Tuesday, 20 July 2021

परमात्मा का अनुभव

परमात्मा का अनुभव


आपको भूख लगती है, प्यास लगती है, पीड़ा होती है, प्रेम होता है, घृणा होती है, क्रोध आता है, दया आती है। ये सभी वे भाव हैं जिन्हें आप अनुभव कर सकते हैं, कुछ कुछ बता सकते हैं दिखा नहीं सकते। जब आपको भूख लगती है तब खाने को व्याकुल हो जाते हैं। आपका रोम-रोम, प्राण-प्राण भोजन को ढूंढने लगता है। प्यास की स्थिति भी ठीक ऐसे ही है। पीड़ा होने पर आपका पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है। घृणा की दशा में संसार वितृष्णा से भर जाता है। क्रोध आने पर सबकुछ स्वाहा कर देने का मन होता है। दया आने पर सर्वस्व लुटा देने का मन करता है।

परमात्मा भी एक अनुभव है। जब परमात्मा आपको अनुभव में आता है, जब परमात्मा आपको घटता है तब कई सारी घटनाएं अकस्मात घट जाती हैं। आप आनन्द, प्रेम, करुणा से भर जाता है। मनुआ बेपरवाह सा हो जाता है। आनन्द ऐसा कि कोई कीचड़ (मुहम्मद साहब) और गाली (कबीर) भी उछाल दे आप पर तो भी कोई हर्ज नहीं। मार भी दे (महावीर) या मार ही डाले (मंसूर) तो कोई गिला नहीं। प्रेम ऐसा कि कोई नहीं पराया रह गया। तृण, लता-गुल्म, कंकड़-पत्थर, जीव-अजीव सब अपने हो जाते हैं। करुणा ऐसी कि अगर किसी का भला खुद की बलि देने से भी हो जाये तो कर देता है। बेपरवाही ऐसी कि कहीं आग लग जाये, प्रलय आ जाये तो भी कोई फिक्र नहीं। यही दशाएं या ऐसी ही अन्य दशाएं भी परमात्मा के मिलन की सूचना होतीं हैं।

आम आदमी की भाषा में आप इन्हें पागल कह सकते हैं क्योंकि पागलपन में भी यही सब घटता है। लेकिन दोनों के मध्य बारीक सा अंतर है। अंतर यह कि पागल बेहोश है और जिसे परमात्मा घटा है वह होश में होता है। पागल को अपने करने का भान नहीं होता जबकि जिसे परमात्मा घटा है वह अपनी मौज में सब करता है। क्योंकि उसके पास फिर ऐसा कुछ बचा नहीं जिसके लिये वह संताप करे, घृणा करे, क्रोध करे, लोभ करे। उस परमहंस को ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि उसके पास अब और कुछ करने को रहा नहीं।

क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि जब आप किसी से भी द्वेष न कर सकेंगे तो क्या करेंगें? प्रेम ही बचता है। जब आप किसी पर क्रोध न कर सकेंगे तो क्या करेंगे? करुणा ही बचती है। जब आपको लोभ न रहेगा फिर क्या करेंगें? दान करेंगें। जब कोई आपका अपना न रहा सब अपने हो गये फिर आप क्या करेंगें? अपना सर्वस्व लुटा देगें। और अगर यह सब आपके साथ घट रहा है फिर दुखी होने और संताप करने के लिए बचा ही क्या? फिर तो नैसर्गिक आनन्द होगा। परमात्मा आपको घट चुका है।

जिस प्रकार आप कहीं यात्रा पर जाते हैं और वहाँ की सुरम्यता, रमणीयता को अनुभव करते हैं। ठीक ऐसे ही परमात्मा की यात्रा पर गया परमहंस भी उसे अनुभव करता है। किंतु जैसे आप उस यात्रा की कुछ तस्वीर ला सकते हैं वह स्थान नहीं, उसकी रमणीयता और सुरम्यता नहीं। ठीक वैसे ही आप परमात्मा की तस्वीर ला सकते हैं, परमात्मा नहीं। उस तस्वीर के साथ आपकी अनुभूति जुड़ी हो सकती है, वह आपके लिये आनन्दप्रद हो सकती है। लेकिन दूसरे के लिये महज तस्वीर देखकर उस आनन्द को प्राप्त करना स्वप्न में राजा बनने जैसा ही है। हां उस तस्वीर को, उस अनुभव को सुनकर आप उस तक पहुंचने का मन जरूर बना सकते हैं लेकिन तस्वीर देख लेना ही यात्रा का आनन्द नहीं। परमात्मा तो सिर्फ आपके जीवन में, आपकी आत्मा में घटता है। उसके सिवा और कहीं नहीं।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

Friday, 16 July 2021

वासना से लड़ो मत

*लड़ो मत वासना से*


झेन फकीरों की कथा है। एक बूढ़ा फकीर और एक युवक फकीर आश्रम वापस लौट रहे हैं। छोटी-सी नदी पड़ती है। और एक सुंदर युवती नदी पार करने को खड़ी है, लेकिन डरती है। अनजानी नदी है, पहाड़ी नदी है, गहरी हो, खतरनाक हो, बड़ी तेज धार है। बूढ़ा संन्यासी तो नीचे आंख करके जल्दी से नदी में प्रवेश कर जाता है क्योंकि वह समझ जाता है कि यह पार होना चाहती है, हाथ का सहारा मांगती है, लेकिन वह डर जाता है। हाथ का सहारा! इस बात में पड़ना ठीक नहीं! लेकिन युवक संन्यासी उसके पीछे ही चला आ रहा है। वह युवती से पूछता है कि क्या कारण है? सांझ हुई जा रही है, जल्दी ही सूरज डूब जाएगा और युवती अकेली छूट जाएगी। युवती कहती है- मैं बहुत डरी हुई हूं। पानी में उतरते घबराती हूँ। मुझे उस पार जाना है।

तो वह युवक संन्यासी उसे कंधे पर ले लेता है। बूढ़ा संन्यासी उस पार पहुंच गया, तब उसे याद आती है कि मेरे पीछे एक युवा संन्यासी भी आ रहा है, कहीं वह इस झंझट में न पड़ जाए! लौटकर देखता है तो उसकी आंखों को भरोसा ही नहीं आता है : वह कंधे पर बिठाए हुए लड़की को नदी पार कर रहा है! बूढ़ा तो आग से जल-भुन गया। युवक संन्यासी ने युवती को दूसरे किनारे उतार दिया, फिर दोनों चुपचाप चलने लगे। दो मील तक कोई बात न हुई। दो मील बाद बूढ़े को बर्दाश्त के बाहर हो गया। उसने कहा - यह ठीक नहीं हुआ और मुझे गुरु को जाकर कहना ही पड़ेगा; नियम का उल्लंघन हुआ है। तुमने उस सुंदर युवती को कंधे पर क्यों बिठाया!

उस युवक ने जो कहा, वह याद रखना। युवक ने कहा - "आप बहुत थक गए होंगे। मैं तो युवती को नदी के तट पर ही उतार आया; आप अभी कंधे पर बिठाए हुए हैं! आप बहुत थक गए होंगे! बात आई और गई भी हो गई, अभी तक आप भूले नहीं!"

जिसको तुम महात्मा कहते हो, वह आंख तो झुका लेगा; लेकिन आंख झुकाने से कहीं वासनाएं समाप्त होती हैं! आंख फोड़ भी लो तो भी वासनाएं समाप्त नहीं होती। आंखों पर पट्टियां बांध लो, तो भी वासनाएं समाप्त नहीं होती, वासनाओं का आंखों से क्या संबंध है? क्या तुम सोचते हो, अंधे को वासना नहीं होती? अंधे को इतनी ही वासना होती है, जितनी तुमको; शायद थोड़ी ज्यादा ही होती है। क्योंकि उसके पास, बेचारे के पास, उपाय भी नहीं; असहाय है, वह तड़फता है। उसके भीतर भी प्रबल आकांक्षा है, प्रबल वेग है। तो आंख बंद कर लेने से, आंख झुका लेने से क्या होगा? किसको धोखा दे रहे हो?

तो एक तो साधारण आदमी है, जिसके शरीर में ज्वर उठता है वासना का, सौंदर्य को देखकर। और एक तुम्हारा तथाकथित महात्मा है; उसके भीतर भी ज्वर उठता है, लेकिन वह आंख झुका लेता है। दोनों के भीतर शरीर भागना चाहता है। एक भागने देता है, दूसरा शरीर को जबरदस्ती रोक लेता है। शायद लौटकर वह दो दिन उपवास करेगा पश्चात्ताप में या शरीर पर कोड़े मारेगा।

हिंदू फकीर, सूफी फकीर, ईसाई फकीर, झेन फकीर, सारी दुनिया में हजारों किस्म के फकीर हुए, जिनमें न मालूम कितने-कितने ढंग के रोग व्याप्त हो गए। कोड़े मारनेवालों की जमात रही है। उपवास करने वालों की जमात रही है रात-रात भर जागन वालों की जमात रहती है। कमर में कीले चुभाने वाले, बैल्ट बांध लेनेवालों की जमात रही है। जूतों में कीले अंदर की तरफ निकालकर घाव पैरों में बनाकर चलनेवालों की जमात रही है। आंखें फोड़ लेनेवाले, जननेंद्रियां काट देनेवालों की जमात रही है। ये बीमार जमातें हैं। मैं इसके समर्थन में नहीं हूँ।

एक और रास्ता है। लड़ो मत वासना से। लड़कर कहां जाओगे? घाव बन जाएंगे। कुछ और बड़ी वासना को जगा लो–परमात्मा की वासना। किसी और बड़े प्रेम से थोड़े भर जाओ। थोड़ी आंख ऊपर उठाओ। इस सौंदर्य में भी इसीलिए रस है कि इस सौंदर्य में क्षणभर को परमात्मा के सौंदर्य की थोड़ी-सी छाया पड़ी है। तुम छाया से ग्रसित हो जाते हो, क्योंकि मूल को नहीं देखा है। तुम तस्वीर से जकड़ जाते हो, क्योंकि जिसकी तस्वीर है उसको तुमने नहीं देखा है। उसको देख लो, मिल गई जागीर। फिर लड़ना नहीं पड़ता। फिर जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती। फिर एक मालकियत आती है, जो बड़ी सहज है।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

माँ छिन्नमस्ता

कथा कहती है कि देवासुर संग्राम में असुरों के संहार और उनके रक्तपान करने के बाद भी माँ चिंतपूर्णी की सखियों नील वर्णी जया और श्वेत वर्णी विजया की रक्तपिपासा शांत नहीं हुई। वे बार बार माँ से रक्त पिलाने को कह रही थीं। माँ ने उन्हें रुकने के लिये कहा लेकिन वे फिर भी नहीं शांत हो रही थीं। माँ उस समय रतिशील कामदेव के मर्दन में व्यस्त थीं। फिर भी जया और विजया शांत न रहीं। फिर माँ चिंतपूर्णी ने अपना शीश काटकर जया औय विजया को रक्तपान कराया। तब उनकी पिपासा शांत हुई। माँ चिंतपूर्णी माँ छिन्नमस्ता कहायीं। ये दस महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर प्रतिष्ठित हैं।


अघोर, शाबर, योग, वज्रयान आदि तंत्र प्रथाओं में माँ छिन्नमस्ता की साधना अति प्रचलित और सम्माननीय साधना है। इस कथा और रूपक का अत्यंत महत्त्व है। चाहे आप गोरें हों या काले दुनिया में तमाम लूट घसोट मचाने के बाद भी, तमाम यत्न-उपाय कर सृजन, संग्रह करने के भाद भी मनुष्य की "कुछ और पाने की पिपासा/महत्त्वाकांक्षा" शांत नहीं होती। इसे शांत करने का एक ही उपाय बचता है, समस्त समस्याओं की जड़ शीश यानि बुद्धि और मन को अलग कर दिया जाये। जब मन और बुद्धि आत्मतत्व से अलग हो जाता है, जब भीतर "मैं" नहीं बचता, तब अंतरतम से अजस्र आनन्द और तृप्ति के रस का उदय होता है। कबीरदास जी इसे कहते हैं -
"कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुईं धरे, सो घर पैठे माहिं॥"


यह रूपक बताता है कि काम हमारा शत्रु नहीं है हमारा शत्रु है हमारा मन, हमारी विचारणा, हमारी बुद्धि। हम नाहक काम के दमन में संलग्न होते हैं। मन को जीतो लो तो सब कुछ जीता हुआ ही है। फिर कुछ जीतना शेष नहीं रह जाता।

माँ छिन्नमस्ता अपने ही रुधिर धार को खुद भी पी रही हैं। इसका एक अर्थ यह है कि मनुष्य खुद ही दाता और खुद ही ग्रहीता है। वह वही प्राप्त करता है जो देता है। अपना खुदा आप ही है। अगर आप ईश्वर पाना चाहते हैं तो खुद ईश्वर होना पड़ेगा। ईश्वर कहीं बाहर से नहीं आता है। जब आपका ही अहमतत्व मिट जाता है फिर परम तत्व का प्राकट्य हो जाता है। कबीर कहते हैं -
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।"


कामाख्या के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय है। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है। यह मंदिर लगभग 6000 साल पुराना बताया जाता है।

माँ छिन्नमस्ता के परम, अद्वितीय, अद्भुत विग्रह को नमन, वंदन, अर्चन। माँ मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकार करें।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

Tuesday, 13 July 2021

सत्य क्या है?

आप न तो पूरा सच जानते हैं और न ही पूरा झूठ कह पाते हैं। वास्तविक सत्य, आपके द्वारा कहे गये झूठ और सच के बीच कहीं होता है। मान लो आपसे किसी ने पूछा कितना समय हुआ। आप बोले कि 12 बजकर 15 मिनट। क्या आप दावा कर सकते हैं कि आपने सच बोला या झूठ? सामान्यतया आप कहेंगे हां सही है। घड़ी में इतना ही बज रहा था। नहीं। इतना ही नहीं बज रहा था। कुछ सेकेंड जरूर आगे पीछे रहा होगा। अब आप कहेंगे कि सेकेंड कौन देखता है? मेरा मत है कि आपने जितना सेकेंड या फिर नैनो सेकेंड छोड़ा होगा आप उतनी मात्रा में झूठे हो गये। लेकिन आप पूरी तरह झूठे भी नहीं है। वास्तविक सत्य कहीं इसके मध्य में है।

चलिए मान लेते हैं कोई पूरा सच कहने की कोशिश करने वाला सत्यवादी है। क्या वह कह सकता है? ऊपर के ही उदाहरण को देखते हैं। मान लो कि उस सत्यवादी ने नैनौ सेकेंड या इससे भी छोटी इकाई तक समय बताने के बारे में वीणा उठाया है। उसने बताया भी। 12 बजकर 15 मिनट 10 सेकेंड और फलां नैनो सेकेंड। क्या वह पूरा सच है? नहीं। वह मेरे पास तक पहुंचते-पहुंचते झूठा हो गया। उसने जब कहा था तब वह सच था लेकिन अब झूठा। वह उसका सच हो सकता है मेरा नहीं। वास्तविक सत्य भी छूट गया।

यह अनादि काल से होता आ रहा है कि लोग सच कहने की कोशिश करते हैं लेकिन वह कभी कह नहीं पाते। सच हमेशा छूट जाता है। कहने के बाद जो बचा रह जाता है वही सदासत्य है। वह अज्ञेय ज्ञेय है। वही ईश्वर है।

लोग कहते हैं कि सच कड़वा होता है। नहीं सच न तो कड़वा होता है न मीठा। सच सिर्फ सच होता है। ऊपर के समय वाले उदाहरण को देखते हैं। समय का सच कड़वा है या मीठा? आप कहेंगे नहीं, न मीठा न कड़वा। नहीं, आप पूरा सच नहीं कह रहे हैं। मान लो किसी को 12 बजकर 12 मिनट वाली ट्रेन पकड़ना है। आपने उसे 12 बजकर 15 मिनट बता दिया। सच बता दिया। यानि उसकी ट्रेन छूट गयी। अब उसके लिये यह सच कड़वा हो गया। इसी तरह रात के 12 बजकर 12 मिनट पर किसी की हसीं रात (सुहागरात) का मुहुर्त है और आपने उसे बताया दिया। उसके लिये यह सच मीठा हो गया। लेकिन झोपड़ी में पड़े दादा जी के लिए दोनों में से कोई भी स्थिति नहीं है। न मीठा न तीखा। तात्पर्य यह है कि किसी सत्य के प्रति हमारा झुकाव क्या है? हमारा स्वार्थ क्या है? हमारी धारणा क्या है? इससे तय होता है कि सच कड़वा है या मीठा या फिर तटस्थ।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

Saturday, 10 July 2021

माँ और पत्नी


संबंधों में नरम-गरम, खट्टा-मीठा लगा रहता है। फिर भी संबंध संबंध होते हैं। कुछ जैविक होते और कुछ जैविक जैसे होते। माता-पिता और भाई-बहन का संबंध जैविक है जबकि पति-पत्नी का संबंध जैविक जैसा है। माता-पिता के बाद अगर हमारे जीवन को बनाने में कोई सर्वाधिक त्याग और योगदान करता है तो वह एक सद्पत्नी होती है। मैं इस बात में कम भरोसा करता हूँ कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं क्योंकि अगर वहां बनतीं तो बनने के बाद टूटती नहीं। फिर भी जोड़ियां बनती हैं यह सच है।

माता का पद संसार में सर्वाधिक उच्च कहा गया है। है भी। मैं थोड़ी सी धृष्टता करते हुए सद्पत्नी को भी लगभग माँ के बराबर रखने की वकालत करता हूँ। वजह यह है कि अगर-

1- माँ ने हमें अपने कोख में नौ महीने पाला और टट्टी-पेशाब में लोटकर हमें बड़ा किया तो पत्नी उसके साथ ऐसा ही करने वाले अपने माता-पिता को छोड़कर एक पराये पुरुष के साथ चली आयी। उसने अपनी उस मिट्टी, उन संगी-साथियों को छोड़ा जिसमें वह पली-बढ़ी और खेली कूदी। मुझे लगता है कि यह त्याग उसे माँ के बरक्स ही खड़ा करता है।

2- माँ अपनी संतान के लिये सिवाय काम-संबंध बनाने के बाकी वो सारे कार्य करती है। नहलाना-धुलना, वस्त्र धुलना, खाना पकाना - खिलाना, पढ़ना-लिखना आदि। पत्नी माँ द्वारा छोड़े गये इस एक कार्य सहित और भी सारे कार्य करती है। इससे भी पत्नी का दर्जा माँ के समानांतर ही हो जाता है।

3- माँ अपनी संतान से बेहद दर्जे का प्यार करती है। एक स्त्री माँ बनकर स्त्रीत्व की पराकाष्ठा या कहें कि प्रेम की ऊंचाई को पार करती है। पत्नी थोड़ा सा इस मामले में माँ से पीछे रह जाती है। वह अपने पति को वैसा प्रेम नहीं कर पाती जैसा वह अपनी संतान को करती है। लेकिन इसके लिये वह दोषी नहीं है। पति दोषी है। एक सदपत्नी तो अपना पूरा समर्पण पति को देती है किंतु पति ठहरा उथला गड्ढा़ वह प्रेम के जरा से अति बहाव से ही भर जाता है और पत्नी का प्रेम उसके ऊपर से बहकर निकल जाता है। पत्नी का प्रेम पति की आत्मा तक नहीं पहुंच पाता। इसी कारण वह अधूरी रह जाती है। किंतु जब वह संतानवती होती है, वह अपने अधूरे किंतु लबालब भरे प्रेम को अपनी संतान पर उड़ेल देती है और फिर वह और उसका प्रेम परिपूर्ण हो जाता है। मेरा मानना है कि अगर पति पत्नी के मध्य माँ और पुत्र सा प्रेम हो जाये तो दुनिया स्वर्ग हो जाये। फिर संसार में सिर्फ प्रेम ही प्रेम बचेगा।

4- एक सद्पत्नी एक माँ की तरह ही अपने पति के जीवन में सुख-दुख, जय-पराजय आदि की संगिनी होती है। उसके जीवन को बनाने-संवारने में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करती है।

अस्तु मेरा तो मानना है कि एक पत्नी को माँ का दर्जा भले न दिया जाये किंतु माँ के समानांतर एक प्रतिष्ठित जगह जरूर मिलनी चाहिये। माँ, माँ होती है और पत्नी, पत्नी। दोनों की त्याग और महत्ता अद्वितीय, अवर्णनीय और अतुलनीय है। हम माँ को सम्मान तो देते हैं लेकिन एक पत्नी अपने सम्मान और गरिमा के लिये हमेशा जूझती और गुहार करती दिखती है। इसलिये उसे उसका हक मिलना चाहिए। 

आज ही के दिन मेरे जीवन में एक सद्पत्नी के रूप में आपका आगमन मेरे जीवन की सुंदरतम घटना थी। मुझे नहीं पता कि मैं कितना आपका साथ निभा पाया लेकिन आपने काफी साथ निभाया। उसके लिये आपको और पराअंबा भगवती, आदि शक्ति को अशेष आभार धन्यवाद। आप सदैव स्वस्थ, सुखी और प्रसन्न रहें।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️