Tuesday, 26 May 2020

सारी समस्याओं की एक जड़

संसार में सारी समस्याओं की जड़ सिर्फ़ इतना है-"कुछ होने की प्रक्रिया या कुछ होने का दंभ।"

इसको ऐसे समझते हैं कि हर व्यक्ति कुछ न कुछ होना चाहता है। सरकारी नौकर, बड़ा बिजनेसमैन, बड़ा नेता, बड़ा अभिनेता, बड़ा खिलाड़ी, बड़े घर, बड़ी गाड़ी का मालिक, अच्छी पत्नी का पति या अच्छे पति की पत्नी, स्वस्थ, सुखी, धार्मिक आदि। और जब कुछ हो जाता है तब उसका दंभ करता है।

मैं राष्ट्रपति हूँ, मैं प्रधानमंत्री हूँ, मैं प्रधानसचिव हूँ, मैं अंबानी हूँ, मैं अमिताभ हूँ, मैं कोहली हूँ, मेरा 100 मंजिला मकान है, मेरे पास हजार गाड़ियां हैं आदि। जब कोई कुछ हो जाता है तो उसे सहेजने में जुटा रहता है, जब कोई कुछ नहीं हो पाता तब वह ईर्ष्या, डाह, कुढ़न में मरा जाता है। जिससे वह ईर्ष्या आदि कर रहा है उसी की तरह बनना चाहता है।

ये बड़ा बनने का शगल और न बन पाने का मलाल आदमी को मारे डालता है। जो बन गया वह सीना फुलाये हर अगले बंदे को अपने से कमतर समझता है और जो नहीं बन पाया वह किसी तरह उस "बड़ेपन" को पाना चाहता है। यहीं से जातीय/प्रजातीय श्रेष्ठता, भाषायी श्रेष्ठता, धर्म की श्रेष्ठता, देश- प्रदेश की श्रेष्ठता आदि का दंभ भी शुरु होता है।

ब्राह्मण बड़ा विद्वान है तो ज्ञान का दंभ करेगा, क्षत्रिय बलवान है तो वह अकड़ कर चलेगा, हिटलर आर्य जाति की श्रेष्ठता में करोड़ों की बलि चढ़ा देगा, अंग्रेज दूसरों को सभ्य बनाने के चक्कर में पूरा विश्व लील जायेगें, मुस्लमान अपने को श्रेष्ठ मान अन्य लोगों को भी महान बनाना चाहता है इसके लिये उसे पूरी पृथ्वी चाहिये ताकि वह श्रेष्ठ "शरिया कानून" लागू कर सके।

जोो कुछ नहीं बन पाया है, वह परिश्रम करता है, जुगाड़ लगाता है, घूस देता है। जब इससे भी बात नहीं बनती तब हत्या, छल, कपट का सहारा लेता है। पूरा का पूरा मानव इतिहास सिर्फ़ इसी बात से भरा पड़ा है। "कुछ होने" की जद्दोजहद।

प्रश्न है कि "आखिर मानव कुछ क्यों होना चाहता है?" उत्तर यह है - "सिर्फ़ इसलिये कि वह कुछ नहीं है।" मानव की उत्पत्ति ही महज वीर्य की एक बूंद और रज के एक कण से हुई है। क्या बिसात है इसकी? कुछ नहीं। पता नहीं कितना वीर्य और कितना रज बर्बाद किया गया होगा। मनुष्य को जन्म किसी और ने दिया, पालन पोषण किसी और ने किया, शिक्षा किसी और ने दिया, पत्नी किसी और ने दिया, भाषा किसी और की है, साहित्य किसी और का, कपड़े किसी और के बनाये हैं, घर संपत्ति बाप दादा ने दिया, नौकरी किसी और की कर रहा है। उसके पास जो कुछ भी है सब दूसरों का दिया हुआ है। उसे चाहिये कुछ ऐसा जिसे वह अपना कह सके। जिस पर वह अधिकार जता सके। मगर अफसोस कि यहाँ भी वह खाली हाथ ही है। उसे कुछ नहीं मिलता अपना।

आखिर यह जद्दोजहद क्यों जीने के लिये तो दो रोटी पर्याप्त है। फिर इतनी मगजमारी क्यों? सिर्फ़ इसलिए कि "मनुष्य कुछ नहीं है।" उसके भीतर एक रिक्तता है, एक शून्यता है। वह उस शून्यता को भरने के लिये छटपटाता है, तड़पता है, भागता है, किंतु यह मृगमरीचिका के पीछे भागने से ज्यादा कुछ नहीं है। अंततः वह खाली हाथ ही रहता है। थका - हारा, लुटा - पिटा, असहाय।

क्या इससे उबरने का कोई उपाय है? सिर्फ़ एक उपाय है। व्यर्थ का उन्माद न पैदा किया जाये। जिंदगी को रेस नहीं बनाना है। अपने अस्तित्व को पहचाना है। अपनी "नथिंगनेस" (कुछ नहीं पन) को पहचाना है। जो मिल गया है उसी से तृप्त होना है। अपने खालीपन को भरने के लिये दूसरे के घर में आग नहीं लगाना है। अपने आप को शांत रखना है। हर क्षण, हर परिस्थिति में आनन्द का अनुभव करना है। यह सच जान लेना है कि हम कुछ नहीं है दो कामातुर जोड़ों से निकले रज और वीर्य के सिवाय अथवाा मिट्टी के पोषक तत्वों से मिलकर बने एक मिट्टी के ढांचे के सिवाय। रही बात चेतना की, तो हमारे भीतर परमात्मा का तत्व वही है। लेकिन हम परमात्मा के उस तत्व को व्यर्थ के प्रोपेगेंडा में खर्च करते हैं और अंततः थके - हारे निढाल पड़ जाते हैं मृत्यु-शैय्या पर।

©विन्ध्येश्वरी

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