी - गंदी गालियां दीजिये, जूतों से कूटिये, थूकिये, मारियेे, चिढाइये।
2- या अगर आप समाज और बड़े - बुजुर्गों के के सामने लज्जा के नाते खुलकर हंस नहीं सकते तो एक बंद कमरे में जमकर हंसिये। ठठा मारकर हंसिये। अथवा पद और घंमड के कारण खुलकर रो नहीं सकते तो आइने में खुद को देखते हुए दहाड़े मारकर रोइये।
3- आप अधिक लोभी हैं तो भगवान के सामने बैठकर उनकी मानसिक पूजा करिये। उनको मंहगे से मंहगा भोजन, वस्त्र, मिठाई, फल-फूल, चढ़ाइये। एकदिन आप पायेंगे कि यह लोभ खत्म हो रहा है।
कुछ दिन के अभ्यासके बाद आप पायेगे कि अंदर से एकदम शांत हो रहें हैं। ये वासनाएं धीरे-धीरे शांत हो रही हैं। इसी समय हमें दूसरा कार्य करना होगा। रचनात्मक कार्य….
ऊर्जा की दिशा को मोड़ना या रचनात्मक कार्य-
1- लोभ को त्याग से, काम को राम से, क्रोध को प्रेम से, ईर्ष्या को सम्मान से, घंमड को शून्यता से जीता जा सकता है।
2- बच्चों को बचपन से ही ऊर्जा को सही दिशा देना सिखाना चाहिए। जैसे- जब बच्चा किसी चीज को तोड़ रहा हो तब उसे यह मत कहिये - "यह मत करो। बल्कि उससे कहिये यह करो।" फूल तोड़ने पर मना करने के बजाय उसे फूल बनाना या पौधा लगाना सिखाइये। किताब फाड़ने पर चिल्लाकर पिटाई करने के बजाय कुछ बनाना सिखाइये। इससे उसकी ऊर्जा बचपन ही रचनात्मक हो जायेगी।
©विन्ध्येश्वरी
रास्ते में अंगुलिमाल एक ऊंचा मचान बनाकर रहता था ताकि दूर से आने वाले राहगीरों को देख सके। उसने दूर से बुद्ध को आते देखा तो चिल्लाया - "तुम वहीं से लौट जाओ। मैं लोगों की हत्या करता हूँ। तुम मुझे संयासी दिख रहे हो इसलिये मैं तुम्हें छोड़ दे रहा हूँ। लौट जाओ। नहीं तो मैं तुम्हें मार दूंगा।" बुद्ध ने कहा - "मैं तो इसी रास्ते पर जाऊंगा। और हत्या तो मैं भी तुम्हारी कर दूंगा।" अंगुलिमाल उनके सामने आ गया। उसने कहा - "मूर्ख संयासी मरने के लिये तैयार हो जाओ।" बुद्ध ने कहा - "तुम मुझे मार देना। लेकिन पहले एक काम कर दो। इस पेड़ से चार पत्ते तोड़ दो।" अंगुलिमाल ने अपनी तलवार से पेड़ की पूरी डाली ही काट दी। उसने कहा - "लो यह पूरी डाली मैंने काट दिया। अब पत्ते ले लो। फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।" बुद्ध कहा - "ठीक है। लेकिन एक काम और कर दो, इस डाली को पुनः वहीं जोड़ दो।" अंगुलिमाल ने कहा - "यह कैसे संभव है? यह टूटी हुई डाली फिर नहीं जोड़ी जा सकती।" बुद्ध ने कहा - "मैंने तुम्हारी शक्ति के बारे में बहुत सुना था। लेकिन तुम तो बहुत कमजोर निकले। काटने का काम एक निशक्त आदमी भी कर सकता था। तुम उससे भी गये गुजरे हो। कहां है तुम्हारी शक्ति, तुम्हारा पौरुष?" अंगुलिमाल चकित हो गया। उसे एहसास हो गया कि वह वास्तव में कमजोर है। असली शक्ति तो तब है जब काटने के साथ जोड़ने का भी काम किया जा सके। शक्ति तो तब है जब घृणा करने वाले पर भी करुणा बरसे। फिर वह बुद्ध का अनुगत हो गया।
दरअसल यह शारीरिक बल और क्रूरता की शक्ति का सदमार्ग की तरफ उन्मुख होना था। हमारी वासनाएं हमारे भीतर मौजूद कमजोरी भी हैं और शक्ति भी। आप इसे ऐसे समझिए जैसे घर के सामने घूर (गांवों में घर का कूड़ा, कचरा, सब्जी के छिलके, गोबर आदि को एक जगह फेंका जाता है, उसे देहाती में घूर कहते हैं)। घूर प्राथमिक तौर पर कूड़े और अपशिष्टों का ढेर है, जिससे बदबू आती है। निहायत ही गंदा। जब आप इसे रोज जाकर खोदते रहते तब यह बदबू, यह कचरा चारों ओर फैल जाता है। वातावरण को प्रदूषित कर देता है। लेकिन जब एक दिन हम इसे अपने खेत में ले जाकर फेंक देते हैं और फिर अच्छे से फैलाकर, खेत की जुताई-गुड़ाई, सिंचाई, बुआई कर देते हैं तब यही गंदा, बेकार घूर उसकी उर्वराशक्ति को कई गुना बढ़ा देता है। उसी खेत से जबर्दस्त पैदावार हासिल होती है या बाग में डाल देने पर वही बदबू खुशबू में बदल जाती है।
इसी प्रकार हमारी वासनाएं भी हैं। कूड़ा, कचरा, गंदा, बेकार। अगर हमें अधिक क्रोध आता है, अगर हम अधिक कामी हैं, अगर हम बेतहाशा लालची और हद दर्जे के घमंडी हैं। और यह हमें बार बार हो रहा है तब यह ठीक वैसे है जैसे हम घूर को रोज - रोज खोद कर छोड़ देते हैं। लेकिन यदि हम इसका सही इस्तेमाल जान ले तो फिर यह शक्ति में बदल जाती हैं जो हमारे जीवन को बदलने का सामर्थ्य रखती हैं। यही शक्ति संसार को सुवासित कर सकती है।
कल्पना कीजिए कि आप एक निहायत ही कमजोर आदमी है। लेकिन आपके सामने एक शेर आ जाता है। आप पूरी शक्ति से जान बचाने के लिए भागते हैं। इतनी तेज भागते हैं कि सामान्य दशा में यह असंभव था। इतनी शक्ति आपमें कहाँ से आ गयी?
मान लीजिए आप एक शांत - सौम्य व्यक्ति हैं। अचानक आपके सामने कोई ऐसा कृत्य हो जाता है, जब आप आगबबूला हो जाते हैं। चेहरा एक दम लाल - पीला हो गया है, दांत कटकटा रहे हैं, आंखें लाल लाल, नसें फूली हुई और शरीर तमतमा रहा है। यह क्या है? यह हमारे आपके भीतर मौजूद एक शक्ति है।
हम सामान्य दशा में काम के प्रति स्थिर चित्त होते हैं। लेकिन किसी सुंदर स्त्री या पुरुष को देखकर अंग-अंग रोमांच से भर जाता है। रोम-रोम में काम का संचार हो जाता है। जब मनुष्य कामोत्सुक हो जाता है फिर उसे कुछ नहीं सूझता। आखिर कहाँ से आयी यह शक्ति?
दरअसल यह वासनाएं हमारे भीतर मौजूद युरेनियम की गांठ जैसी हैं जिनमें अपार ऊर्जा भरी हुई है। जो एक रिएक्शन के द्वारा ऊर्जा में बदल जाती हैं। यदि यह किसी आतंकवादी विचारधारा वाले आदमी/देश (जैसे आई. एस. आई. एस./अमेरिका) के हाथ पड़ जाये तो सर्वनाश कर सकता है या उसी के बल पर दुनिया के ऊपर दादागीरी हांक सकता है। अथवा यदि यह किसी शांति प्रिय देश (जैसे भारत) के हाथ पड़ जाता है तब वह इसका उपयोग जनकल्याण के लिये ऊर्जा के उत्पादन में करेगा।
प्रथम द्रष्टया चाहे हमारे भीतर मौजूद वासना हो या प्रकृति में मौजूद परमाणु खतरनाक ही नजर आते हैं। अब तीन बातें हो सकती हैं। एक - इनके खतरे को भांप कर हम इनका दमन कर दें या इन्हें यूं ही पड़ा रहने देें। इस स्थिति में ऊर्जा से कोई खतरा तो नहीं है लेकिन यह अपार ऊर्जा बेकार हो गयी है। दूसरा - इन्हें घातक बम या पाप का माध्यम बना दें और विनाश करेें। तीसरा - हम इन्हें उचित प्रक्रिया के द्वारा ऊर्जा में बदल दें, अच्छे हाथों में जाने देंं, जिससे विकास हो सके। ध्यान रहे हमें इन शक्तियों का दमन नहीं करना है। जब हम अपने भीतर मौजूद शक्तियों का दमन करते हैं तब यह हमारे शरीर को ही नुकसान पहुंचाता है। हमारे शरीर को विषाक्त कर देता है। हमारे शरीर में विकारों को जन्म देता है। अत्यधिक चिंतित रहने वाले आदमी के चेहरे पर झुर्रियां जल्दी पड़ती हैं, वह जल्दी बीमार पड़ता है। अत्यधिक क्रोधी आदमी की भौंहै हमेशा तनी रहती है। आंखें निकली रहती हैं। काम केे वेग को रोकनेे से नपुंसकता आती है। या अत्यधिक कामी व्यक्ति जल्दी वृद्ध होता है। हमें इन शक्तियों को सही मार्ग देना है, दबाना नहीं है।
हमारे समाज में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने ऊर्जा का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों किया है। हिटलर के पास बुद्धि, वाकपटुता, नेतृत्वकौशल था उसने इस शक्ति का उपयोग लाखों लोगों का संहार करने और विश्व को महायुद्ध में झोंकने में किया। यही शक्ति गांधी के पास भी थी। उन्होंने इससे विश्व को एक नयी दिशा देने का काम किया। अकबर के पास काम की शक्ति अधिक थी, उसने अपने हरम को सुंदर स्त्रियों से सजा रखा था। यही ऊर्जा तुलसीदास के पास भी थी। उन्होंने पत्नी से दुत्कार खाने के बाद इसे राम की तरफ मोड़ दिया। ऐसे ही नेपोलियन, सिकंदर, मुसोलिनी, ओसामा, तैमूर, चंगेज आदि ने भी अपनी शक्ति को गलत दिशा देकर समाज को पीड़ित, प्रताड़ित किया। यही ऊर्जा बुद्ध, महावीर, आचार्य शंकर, कबीर, मीरा, सूर, अरस्तू, प्लेटो, मुहम्मद और जीसस आदि के पास भी थी। इन्होंने इसे सही दिशा देकर संसार को सुंदर बनाने का प्रयत्न किया।
प्रश्न उठता है कि इन शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाये कि यह हमारे लिए सकारात्मक परिणाम देने वाली हों? कुछ तरीके इस प्रकार हैं-
ऊर्जा को बाहर निकलना-
1- हफ्ते में एक आध दिन आप एक बंद कमरे में वह करिये जो आप सभ्य समाज में नहीं कर सकते। जैसे- अपने कमीने बाॅस या पति/पत्नी या पड़ोसी या टीचर का कार्टून या स्केच बनाकर उसे गंदी - गंदी गालियां दीजिये, जूतों से कूटिये, थूकिये, मारियेे, चिढाइये।
2- या अगर आप समाज और बड़े - बुजुर्गों के के सामने लज्जा के नाते खुलकर हंस नहीं सकते तो एक बंद कमरे में जमकर हंसिये। ठठा मारकर हंसिये। अथवा पद और घंमड के कारण खुलकर रो नहीं सकते तो आइने में खुद को देखते हुए दहाड़े मारकर रोइये।
3- आप अधिक लोभी हैं तो भगवान के सामने बैठकर उनकी मानसिक पूजा करिये। उनको मंहगे से मंहगा भोजन, वस्त्र, मिठाई, फल-फूल, चढ़ाइये। एकदिन आप पायेंगे कि यह लोभ खत्म हो रहा है।
कुछ दिन के अभ्यासके बाद आप पायेगे कि अंदर से एकदम शांत हो रहें हैं। ये वासनाएं धीरे-धीरे शांत हो रही हैं। इसी समय हमें दूसरा कार्य करना होगा। रचनात्मक कार्य….
ऊर्जा की दिशा को मोड़ना या रचनात्मक कार्य-
1- लोभ को त्याग से, काम को राम से, क्रोध को प्रेम से, ईर्ष्या को सम्मान से, घंमड को शून्यता से जीता जा सकता है।
2- बच्चों को बचपन से ही ऊर्जा को सही दिशा देना सिखाना चाहिए। जैसे- जब बच्चा किसी चीज को तोड़ रहा हो तब उसे यह मत कहिये - "यह मत करो। बल्कि उससे कहिये यह करो।" फूल तोड़ने पर मना करने के बजाय उसे फूल बनाना या पौधा लगाना सिखाइये। किताब फाड़ने पर चिल्लाकर पिटाई करने के बजाय कुछ बनाना सिखाइये। इससे उसकी ऊर्जा बचपन ही रचनात्मक हो जायेगी।
©विन्ध्येश्वरी
Sunday, 21 June 2020
लव आजकल : निर्णय का कशमकश
आज एक फिल्म देखा - "लव आजकल"। फिल्म तो मूलतः करियर और प्रेम केंद्रित है। लेकिन मुझे इस फिल्म से जो संदेश मिला वह कुछ दूसरा है। मुझे लगता है कि फिल्म प्यार और करियर के कशमकश से ज्यादा निर्णय का कशमकश है। हिरोइन की माँ ने अपने जवानी के जोश में आकर करियर को ठोकर मारकर अपने प्रेमी के साथ जीवन व्यतीत करना ज्यादा मुफ़ीद समझा लेकिन कुछ दिन की रंगीनी के बाद वही घर के किचकिच, चौका, बर्तन, झाड़ू, पोंछा, पति की तीमारदारी और सारा जीवन महज एक नौकरानी बन जाना। वह एक रोबोट बन गयी है। जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिये पति पर निर्भरता, छोटी-छोटी खुशियों की तिलांजलि। माँ ऊब गयी थी अपने इस जीवन से। यानी उसे अपने पहले लिये गये निर्णय पर ताउम्र पछतावा है। उसकी कोशिश है कि उसकी बेटियां इस मार्ग पर न चलें। लेकिन बड़ी बेटी इसी मार्ग पर चलकर पुनः बर्बाद हो चुकी है।
उसने अपनी छोटी बेटी (हिरोइन) को इस लफड़े में न पड़ने की सलाह घोंट घोंट कर पिलाया। बेटी के मन में करियर को पाने का जनून भर दिया। बेटी भी लगभग माँ के अनुसार ही चल रही थी कि एक मोड़ पर हीरो टकरा जाता है। फिर वह प्यार में पड़ जाती है। फिर वह "गलती" कर बैठती है। अंततः करियर में सेटेल होने के बाद भी उसका हृदय उस प्रेमी से ही लगा रहता है। यद्यपि वह कहती है कि "उसने काम को ही ब्वाॅयफ्रेंड बना लिया है लेकिन यह कहने के सिवाय और कुछ नहीं है। 12 - 15 घंटे की नौकरी, तमाम पचड़े-लफड़े, भाग-दौड़। वह अपने शानदार चमकते करियर से ऊब चुकी है। यद्यपि आर्थिक स्वतंत्रता है लेकिन उसे यहाँ रोबोट बन कर जीना पड़ रहा है। उसे भी अपने निर्णय पर मलाल है।
जीवन में कोई भी चीज हमारे माकूल नहीं हो सकती फिर निर्णय भी उससे भिन्न कैसे हो सकता है?हमारा निर्णय सही है या गलत यह वक्त तय करता है। एल्बा का युद्ध हारने के बाद नेपोलियन से पूछा गया - "क्या आप अपने को एक सफल सम्राट मानते हैं?" उसने कहा - "हाँ, लेकिन एल्बा का युद्ध हारने से पहले।"हमारे हर निर्णय पर कुछ दिन बाद एक काश!!!………… लगता है। जीवन का कोई भी निर्णय सौ प्रतिशत सही कैसे हो सकता है? हर निर्णय के पीछे कुछ सही और कुछ गलत होता है। हमारे निर्णय की सफलता या असफलता दो बातों से तय होती है-
1- जो हमने सोचा था वह मिला या नहीं। और अगर मिला तो कितने प्रतिशत तक मिला।
2- उसे पाने या निर्णय को सही सिद्ध करने के लिए क्या कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि हर निर्णय की एक कीमत होती है।
©विन्ध्येश्वरी
उसने अपनी छोटी बेटी (हिरोइन) को इस लफड़े में न पड़ने की सलाह घोंट घोंट कर पिलाया। बेटी के मन में करियर को पाने का जनून भर दिया। बेटी भी लगभग माँ के अनुसार ही चल रही थी कि एक मोड़ पर हीरो टकरा जाता है। फिर वह प्यार में पड़ जाती है। फिर वह "गलती" कर बैठती है। अंततः करियर में सेटेल होने के बाद भी उसका हृदय उस प्रेमी से ही लगा रहता है। यद्यपि वह कहती है कि "उसने काम को ही ब्वाॅयफ्रेंड बना लिया है लेकिन यह कहने के सिवाय और कुछ नहीं है। 12 - 15 घंटे की नौकरी, तमाम पचड़े-लफड़े, भाग-दौड़। वह अपने शानदार चमकते करियर से ऊब चुकी है। यद्यपि आर्थिक स्वतंत्रता है लेकिन उसे यहाँ रोबोट बन कर जीना पड़ रहा है। उसे भी अपने निर्णय पर मलाल है।
जीवन में कोई भी चीज हमारे माकूल नहीं हो सकती फिर निर्णय भी उससे भिन्न कैसे हो सकता है?हमारा निर्णय सही है या गलत यह वक्त तय करता है। एल्बा का युद्ध हारने के बाद नेपोलियन से पूछा गया - "क्या आप अपने को एक सफल सम्राट मानते हैं?" उसने कहा - "हाँ, लेकिन एल्बा का युद्ध हारने से पहले।"हमारे हर निर्णय पर कुछ दिन बाद एक काश!!!………… लगता है। जीवन का कोई भी निर्णय सौ प्रतिशत सही कैसे हो सकता है? हर निर्णय के पीछे कुछ सही और कुछ गलत होता है। हमारे निर्णय की सफलता या असफलता दो बातों से तय होती है-
1- जो हमने सोचा था वह मिला या नहीं। और अगर मिला तो कितने प्रतिशत तक मिला।
2- उसे पाने या निर्णय को सही सिद्ध करने के लिए क्या कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि हर निर्णय की एक कीमत होती है।
यदि थोड़ा सा और आगे बढ़कर कहा जाये तो यह निर्णय के मसले से ज्यादा "मनोविज्ञान" का मसला है। जो हमें मिल जाता है वह हमारे लिये मूल्यहीन हो जाता है और जो नहीं मिलता है या जो गोपन में होता है उसका आकर्षण निरंतर बना रहता है। आमतौर प्रेमी - प्रेमिका का जीवन एक्साइटमेंट भरा होता है। छुप छुपा कर मिलते हुए एक छोटा सा चुंबन या एक स्पर्श स्वर्ग की खुशी देता है। यदि कोई कई प्रेमियों या प्रेमिकाओं के साथ ऐसा नहीं कर चुका है तो या जब तक की गुप्त धन बाहर नहीं आ जाता तब तक। जबकि पति - पत्नी का जीवन शुरुआती दिनों को छोड़कर धीरे-धीरे इससे हीन होने लगता है। क्यों? क्योंकि वहाँ सबकुछ खुली किताब हो जाता है। जिस नौकरी को हम पाने के लिये मरे जा रहे होते हैं, कुछ समय के बाद वह भी निरस और बोरियत भरा लगने लगता है। क्यों? क्योंकि उसका तिलस्म हमारे सामने उजागर हो चुका होता है। हम जिस स्थान पर रहते हैं वहां हजारों लोग घूमने आते हैं हम शायद ही कभी जाते हों। हम दूसरे प्रदेश या देश में घूमने जाते हैं। हमें अपना स्थान उतना घूमने योग्य नहीं लगता और दूसरों को अपना। क्यों? वही अज्ञात का आनन्द। इसीलिए किसी शायर ने कहा है - "दुनिया जिसे कहती है जादू का खिलौना। मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये है सोना।" अज्ञात और गोपन का आनन्द कुछ दूसरा है। मनुष्य उसे महसूस करके ही खुश होता है। जब उसे वह मिल जाता है तब वह मिट्टी के समान हो जाता है।
©विन्ध्येश्वरी
चीन का आर्थिक बहिष्कार
चीन का आर्थिक बहिष्कार
क्यों? ( लाभ के अंतर्गत भी लगभग यही बिंदु शामिल किये जा सकते हैं)
1- सीमा पर सामरिक तनाव का आर्थिक जवाब
2- मेक इन इंडिया को बढ़ावा देना
3- पूंजी निकास को रोकना
4- व्यापार घाटे को कम करना
5- घरेलू उद्योगों को संरक्षित करना
6- चीन की आक्रामक विदेश नीति का जवाब
लाभ-
1- आयात में खर्च होने वाले विदेशी मुद्रा भंडार की बचत
2- घरेलू उद्योगों के संरक्षण से रोजगार में वृद्धि
3- घटिया चीनी सामानों का आयात बंद करने से उपभोक्ता हितों का संरक्षण
4- भविष्य में स्वावलंबन
5- देश का तीव्र आर्थिक विकास
हानि-
1- भारत - चीन संबंधों में दूरगामी तनाव और विकट दुष्परिणाम संभावित
2- चीन की आक्रामकता और पाकिस्तानी पृष्ठ पोषण में वृद्धि
3- चीन समर्थक पड़ोसी देशों (नेपाल, श्रीलंका आदि) से भी तनाव संभावित
चुनौतियाँ-
1- चीन के साथ भारत का आयात 70 अरब डाॅलर का है और जबकि निर्यात 17 अरब डॉलर। लेकिन चीन के समग्र वैदेशिक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी महज 3% है। संभव है कि चीन के ऊपर इस बहिष्कार का अधिक असर न पड़े।
2- भारत में चीन आयातित सामानों की अत्यधिक भागीदारी है। जैसे- खिलौना 90%, एल ई डी बल्व और एल सी डी 40%, दवाओं के लिये कच्चा माल (API) 80%, मोटर पार्ट 50%, मोबाइल पार्ट 70% आदि। ऐसे भी तत्काल बहिष्कार भारतीय उद्योगों को चौपट कर सकता है।
3- अनेक स्टार्टअप कंपनियों में चीनी कंपनियों ने निवेश किया है। जैसे - स्वीगी, जौमैटो, फ्लिपकालर्ट, बाय्जू आदि। यदि चीनी वस्तुओं और निवेश का बहिष्कार किया गया तो इन स्टार्टअपस् से भी निवेश निकाल लिया जायेगा। इससे ये कंपनियां पूंजी संकट से घिर सकती है।
समाधान-
1- आवश्यक वस्तुओं की सूची बनाकर मित्र देशों जैसे- जापान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों आदि से सामान मंगाना
2- घरेलू विनिर्माण उद्योगों को सस्ता ऋण, कर छूट आदि देकर उत्पादन हेतु प्रोत्साहित करना
3- घरेलू श्रम का कुशलता पूर्वक उपयोग (विशेष कौशल प्रशिक्षित श्रमिकों को नियोजित करना, अर्ध्दकुशल और अकुशल श्रमिकों को प्रशिक्षित कर नियोजित करना)
4- घरेलू और विदेशी (चीन को छोड़कर) निवेश को प्रोत्साहित करना
5- भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी को आसान बनाना
6- सस्ती बिजली और कोयला उपलब्ध करवाना
7- सरकारी स्तर पर चीनी कंपनियों को ठेका देने से बचना
©विन्ध्येश्वरी
क्यों? ( लाभ के अंतर्गत भी लगभग यही बिंदु शामिल किये जा सकते हैं)
1- सीमा पर सामरिक तनाव का आर्थिक जवाब
2- मेक इन इंडिया को बढ़ावा देना
3- पूंजी निकास को रोकना
4- व्यापार घाटे को कम करना
5- घरेलू उद्योगों को संरक्षित करना
6- चीन की आक्रामक विदेश नीति का जवाब
लाभ-
1- आयात में खर्च होने वाले विदेशी मुद्रा भंडार की बचत
2- घरेलू उद्योगों के संरक्षण से रोजगार में वृद्धि
3- घटिया चीनी सामानों का आयात बंद करने से उपभोक्ता हितों का संरक्षण
4- भविष्य में स्वावलंबन
5- देश का तीव्र आर्थिक विकास
हानि-
1- भारत - चीन संबंधों में दूरगामी तनाव और विकट दुष्परिणाम संभावित
2- चीन की आक्रामकता और पाकिस्तानी पृष्ठ पोषण में वृद्धि
3- चीन समर्थक पड़ोसी देशों (नेपाल, श्रीलंका आदि) से भी तनाव संभावित
चुनौतियाँ-
1- चीन के साथ भारत का आयात 70 अरब डाॅलर का है और जबकि निर्यात 17 अरब डॉलर। लेकिन चीन के समग्र वैदेशिक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी महज 3% है। संभव है कि चीन के ऊपर इस बहिष्कार का अधिक असर न पड़े।
2- भारत में चीन आयातित सामानों की अत्यधिक भागीदारी है। जैसे- खिलौना 90%, एल ई डी बल्व और एल सी डी 40%, दवाओं के लिये कच्चा माल (API) 80%, मोटर पार्ट 50%, मोबाइल पार्ट 70% आदि। ऐसे भी तत्काल बहिष्कार भारतीय उद्योगों को चौपट कर सकता है।
3- अनेक स्टार्टअप कंपनियों में चीनी कंपनियों ने निवेश किया है। जैसे - स्वीगी, जौमैटो, फ्लिपकालर्ट, बाय्जू आदि। यदि चीनी वस्तुओं और निवेश का बहिष्कार किया गया तो इन स्टार्टअपस् से भी निवेश निकाल लिया जायेगा। इससे ये कंपनियां पूंजी संकट से घिर सकती है।
समाधान-
1- आवश्यक वस्तुओं की सूची बनाकर मित्र देशों जैसे- जापान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों आदि से सामान मंगाना
2- घरेलू विनिर्माण उद्योगों को सस्ता ऋण, कर छूट आदि देकर उत्पादन हेतु प्रोत्साहित करना
3- घरेलू श्रम का कुशलता पूर्वक उपयोग (विशेष कौशल प्रशिक्षित श्रमिकों को नियोजित करना, अर्ध्दकुशल और अकुशल श्रमिकों को प्रशिक्षित कर नियोजित करना)
4- घरेलू और विदेशी (चीन को छोड़कर) निवेश को प्रोत्साहित करना
5- भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी को आसान बनाना
6- सस्ती बिजली और कोयला उपलब्ध करवाना
7- सरकारी स्तर पर चीनी कंपनियों को ठेका देने से बचना
©विन्ध्येश्वरी
Saturday, 20 June 2020
प्रेम का घर
"कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
शीश उतारे भुईं धरे, सो घर पैठे माहिं॥"
कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर का घर मौसी का घर नहीं है, जब मर्जी, जैसी मर्जी हाथ झुलाते चले आये। यह प्रेम का घर है। यहाँ प्रवेश पाने के लिये अपना शीश चढ़ाना पड़ता है। अर्थात ईश्वर को पाने के लिए अपने अहंकार का बलिदान करना पड़ेगा। आप अहम के साथ ईश्वर के परिसर में प्रवेश नहीं पा सकते।
हमारे भीतर पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, धन, ज्ञान आदि का अभिमान भरा रहता है। इस अभिमान के साथ हम ईश्वर के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च में चाहे जितना माथा रगड़ लें, चाहे जितनी पूजा-आरती, अजान-नमाज-प्रेयर, रोजा-व्रत-फास्ट रख लें, ईश्वर का साक्षात्कार असंभव है। हम सब ईश्वर को मूर्ख समझते हैं। ये वो चढ़ाने - करने से ईश्वर मिल जायेगा। इतना सस्ता ईश्वर नहीं है। उसे हमारा शीश चाहिए, हमारा अभिमान चाहिए। अभिमान मुक्त होकर हम न केवल ईश्वरत्व का सहज साक्षात्कार कर सकते हैं, वरन स्वयं ईश्वर हो सकते हैं।
जब तक हमारे भीतर अहम भाव (यानि मैं हूँ) है तब तक ईश्वरत्व की प्राप्ति असंभव है। इसीलिये कबीर कहते भी हैं "जब 'मैं' था तब हरि नहीं, अब हरि हैं 'मैं' नाहिं। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं॥" जब तक मेरे भीतर 'मैं भाव' था तब तक ईश्वर नहीं था और जब ईश्वर आया तब 'मैं' नहीं हूँ। यह प्रेम की गली बहुत ही संकरी है। इसमें दो चीजें एक साथ नहीं समा सकतीं। या तो अहंकार रहेगा या फिर ईश्वर। अतः मुक्त मन से "त्वदीयं वस्तु गोविंदं, तुभ्यमेव समर्पये।" मेरा पद - मेरी बेगारी, मेरी प्रतिष्ठा - मेरी तौहीन, मेरा धन - मेरी गुरबत, मेरी शक्ति - मेरी निशक्तता, मेरा ज्ञान - मेरा अज्ञान, मेरा मान - मेरा अपमान सब तेरा है। मेरा मुझ में कुछ नहीं है जो है सो तोर।
©विन्ध्येश्वरी
शीश उतारे भुईं धरे, सो घर पैठे माहिं॥"
कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर का घर मौसी का घर नहीं है, जब मर्जी, जैसी मर्जी हाथ झुलाते चले आये। यह प्रेम का घर है। यहाँ प्रवेश पाने के लिये अपना शीश चढ़ाना पड़ता है। अर्थात ईश्वर को पाने के लिए अपने अहंकार का बलिदान करना पड़ेगा। आप अहम के साथ ईश्वर के परिसर में प्रवेश नहीं पा सकते।
हमारे भीतर पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, धन, ज्ञान आदि का अभिमान भरा रहता है। इस अभिमान के साथ हम ईश्वर के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च में चाहे जितना माथा रगड़ लें, चाहे जितनी पूजा-आरती, अजान-नमाज-प्रेयर, रोजा-व्रत-फास्ट रख लें, ईश्वर का साक्षात्कार असंभव है। हम सब ईश्वर को मूर्ख समझते हैं। ये वो चढ़ाने - करने से ईश्वर मिल जायेगा। इतना सस्ता ईश्वर नहीं है। उसे हमारा शीश चाहिए, हमारा अभिमान चाहिए। अभिमान मुक्त होकर हम न केवल ईश्वरत्व का सहज साक्षात्कार कर सकते हैं, वरन स्वयं ईश्वर हो सकते हैं।
जब तक हमारे भीतर अहम भाव (यानि मैं हूँ) है तब तक ईश्वरत्व की प्राप्ति असंभव है। इसीलिये कबीर कहते भी हैं "जब 'मैं' था तब हरि नहीं, अब हरि हैं 'मैं' नाहिं। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं॥" जब तक मेरे भीतर 'मैं भाव' था तब तक ईश्वर नहीं था और जब ईश्वर आया तब 'मैं' नहीं हूँ। यह प्रेम की गली बहुत ही संकरी है। इसमें दो चीजें एक साथ नहीं समा सकतीं। या तो अहंकार रहेगा या फिर ईश्वर। अतः मुक्त मन से "त्वदीयं वस्तु गोविंदं, तुभ्यमेव समर्पये।" मेरा पद - मेरी बेगारी, मेरी प्रतिष्ठा - मेरी तौहीन, मेरा धन - मेरी गुरबत, मेरी शक्ति - मेरी निशक्तता, मेरा ज्ञान - मेरा अज्ञान, मेरा मान - मेरा अपमान सब तेरा है। मेरा मुझ में कुछ नहीं है जो है सो तोर।
©विन्ध्येश्वरी
Friday, 19 June 2020
स्टेगोडाॅन हाथी
स्टेगोडाॅन हाथी:-
1- उ. प्र. के सहारनपुर जिले में 50 लाख साल पुराने स्टेगोडाॅन हाथी का जीवाश्म मिला है।
2- स्टेगोडाॅन, जिसका अर्थ है "छत वाले दांत" (जो प्राचीन ग्रीक शब्दों से st, stégō, 'to cover', + ,ο +, odoús, 'दांत') से बना है
3- इस प्रजाति के हाथी के दाढ़ पर विशिष्ट लकीरें होती हैं,
4- यह विलुप्त हाथी Stegodontinae का एक जीनस है
5- स्टेगोडोन्स 1.6 करोड़ साल पहले से लेकर लगभग 1 लाख साल पहले तक मौजूद थे
6- 4,100 साल पहले तक स्थानीय अस्तित्व के अपुष्ट रिकॉर्ड भी पाये जाते हैं
7- इसका जीवाश्म एशियाई और अफ्रीकी क्षेत्रों में पाए गये हैं
8- वर्ष 1951 में भारत तथा वर्ष 2015 में नेपाल ने इस प्रजाति के संबधित डाक टिकट भी जारी किया था
1- उ. प्र. के सहारनपुर जिले में 50 लाख साल पुराने स्टेगोडाॅन हाथी का जीवाश्म मिला है।
2- स्टेगोडाॅन, जिसका अर्थ है "छत वाले दांत" (जो प्राचीन ग्रीक शब्दों से st, stégō, 'to cover', + ,ο +, odoús, 'दांत') से बना है
3- इस प्रजाति के हाथी के दाढ़ पर विशिष्ट लकीरें होती हैं,
4- यह विलुप्त हाथी Stegodontinae का एक जीनस है
5- स्टेगोडोन्स 1.6 करोड़ साल पहले से लेकर लगभग 1 लाख साल पहले तक मौजूद थे
6- 4,100 साल पहले तक स्थानीय अस्तित्व के अपुष्ट रिकॉर्ड भी पाये जाते हैं
7- इसका जीवाश्म एशियाई और अफ्रीकी क्षेत्रों में पाए गये हैं
8- वर्ष 1951 में भारत तथा वर्ष 2015 में नेपाल ने इस प्रजाति के संबधित डाक टिकट भी जारी किया था
©विन्ध्येश्वरी
अंधकार बनाम प्रकाश
एक लड़का अंधेरे कमरे में बैठा था। उसके पिता आये तो उन्होंने पूछा - "बेटे, अंधेरे कमरे में क्यों बैठे हो? एक दिया तो जला लेते? उस लड़के ने कहा - "वह इंतजार कर रहा है कि जब अंधकार खत्म हो जायेगा, तब वह दिया जलायेगा।" पिता ने कहा - "क्या मूर्खता पूर्ण बात कर रहे हो? भला बिना दिया जलाये अंधकार कैसे मिटेगा?"
लड़का गलत था या सही, यह निर्णय आप कीजिये। लेकिन हम आज भी हजारों वर्षों से अंधेरा छंटने के बाद दिया जलाने का इंतज़ार कर रहे हैं। आप कहेंगे क्या पागलों वाली बातें कर रहे हो? मैं सच कह रहा हूँ। क्योंकि धर्मशास्त्रों में लिखा है और संत लोग भी यही कहते हैं कि अपने काम, क्रोध, लोभ का दमन करोगे तभी परमात्मा मिलेगा। ईश्वर को प्राप्त करने के लिये त्याग जरूरी है (भले ही वे हमारे चढ़ावे और दक्षिणा का इंतज़ार कर रहे हों और कम मिलने पर नाक-भौं सिकोड़ते हों)।
हमारी वासनाएं हमारे भीतर मौजूद अंधकार हैं। इस अंधकार का नाश करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता है। प्रकाश क्या है? यह ठीक अंधकार का विपरीत है। यानि प्रकाश की अनुपस्थिति ही अंधकार है। अंधकार को आप ढूंढते रहिये लेकिन यह कहीं नहीं मिलेगा। हमारी वासनाएं भी कहीं नहीं है। यह वासनाओं के विपरीत (निर्लिप्ति) की अनुपस्थिति मात्र हैं।
प्रश्न है कि इस वासना रूपी अंधकार को समाप्त कैसे किया जाये। इसका एक सहज और सरल मार्ग है। जैसे हम अंधकार को दूर करने के लिए अंधकार के जाने का इंतज़ार नहीं कर सकते वैसे ही बुराई को दूर करने के लिए बुराई के जाने का इंतज़ार निरर्थक है। अच्छाई को स्वीकार कर उसे आचरण में शामिल करें। बुराई अपने आप खत्म होने लेगेगी।
लड़का गलत था या सही, यह निर्णय आप कीजिये। लेकिन हम आज भी हजारों वर्षों से अंधेरा छंटने के बाद दिया जलाने का इंतज़ार कर रहे हैं। आप कहेंगे क्या पागलों वाली बातें कर रहे हो? मैं सच कह रहा हूँ। क्योंकि धर्मशास्त्रों में लिखा है और संत लोग भी यही कहते हैं कि अपने काम, क्रोध, लोभ का दमन करोगे तभी परमात्मा मिलेगा। ईश्वर को प्राप्त करने के लिये त्याग जरूरी है (भले ही वे हमारे चढ़ावे और दक्षिणा का इंतज़ार कर रहे हों और कम मिलने पर नाक-भौं सिकोड़ते हों)।
हमारी वासनाएं हमारे भीतर मौजूद अंधकार हैं। इस अंधकार का नाश करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता है। प्रकाश क्या है? यह ठीक अंधकार का विपरीत है। यानि प्रकाश की अनुपस्थिति ही अंधकार है। अंधकार को आप ढूंढते रहिये लेकिन यह कहीं नहीं मिलेगा। हमारी वासनाएं भी कहीं नहीं है। यह वासनाओं के विपरीत (निर्लिप्ति) की अनुपस्थिति मात्र हैं।
प्रश्न है कि इस वासना रूपी अंधकार को समाप्त कैसे किया जाये। इसका एक सहज और सरल मार्ग है। जैसे हम अंधकार को दूर करने के लिए अंधकार के जाने का इंतज़ार नहीं कर सकते वैसे ही बुराई को दूर करने के लिए बुराई के जाने का इंतज़ार निरर्थक है। अच्छाई को स्वीकार कर उसे आचरण में शामिल करें। बुराई अपने आप खत्म होने लेगेगी।
जन्म के समय लोग बिना किसी खास हुनर के पैदा होते हैं। लेकिन हम यह कभी नहीं कहते कि जब हमें चलना आ जायेगा तभी हम चलेंगे। जब हम हमें बोलना आ जायेगा तभी बोलेंगे। हम यत्न करते हैं और फिर वैसा होने लगता है। हमारी अज्ञानता नष्ट होती जाती है और हम धीरे-धीरे सब सीखते चले जाते हैं।
ध्यान रहे हमें अंधकार, अज्ञान या वासना से लड़ना नहीं है। क्योंकि हम इनसे लड़कर इन्हें कभी नहीं हरा सकते चाहे कोई कितना ही बलवान, धनवान, सामर्थ्यवान क्यों न हो। वरन इनसे लड़ कर हम इन्हें और शक्तिशाली बनाते हैं। कल्पना कीजिए कि आप एक विश्वविजेता पहलवान है और आप एक अंधेरे कमरे में हैं। आप हाथ में लठ्ठ लेकर अंधेरे को ढूंढ रहे हैं - "मिल तुझे अभी सबक सिखाता हूँ।" क्या होगा? आप अंधेरे का तो कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे ऊपर से दीवारों से सिर टकराकर अपना माथा ही लहूलुहान करेगें। ठीक ऐसे ही अज्ञान को समाप्त करने के न तो धन की जरूरत है और न ही बल की, बल्कि इसके लिये ज्ञान का एक छोटा सा दिया ही काफी है।
आपको क्या लगता है अगर उपरोक्त बातें कुछ हद तक सही हैं तो क्या वासना पर यह सिद्धांत लागू नहीं होता? होता है। जब आप अपने क्रोध को रोकते हैं तब आप क्रोध से लड़ रहे होते हैं। क्रोध का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन आप अपना नुकसान जरूर कर बैठते हैं। जब आप काम को रोकते हैं तब आप उसे कई गुना शक्तिशाली बना रहे होते हैं। इसका कुल जमा मतलब यह है कि हमें इनसे लड़ना नहीं बल्कि समझना है - "आखिर यह क्यों है?" फिर उसका हमें निदान करना है।
भूगोल में हवाओं का एक नियम है, हवाएं हमेशा उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती हैं। लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि पृथ्वी पर कभी भी कोई ऐसी जगह नहीं है जहां हवा मौजूद नहीं है। फिर ऐसा कैसे होता है कि हवा चले? सीधा सा उत्तर है अगर कहीं हवा के कम दबाव की थोड़ी सी भी गुंजाइश है तो तत्काल उस क्षेत्र में उससे जरा सी भी ज्यादा हवा के क्षेत्र से हवाएं दौड़ने लगती हैं। यानि हवा का दबाव लगभग संतुलित बना रहता है।
हमारे जीवन में भी अंधकार और प्रकाश, अच्छाई और बुराई, ज्ञान और अज्ञान इसी दबाव के नियम का अनुसरण करते हैं। अगर प्रकाश कमजोर हुआ तो अंधकार हावी, अगर अंधकार कमजोर हुआ तो प्रकाश हावी। अच्छाई कमजोर हुई तो बुराई हावी और बुराई कमजोर हुई तो अच्छाई हावी। ज्ञान कमजोर हुआ अज्ञान हावी और अज्ञान कमजोर हुआ तो ज्ञान हावी।
हमारे जीवन में भी अंधकार और प्रकाश, अच्छाई और बुराई, ज्ञान और अज्ञान इसी दबाव के नियम का अनुसरण करते हैं। अगर प्रकाश कमजोर हुआ तो अंधकार हावी, अगर अंधकार कमजोर हुआ तो प्रकाश हावी। अच्छाई कमजोर हुई तो बुराई हावी और बुराई कमजोर हुई तो अच्छाई हावी। ज्ञान कमजोर हुआ अज्ञान हावी और अज्ञान कमजोर हुआ तो ज्ञान हावी।
इसका मंतव्य यह है कि हमें अपने जीवन में अंधकार, बुराई और अज्ञान के छंटने का इंतज़ार नहीं करना है। अंधकार को नजरअंदाज कर प्रकाश का, बुराई को नजरअंदाज कर अच्छाई का, अज्ञान को नजरअंदाज कर ज्ञान एक दिया जलाना है। हम अंधकार, अज्ञान और बुराई को अपने से दूर कर सकेंगे।
©विन्ध्येश्वरी
©विन्ध्येश्वरी
Wednesday, 17 June 2020
बंदर और टोपी की कहानी का नया संस्करण
अब आगे की कहानी-
व्यापारी का एक आज्ञाकारी पुत्र था। पिता के कहे अनुसार वह भी टोपियों का व्यापार करने लगा। बाजार जाते समय वह आज्ञाकारी पुत्र उसी पेड़ के नीचे बैठकर विश्राम करने लगा। उसे पता न चला कि कब नींद आ गयी। इतने में उस पेड़ पर बैठे सारे बंदर उसकी टोकरी से सारी टोपियां उठा ले गये। और लगाकर मजे लेकर एक दूसरे की शक्लें निहारने लगे।
जब उस व्यापारी की नींद खुली तब वह टोकरी में टोपियां न पा कर दुखी हुआ। तब तक उसे याद कि पिता जी ने अपना एक किस्सा सुनाया था। उसमें भी बंदरों ने उनकी टोपी ले ली थी। फिर उन्होंने अपनी पहनी हुई टोपी को जमीन पर फेंक दिया। सारे बंदरों ने भी वैसा ही किया था। इस आज्ञाकारी बेटे ने भी अपनी पहनी हुई टोपी को जमीन पर फेंक दिया और बंदरों द्वारा टोपियां फेंके जाने का इंतजार करने लगा।
लेकिन यह क्या? एक बंदर जिसके सिर पर टोपी नहीं थी वह पेड़ से उतरा, उसने जमीन पड़ी हुई उस टोपी को उठाया और पहनकर पेड़ पर जाकर बैठ गया। आज्ञाकारी व्यापारी बहुत दुखी हुआ। उसके पिता की बतायी हुई तरकीब काम नहीं आयी।
कहानी का निष्कर्ष
हमारे साथ सदियों से ऐसा ही होता आया है। हमारे बाप - दादा जो किये हैं वही करने की हमें शिक्षा दी जाती है। वही करने के लिये हमें बाध्य किया जाता है। और ऐसा न कर पाने पर हमारे ऊपर नालायक और अवज्ञाकारी का तमगा लगा दिया जाता है। धर्म के क्षेत्र में पंडे- पुरोहितों, मुल्ला - मौलवियों, पादरियों - भिक्षुओं और जैन साधुओं ने ऐसा ही किया है। हमारे सामने एक लकीर खींच दी गयी है और बार बार कहा जाता है - यह वही लकीर जिससे तुम्हारी किस्मत लिखी गयी है और बनेगी भी इसी से। इससे आगे सोचना पाप है।
जब भी कोई बच्चा या युवक अपने किसी बुजुर्ग से कोई अटपटा प्रश्न करता है, पहले तो नासमझ मानकर टाला जाता है, बाद में उसे शालीनता और सभ्यता का पाठ पढ़ाया जाता है। प्रश्न इस समाज को व्यथित करता है। बेचैन करता है। बंधी - बंधाई धारणाओं, मान्यताओं, विश्वासों पर चलना जितना आसान है उतना नये मार्ग को खोज कर या निर्माण करके चलना नहीं। हमें उसी मार्ग पर चलने की शिक्षा दी जाती है जो जीर्ण-शीर्ण और पुरानी हो चुकी है। जो कालबाह्य (आउटडेटेड) हो चुकी है भले ही उसकी दिशा उधर न जाती हो जिधर हमें वास्तव में जाना है।
हमें मूर्ख आज्ञाकारी पुत्र बनना है या एक विवेकशील मनुष्य? मेरा स्पष्ट मत है कि आज्ञाकारी व्यापारी पुत्र बनकर गलत मार्ग पर जाने से ज्यादा श्रेष्ठ है अवज्ञाकारी बनकर नये मार्ग की खोज करना। क्योंकि टोपी को उतार कर फेंकना उसके पिता के समय का सच था। अब समय बदल चुका है। नये रास्ते, नये तरीके, नये विचार खोजना होगा अगर हम अपनी समूल पूंजी को खोना - गंवाना नहीं चाहते हैं तो……….
©विन्ध्येश्वरी
स्त्री का स्वभाव
1- प्रकृति ने स्त्री को पूर्ण गुणसूत्र से निर्मित किया है जबकि पुरुष को अपूर्ण। इस अंतर के कारण स्त्री स्थिर चित्त हो जाती है जबकि पुरुष हमेशा अस्थिर चित्त बना रहता है। अस्थिर चित्त व्यक्ति के लिये स्थिर चित्त व्यक्ति को समझना कठिन हो जाता है। जैसे किसी सिद्ध महात्मा (जो स्थिर चित्त हो चुका है- कबीर की बानी) की बात को समझना सामान्य आदमी के लिये कठिन होता है।
2- स्त्री का अवचेतन मन काफी सक्रिय होता है जबकि पुरुष का चेतन मन सक्रिय होता है। इस अंतर के कारण स्त्री मन के तीसरे तल से सोचती है जबकि पुरुष मन के पहले तल पर ही सोच पाता है। मन का पहला तल तर्क प्रधान है जबकि तीसरे तल पर तर्क की कोई गुंजाइश नहीं है, वहां सीधे फैसला होता है। इसका नतीजा यह होता कि जब तक पुरुष तर्क करने में उलझा रहता है तब तक स्त्री निष्कर्ष और निर्णय तक पहुंच जाती है। इसीलिए पुरुष को स्त्री की समझ में नहीं आती।
©विन्ध्येश्वरी
Tuesday, 16 June 2020
दीपक और प्रकाश
प्रकाश की आवश्यकता सभी को है लेकिन दीपक कोई नहीं बनना चाहता है। जब तक मनुष्य अपना दीपक खुद नहीं बनेगा तब तक उसे दूसरों से प्रकाश उधार लेना पड़ेगा। कुछ लोग मेरी इस बात से नइत्तेफाक रख सकते हैं जो कि रखना ही चाहिये, क्योंकि उनका दावा हो सकता है "आखिर दीपक के पास तेल और बाती तो दूसरे की होगी। फिर कोई अपना दीपक खुद कैसे हो सकता है?" प्रारंभिक तौर पर वे लोग सही हैं लेकिन वास्तव में गलत। क्योंकि दीपक के पास तेल और बाती भले ही दूसरों की ही लेकिन प्रकाश उसका अपना होता है। न तो केवल तेल से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है और न ही केवल बाती से। इन दोनों चीजों को मिलाकर प्रकाश उत्पन्न करने का कार्य दीपक ही करता है। ध्यान रहे इस प्रक्रिया में न तो तेल, न बाती और न ही दीपक महत्त्वपूर्ण है। महत्त्वपूर्ण है तो उससे प्रस्फुटित प्रकाश।
इस जगत का दुर्भाग्य यह है कि जब कोई प्रकाश स्रोत बनना चाहता है तो प्रकाश विरोधी हवाएँ उसे समूल नष्ट करने को प्रयत्नशील हो जाती है। अपने अंतिम क्षण तक नष्ट करना चाहती लेकिन जब वे नष्ट नहीं कर पाती (क्योंकि प्रकाश एक ऊर्जा है। ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। यह तो बस होता है। जिसकी दृष्टि में मोतियाबिन्द नहीं हुआ होता उसे दिखता है। बाकी अंधों का क्या?)। तब वे प्रकाश को ही आंधी का रूप दे देती हैं जो महाविनाशकारी होता है।
सारी दुनिया, जिसे अनश्वर प्रकाश से जगमग - जगमग होना चाहिए था, वह उन दुष्ट और भयावह आंधियों के हाथ पड़ कर संसार को जलाने लगता है। सदियों से इस संसार में यही होता आ रहा है। कृष्ण जिसने क्लीव (कायर) हो चुके अर्जुन को प्रकाशित कर पुरुषार्थ के लिये उद्यत किया। उसी कृष्ण के प्रकाश से जिस जगत को आलोकित होना था आंधियों (पंडे, पुजारियों) ने बड़वाग्नि का रूप दे दिया। उनके नाम पर कथाएं कही जाती हैं। भागवत माहात्म्य में वर्णन आता है कि उनकी कथा को सुनकर प्रेतयोनि धुंधरकारी मुक्त हो गया। हजारों वर्षों से वही कथा सुन-सुनाकर भी कोई पंडित या उसका चेला मुक्त नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि जिस कृष्ण के प्रकाश को हमें अपने भीतर भरना था उसे न भरकर आंधियों के संग जाने दिया।
यही हाल राम, कबीर, बुद्ध, महावीर, क्राइस्ट आदि के साथ हुआ। आज ये प्रकाशपुंज रूप आत्माएं मूर्ख, पाखंडी, स्वार्थी तत्वों के हाथ में पड़कर एक नये उपद्रव को जन्म दे रही है। कबीर, जिन्होंने हमेशा मूर्ति पूजा का विरोध किया, आज उनकी मूर्तियां बनाकर पूजी जा रही है। राम, जिन्होंने मर्यादा की प्रतिष्ठा की, उनके कथित अनुयायी सैकड़ों बार मर्यादाओं की चादर तार तार कर चुके हैं। बुद्ध, जिन्होंने ईश्वर की सत्ता को मानने से इंकार कर दिया था, आज खुद भगवान बना दिये गये हैं। महावीर, जिन्होंने कहा कि शायद मैं भी सच हूँ, शायद आप भी सच हैं और शायद वे भी सच हैं, उनके अनुयायी सिर्फ खुद को ही सच मान रहे हैं। क्राइस्ट, जिन्होंने खुद सूली चढ़कर ईश्वर से दूसरों के गुनाहों को माफ करने की प्रार्थना किया, उन्हीं के अनुयायियों ने कल, बल, छल से पूरे विश्व को आक्रांत कर डाला।
प्रकाश और उसकी ऊर्जा का इससे बड़ा दुरुपयोग संभवतः ब्रह्मांड में अन्यत्र नहीं है। अंततः मेरा मानना है कि हमें अपना दीपक खुद बनकर संसार को आलोकित भी करना है और आंधियों के हाथ न पड़ कर संसार को जलने से बचाना भी है।
©विन्ध्येश्वरी
इस जगत का दुर्भाग्य यह है कि जब कोई प्रकाश स्रोत बनना चाहता है तो प्रकाश विरोधी हवाएँ उसे समूल नष्ट करने को प्रयत्नशील हो जाती है। अपने अंतिम क्षण तक नष्ट करना चाहती लेकिन जब वे नष्ट नहीं कर पाती (क्योंकि प्रकाश एक ऊर्जा है। ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। यह तो बस होता है। जिसकी दृष्टि में मोतियाबिन्द नहीं हुआ होता उसे दिखता है। बाकी अंधों का क्या?)। तब वे प्रकाश को ही आंधी का रूप दे देती हैं जो महाविनाशकारी होता है।
सारी दुनिया, जिसे अनश्वर प्रकाश से जगमग - जगमग होना चाहिए था, वह उन दुष्ट और भयावह आंधियों के हाथ पड़ कर संसार को जलाने लगता है। सदियों से इस संसार में यही होता आ रहा है। कृष्ण जिसने क्लीव (कायर) हो चुके अर्जुन को प्रकाशित कर पुरुषार्थ के लिये उद्यत किया। उसी कृष्ण के प्रकाश से जिस जगत को आलोकित होना था आंधियों (पंडे, पुजारियों) ने बड़वाग्नि का रूप दे दिया। उनके नाम पर कथाएं कही जाती हैं। भागवत माहात्म्य में वर्णन आता है कि उनकी कथा को सुनकर प्रेतयोनि धुंधरकारी मुक्त हो गया। हजारों वर्षों से वही कथा सुन-सुनाकर भी कोई पंडित या उसका चेला मुक्त नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि जिस कृष्ण के प्रकाश को हमें अपने भीतर भरना था उसे न भरकर आंधियों के संग जाने दिया।
यही हाल राम, कबीर, बुद्ध, महावीर, क्राइस्ट आदि के साथ हुआ। आज ये प्रकाशपुंज रूप आत्माएं मूर्ख, पाखंडी, स्वार्थी तत्वों के हाथ में पड़कर एक नये उपद्रव को जन्म दे रही है। कबीर, जिन्होंने हमेशा मूर्ति पूजा का विरोध किया, आज उनकी मूर्तियां बनाकर पूजी जा रही है। राम, जिन्होंने मर्यादा की प्रतिष्ठा की, उनके कथित अनुयायी सैकड़ों बार मर्यादाओं की चादर तार तार कर चुके हैं। बुद्ध, जिन्होंने ईश्वर की सत्ता को मानने से इंकार कर दिया था, आज खुद भगवान बना दिये गये हैं। महावीर, जिन्होंने कहा कि शायद मैं भी सच हूँ, शायद आप भी सच हैं और शायद वे भी सच हैं, उनके अनुयायी सिर्फ खुद को ही सच मान रहे हैं। क्राइस्ट, जिन्होंने खुद सूली चढ़कर ईश्वर से दूसरों के गुनाहों को माफ करने की प्रार्थना किया, उन्हीं के अनुयायियों ने कल, बल, छल से पूरे विश्व को आक्रांत कर डाला।
प्रकाश और उसकी ऊर्जा का इससे बड़ा दुरुपयोग संभवतः ब्रह्मांड में अन्यत्र नहीं है। अंततः मेरा मानना है कि हमें अपना दीपक खुद बनकर संसार को आलोकित भी करना है और आंधियों के हाथ न पड़ कर संसार को जलने से बचाना भी है।
©विन्ध्येश्वरी
Sunday, 14 June 2020
चक्रवात : प्राकृतिक और मानसिक
चक्रवात तब बनता है जब उसके केंद्र में न्यूनवायुदाब (हवा का कम दबाव) होता है। न्यूनवायुदाब के कारण चक्रवात आगे बढ़ता है। जब यह न्यूनवायुदाब अधिक बढ़ जाता है तब यह चक्रवात प्रायः विनाशकारी होता है। इसमें तीव्र हवाएं, बिजली की कड़क, गरज, तीव्र बारिश आदि घटनाएं होती हैं। इससे हजारों की संख्या में जान व खरबों के माल का नुकसान होता है।
इस तूफान से बचने का हाल फिलहाल कोई विशेष साधन मौजूद नहीं है। सिवाय चक्रवात की जद में आने वाले लोगों को वहाँ से सुरक्षित जगह पर रखने के।
एक उपाय और है। वह है समुद्र तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वन को लगाना। मैंग्रोव वन चक्रवात की तीव्रता को कम कर सकते हैं। इससे विनाश कम होता है। लेकिन रोकने का कोई उपाय मौजूद नहीं है।
अब आते हैं असली मुद्दे पर। मानव के मन में विषाद, तनाव अदि एक तरीके का न्यूनवायुदाब रूपी चक्रवात है। झुंझलाहट, चिड़चिड़ापन, क्रोध आदि मानसिक चक्रवात के घटक हैं। हाल फिलहाल इस मानसिक चक्रवात से बचने का कोई विशेष उपाय उपलब्ध नहीं है। सिवाय इसके कि इससे पीड़ित व्यक्ति को कुछ विभ्रमकारी दवाएं दी जाये जिससे वह अपना विषाद कुछ देर के लिये भूल जाये। या कुछ लोग इससे बचने के लिए शराब का भी सहारा लेते हैं। या उस व्यक्ति के आसपास के लोगों को उसके पास से हटा दिया जाये जिससे उसके किसी तांडवकारी कृत्य का असर उन पर न पड़े।
इस मानसिक चक्रवात से बचने में एक सदमित्र मैग्रोव वन की भूमिका निभा सकता है। वह चक्रवात के असर को कम कर सकता है। संभव है छोटे-मोटे या कमजोर चक्रवात को समाप्त भी कर दे (स्मरणीय है कि मैंग्रोव वन असर कम कर सकते हैं चक्रवात को नहीं)। लेकिन समस्या यह है कि जिस प्रकार मैंग्रोव वन कम बचे हैं, क्योंकि उनकी कटाई (कृषि और अन्य औद्योगिक कार्यों के लिये) अधिक हो रही है। मनुष्य का लालच मैंग्रोव वनों को निगल रहा है। ठीक उसी प्रकार अब सच्चे मित्र भी कम ही बचे हैं। इन पर भी मनुष्य का लालच, भौतिकतावाद, स्वार्थ आदि हावी हो गया है।
अंततः हमें दो स्तरों पर कार्य करना पड़ेगा-
1- रोकने का उपाय:- प्राकृतिक चक्रवात को रोकने के लिये मैंग्रोव वन का क्षेत्रफल बढ़ाया जाये। इन्हें वृहद पैमाने पर लगाया जाये। ठीक उसी प्रकार से अच्छे मित्रों की संख्या बढ़ाने के लिए समाज में नैतिकता, सद आचरण को बढ़ावा देना चाहिए। बच्चों के सामने अच्छे मित्रों का उदाहरण रखना चाहिए।
2- खत्म करने का उपाय:- कोई ऐसी तकनीक विकसित की जाये जिससे चक्रवात की परिस्थिति ही उत्पन्न न हो (फिलहाल ऐसा संभव नहीं है)। लेकिन मानसिक चक्रवात को उसके उद्गम स्थल या उससे भी पहले रोकने के कुछ उपाय अवश्य हैं। जैसे -
१- निष्काम कर्मयोग (कर्म को अपने जीवन-मरण का प्रश्न न बना कर केवल ईश्वर की मर्जी मानकर करना)
२- संतोष (साईं इतना दीजिए जामे……… क्योंकि ताउम्र भटकने के बाद सारा ऐश्वर्य, सारी प्रसिद्धि, सारी शक्ति यहीं धरी रह जायेगी ऐसा भान होना।)
३- स्वयं को जानना (मनुष्य मूलतः कई प्रकार की वृत्तियों जैसे - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि का समुच्चय है। जब भी मन में इनमें से कोई वृत्ति उठे तब उस वृत्ति के उठने के कारण की तलाश करना। 99.99% अवसरों पर हम इन्हें निरर्थक ही पायेंगे। यहीं से मन शांत होना शुरू होगा। ध्यान रहे इन वृत्तियों का दमन नहीं करना है। दमन करने से ये और भी उग्र हो जाती हैं। जैसा कि समाज में कहावत भी है "किसी को इतना मत दबाओ (डराओ) कि वह दबना (डरना) ही छोड़ दे।)
४- योग, ध्यान, प्राणायाम
©विन्ध्येश्वरी
आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं है - सुशांत सिंह राजपूत
"आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं है" फिर ऐसा क्यों?
वस्तुतः मनुष्य के भीतर "कुछ होने" की प्रबल इच्छा उसे दिन-रात दौड़ाती रहती है। दिग-दिगांतर में प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा, लोगों के मध्य शक्ति और प्रभुत्व, इफरात बैंक बैलेंस, ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं एवं प्रासाद, ऐश्वर्य - सुख और आराम आदि ये अनन्त इच्छाएं पहले तो पूरा करने का दबाव और फिर सहेजने का झंझट। मनुष्य को अंदर से भोथरा कर देता है। वह राग-द्वेष, आशा-निराशा, मोह-आधिपत्य के भंवर में डूब जाता है। "दुनिया जिसे कहती है जादू का खिलौना। मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो है सोना।"
जीवन का ध्येय सांसारिक वैभव नहीं है, भीतर की मस्ती है, आंतरिक आनन्द है। लेकिन मनुष्य की विडम्बना यही कि वह इसे बाहर खोजता है। एक इच्छा, महत्त्वाकांक्षा की प्रतिपूर्ति के बाद अगली, अगली के बाद अगली, फिर अगली……… फिर किसी मोड़ पर जीवन की निस्सारता समझ आती है। अधिकांश लोगों को बुढ़ापे में और कुछ को पहले। जब यह जीवन, यह संसार, यह भाग दौड़ निस्सार लगने लगता है तब जन्म लेता यह तो संयास या फिर आत्महत्या………… ।
जीवन में पाने का ध्येय और खोने का गम सिर्फ़ इतना होना चाहिए जितने में जीवन जिया जा सके। किंतु यदि अधिक पाना ही हो तो निष्काम होकर, मैं प्रभु का और सब प्रभु का। न पाने की खुशी और न खोने का गम। "साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम सामाय। आप न भूखा रहूँ, साधु न भूखा जाये॥" लेकिन जीवन में पाने का अंतहीन सिलसिला है यह या तो वृद्धावस्था की मृत्यु से समाप्त होता या फिर आकस्मिक मृत्यु से। परंतु इस मृत्यु से पहले भी मनुष्य करोड़ों बार मरता है, प्रतिपल मरता है, कदम-दर-कदम मरता है क्योंकि वह भीतर से जगा हुआ नहीं है, भीतर से खुश नहीं है। ये सामान, ये इंतजाम, ये वैभव हमें खुश नहीं कर सकता। अगर करेगा भी दो चार पल या दिन के लिये। फिर वही निस्सार जीवन और अगली भागमभाग।
कहीं तो रुकना चाहिए इसे। अंतहीन अभीप्सा, लालसा तथा इससे उपजे विषाद और तनाव को रोकना होगा। इसका एक और सुंदर मार्ग है कुछ न करना। कभी शांत होकर बिना कुछ विचार किये बैठना, कभी खुद से बात करन। याया अगर करना ही है तो निष्काम होकर करना। बस। परम शांति! परम शांति! परम शांति!
©विन्ध्येश्वरी
Saturday, 13 June 2020
अवधी भाषा की शक्तियां और कमजोरियां
1- गंभीर, उदात्त तथा मर्यादापूर्ण अभिव्यक्ति के लिये अनुकूल
2- न तो ब्रजभाषा की तरह कोमल और संगीतात्मक तथा न ही हरियाणवी की तरह कठोर
3- गति की तीव्रता कम तथा ठहराव
4- लोचशीलता - भाषाओं को आसानी से आत्मसात करना
5- प्रबंध काव्य के अनुकूल (रामचरित मानस, पद्मावत आदि)
6- बड़ा प्रयोक्तावर्ग - लगभग संपूर पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश (अयोध्या, फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर, गाजीपुर, लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली आदि)
अवधी भाषा की कमजोरी-
1- चंचल, मनोरंजन परक वृत्तियों का वर्णन करने में असमर्थ
2- आधुनिक जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त करने में असमर्थ
3- मुक्तक काव्य के अनुकूल नहीं (संभवतः इसी कारण तुलसीदास ने मुक्तक काव्यों की रचना के ब्रजभाषा का चयन किया)
4- अपने स्थान की सीमा का अतिक्रमण करने में अक्षम
सभ्यताओं पर प्रश्न चिह्न
सामान्यतया हम इन्हें कपोल-कल्पना या मिथक मानते हैं। जैसे-ब्रह्मास्त्र (वर्णन के आधार पर आज के परमाणु बम जैसा) ,आग्नेयास्त्र (मिसाइल जैसा), वरुणास्त्र (पानी बरसाने वाला अस्त्र) आदि या फिर पुष्पक विमान या पशु-पक्षियों का वाहन के रूप में उपयोग या राम, कृष्ण, एरिक, हरकुलिश, गिलगमेश, ओलंपस, ज्यूस, वीनस, आदि देवी-देवताओं की मौजूदगी, या जीन आनुवांशिकी से निर्मित संतान जैसे सीता या द्रोणाचार्य या गणेश का अंग प्रत्यारोपण या राम सेतु या द्वारिकापुरी, अटलांटिस, माया, वैदिक सभ्यता आदि। क्योंकि कोई विश्वासनीय प्रमाण न होने के कारण इन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता।"
अब अनुमान कीजिये कि अपनी वर्तमान सभ्यता जलवायु परिवर्तन से नष्ट हो गयी है। बचा है कोई एक आदमी। अब वह अपना पुराना इतिहास लिखता है। जिसमें है - परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, मशीनगन, तोप-जिससे बड़े से बड़े शहर को चंद सेकेंड में तबाह किया जा सकता है। सुपर या हाइपर सोनिक विमान, उड़ती कारें- जिससे आप मनवांछित जगह पर कभी भी आ जा सकते हैं। जेनेटिक्स सांइस- जिससे आप किसी प्राकृतिक वस्तु से कोई नयी और उससे अच्छी गुणवत्ता की वस्तु बना सकते हैं। बड़े - बड़े कारखाने जहाँ लाखों सामानों का उत्पादन कुछ घंटों में हो जाता है। इंटरनेट जिस पर कोई भी जानकारी कुछ सेकेंड में आपके सामने होती है, आप इस पर वर्चुअल मीटिंग कर सकते हैं। एक छोटी सी चिप जिसमें हम लाखों टेराबाइट डाटा स्टोर कर सकते हैं। क्वांटम फिजिक्स जिसके द्वारा आदमी टाइम ट्रेवल कर सकता है। आतंकवादी, नक्सलवादी जिन्होंने लोगों को बेरहमी से मारा आदि।
क्या उस व्यक्ति के बाद की पीढ़ी इन चीजों को सत्य मान पायेगी? क्या वह कल्पना भी कर सकती है कि कभी ऐसा भी कुछ रहा होगा? क्योंकि इस विनाश के बाद तो आगामी सभ्यता फिर से आदिम युग में चली जायेगी। फिर वही नंग धडंग आदमी, आखेट से भोजन, और गुफाओं में रहना।
क्या शिकार के लिये दिनभर दौड़ लगाने वाला आदमी यह सोच सकता है कि कभी घर बैठकर स्विगी या जोमैटो से खाना आर्डर होता था? या एक दिन के बाद सड़ा हुआ बदबूदार मांस देखकर वह आदमी मान सकता है कि कभी रेफ्रिजरेटर भी हुआ करता था जिसमें आप हफ्तों खाना स्टोर कर सकते थे? या दिन-रात धूप, बरसात और सर्दी सहने वाला आदमी सोचेगा कि कभी एसी, कूलर या नरम और गरम कपड़े भी हुआ करते थे? मुझे लगता है शायद नहीं। वह भी हमारी तरह (जैसा कि हम अपनी पूर्व की सभ्यताओं को कल्पना मानते हैं) हमारी सभ्यता को भी कल्पना और मिथक ही मानेगा।
©विन्ध्येश्वरी
Tuesday, 9 June 2020
मुख्तार माई
मुख्तार माई:-
1- एक ऐसी पाकिस्तानी औरत जिसके साथ 4 लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया और 10 लोग खड़े होकर तमाशा देखते रहे।(सन् 2000 की घटना है)
2- सामूहिक बलात्कार इसलिए क्योंकि उनके भाई के ऊपर यह आरोप था कि उसने एक लड़की के साथ व्यभिचार किया है।
3- अतः खाप पंचायत ने शरियत कानून के हिसाब से फैसला सुनाया कि रेप का बदला रेप ही होगा।
4- दरअसल शरियत कानून के अनुसार अपराध 4 प्रकार के होते हैं-
• हदूद (ईश्वर के विरुद्ध अपराध - चोरी, जिना - व्यभिचार आदि)
• किसास (व्यक्तिगत अपराध - झगड़ा, मारपीट आदि)
• सियासाह (सरकार के विरुद्ध अपराध)
• ताजि़र (वे अपराध जिनके बारे शरियत या हदीस में उल्लेख नहीं है)
इसमें सबसे खतरनाक अपराध हदुद माना जाता है जिसमें भयानक सजा दी जाती है। चोरी के बदले हाथ काटना, जिना में पत्थर मारना, सिर के बदले सिर, आंख के बदले आंख, खून के बदले खून आदि।
सबसे दुखद पहलू यह है कि
1- अगर पुरुष व्यभिचार करता है तो उसका कोई खास जिक्र नहीं है। लेकिन
2- अगर स्त्री किसी पुरुष के ऊपर दुष्कर्म का आरोप लगाती है तो
• उसे चार चश्मदीद (प्रत्यक्ष रूप से देखने वाला) पुरुष गवाह लाना होगा (ध्यान रहे स्त्री की गवाही मान्य नहीं है)।
• यदि वह ऐसा करने में असफल होती है तब उसे जिना (व्यभिचार का दोषी) माना जायेगा। जिसकी सजा पत्थर मारना है।
2- सामूहिक बलात्कार इसलिए क्योंकि उनके भाई के ऊपर यह आरोप था कि उसने एक लड़की के साथ व्यभिचार किया है।
3- अतः खाप पंचायत ने शरियत कानून के हिसाब से फैसला सुनाया कि रेप का बदला रेप ही होगा।
4- दरअसल शरियत कानून के अनुसार अपराध 4 प्रकार के होते हैं-
• हदूद (ईश्वर के विरुद्ध अपराध - चोरी, जिना - व्यभिचार आदि)
• किसास (व्यक्तिगत अपराध - झगड़ा, मारपीट आदि)
• सियासाह (सरकार के विरुद्ध अपराध)
• ताजि़र (वे अपराध जिनके बारे शरियत या हदीस में उल्लेख नहीं है)
इसमें सबसे खतरनाक अपराध हदुद माना जाता है जिसमें भयानक सजा दी जाती है। चोरी के बदले हाथ काटना, जिना में पत्थर मारना, सिर के बदले सिर, आंख के बदले आंख, खून के बदले खून आदि।
सबसे दुखद पहलू यह है कि
1- अगर पुरुष व्यभिचार करता है तो उसका कोई खास जिक्र नहीं है। लेकिन
2- अगर स्त्री किसी पुरुष के ऊपर दुष्कर्म का आरोप लगाती है तो
• उसे चार चश्मदीद (प्रत्यक्ष रूप से देखने वाला) पुरुष गवाह लाना होगा (ध्यान रहे स्त्री की गवाही मान्य नहीं है)।
• यदि वह ऐसा करने में असफल होती है तब उसे जिना (व्यभिचार का दोषी) माना जायेगा। जिसकी सजा पत्थर मारना है।
निष्कर्ष यह है कि अगर किसी समाज में इस प्रकार के अतार्किक, अमानवीय कानून हैं जिन्हें अल्लाह या भगवान के कानून के तौर पर चलाया जा रहा है तो ऐसे अल्लाह या भगवान को हमें छोड़ देना चाहिए या जो किताबें ऐसा करने के लिये कहती हैं उन्हें जला देना चाहिए या फिर सभ्यता और मानवीयता का परिचय देते हुए खुद को बदलना चाहिये।
(इस घटना के बाद मुख्तार माई दुष्कर्म पीड़ितों, घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं और अशिक्षित महिलाओं की आवाज बन गयीं। इनके दसों स्कूल संचालित हो रहे हैं।)
Sunday, 7 June 2020
स्त्री के दो रूप
रही बात स्त्रीवादी होने की ऐसा होने में कोई बुराई नजर नहीं आती। स्त्री इस संसार की वह प्राणी है जिसे हमेशा निम्नतम दर्जे का माना गया है। यहाँ तक कि निम्न जातियों में भी स्त्री उससे भी निम्न है। शायद सबसे गयी गुजरी। क्योंकि जब पशु को खरीदा जाता है तो खरीदने वाला उसका दाम देता है लेकिन अपनी बेटी (जोो कि एक स्त्री ही है) का हाथ सौंपने वाला पिता लेने वाले को धन देता है। इससे बड़ी घृणास्पद बात क्या हो सकती है?
मामला यहीं समाप्त नहीं होता। जिस घर में वह जाती है वहाँ उसे पशु से भी बदतर जीवन जीना पड़ता है। घर का सारा काम (भोजन पकाना, चौका बरतन करना, झाड़ू पोछा करना, कपड़े धुलना आदि) उसी के जिम्मे, सबकी सेवा सुश्रूषा करना, सबके खाने के बाद बचा खुचा खाना, सबके सोने के बाद सोना और सबके जागने के पहले जागना। इसके बावजूद यह कहा जाता है तुम करती ही क्या हो? तुम्हारी औकात ही क्या है? दुख, बीमार होने पर कोई बात पूछने वाला नहीं होता। कई लोग तो इसे स्त्री द्वारा काम से बचने हेतु नाटक भी मानते हैं। ताना- फबती, डांट-मार, हिंसा सब उसकी दिनचर्या के अंग हैं।
बच्चा न हो तो स्त्री दोषी। लड़की हो जाये तो वही दोषी। बच्चे बिगड़ जाये तो उसे ही लानत मलानत सहनी पड़ती है। बचपन में पिता का संरक्षण, युवापन में पति और ससुराल वालों का धौंस, वृद्धावस्था में बच्चों का उत्पीड़न। कहां जाये ये स्त्री? इसीलिए महादेवी वर्मा जी ने कहा है - "अबला जीवन हाय तुम्हारी। आंचल में है दूध और आंखों में पानी।"
शिक्षा का अधिकार, आर्थिक अधिकार, अपनी इच्छा से निर्बाध विचरण का अधिकार आदि मौलिक अधिकारों से भी स्त्रियों को सदियों से वंचित रखा गया है। सभी धर्मों के शास्त्रों, ग्रंथों में सदा सर्वदा स्त्री को दबा कर रखने का ही उपदेश दिया गया है। जो समाज के हर व्यक्ति के मन में गहरे तक धंसा हुआ है।
अगर इन ज्यादतियों के विरोध में मैं कुछ लिख देता हूँ, बोल देता हूँ तो इसमें मेरी कोई महानता नहीं है, न ही यह किसी के विरोध में है और न इसे स्त्रीवादी होना ही कहा जा सकता है। बल्कि यह स्त्री के लिए शताब्दियों से हो रहे अन्याय का प्रतिकार करने हेतु एक विनम्र लेकिन तुच्छ प्रयास है। इन समस्त विद्रूपताओं के बीच स्त्री का एक खास गुण भी है जो संभवतः स्त्री भी नहीं जानती।
प्राकृतिक रूप से स्त्री शांत, सहृदय, कोमल और दयालु स्वभाव की होती है। लोग उसके इसी गुण का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं। उन्हें लगता है कि विनम्र व्यक्ति आसानी से दबाया जा सकता है। ठीक उसी तरह जैसे सीधे बांस को आसानी से काटा जा सकता है। लेकिन ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि सीधे बांस से लाठी भी बनती है जो बड़े से बड़े पहलवान की खोपड़ी खोलने की ताकत रखती है। स्त्री के साथ भी ऐसा है। सृजन की देवी ने जब जब अपना रौद्र रूप लिया है या विनाश पर उतरी है तो फिर कुछ बाकी नहीं बचा। फिर चाहे वह देवासुर संग्राम में काली और दुर्गा का अवतार हो या फिर राम - रावण युद्ध में सीता की गुप्त भूमिका हो या फिर महाभारत के युद्ध में द्रौपदी का हाथ।
अभी आज की नारी अपने दूसरे रूप में पूरी तरह से नहीं आयी है। लेकिन वह समय बिल्कुल भी दूर नहीं है जब वह यह रूप भी ग्रहण कर लेगी। उस समय सृजन की देवी विनाश करेगी। जो नये युग के निर्माण का कारण बनेगा।
©विन्ध्येश्वरी
Thursday, 4 June 2020
कलयुग बनाम अन्य युग
वस्तुतः मनुष्य के भीतर उसके दुर्गुण (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार आदि) सदा से एक जैसे रहे हैं। ये बुराइयां आज भी मनुष्य में यथावत हैं। लेकिन हर व्यक्ति या तो भविष्य में जीता है या भूतकाल में। भविष्य की सुखद तस्वीर और भूतकाल की मीठी यादें उसे गुदगुदाती हैं। साथ ही अगर कोई बुजुर्ग आपकी पीढ़ी को निम्नतर सिद्ध करना चाहेगा तो वह अपने समय की मिसालें देंगा। जबकि भूतकाल में वह भी वही सब कर चुका है जो खताएं आज आप कर रहे हैं। यही हाल युग - प्रशस्ति के बारे में भी समीचीन (सही) है।
मैं तो मानता हूँ कि कई मामलों में पहले की अपेक्षा अब अधिक उदारवादी रुख है। समाज के अंतरण के कारण आज कई सारी बुराइयां दूर हुईं हैं। लोगों को पहले से अधिक अधिकार प्राप्त हुए हैं। सारांशतः अपने समय को कोसना बंद कर, समाज को और सुंदर बनाने का यत्न करना चाहिए।
©विन्ध्येश्वरी
Tuesday, 2 June 2020
कबीर पंथियों का पाखंड : कबीर की शिक्षाओं का अपमान
निराकार ईश्वर की उपासना का कबीर का उपदेश उनके बीजक तक सिमट कर रह गया और गुरु के गुड़ के चेलो ने पूरी शक्कर बना डाली।
पाखंड को बढ़ावा देने वाला पाखंडी होता है। पाखंडी को गुरु अथवा ईश्वर कहने वाला अज्ञानी होता हैं। वैसे अज्ञानियों का यही हाल रहा तो रामपाल के मरने के बाद उसकी भी मूर्ति बनाकर उसे भी भोग लगाना शुरू कर देगे।
पढ़े कि कबीर दास ने मूर्ति पूजा के विरुद्ध क्या कहा हैं:-
पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूं पहार। ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार।।
एक मूर्ति से तो एक चक्की ही अच्छी हैं , कम से कम संसार का भला तो करती हैं।
कांकर पाथर जोरि के मसजिद लई चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय।।’’
मन तुम नाहक दुंद मचाये। करी असनान छुवो नहीं काहू , पाती फूल चढ़ाये।
मूर्ति से दुनिया फल माँगे, अपने हाथ बनाये।यह जग पूजैदेव–देहरा, तीरथ –वर्त–अन्हाये।
चलत –फिरत में पाँव थकित भे , यह दुख कहाँ समाये। झूठी काया झूठी माया , झूठे झूठे झुठल खाये।
बाँझिन गाय दूध नहीं देहै , माखन कहँ से पाए। साँचे के सँग साँच बसत है, झूठे मारि हटाये।
कहैं कबीर जहँ साँच बसतु है, सहजै दरसन पाये।
मन तू व्यर्थ उलझन में है द्वंद मचा रहा है। फूल पत्ती चढ़ाकर भी कोई आकाश को हाथों से नहीं छु सकता। दुनिया अपने हाथ की बनाई हुई मूर्ति से फल मांगती है और देवी देवताओं की चौखट पूजती है। तीर्थयात्रा पर जाती है , व्रत रखती है और स्नान करती है। इसी चक्कर में चलते चलते पाँव थक जाते है यानी असली ईश्वर का ध्यान करने के बजाय हम कर्मकांडों पे अपना समय गवाते है और उसे भूल जाते है। आखिर यह दुख कहाँ समाएगा। ये काया भी झूठी है और संसार की माया भी झूठी है। हम व्यर्थ ही जूठन खाते फिरते है। बाँझ गाय जब दूध ही नहीं देगी तो मक्खन कहाँ से मिलेगा? सच्चे के साथ सच्चा ही बसता है, झूठे को भगा दो। कबीर कहते है की जहां सत्य का वास है वहां ईश्वर के दर्शन सहज हो जाते हैं।
मूर्ति के साथ साथ मंदिर/मस्जिद का विरोध कबीर ने किया है क्यूंकि ईश्वर मूर्ति में नहीं अपितु अपने ह्रदय में ही वास करते है। देखो :-
कबीर दुनिया देहुरे सीस नवावत जाई ,हिरदा भीतरि हरी बसै, तू ताहि सौ हयौ लाई
केसो कहा बिगाड़िया जो मूड़े सौ बार। मन को काहे न मूड़िये जामें विषय विकार।।
मन मथुरा दिल द्वारका काया काशी जानि। दसवां द्वार देहुरा तामें ज्योति पिछानि॥
मूर्ति पूजकों का विरोध उनकी दुकान कहकर कबीर स्वयं कर रहे हैं और उनके मुर्ख चेले कबीर के नाम की ही दुकान चला
ते हैं।
पूजा-घर मेँ मूर्ति, मीरा के संग श्याम। जितनी जिसकी चाकरी, उतने उसके दाम॥
कबीर का कहना है कि ईश्वर निराकार है ,निर्गुण है।
रामपाल को देखो , खुद ही स्वघोषित साकार भगवान बने बैठा है और अपने चेलो से अपनी पूजा करवा रहा है।
‘कहैं कबीर बिचारि के जाके बरन न गांव । निराकार और निरगुणा है पूरन सब ठांव॥’
रामपाल के चेलो, अगर तुम रामपाल के सहारे रहे। तो तुम्हारा तुम्हारा बंटाधार ऐसे ही होगा जैसे कबीर ने कहा है:-
‘‘पाहन केरा पूतरा, करि पूजै करतार। इन्ही भरोसे जे रहे, ते बूडे़ कालीधार।।’’
कबीर दास ने देखों क्या कहा हैं –
‘‘माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।।’’
‘‘माला फेरे मन मुखी, तातै कछू न होई। मन माला को फेरता, घट उजियारा होई।।’’
कबीर के संदेशों को न समझ कर आज कबीरपंथी उनकी शिक्षाओं के ठीक विपरीत चल रहे है। यह केवल और केवल अन्धविश्वास है। पाखंड के शिकार लोगों अगर आपके आचरण में परिवर्तन नहीं है। आपके मन में शुद्धता नहीं है। तो समझ लो तुम अपना मूल्यवान जीवन पाखंड के पीछे व्यर्थ कर रहे हो।
साभार - चौथा खंभा अंतर्जाल स्थल (gratefully- chautha khanbha website)
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