Friday, 29 May 2020

विज्ञान बनाम ईश्वर


विज्ञानवादियों और ईश्वरवादियों के मध्य एक द्वंद निरंतर चलता रहता है - "कौन सच है, कौन झूठा? कौन अच्छा है, कौन बुरा? कौन बड़ा है, कौन छोटा? किसे सिद्ध किया जा सकता है, किसे नहीं आदि?" यह एक फिजूल का द्वंद है। कोई कुछ नहीं है। सब मनुष्य के ऊपर निर्भर है कि वह किसे किस रूप में लेता है। लेकिन इसे मान लेने से परे भी एक सत्य है। वह यह कि वास्तव में विज्ञान को समझ लेने वाला व्यक्ति ईश्वर को मान लेगा और वास्तव में ईश्वर को समझ लेने वाला व्यक्ति विज्ञान को मान लेगा।

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? इसलिये कि बड़ा से बड़ा वैज्ञानिक, विज्ञान शिक्षक, जो यह कहता है कि विज्ञान है वह भी विज्ञान को सिद्ध नहीं कर सकता। अगर वह सिद्ध करने की कोशिश भी करेगा तो सिद्धांतों और वस्तुओं के रूप में। जैसे - न्यूटन का नियम, आइंस्टीन का नियम, आर्कमिडीज का सिद्धांत आदि विज्ञान के नियम हैं या फिर कंप्यूटर, मोबाईल फोन, हवाईजहाज, ट्रेन, कार, बड़ी-बड़ी मशीनों आदि का निर्माण विज्ञान के द्वारा ही संभव है। वह विज्ञान नहीं बता रहा है, विज्ञान के घटक बता रहा है।

दरअसल विज्ञान सिर्फ़ और सिर्फ़ नियम है। विज्ञान को प्राप्त होने वाले ये नियम इस प्रकृति में भरे पड़े हैं। कण-कण में ये नियम मौजूद हैं। ये नियम जिसे पता चल जाता है या जो इन नियमों को जान लेता है, वह वैज्ञानिक बन जाता है। खुद विज्ञान बन जाता है (जैसे सैकड़ों लोग न्यूटन के नियमों पर शोध करके पी. एच. डी. डिग्री प्राप्त किये होगें या आइंस्टीन के मस्तिष्क पर अभी भी गुत्थियां उलझी हुई होगीं। ये नियम अनुभूति के विषय हैं। यह अनुभूति गहन अंतर्साधना, मौन, एकाग्रता और दृढ़ विश्वास से प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में जो जितना डूबता जाता है वह उतना बड़ा वैज्ञानिक बन जाता है।

इन नियमों को जो मूर्त रूप दे देता है वह आविष्कारक हो जाता है। एक आविष्कारक बनने के लिए भी इन्हीं सब गुणों की आवश्यकता होती है। कुछ लोग विज्ञान के नियमों का प्रतिपादन करने के साथ ही आविष्कारक भी होते हैं। जैसे आइंस्टीन।

इसी प्रकार बड़े से बड़ा पंडित - ज्ञानी, साधु - संत, औलिया - फकीर, मुल्ला - मौलवी भी ईश्वर को सिद्ध नहीं कर सकते हैं। दिखा नहीं सकते हैं? अगर वे ईश्वर को समझायेंगे तो यही कहेंगे - "ईश्वर अनन्त है, सृष्टि का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है, आखिर यह दुनिया कैसे चल रही है आदि? या फिर पशु - पक्षी, जंगल - पहाड़, समुद्र - मैदान आदि बनाने वाला कोई तो है? "जो वह कोई है" वही "ईश्वर" है।

दरअसल ईश्वर भी एक नियम मात्र है। ये ईश्वरीय नियम कण-कण में व्याप्त हैं। जिसे पता चल जाता वह "परमहंस" हो जाता है, सांसारिकताओं (मोह - विमोह, माया - अमाया, ममता - कठोरता, काम - निष्काम, क्रोध - अक्रोध, अहंकार - निर्अहंकार, मान - अपमान, हानि - लाभ, दुःख - सुख आदि गुण) से ऊपर उठ जाता है। कभी - कभी तो उसे स्वयं ईश्वर मान लिया जाता है- जैसे राम, कृष्ण, शिव आदि। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सामान्य मनुष्य इन गुणों - अवगुणों से भरा पड़ा है। जब उसे कोई ऐसा व्यक्ति दिखता है जो वेश्या (सामाजिक रूप से घृणित व्यक्ति) के हाथ का भी भोजन कर ले (गौतम बुद्ध) या अपने समस्त कुल का विनाश हो जाने के बाद भी मुस्करा रहा हो (कृष्ण का सारा परिवार और यदुकुल उनकी आंखों के सामने मर-खप गया) या फिर पिता की आज्ञा होने मात्र से अपनी माँ का वध कर दे (परशुराम) या फिर मिल रहे राज्य को ठुकराकर वन में चला जाये (राम) या फिर स्वयं को शूली पर चढ़ाने वाले के गुनाहों को माफ करने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करे (ईसा मसीह) आदि।

ईश्वरीय नियमों की अनुभूति भी गहन अंतर्साधना, मौन, एकाग्रता और दृढ़ विश्वास से होती है। जो व्यक्ति जितना ही आत्म - जाग्रति को प्राप्त होता है वह उतना बड़ा संत या ईश्वर (ही) बन जाता है। कुछ लोग इन ईश्वरीय नियमों को मान कर नये - नये पंथ, मजहब, संप्रदाय का निर्माण कर लेते हैं। फिर लाखों लोग उन्हीं की देखा - देखी उसे मानने लगते हैं।

यहीं पर विज्ञान और ईश्वर वादियों में एक अंतर आ जाता है। संभवतः विज्ञान का कोई खास संप्रदाय नहीं बनता, उसमें अंधविश्वास नहीं आता लेकिन ईश्वरीय ज्ञान के मार्ग में अंधविश्वास, पोंगापंथी, ढकोसला आदि का समावेश हो जाता है। ऐसा इसलिये होता क्योंकि थोड़ा बहुत ईश्वरीय नियमों को मानने (या मानने का ढोंग करने वाले) अपने निहित स्वार्थों और हमारे भय तथा लालच (अगर हम ईश्वर को फल - फूल, दक्षिणा, मेवा - मिष्ठान नहीं चढ़ायेंगे तो वह हम से नाराज हो जायेगा, हम उसकी बात नहीं मानेंगे तो हमें नुकसान पहुंचायेगा, नर्क भेजेगा आदि का भय अथवा स्वर्ग, मोक्ष, आरामदायक जीवन आदि का लालच) के कारण हमारा दोहन करते हैं।

भय और लालच ही मनुष्य को कमजोर बनाता है। सर्वत्र हमारे भय का शोषण हो रहा है। जैसे - ईश्वरवादी ईश्वर का भय दिखाकर या स्वर्ग का लालच देकर, राजनेता शत्रु पक्ष का भय दिखाकर या अच्छे दिन लाने का वायदा करके, डाॅक्टर बीमारी का भय दिखाकर, पुलिस कानून का भय दिखाकर, वैज्ञानिक आरामदायक जीवन का लालच दिखाकर आदि।

यहीं से धार्मिक विकृति का संस्थागत रूप शुरू होता है। जिस प्रकार सिर्फ़ विज्ञान की किताबें पढ़ लेने से, मात्र प्रयोगशाला के फेरे लगाने से, बड़े - बड़े सूत्र रट लेने से कोई वैज्ञानिक या आविष्कारक नहीं बन जाता ठीक उसी प्रकार धर्म की चार किताबें पढ़ लेने से, मंदिर - मस्जिद - चर्च या गुरुद्वारा का चक्कर लगाने से या कोई मंत्र जप लेने से ईश्वरीय ज्ञान नहीं प्राप्त होता। किंतु ध्यान रहे कि जिस प्रकार वैज्ञानिक बनने के लिये विज्ञान की किताबें पढ़ना, प्रयोगशाला में प्रयोग करना, सूत्र आदि रटना सहायक होते हैं ठीक उसी प्रकार ईश्वरीय नियमों को जानने में ये उपकरण सहायक हो सकते हैं। किंतु जिस प्रकार वैज्ञानिक बनने के लिये यही एकमात्र तरीका नहीं है ठीक उसी प्रकार ईश्वरीय नियम के ज्ञान के लिये भी यही एकमात्र उपाय नहीं है। जिस प्रकार वैज्ञानिक बनने के लिये वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना आवश्यक है उसी प्रकार ईश्वर को जानने के लिये ईश्वरमय दृष्टि होना आवश्यक है।

निष्कर्ष यह है कि यद्यपि विज्ञान और ईश्वर न तो एक दूसरे के पूरक हैं न ही एक सिक्के के दो पहलू। क्योंकि एक बाह्य जगत को जानने का उपकरण है और दूसरा आंतरिक जगत का। तथापि दोनों एक दूसरे को जानने में सहायक हो सकते हैं। एक को भली भांति जान लेना वाला व्यक्ति सहजभाव से दूसरे को स्वीकार कर लेगा।

©विन्ध्येश्वरी

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