Friday, 29 May 2020

विज्ञान बनाम ईश्वर


विज्ञानवादियों और ईश्वरवादियों के मध्य एक द्वंद निरंतर चलता रहता है - "कौन सच है, कौन झूठा? कौन अच्छा है, कौन बुरा? कौन बड़ा है, कौन छोटा? किसे सिद्ध किया जा सकता है, किसे नहीं आदि?" यह एक फिजूल का द्वंद है। कोई कुछ नहीं है। सब मनुष्य के ऊपर निर्भर है कि वह किसे किस रूप में लेता है। लेकिन इसे मान लेने से परे भी एक सत्य है। वह यह कि वास्तव में विज्ञान को समझ लेने वाला व्यक्ति ईश्वर को मान लेगा और वास्तव में ईश्वर को समझ लेने वाला व्यक्ति विज्ञान को मान लेगा।

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? इसलिये कि बड़ा से बड़ा वैज्ञानिक, विज्ञान शिक्षक, जो यह कहता है कि विज्ञान है वह भी विज्ञान को सिद्ध नहीं कर सकता। अगर वह सिद्ध करने की कोशिश भी करेगा तो सिद्धांतों और वस्तुओं के रूप में। जैसे - न्यूटन का नियम, आइंस्टीन का नियम, आर्कमिडीज का सिद्धांत आदि विज्ञान के नियम हैं या फिर कंप्यूटर, मोबाईल फोन, हवाईजहाज, ट्रेन, कार, बड़ी-बड़ी मशीनों आदि का निर्माण विज्ञान के द्वारा ही संभव है। वह विज्ञान नहीं बता रहा है, विज्ञान के घटक बता रहा है।

दरअसल विज्ञान सिर्फ़ और सिर्फ़ नियम है। विज्ञान को प्राप्त होने वाले ये नियम इस प्रकृति में भरे पड़े हैं। कण-कण में ये नियम मौजूद हैं। ये नियम जिसे पता चल जाता है या जो इन नियमों को जान लेता है, वह वैज्ञानिक बन जाता है। खुद विज्ञान बन जाता है (जैसे सैकड़ों लोग न्यूटन के नियमों पर शोध करके पी. एच. डी. डिग्री प्राप्त किये होगें या आइंस्टीन के मस्तिष्क पर अभी भी गुत्थियां उलझी हुई होगीं। ये नियम अनुभूति के विषय हैं। यह अनुभूति गहन अंतर्साधना, मौन, एकाग्रता और दृढ़ विश्वास से प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में जो जितना डूबता जाता है वह उतना बड़ा वैज्ञानिक बन जाता है।

इन नियमों को जो मूर्त रूप दे देता है वह आविष्कारक हो जाता है। एक आविष्कारक बनने के लिए भी इन्हीं सब गुणों की आवश्यकता होती है। कुछ लोग विज्ञान के नियमों का प्रतिपादन करने के साथ ही आविष्कारक भी होते हैं। जैसे आइंस्टीन।

इसी प्रकार बड़े से बड़ा पंडित - ज्ञानी, साधु - संत, औलिया - फकीर, मुल्ला - मौलवी भी ईश्वर को सिद्ध नहीं कर सकते हैं। दिखा नहीं सकते हैं? अगर वे ईश्वर को समझायेंगे तो यही कहेंगे - "ईश्वर अनन्त है, सृष्टि का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है, आखिर यह दुनिया कैसे चल रही है आदि? या फिर पशु - पक्षी, जंगल - पहाड़, समुद्र - मैदान आदि बनाने वाला कोई तो है? "जो वह कोई है" वही "ईश्वर" है।

दरअसल ईश्वर भी एक नियम मात्र है। ये ईश्वरीय नियम कण-कण में व्याप्त हैं। जिसे पता चल जाता वह "परमहंस" हो जाता है, सांसारिकताओं (मोह - विमोह, माया - अमाया, ममता - कठोरता, काम - निष्काम, क्रोध - अक्रोध, अहंकार - निर्अहंकार, मान - अपमान, हानि - लाभ, दुःख - सुख आदि गुण) से ऊपर उठ जाता है। कभी - कभी तो उसे स्वयं ईश्वर मान लिया जाता है- जैसे राम, कृष्ण, शिव आदि। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सामान्य मनुष्य इन गुणों - अवगुणों से भरा पड़ा है। जब उसे कोई ऐसा व्यक्ति दिखता है जो वेश्या (सामाजिक रूप से घृणित व्यक्ति) के हाथ का भी भोजन कर ले (गौतम बुद्ध) या अपने समस्त कुल का विनाश हो जाने के बाद भी मुस्करा रहा हो (कृष्ण का सारा परिवार और यदुकुल उनकी आंखों के सामने मर-खप गया) या फिर पिता की आज्ञा होने मात्र से अपनी माँ का वध कर दे (परशुराम) या फिर मिल रहे राज्य को ठुकराकर वन में चला जाये (राम) या फिर स्वयं को शूली पर चढ़ाने वाले के गुनाहों को माफ करने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करे (ईसा मसीह) आदि।

ईश्वरीय नियमों की अनुभूति भी गहन अंतर्साधना, मौन, एकाग्रता और दृढ़ विश्वास से होती है। जो व्यक्ति जितना ही आत्म - जाग्रति को प्राप्त होता है वह उतना बड़ा संत या ईश्वर (ही) बन जाता है। कुछ लोग इन ईश्वरीय नियमों को मान कर नये - नये पंथ, मजहब, संप्रदाय का निर्माण कर लेते हैं। फिर लाखों लोग उन्हीं की देखा - देखी उसे मानने लगते हैं।

यहीं पर विज्ञान और ईश्वर वादियों में एक अंतर आ जाता है। संभवतः विज्ञान का कोई खास संप्रदाय नहीं बनता, उसमें अंधविश्वास नहीं आता लेकिन ईश्वरीय ज्ञान के मार्ग में अंधविश्वास, पोंगापंथी, ढकोसला आदि का समावेश हो जाता है। ऐसा इसलिये होता क्योंकि थोड़ा बहुत ईश्वरीय नियमों को मानने (या मानने का ढोंग करने वाले) अपने निहित स्वार्थों और हमारे भय तथा लालच (अगर हम ईश्वर को फल - फूल, दक्षिणा, मेवा - मिष्ठान नहीं चढ़ायेंगे तो वह हम से नाराज हो जायेगा, हम उसकी बात नहीं मानेंगे तो हमें नुकसान पहुंचायेगा, नर्क भेजेगा आदि का भय अथवा स्वर्ग, मोक्ष, आरामदायक जीवन आदि का लालच) के कारण हमारा दोहन करते हैं।

भय और लालच ही मनुष्य को कमजोर बनाता है। सर्वत्र हमारे भय का शोषण हो रहा है। जैसे - ईश्वरवादी ईश्वर का भय दिखाकर या स्वर्ग का लालच देकर, राजनेता शत्रु पक्ष का भय दिखाकर या अच्छे दिन लाने का वायदा करके, डाॅक्टर बीमारी का भय दिखाकर, पुलिस कानून का भय दिखाकर, वैज्ञानिक आरामदायक जीवन का लालच दिखाकर आदि।

यहीं से धार्मिक विकृति का संस्थागत रूप शुरू होता है। जिस प्रकार सिर्फ़ विज्ञान की किताबें पढ़ लेने से, मात्र प्रयोगशाला के फेरे लगाने से, बड़े - बड़े सूत्र रट लेने से कोई वैज्ञानिक या आविष्कारक नहीं बन जाता ठीक उसी प्रकार धर्म की चार किताबें पढ़ लेने से, मंदिर - मस्जिद - चर्च या गुरुद्वारा का चक्कर लगाने से या कोई मंत्र जप लेने से ईश्वरीय ज्ञान नहीं प्राप्त होता। किंतु ध्यान रहे कि जिस प्रकार वैज्ञानिक बनने के लिये विज्ञान की किताबें पढ़ना, प्रयोगशाला में प्रयोग करना, सूत्र आदि रटना सहायक होते हैं ठीक उसी प्रकार ईश्वरीय नियमों को जानने में ये उपकरण सहायक हो सकते हैं। किंतु जिस प्रकार वैज्ञानिक बनने के लिये यही एकमात्र तरीका नहीं है ठीक उसी प्रकार ईश्वरीय नियम के ज्ञान के लिये भी यही एकमात्र उपाय नहीं है। जिस प्रकार वैज्ञानिक बनने के लिये वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना आवश्यक है उसी प्रकार ईश्वर को जानने के लिये ईश्वरमय दृष्टि होना आवश्यक है।

निष्कर्ष यह है कि यद्यपि विज्ञान और ईश्वर न तो एक दूसरे के पूरक हैं न ही एक सिक्के के दो पहलू। क्योंकि एक बाह्य जगत को जानने का उपकरण है और दूसरा आंतरिक जगत का। तथापि दोनों एक दूसरे को जानने में सहायक हो सकते हैं। एक को भली भांति जान लेना वाला व्यक्ति सहजभाव से दूसरे को स्वीकार कर लेगा।

©विन्ध्येश्वरी

भारत में साम्प्रदायिकता के जन्म का कारण एवं प्रसार का क्रमबद्ध चरण (आजादी से पहले)


भारत में साम्प्रदायिकता के जन्म का कारण एवं प्रसार का क्रमबद्ध चरण (आजादी से पूर्व )-
1- 1857 में हिंदू-मुस्लिम एकता के कारण प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का विकट रूप (यहीं से अंग्रेज धार्मिक रूप बांटो और राज करो की नीति अपनाते हैं।
2- मुस्लिमों की अवहेलना और हिंदुओं को प्रोत्साहन।
3- 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद तथा कांग्रेस द्वारा स्वतंत्रता संघर्ष के कारण हिंदुओं को दुश्मन मानने तथा मुस्लिमों को प्रोत्साहन देने की शुरुआत 
4- 1887 में लार्ड डफरिन द्वारा सैय्यद अहमद खां एवं राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद को कांग्रेस का विरोध हेतु प्रोत्साहित करना
5- 1905 में प्रशासनिक एवं भाषायी आधार पर बंगाल विभाजन (जबकि असली उद्देश्य बंगाल में स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करना, लेकिन आधार सांप्रदायिक)
6- 1906 आगा खां के नेतृत्व में एक मुस्लिम शिष्टमंडल का लार्ड मिंटो से मिलना एवं राजभक्ति के पुरस्कार स्वरूप सरकारी पदों पर मुस्लिमों को वरीयता का आग्रह
7- 1907 में मुस्लिम लीग की स्थापना
8- 1909 में मार्ले मिंटो द्वारा सांप्रदायिक निर्वाचन की शुरुआत
9- 1909 में पंजाब हिंदू महासभा का गठन
10- 1915 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा का गठन
11- 1916 में कांग्रेस - लीग समझौते का पार्श्व प्रभाव (समझौते में कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर आरक्षण एवं निर्वाचन स्वीकार किया)
12- 1919 में कांग्रेस द्वारा धार्मिक आधार पर खिलाफत आंदोलन का समर्थन
13- 1920 में शुद्धि आंदोलन (हिंदू से मुसलमान हुए लोगों की हिंदू धर्म में पुनः वापसी) एवं तंजीम व तबलीग आंदोलन (शुद्धि आंदोलन के विरोध में)
14- 1928 में "नेहरू रिपोर्ट" का पृथक निर्वाचन (सांप्रदायिक निर्वाचन) के मुद्दे पर लीग द्वार विरोध
15- 1932 में रैमजे मैकडोनाल्ड का सांप्रदायिक पंचाट (मुस्लिमों, दलितों आदि को पृथक निर्वाचन अधिकार)
16- 1937 में रहमत अली द्वारा पृथक पाकिस्तान की अवधारणा
17- 1937 के केंद्रीय विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को भारी बहुमत, इससे मुस्लिम लीग में घबराहट
18- यहीं मुस्लिम लीग के उग्र सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत
19- 1939 में जिन्ना की मांग - कांग्रेस स्वयं को हिंदू तथा मुस्लिम लीग को मुस्लिमों का संगठन घोषित करे
20- 1940 में धार्मिक जनसंख्या के आधार पर देश के विभाजन की अवधारणा
21- 16 अगस्त 1946 मुस्लिम लीग का प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस
22- 14 अगस्त 1947 सांप्रदायिक आधार पर देश का विभाजन
23- कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारण
  • 18 वीं शदी के विभिन्न धार्मिक सुधार आंदोलनों का पार्श्व प्रभाव
  • 1905 - 1918 के मध्य उग्रवादी दल की रणनीति - गणेश उत्सव, शिवा जी उत्सव आदि
  • विभिन्न आंदोलनों के दौरान वंदेमातरम गाना, भारत माता की अभिकल्पना, देवी देवताओं की शपथ आदि
  • भारतीय इतिहास लेखन की दोषपूर्ण परंपरा (मध्यकाल को मुगलकाल या इस्लाम काल तथा उसके पहले हिंदू काल के रूप में विभाजन)
  • आर्थिक असमानता एवं पिछड़ापन तथा शिक्षा की कमी(तत्कालीन समय में सभी वर्ग ख़ासकर मुस्लिम लोग शिक्षा की कमी के कारण प्रायः आर्थिक रूप से पिछड़े रहते थे जिससे उनमें धार्मिक उन्माद आसानी से पैदा किया जा सकता है)
@विन्ध्येश्वरी

Tuesday, 26 May 2020

सारी समस्याओं की एक जड़

संसार में सारी समस्याओं की जड़ सिर्फ़ इतना है-"कुछ होने की प्रक्रिया या कुछ होने का दंभ।"

इसको ऐसे समझते हैं कि हर व्यक्ति कुछ न कुछ होना चाहता है। सरकारी नौकर, बड़ा बिजनेसमैन, बड़ा नेता, बड़ा अभिनेता, बड़ा खिलाड़ी, बड़े घर, बड़ी गाड़ी का मालिक, अच्छी पत्नी का पति या अच्छे पति की पत्नी, स्वस्थ, सुखी, धार्मिक आदि। और जब कुछ हो जाता है तब उसका दंभ करता है।

मैं राष्ट्रपति हूँ, मैं प्रधानमंत्री हूँ, मैं प्रधानसचिव हूँ, मैं अंबानी हूँ, मैं अमिताभ हूँ, मैं कोहली हूँ, मेरा 100 मंजिला मकान है, मेरे पास हजार गाड़ियां हैं आदि। जब कोई कुछ हो जाता है तो उसे सहेजने में जुटा रहता है, जब कोई कुछ नहीं हो पाता तब वह ईर्ष्या, डाह, कुढ़न में मरा जाता है। जिससे वह ईर्ष्या आदि कर रहा है उसी की तरह बनना चाहता है।

ये बड़ा बनने का शगल और न बन पाने का मलाल आदमी को मारे डालता है। जो बन गया वह सीना फुलाये हर अगले बंदे को अपने से कमतर समझता है और जो नहीं बन पाया वह किसी तरह उस "बड़ेपन" को पाना चाहता है। यहीं से जातीय/प्रजातीय श्रेष्ठता, भाषायी श्रेष्ठता, धर्म की श्रेष्ठता, देश- प्रदेश की श्रेष्ठता आदि का दंभ भी शुरु होता है।

ब्राह्मण बड़ा विद्वान है तो ज्ञान का दंभ करेगा, क्षत्रिय बलवान है तो वह अकड़ कर चलेगा, हिटलर आर्य जाति की श्रेष्ठता में करोड़ों की बलि चढ़ा देगा, अंग्रेज दूसरों को सभ्य बनाने के चक्कर में पूरा विश्व लील जायेगें, मुस्लमान अपने को श्रेष्ठ मान अन्य लोगों को भी महान बनाना चाहता है इसके लिये उसे पूरी पृथ्वी चाहिये ताकि वह श्रेष्ठ "शरिया कानून" लागू कर सके।

जोो कुछ नहीं बन पाया है, वह परिश्रम करता है, जुगाड़ लगाता है, घूस देता है। जब इससे भी बात नहीं बनती तब हत्या, छल, कपट का सहारा लेता है। पूरा का पूरा मानव इतिहास सिर्फ़ इसी बात से भरा पड़ा है। "कुछ होने" की जद्दोजहद।

प्रश्न है कि "आखिर मानव कुछ क्यों होना चाहता है?" उत्तर यह है - "सिर्फ़ इसलिये कि वह कुछ नहीं है।" मानव की उत्पत्ति ही महज वीर्य की एक बूंद और रज के एक कण से हुई है। क्या बिसात है इसकी? कुछ नहीं। पता नहीं कितना वीर्य और कितना रज बर्बाद किया गया होगा। मनुष्य को जन्म किसी और ने दिया, पालन पोषण किसी और ने किया, शिक्षा किसी और ने दिया, पत्नी किसी और ने दिया, भाषा किसी और की है, साहित्य किसी और का, कपड़े किसी और के बनाये हैं, घर संपत्ति बाप दादा ने दिया, नौकरी किसी और की कर रहा है। उसके पास जो कुछ भी है सब दूसरों का दिया हुआ है। उसे चाहिये कुछ ऐसा जिसे वह अपना कह सके। जिस पर वह अधिकार जता सके। मगर अफसोस कि यहाँ भी वह खाली हाथ ही है। उसे कुछ नहीं मिलता अपना।

आखिर यह जद्दोजहद क्यों जीने के लिये तो दो रोटी पर्याप्त है। फिर इतनी मगजमारी क्यों? सिर्फ़ इसलिए कि "मनुष्य कुछ नहीं है।" उसके भीतर एक रिक्तता है, एक शून्यता है। वह उस शून्यता को भरने के लिये छटपटाता है, तड़पता है, भागता है, किंतु यह मृगमरीचिका के पीछे भागने से ज्यादा कुछ नहीं है। अंततः वह खाली हाथ ही रहता है। थका - हारा, लुटा - पिटा, असहाय।

क्या इससे उबरने का कोई उपाय है? सिर्फ़ एक उपाय है। व्यर्थ का उन्माद न पैदा किया जाये। जिंदगी को रेस नहीं बनाना है। अपने अस्तित्व को पहचाना है। अपनी "नथिंगनेस" (कुछ नहीं पन) को पहचाना है। जो मिल गया है उसी से तृप्त होना है। अपने खालीपन को भरने के लिये दूसरे के घर में आग नहीं लगाना है। अपने आप को शांत रखना है। हर क्षण, हर परिस्थिति में आनन्द का अनुभव करना है। यह सच जान लेना है कि हम कुछ नहीं है दो कामातुर जोड़ों से निकले रज और वीर्य के सिवाय अथवाा मिट्टी के पोषक तत्वों से मिलकर बने एक मिट्टी के ढांचे के सिवाय। रही बात चेतना की, तो हमारे भीतर परमात्मा का तत्व वही है। लेकिन हम परमात्मा के उस तत्व को व्यर्थ के प्रोपेगेंडा में खर्च करते हैं और अंततः थके - हारे निढाल पड़ जाते हैं मृत्यु-शैय्या पर।

©विन्ध्येश्वरी

अपसौर (Aphelion) और उपसौर (Perihelion):प्रकृति की अद्भुत कारीगरी


आज एक मित्र के ह्वाट्सएप स्टेटस पर टिप्पणी के दौरान एक अद्भुत ज्ञान प्राप्त हुआ- "प्रकृति के अद्वितीय प्रबंधन कौशल" के बारे में।

दरअसल उनकी पोस्ट थी - "इस समय नौतपा के दौरान गर्मी इसलिये ज्यादा पड़ती क्योंकि पृथ्वी सूर्य से अधिक निकट होती है।" मैंने उन्हें उपसौर और अपसौर के बार में बताया। इसी दौरान अचानक मेरे दिमाग में एक बात कौंधी - "अद्भुत है प्रकृति की लीला।" क्या है यह लीला? आइये देखते हैं।

खगोल विज्ञान के अनुसार पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 15 करोड़ किमी है। 3 जनवरी (उपसौर- Perihelion की स्थिति में) को पृथ्वी सूर्य के सर्वाधिक निकट यानि 14 करोड़ 7 लाख 98 हजार 70 किमी होती है। यह स्थिति दिसम्बर के बाद 14 दिन तक रहती है। इस दौरान उत्तरी गोलार्द्ध यानि विषुवत रेखा से उत्तर (जहाँ हम लोग हैं) वाला भाग आम दिनों की अपेक्षा 7% (यानि 2.3' से.) अधिक तापमान प्राप्त करता है।

ठीक इसके विपरीत 4 जुलाई (अपसौर-Aphelion की स्थिति में) को पृथ्वी सूर्य के सर्वाधिक दूर यानि 15 करोड़ 20 लाख 97 हजार 700 किमी होती है। यह स्थिति जून के बाद 14 दिन तक रहती है। इस दौरान उत्तरी गोलार्द्ध यानि विषुवत रेखा से उत्तर (जहाँ हम लोग हैं) वाला भाग आम दिनों की अपेक्षा 7% (यानि 2.3' से.) कम तापमान प्राप्त करता है।

इससे पहले हम प्रकृति के प्रबंध कौशल को देखें एक सामान्य सा सिद्धांत समझ लेते हैं -

पृथ्वी की परिक्रमण गति (जिसमें पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है) के कारण सूर्य की किरणें मकर रेखा (आस्ट्रेलिया के पास) पर सीधी और कर्क रेखा (भारत वाले भाग) पर तिरछी पड़ती हैं। मकर रेखा पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ने के कारण यहां गर्मी होती है। जबकि कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण यहां ठंडी पड़ती है।

ध्यातव्य यह है कि दक्षिणी गोलार्द्ध (विषुवत रेखा के दक्षिण वाले भाग) में जल अधिक है। जबकि उत्तरी गोलार्द्ध (विषुवत रेखा के उत्तर वाले भाग) में स्थल अधिक है। जल देर से गर्म और देर से ठंडा होता है, इससे वहां तापमान सामान्य बना रहता है। जबकि स्थल भाग जल्दी ठंडा और जल्दी गर्म होता है, इस कारण यहां गर्मी या ठंडी दोनों अधिक पड़ती है।

अब प्रकृति की कारीगरी देखते हैं।
कायदे से जब सूर्य कर्क रेखा पर चमक रहा हो तब भारत वाले भाग में गर्मी अधिक पड़ती और मकर रेखा वाले भाग पर ठंड ज्यादा लेकिन इसी समय अपसौर के कारण सूर्य पृथ्वी से सर्वाधिक दूर होता है जिससे उत्तरी गोलार्द्ध 7% (2.3'c) कम तापमान प्राप्त करता है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध 7% अधिक तापमान प्राप्त करता है। फलतः "जून-जुलाई के महीने में तापमान संतुलन बना रहता है। यदि ऐसा नहीं होता तो हमें और अधिक गर्मी सहनी पड़ती।"

इसी प्रकार जनवरी में जब सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर तिरछी पड़ रही हैं, उत्तरी गोलार्द्ध में ठंड अधिक होता और दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मी। लेकिन उपसौर के कारण सूर्य पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है। फलतः "दिसंबर - जनवरी में भी पूरी पृथ्वी पर तापमान संतुलन बना रहता है। यदि ऐसा न होता तो हमें और अधिक ठंड झेलना पड़ता।"

©विन्ध्येश्वरी

Sunday, 24 May 2020

परमात्मा का स्तर


क्या प्रभु का लेवल सिर्फ इतना है कि "लोग कुछ मंत्रों या आयतों (कुरान) या पैरा (बाइबिल) के माध्यम से उसे भजें और कुछ फल-फूल, दक्षिणा चढ़ायें जिससे वह खुश हो जाये और उनके जीवन में सब मंगल मंगल हो जाये।" इतना सस्ता और घटिया प्रभु? ठीक किसी दफ्तर के घूसघोर क्लर्क या चपरासी की तरह जो घूस लेकर लोगों की फाइल खिसकाता है! परमात्मा के प्रति हमारी आस्था कितनी लिजलिजी और ज़लील है! वैसे ही जैसे हमारे पास परमाणु का भंडार हो, हम उसे जलाकर हाथ सेंकने का काम कर रहे हों।

हम उसे तुच्छ चीजें (फल, फूल, दक्षिणा) अर्पित करके और उससे बदले में धन, दौलत, संपन्नता, सुख, समृद्धि मांग कर कदम कदम पर उस परमशक्ति को जलील और अपमानित करते हैं। यह ठीक वैसे है जैसे एक पिता द्वारा दिये गये मोटर साइकिल के खिलौने को उसका बेटा उसे अर्पित करके वास्तविक मोटरसाइकिल मांगें।

हम प्रभु से कैसी अटपटी और बेहूदा मांगें करते हैं "लाला तुम जुग जुग जियो।" लाला युग युग जीकर क्या करेगा। ईश्वर भी बेचारा असमंजस में पड़ जायेगा। यार मैं तो खुद युग युग नहीं जी पाया (राम, कृष्ण, परशुराम आदि) अब इसे कैसे युग युगांतर तक जीवित रखूं?

परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। वह नियम है। ठीक विज्ञान के नियमों की तरह। विज्ञान वस्तुतः कुछ नहीं है वह भी नियम है। उसके नियम कायदों पर चलकर विज्ञान तत्व को जाना जा सकता है। नये नये अविष्कार किये जा सकते हैं। परमात्मा को भी उसके नियमों पर चलकर जाना जा सकता है।

प्रश्न है "इन नियमों को जाना कैैसे जाये?" इसका उत्तर यह है जिस प्रकार विज्ञान संबंधी नियम इस सृष्टि में भरे पड़े हैं। जिन्हें जानने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसी प्रकार परमात्मा संबंधी नियम इस सृष्टि में यहां तक कि हम सबके भीतर भी भरा पड़ा है बस आवश्यकता है अपने भीतर ईश्वरीय चेतना, ईश्वरीय दृष्टिकोण विकसित करने की। लेकिन हम फंसे हुए हैं फालतू के ढकोसलों में, बेवजह के देवताओं और भगवानों के चक्कर में।

वह परमात्मा इन तुच्छताओं से ऊपर है। अगर हम कुछ अर्पित करते हैं या नहीं करते हैं, उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उसे इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि कौन सा व्यक्ति क्या चढ़ाता कितना चढ़ाता है क्यों नहीं चढ़ाता। बल्कि वह न चढ़ाने पर ज्यादा खुश होता होगा। वह न तो कुछ देता है न लेता है। हम खुद ही इस जगत के कर्ता, धर्ता और उपभोक्ता हैं, किंतु हम खुद ही कुछ नहीं हैं। यही इस संसार का रहस्य है।

समुद्र का निर्माण अनन्त बूंदों से हुआ है। बूंदों के अतिरिक्त समुद्र कुछ नहीं है। बूंदे भी कुछ नहीं महज उस विशाल समुद्र से निकले एक कण के सिवा। परमात्मा भी अनन्त आत्माओं के संग्रह के सिवा कुछ नहीं है और ये आत्माएं उसी परमात्मा से उत्पन्न हुई हैं। बूंद समुद्र को कभी जान नहीं सकती अगर वह अपने "बूंदपन" को छोड़ने के लिये राजी न हो। और जब बूंद का "बूंदपन" (अहम) खत्म हो जाता है तब वह समुद्र हो जाती है। उसी में विलीन हो जाती है।

परमात्मा को जानने के लिए जीवात्मा को अपना "जीवपन" छोड़ना पड़ेगा। उससे जानना पड़ेगा कि वह अनन्त परमात्मा का हिस्सा है। लेकिन हमारे मन मस्तिष्क और रोम - रोम में परमात्मा की गलत अवधारणा घर कर चुकी है। हमने उसे अपने अनुसार ढाल लेने का प्रयत्न किया है। परंतु क्या बूंद अपने में समुद्र को ढाल सकती है? या समुद्र बूंद में ढल सकता है? कतई नहीं। फिर वह हमसे दूर चला जायेगा क्योंकि हमारे पास उसे अपने में समाहित करने की पात्रता नहीं है। यही कारण है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में जाकर, लाख लाख भक्तिगीत गाकर, तमाम चढ़ावे चढ़ाकर भी कोई परमात्मा को उपलब्ध नहीं हुआ।

अपने मस्तिष्क में चढ़े भ्रम के आवरण को तोड़िये। परमात्मा को खंडित रूप में नहीं पूर्ण रूप में स्वीकार कीजिये। और फिर पूर्ण हो जाइये।

©विन्ध्येश्वरी

बूंद और समुद्र


कबीरदास जी कहते हैं-
"हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हेराय।
बूंद समानी समद में सो कत हेरी जाय॥"

मनुष्य और ईश्वर के मध्य बूंद और समुद्र सा संबंध है। समुद्र वस्तुतः कुछ नहीं है अनन्त बूंदों का संग्रह है और बूंद भी कुछ नहीं है उसी समुद्र का एक हिस्सा है। परमात्मा भी कुछ नहीं है। हम सब मनुष्य ही एक परमशक्ति का निर्माण करते हैं और हम भी कुछ नहीं हैं सिवाय एक बूंद के। जब हम परमात्मा को ढूंढते ढूंढते स्वयं के अस्तित्व को भूल जाते हैं तब हम परमात्मा हो जाते हैं। यानि अपने 'मैं पन' को मिटाना ही ईश्वर को पाना है। "मैं पन का तात्पर्य है मैं कुछ हूँ।" किसी शायर ने कहा है - "मिटा दे अपनी हस्ती को अगर तू मर्तबा चाहे। दाना खाक में मिलकर गुले गुलज़ार होता है।" बीज को वृक्ष बनने के लिये स्वयं को मिटाना होगा। किंतु यह हमारा भ्रम है कि बीज मिट गया है। बीज मिटा नहीं है वह वृक्ष में परिवर्तित हो गया है। हम भी अपने अस्तित्व को मिटाकर मिटते नहीं बल्कि बीज की तरह वृक्ष में परिवर्तित हो जाते हैं या बूंद की तरह समुद्र हो जाते हैं। दुर्भाग्य यह है कि हम न तो वृक्ष होना चाहते हैं और न ही समुद्र होना चाहते हैं।

हमने अपनी सुविधानुसार अपने अपने परमात्मा गढ़ लिये हैं। किंतु इससे होना जाना कुछ नहीं है। हम जिस प्रकार अपने गम को भरने के लिए शराब का सहारा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार हमने अपने खालीपन को भरने के लिये विभिन्न भगवानों, धर्मों और धर्मग्रंथों का निर्माण कर लिया है। यह हमारे नशे को तृप्त करने का एक साधन मात्र है। ध्यान रहे यह नशा हमें ईश्वरत्व का बोध नहीं करायेगा बल्कि शराब की तरह हमारा नाश कर देगा। पता बताइये उस पंडे, पुजारी, पुरोहित, मुल्ला, मौलवी, पादरी का जिसने इस मार्ग पर चलकर ईश्वर को आत्मसात कर लिया हो। ये लोग हमारे भय का व्यापर करते हैं। हमें स्वर्ग और नर्क का भय दिखाते हैं। भय ही नर्क है और अभय ही स्वर्ग है। इन्होंने अजीबोगरीब स्वर्ग और नर्क गढ़ा है। यहाँ स्त्री का त्याग करो स्वर्ग में अप्सराएँ- हूरें मिलेगीं वह भी एकदम 16 वर्षीय कभी न वृद्ध होने वाली। ध्यान रहे इन्होंने स्त्रियों के लिये देव पुरुष या फरिश्ते नहीं गढ़ा। क्यों? यह पता नहीं या शायद इस धरती की तरह वहाँ भी केवल पुरुष प्रधान समाज होता हो। यहाँ अपनी आकांक्षाओं का त्याग करो वहां कल्प वृक्ष मिलेगा सारी मनोकामनाएं पूरी करने वाला। नर्क भी अपनी सुविधानुसार गढ़ा तिब्बत के आदमियों के लिये नर्क में कंपकंपाती ठंड की व्यवस्था है जबकि भारत और अरब देश के आदमी के लिये नर्क में भयानक गर्मी का प्रबंध है। नर्क के अधिकारी ने ऐसा क्यों किया पता नहीं।

इन्हीं सब कपोल-कल्पनाओं के सहारे हमारे, आप सबके भय का व्यापार किया जाता है जबकि परमात्मा इन सबसे परे है। वह हानि-लाभ, जय-पराजय, मान-अपमान, पुण्य-पाप, हिंसा-अहिंसा, काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर आदि से परे चिरंतन है। "अपने होने का भ्रम" मिटाइये और परमात्मा बन जाइये।

©विन्ध्येश्वरी

Saturday, 23 May 2020

क्या ईश्वर है?


मेरे एक विज्ञानवादी मित्र ने कहा कि "क्या आप ईश्वर को सिद्ध कर सकते हैं?"

मैंने कहा "नहीं" । लेकिन क्या आप विज्ञान को सिद्ध कर सकते हैं?

उन्होंने कहा "हाँ"।

मैं - "फिर बताइये विज्ञान क्या है?"

उन्होंने वही परंपरागत परिभाषा दुहरायी "क्रमबद्ध सुव्यवस्थित एवं तर्कसंगत ज्ञान विज्ञान है।"

मैंने कहा "इसमें विज्ञान कहाँ है? क्रमबद्ध तो कोई भी चीज हो सकती है, जैसे एक कतारबद्ध पेड़, ट्रेन की पटरी, किताब के पन्ने आदि क्या यह विज्ञान है? सुव्यवस्थित बिस्तर क्या विज्ञान हो सकता है? तर्कसंगत ज्ञान कुछ अस्पष्ट सा है। क्या अगर कोई बच्चा यह पूछे कि अक्षर "क" को क्यों इसी तरह लिखा जाता है तो क्या यह विज्ञान है?"

उनका उत्तर था कि "इसमें से कोई भी अलग अलग विज्ञान नहीं है। इनका सम्मिलित रूप ही विज्ञान है। विज्ञान एक नियम है।"

"क्या विज्ञान को छू सकते हैं, देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं, या सुन सकते हैं?" - मैंने पूछा।

उन्होंने कहा- "नहीं। विज्ञान अदृश्य है, अस्पृश्य है, अश्रवण है, लेकिन जब आप विज्ञान के द्वारा निर्मित कोई वस्तु देखते, सुनते या छूते हैं तब आप विज्ञान से ही रूबरू हो रहे होते हैं।"

"यानि विज्ञान कोई चीज नहीं है। बल्कि सिर्फ़ यह सोच है। जब आप किसी चीज को वैज्ञानिक तरीके से सोचते हैं और उस पर प्रयोग करते हैं तब वह मूर्त रूप में परिणत होता है। संसार भर में फैली भौतिक वस्तुएं विज्ञान का ही मूर्त रूप हैं। विज्ञान की अपनी कोई शक्ति नहीं है बल्कि वह किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में सवार होकर साकार हो जाता है। विज्ञान स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं कर सकता लेकिन जब विज्ञान में विशेष रुचि रखने वाला कोई व्यक्ति किसी अवधारणा या सिद्धांत पर काम करता है तब वह अपरिमित शक्ति धारण कर लेता है।" - यह लंबा सा स्टेटमेंट मैंने दिया।

उन्होंने हामी में सिर हिलाया और हल्के से मुस्कराये। फिर कहा -" आपने बहुत सही कहा।"

मैंने कहा-" मित्र! यह आपकी ही बात की व्याख्या है। जो मेरे बड़े काम की बात है।"

"वस्तुतः विज्ञान और भगवान में कोई बहुत अंतर नहीं है। अंतर है हमारे पूर्वाग्रह का और दोनों की प्रकृति में। हम विज्ञान को एक नियम मानते हैं, क्रमबद्ध सुव्यवस्थित एवं तर्कसंगत ज्ञान मानते हैं, वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोगात्मक रूप विज्ञान का मूर्त स्वरूप होता है। वह किसी मनुष्य के मस्तिष्क में सवार होकर साकार होता है। ठीक ऐसे ही ईश्वर भी एक नियम है, वह सत (जो सदा से रहा है), चित (चेतना युक्त), आनंद (कभी न नष्ट होने वाली खुशी) स्वरूप है, यह पूरी प्रकृति उसका मूर्त रूप है, वह भी किसी आध्यात्म में रुचि रखने वाले व्यक्ति के मन, मस्तिष्क और आत्मा में सवार होकर साकार होता है।"

"आपने तो मुझे कंफ्यूज कर दिया। अब मैं वैज्ञानिक बात को मानूं या आध्यात्मिक बात को। अब तो दोनों एक जैसे लगते हैं।" उन्होंने अविश्वास से कहा।
मैंने कहा - "विज्ञान भी मूलतः प्रकृति या कहें कि ईश्वर को जानने का उपकरण है। फर्क सिर्फ इतना है कि विज्ञान "nul hypothesis" (शून्य परिकल्पना) यानि ईश्वर नहीं है" से अपना शोध शुरू करता है और आध्यात्म "alternative hypothesis" (कुछ तो है) यानि "ईश्वर है" से अपना शोध शुरू करता है। विज्ञान निगमनिक पद्धति से यानि बाहरी दुनिया को समझ कर ईश्वर और उसके रहस्य को जानना चाहता है जबकि आध्यात्म आगमनिक पद्धति से यानि भीतरी दुनिया में प्रवेश कर उसे समझना चाहता है। विज्ञान और आध्यात्म दोनों ही सत्य और आनंद की खोज में जुटे हुए हैं। लेकिन विज्ञान भौतिक वस्तुओं जैसे मोबाइल, कार, एसी, कूलर आदि से आनंद प्राप्त करना चाहता है और आध्यात्म इन सबसे निवृत्त होकर।"

लेकिन यह पूजा - पाठ, तंत्र - मंत्र, पंडे - पुजारी, साधु- महात्मा, मंदिर - मस्जिद? ये सब क्या है?"- उन्होंने अपनी आंखों को सिकोड़ते और फैलाते हुए प्रश्न किया।

"यह ठीक वैसे ही है जैसे विज्ञान पढ़ाने के लिए अध्यापक होते हैं, शोध करने के लिए वैज्ञानिक होते हैं, प्रयोगशालाएं होती हैं, प्रयोग होता है, उनकी सहायता के लिए सहायक होते हैं, विज्ञान लेखक होते हैं………।"-मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था उन्होंने झपटते हुए पूछा -"लेकिन ये पंडे पुजारी मौलवी पादरी आदि तो पाखंड करते हैं, ढकोसला करते हैं, आडबंर फैलाते हैं। इसका क्या?"

"इसकी भी वजह है। क्या आप दावा कर सकते हैं कि सभी वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रयोगशालाएं एक ही स्तर की हैं? मुझे लगता है आप नहीं में ही उत्तर देगें?"……

उन्होंने हाँ में सिर हिलाया।

मैंने अपनी बात पुनः शुरू किया - "ठीक ऐसे ही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि भी ईश्वर को प्राप्त करने के लिए प्रयोगशालाएं हैं। पंडित, पुजारी, मौलवी, पादरी, साधु, संत, फकीर आदि उसके वैज्ञानिक, शिक्षक आदि हैं। लेकिन उनका स्तर एक समान नहीं है। किंतु वे अपनी मूढ़ता को अपने आडंबर के आवरण में छिपाते हैं। हम भी मूर्ख बनकर उसमें सुखी होते हैं।"

उन्होंने कहा - "फिर ईश्वर को कैसे खोजा जाये?"

"खोज?"- मैंने आश्चर्य से पूछा। "खोज से आशय क्या है आपका?"

"यही कि ईश्वर दिखायी नहीं देता। वह अदृश्य है। तो कैसे उसे प्राप्त किया जाये।"-उन्होंने सफाई दिया।

मैंने कहा -"आपकी बात अभी भी अस्पष्ट है। किंतु जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ आप यह मानते हैं कि वह गायब है। गुम हो गया है। उसे ढूंढना है। लेकिन आपको आश्वस्त हो जाना चाहिए कि ईश्वर गुम नहीं है। अदृश्य नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे विज्ञान अदृश्य नहीं है। सर्वत्र विज्ञान ही भरा पड़ा है। न्यूटन को गिरते हुए सेब में विज्ञान मिला, क्लाइव बंधु को उठते गिरते केतली के ढक्कन में विज्ञान मिला, अरबी लोगों को खुले आसमान में विज्ञान मिला। यूरोपीयन को उनकी आवश्यकता ने विज्ञान सिखाया। अतः जिस प्रकार विज्ञान को जानने के लिए "वैज्ञानिक अभिरुचि" की आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर को जानने के लिए "ईश्वर में अभिरुचि" होना आवश्यक है। राजकुमार सिद्धार्थ को वटवृक्ष के नीचे खीर खाकर ज्ञान मिला, महावीर को ऋजुपालिका नदी के किनारे ज्ञान मिला, अर्जुन को समरांगण में ज्ञान हुआ, अशोक को युद्ध के बाद ज्ञान हुआ, तुलसीदास को पत्नी की डांट खाकर ज्ञान हुआ। राजा जनक को घोड़े की रकाब में पैर डालते समय ज्ञान हो गया।"

"यानि ईश्वर को जानने के लिए संयोग पर निर्भर होना पड़ेगा?" - उन्होंने मायूस होकर पूछा।

मैंने हंसते हुए कहा -" आप इतने मायूस क्यों हो रहे हैं? कौन आप अभी के अभी ईश्वर को जानने जा रहे हैं?"

उनकी तंद्रा टूटी -"फिर भी। यह जानना तो जरूरी है।"

मैंने कहा - "प्रिय मित्र! उससे पहले यह जानना जरूरी है कि क्या आप वास्तव में ईश्वर को जानना चाहते हैं यानि आपको स्वयं के बारे में जानना होगा कि आपकी आवश्यकता क्या है? क्या ईश्वर आपकी आवश्यकता है? यदि है तो फिर कभी भी कहीं भी आपको यह ज्ञान उपलब्ध हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे आप किसी भी चीज में विज्ञान ढूढ़ सकते हैं। लेकिन इस प्रथम महत्त्वपूर्ण बात के अलावा कुछ और बातें भी आवश्यक हैं। जैसे अच्छा गुरु, अच्छी पुस्तक, अच्छे साथी, सघन परिश्रम, सही दिशा में प्रयास आदि। किंतु ध्यान रहे यही महत्त्वपूर्ण नहीं है महत्त्वपूर्ण हैं आप और आपका प्रयास।"

"फिर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि में जाना फिजूल है?"- उन्होंने पीछे पसरते हुए कहा क्योंकि शायद वे एक लंबे उत्तर की आशा कर रहे थे।

मैंने कहा -" हो भी सकता है और नहीं भी।"

"आपका मतलब क्या है?" वे अपने आराम आसन को तोड़ते हुए आगे तरफ झुक गये।

"यही कि अगर विज्ञान की प्रयोगशाला में जाकर आपने प्रयोग नहीं किया और आप यह मान लें कि आप वैज्ञानिक हो गये, आपको विज्ञान पूरा आ गया, अब विज्ञान की आप पर कृपा हो जायेगी तो फिजूल है। लेकिन यदि आप वहाँ जाकर प्रयोग करते हैं, उससे जुड़ते हैं जो वहाँ है। और आप दिन-रात उसे सिद्ध करने में जुटे रहते हैं। तो फिर सार्थक है।"- मैं अपनी बात समाप्त ही करने वाला था कि उन्होंने फिर पूछा -" आपकी यह बात मैं पूरा समझ नहीं पाया।"

"इन स्थलों को आप ईश्वर से जुड़ने का स्थल मानिये और वे उपकरण जो वहाँ लगे हैं, रखे हैं उन्हें उस ईश्वर से जुड़ने के उपकरण। घंटा बजाकर उसकी ध्वनि को ध्यान से सुनिये। बार बार यही कीजिये आप पायेगें कि आप शांत हो रहे हैं, गहरे ध्यान में उतर रहे हैं। ईश्वर पर फूल चढ़ाते हुए उसे महसूस कीजिये कि आप वास्तव में उसे ही अर्पित कर रहे हैं। ऐसा करते हुए आप अपने आपको देखिये कि कैसे चढ़ा रहे हैं? प्रार्थना करते हुए सिर्फ शब्द मत बोलिये उन एक एक शब्द को अनुभव कीजिये। आप पायेगें कि पूरा रामायण, बाइबिल या कुरान पढ़ने की जरूरत नहीं है सिर्फ कुछ पंक्तियों में ही आप ईश्वर से जुड़ जायेगें। और अगर यह सब नहीं हो रहा है तो सच मानिये कि आप भी उस आडबंर दिखावे में सहायक बन रहे हैं।"

उन्होंने कहा -" यार! आप से बात करके खुशी हुई, लेकिन मैं तो यह भूल ही गया कि मैं ईश्वर को जानने नहीं बल्कि यह सिद्ध करने आया था कि "ईश्वर नहीं है।" हालांकि मेरी यह अवधारणा कुछ समय के लिए भले ही आगे बढ़ गयी है किंतु मुझे लगता है कि मैं एक दिन सिद्ध कर पाऊंगा "ईश्वर नहीं है।"

मैंने मुस्कराकर कहा -"प्रिय मित्र! मुझे भी आपसे बात करके खुशी हुई। मैं भी उस दिन की प्रतीक्षा करूंगा जब आप मुझे यह सूचना देगें।"

©विन्ध्येश्वरी

Friday, 22 May 2020

स्त्री और पुरुष के कर्म

मुझे यह मानने में कतई संकोच नहीं है कि "स्त्री और पुरुष समान नहीं हैं।" दोनों के मध्य शारीरिक, मानसिक और जैविक जैसे कई स्तरों पर अंतर विद्यमान है। स्वभावतः स्त्री सृजन, ममता, वात्सल्य, करुणा, धैर्य आदि गुणों से युक्त है। साथ ही वह जैविक रूप से सभी 23 xx गुणसूत्रों से युक्त "पूर्ण" मनुष्य है। दूसरी तरफ पुरुष सृजन सहायक, कठोर, अश्रु पीने वाला, अधैर्यशील प्राणी है। गुणसूत्रों की अपूर्णता (23 गुणसूत्र किंतु 23वां गुणसूत्र xy) के कारण उसे सदैव कुछ कमी खटकती रहती है जो उसे चलायमान बनाती है। इसका सीधा सा अर्थ है कि स्त्री पुरुष के लिए समान कार्य नहीं हो सकते।

यदि किसी स्त्री को युद्ध में शत्रु से लड़ने भेज दिया जाये और वह शत्रु पर प्रहार करने के बजाय ममता प्रदर्शित करने लगे तब तो हो गया "बंटाधार"। या शल्य-चिकित्सा करते समय उसकी करुणा जग जाये तो शल्य-क्रिया मुश्किल हो जायेगी। वहीं जब एक पुरुष को किसी शिशुगृह का संरक्षक या परिचारक बना दिया जाये और किसी शिशु के रोने पर उसके भीतर की कठोरता जग जाये फिर बच्चे का तो "कल्याण" हुआ समझो। यह ठीक वैसे ही है जैसे गेहूं से "भात" नहीं बनाया जा सकता है और चावल से रोटी। या आलू से पनीर नहीं बनाया जा सकता और पनीर से आलू। या ट्रेन को हवा में नहीं उड़ाया नहीं जा सकता या हवाई जहाज को ट्रेन की पटरी पर दौड़ाया नहीं जा सकता।

किंतु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि "कथित रूप से पुरुषों के लिए आरक्षित कार्य" स्त्री नहीं कर सकती या "कथित रूप से स्त्रियों के लिये आरक्षित कार्य पुरुष नहीं कर सकता।" जिस कार्य के लिए जो अनिवार्य योग्यता, कौशल और गुण आवश्यक हैं यदि वह उनमें से किसी में भी है तो वह उस कार्य को करने के लिए स्वतंत्र है। और ऐसे अनेक उदाहरण समाज में उपलब्ध भी हैं जब स्त्री और पुरुष ने प्रचलित रुढ़िबंधों का तोड़कर अपनी प्रकृति के विपरीत कार्य किया और उसमें सफलता ही नहीं प्राप्त किया बल्कि प्रतिमान स्थापित किया। यह भी ठीक वैसे ही जैसे चावल के आटे से रोटी बनती है या गेंहू को उबाल कर खाया जा सकता है। पनीर में कम मसाला डालकर आलू की तरह खाया जा सकता है या आलू वाली सब्जी को ज्यादा छौंक लगाकर ज्यादा मसाला डालकर पनीर की तरह खाया जा सकता है। ट्रेन को बुलेट ट्रेन में बदला गया है और संभव है क्वांटम फिजिक्स में प्रगति के बाद ट्रेन उड़ने लगे और वायुयान ट्रेन की पटरियों के मुताबिक ढालकर दौड़ाया जा सके। ऐसा होने से समाज में कार्य की विविधता, प्रकृति, करने के तरीके आदि में गुणात्मक परिवर्तन आयेगा, स्वाद में वृद्धि होगी, लोगों को और अधिक विकल्प उपलब्ध होगें।

मुश्किल यह है कि "यह कौन निर्धारित करे कि कौन क्या कर सकता है?" इसका सिर्फ एक उत्तर है - "जो वैसा करना चाह रहा है।" यदि एक महिला किसी को भी बेहरमी से उठाकर पटक सकती है, पीट सकती है या गोलियों से भून सकती है तो उसे निस्संदेह पहलवान, मुक्केबाज, सैनिक या फिर गैंगस्टर बनना चाहिये। या एक पुरुष अगर ममता और करुणा से भरा हुआ है तो बेशक उसे शिशुगृह का उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए या फिर नर्स के रूप काम करना चाहिए।

यद्यपि ऊपरी तौर पर यह दर्शन काफी रुचिकर प्रतीत होता है किंतु इसमें एक मुश्किल यह है कि "यह संभवतः व्यापक पैमाने पर लागू नहीं हो सकता है।" क्योंकि जिस चीज का जो स्वभाव है वह एक तो आसानी से छोड़ नहीं सकता और न ही आसानी से बदला जा सकता है। एक सीमा के बाद यह बदलाव अरुचिकर भी प्रतीत होने लगता है। जैसे आलू की सब्जी को कब तक पनीर की तरह खाया जा सकता है साथ ही क्या मात्र पनीर मसाला मिला देने से आलू पनीर हो जायेगा? वायुयान कब तक ट्रेन की पटरी पर दौड़ सकता है साथ ही ट्रेन की पटरी पर दौड़ने से क्या वायुयान वायुयान रह जायेगा? चावल के आटे की रोटी हम कब तक खा सकते हैं? क्या गेंहूं के सारे पोषक तत्व चावल में मिल सकते हैं? या गेंहूं को कब तक उबाल कर खाया जा सकता है?

इसका एक अर्थ यह है कि यद्यपि दोनों अपनी प्रकृति के विपरीत कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं, होने ही चाहिये और यह निर्णय करने का हक पंगु और जड़ समाज को नहीं बल्कि उसे स्वयं मिलना चाहिए। लेकिन प्रकृति के अनुरूप कार्य करने से प्रगति की गति बढ़ जाती है ठीक वैसे ही जैसे धारा के विपरीत किसी की भी चाल कम हो जाती है जबकि धारा के अनुकूल प्रवाहित होने पर गति में वृद्धि हो जाती है।

©विन्ध्येश्वरी