Monday, 26 February 2018

भारतीय न्याय व्यवस्था की समस्याएँ

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर का प्रधानमंत्री के समक्ष अचानक भावुक हो जाना भारतीय न्यायिक व्यवस्था के गहराते संकट की ओर इशारा करता है। गौर करने की बात है कि आज पूरे देश में लगभग तीन करोड़ केस पेडिंग पड़े हुए हैं।
भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सामने अभी कुछ मुख्य चुनौतियाँ निम्न हैं-

*भारतीय विधि आयोग के 40,000 जजों की नियुक्ति की सिफारिष के तीन दशक बाद भी अभी मात्र 18,000 जज हैं।सन् 2014 में भारतीय विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि केवल उच्च न्यायलयों के पेडिंग केस निपटाने के लिए 1,000 अतिरिक्त जजों की आवश्यकता है।

*हमारे तंत्र में केस के सुलझाने की कोई नियत अवधि तय नहीं की गई है, जबकि अमेरिका में यह तीन वर्ष है।भारतीय न्यायिक डाटा ग्रिड के अनुसार निचली अदालतों में पडे़ दो करोड़ केस में से लगभग 10.83 प्रतिशत केस दस साल और लगभग18.1 प्रतिशत केस पाँच से दस सालों से पेडिंड पड़े हैं। इसके चलते ही सर्वोच्च न्यायधीश ने पिछले पाँच सालों से पेंडिग पड़े 81 लाख मामलों को वरीयता के आधार पर निपटाने पर जोर दिया था। यह स्वागत योग्य कदम था।

*राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) द्वारा जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर की गई सिफारिषें भी सर्वोच्च न्यायधीश के पास पेंडिंग हैं। जल्दी ही विचार करके निर्णय लेने की घोषणा सर्वोच्च न्यायधीष ने की है।

*ब्रिटिश काल से चली आ रही न्यायलयों के लंबे अवकाश की प्रथा पर भी विचार की बहुत जरूरत है।

*जजों को सामान्य किस्म की जनहित याचिकायें (PIL) लेने से भी बचना चाहिए।केंद्र एवं राज्य सरकारों के मामले न्यायलयों में सबसे ज्यादा है। यह आंकड़ा 70 प्रतिशत के लगभग है।

*छोटे-मोटे और गंभीर केस की भी सीमाएं तय होनी चाहिए।

*भूमि संबंधी पुराने विवादों के निपटारे के लिए भी समय सीमा तय करने की जरूरत है। एक सर्वक्षण के अनुसार जिला अदालतों में चल रहे लगभग दो-तिराई केस जमीन जायदाद से जुड़े हुए हैं।

Wednesday, 7 February 2018

बाल अपराध-1

प्रश्न- पिछले कुछ वर्षों के दौरान नाबालिगों द्वारा किए गए जघन्य अपराध अत्यंत चिंता का विषय है। इस बारे में किए गए उपायों के अप्रभावी होने के कारणों का उल्लेख कीजिए। अपनी ओर से कुछ प्रभावी उपाय सुझाएं। (जी.एस. द्वितीय प्रश्न पत्र)

उत्तर- पिछले कुछ वर्षों में नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले चर्चित जघन्य अपराध जैसे - निर्भया कांड, हरियाणा के एक स्कूल में कक्षा 11 के एक छात्र द्वारा कक्षा तीन के एक लड़के की हत्या, मुंबई में 12 वर्षीय किशोर द्वारा 70 साल की वृद्धा को चाकू मारना आदि हैं। यह घटनाएं इस बात की द्योतक हैं कि समाज का सबसे सुकोमल मस्तिष्क किस तरह गलत दिशा में जा रहा है। यद्यपि इस अपराध को रोकने के लिए सरकार द्वारा कई उपाय किए गए हैं जैसे -
* जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट,
* बाल सुधार गृह,
* जुवेनाइल जस्टिस एक्ट आदि

किंतु यह उपाय प्रभावी नहीं सिद्ध हो पा रहे हैं क्योंकि तकनीकी और व्यावहारिक स्तर पर कई समस्याएं हैं जैसे-
* भारतीय दंड संहिता की धारा 83 के अनुसार 12 वर्ष से कम आयु का नाबालिग अपराधी नहीं है।
* बालिग होने की आयु में विरोधाभास है। उदाहरणार्थ भारत सरकार और यू एन के अनुसार बालिग होने की उम्र 18 है जबकि ज्यादातर बाल अपराधी 18 से कम आयु के होते हैं अर्थात कानूनी तौर पर नाबालिग किंतु बायोलॉजिकल तौर पर बालिग।
* यदि बाल अपराधी 17 वर्ष 11 माह का हुआ तो तकनीकी आधार पर वह नाबालिग हुआ अर्थात वह सजा से बच जाएगा।
* बाल अपराधियों को कठोर दंड ना देकर बाल सुधार गृह भेज दिया जाता है जिससे अन्य बाल अपराधियों के मन में अपराध के प्रति भय नहीं उत्पन्न हो पाता।

बाल अपराध अपने आप में एक गंभीर समस्या है इसे रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:-

* बालिग होने की आयु सीमा को अपराधियों के लिए संशोधित किया जाना चाहिए।
*प्राथमिक कक्षाओं से लेकर कम से कम हाई स्कूल तक नैतिक शिक्षा पर बल दिया जाना चाहिए।
* समाज- परिवार और माता- पिता को इस दिशा में जागरुक किया जाना चाहिए।
* बच्चों को रचनात्मक कार्यों से जोड़ना चाहिए।
* सरकार को क्राइम रजिस्टर बनाना चाहिए जिसमें नाबालिग अपराधी का पूरा विवरण हो तथा उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
* अच्छा कार्य करने वाले बच्चों को पुरस्कृत करने का दायरा और बढ़ाना चाहिए इसे गांव शहर जिला और प्रदेश स्तर पर भी किया जाना चाहिए।
* उपेक्षित बालकों की शिक्षा दीक्षा और पालन पोषण का उचित प्रबंध किया जाना चाहिए।

Tuesday, 6 February 2018

बाल अपराध

बाल अपराध :कारण एवं प्रकार

* मानव समाज में व्यवस्था और सुरक्षा बनाये रखने के लिए वहा की परिस्थितियां और परम्परा आदि के साथ-साथ वहा के विधान के आधार पर कुछ नियम और कानून बनाये जाते है . इनको तोड़ने वाला व्यक्ति अपराधी कहलाता है।
* अपराध और नैतिक पाप में अंतर है।
* अपराध वह कृत्य जिसके लिए राज्य दंड डे सकता है।
* बाल -अपराध से तात्पर्य है किसी स्थान विशेष के नियमो के अनुसार एक निश्चित आयु से कम के बच्चे द्वारा किया जाने वाला अपराध।
* भारतीय विधान धारा 83 के अनुसार 12 वर्ष से कम आयु वाले नासमझ बालको को अपराधी नहीं नहीं माना जाता।
*जुनेवाईल जस्टिस एक्ट 1986 के अनुसार बाल/किशोर अपराधी की अधिकतम आयु 16 वर्ष है।
* सामान्य रूप से बाल अपराधी अवयस्क अर्थात 18 वर्ष से कम माना जाता है।
* बाल -अपराध के कुछ उदहारण :चोरी ,झगड़ा,और मारपीट,मद्यपान ,यौन अपराध, आत्महत्या ,हत्या, धोखा ,बेईमानी,/जालसाजी ,आवारागर्दी,तोड़-फोड़, छेड़खानी आदि।
* बाल -अपराध के कारण :
-आनुवंशिकता
-शारीरिक संरचना
-भग्न परिवार/परिवारों में टूटन
-अशिक्षित माता-पिता
-पक्षपात -परिवार , समाज
-अनैतिक परिवार
-सौतेली माँ
-बुरे साथी/संगत
-सामाजिक कुप्रथाए
-निर्धनता
-बालश्रम/नौकरी
-गंदी और घनी बस्तियां
-बुद्धि (कभी कभी मंदबुद्धि तो कभी तीव्रबुद्धि बाल-अपराध भी पाए जाते है) 
-आवश्यकता /इच्छापूर्ति न होने पर
-मनोविकृति
-सही दिशा में मनोरंजन का आभाव
-कुसमयोजन की समस्या
-संवेगात्मक अस्थिरता
-कुंठा
-विद्यालयीन कारण : विद्यालय की स्थिति , नियंत्रण का आभाव, मनोरंजन व रोचक प्रणालियों का अभाव , परीक्षा की उचित प्रणाली का अभाव।

* क्रो एवं क्रो के अनुसार -" किशोरापराध के पीछे आत्मचेतना और स्वार्थ जैसे तत्व होते है। क्योंकि आत्मचेतना के कारण बालक अपनी इच्छाओं की तुरंत पूर्ति  करना चाहता है।

* बाल -अपराध का उपचार व रोकथाम : 
परिक्षण काल/प्रोबेशन में रखना- 14 वर्ष से कम उम्र के बालापराधि को प्रोबेशन की देखरेख में रख दिया जाता है और सुधारने के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है।

सुधार-विद्यालय/सुधार- गृह इनमें 14 -15 वर्ष तक के बाल -अपराधियों को लगभग 5 वर्ष तक रखा जाता है। कई राज्यों में ऐसे आवासीय विद्यालय भी है जहाँ 16 से 21 वर्ष तक 5 साल तक बाल अपराधी को रखकर पढाया-लिखाया जाता है।

कारावास - ऐसा तब किया जाता है जब बाल-अपराधी उम्र में अधिक और अपराध में गंभीर है।

परिवार की भूमिका- वातावरण अच्छा रखना,उचित मांगो और जेबखर्च की सीमा पूर्ति तथा मार्गदर्शन ,नियंत्रण और नज़र रखना।

विद्यालय में कार्य- योग्य शिक्षक , प्रेम और सहानुभूति , उत्तम वातावरण , व पुस्तकालय , स्वतंत्रता , सुविधा व ध्यान। 
*समाज व राज्य की भूमिका : - बालकों /विद्यार्थियों को राजनीती से दूर रखना . मनोरंजन की स्वस्थ व्यवस्था . गन्दी बस्तियों को समाप्त कर अच्छा वातावरण बनाना . बालश्रम रोकना।

मनोवैज्ञानिक उपचार - बाल अपराधी का विश्लेषण , मनोवैज्ञानिक जाँच, निर्देशन एवं उपचार , साक्षात्कार , खेल चिकित्सा , साइको ड्रामा।

विशेष-हरलोक आदि वैज्ञानिक बताते है की समाज विरोधी व्यव्हार वयसंधि में पाया जाता है . जो लगभग 11 या 12 वर्ष की अवस्था होती है . 13 -14 वर्ष की अवस्था में समाज विरोधी व्यव्हार चरमसीमा पर होता है .

समाज विरोधी व्यव्हार -दुसरे व्यक्तियों के प्रति अरुचि संगठन के व्यव्हार का विरोध दुसरे व्यक्तियों की आशाओं के विरुद्ध जानबूझकर कार्य दुसरो को सताने में आनन्द ,, आदि 

Friday, 2 February 2018

1991 के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का प्रभाव

प्रश्न - 'वर्तमान भारत की तस्वीर 1991 में अपनाये गये आर्थिक सुधार कार्यक्रमों की परिणति है।' इसकी सफलताओं और असफलताओं को दृष्टिगत रखते हुए इस कथन की समीक्षा कीजिये।

उत्तर - कोई भी परिवर्तन अचानक नहीं होता। इसी प्रकार 1991 से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से परिवर्तन का दौर शुरू हो चुका था। किंतु यह समय एक निर्णायक मोड़ था। इसके पहले देश ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से काफी विकास किया था लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की बंद प्रकृति और संरक्षणवादी नीतियों के कारण आशानुरूप पर्याप्त विकास नहीं हो पाया था। इस कारण 1991 में एल पी जी (लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन) माॅडल अपनाया गया।
इसके तहत भारतीय अर्थव्यवस्था का द्वार विश्व और निजी क्षेत्रों के लिये खुल गया। भारत सरकार ने अपनी नीतियों में काफी ढील दिया। जिसके तहत करों में छूट तथा उन्हें तर्कसंगत बनाना, आसान ऋण उपलब्ध कराना, सरल लाइसेंसिंग प्रणाली, मूलभूत ढांचागत सुविधा उपलब्ध कराना आदि शामिल है।
इन कार्यक्रमों से कई सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़े।
सकारात्मक प्रभाव -
* देश के आर्थिक विकास की रफ्तार (4.1%के स्तर से 7-8%) में वृद्धि।
* जी डी पी में वृद्धि।
* प्रति व्यक्ति आय (1991 में 144 $ से 2016 में 1709 $) में वृद्धि।
* प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि।
* देश में उन्नत तकनीकी और नवाचारों का प्रवेश।
* सेवा क्षेत्र में प्रभावी वृद्धि।
* ढांचागत अवसंरचना में विकास।
* लोगों के जीवन स्तर में सुधार।
* भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक ढांचे में बदलाव।
इन महत्त्वपूर्ण सकारात्मक बदलावों के अलावा कुछ नकारात्मक प्रभाव भी पड़े-
* गैर समावेशी विकास।
* कृषि क्षेत्र की उपेक्षा।
* पर्यावरणीय अवनयन।
* अमीर और गरीब के मध्य खाई गहरी।
उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि वर्तमान भारत की तस्वीर के कई आयाम 1991 के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के बाद उभरे हैं। एक प्रकार से यह समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज क्रांतिकारी साबित हुआ। एक तरफ जहां इसके कई सकारात्मक प्रभाव पड़े वहीं दूसरी ओर यह नकारात्मक प्रभावों से अछूता नहीं है।

गिरमिटिया प्रथा

*सत्रहवीं सदी में आये अंगरेज़ों ने आम भारतीयों को एक-एक रोटी तक को मोहताज कर दिया। फिर उन्होंने गुलामी की शर्त पर लोगों को विदेश भेजना प्रारंभ किया। इन मज़दूरों को गिरमिटिया कहा गया।
* गिरमिट शब्द अंगरेजी के `एग्रीमेंट' शब्द का अपभ्रंश बताया जाता है। जिस कागज पर अंगूठे का निशान लगवाकर हर साल हज़ारों मज़दूर दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों को भेजे जाते थे, उसे मज़दूर और मालिक `गिरमिट' कहते थे। इस दस्तावेज के आधार पर मज़दूर गिरमिटिया कहलाते थे।
* हर साल १० से १५ हज़ार मज़दूर गिरमिटिया बनाकर फिजी, ब्रिटिश गुयाना, डच गुयाना, ट्रिनीडाड, टोबेगा, नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) आदि को ले जाये जाते थे। यह सब सरकारी नियम के अंतर्गत था। इस तरह का कारोबार करनेवालों को सरकारी संरक्षण प्राप्त था।
👉 इतिहास :-
*गिरमिटिया प्रथा अंग्रेजों द्वारा सन् १८३४ से आरम्भ हुई और सन् १९१७ में इसे निषिद्ध घोषित किया गया।
👉 गिरमिटियों की दुर्दशा :-
*गुलाम पैसा चुकाने पर भी गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता था, लेकिन गिरमिटियों के साथ केवल इतनी बाध्यता थी कि वे पांच साल बाद छूट सकते थे।
* गिरमिटिये छूट तो सकते थे, लेकिन उनके पास वापस भारत लौटने को पैसे नहीं होते थे। उनके पास उसके अलावा और कोई चारा नहीं होता था कि या तो अपने ही मालिक के पास काम करें या किसी अन्य मालिक के गिरमिटिये हो जायें। वे भी बेचे जाते थे। काम न करने, कामचोरी करने पर प्रताड़ित किये जा सकते थे।
*आमतौर पर गिरमिटिया चाहे औरत हो या मर्द उसे विवाह करने की छूट नहीं थी।
*यदि कुछ गिरमिटिया विवाह करते भी थे तो भी उन पर गुलामी वाले नियम लागू होते थे। जैसे औरत किसी को बेची जा सकती थी और बच्चे किसी और को बेचे जा सकते थे।
* गिरमिटियों (पुरुषों) के साथ चालीस फीसदी औरतें जाती थीं, युवा औरतों को मालिक लोग रखैल बनाकर रखते थे और उनका भरपूर यौनशोषण करते थे। आकर्षण खत्म होने पर यह औरतें मज़दूरों को सौंप दी जाती थीं।
* गिरमिटियों की संतानें मालिकों की संपत्ति होती थीं। मालिक चाहे तो बच्चों से बड़ा होने पर अपने यहां काम करायें या दूसरों को बेच दें।
*गिरमिटियों को केवल जीवित रहने लायक भोजन, वस्त्रादि दिये जाते थे। इन्हें शिक्षा, मनोरंजन आदि मूलभूत ज़रूरतों से वंचित रखा जाता था। यह १२ से १८ घंटे तक प्रतिदिन कमरतोड़ मेहनत करते थे।
* अमानवीय परिस्थितियों में काम करते-करते सैकड़ों मज़दूर हर साल अकाल मौत मरते थे। मालिकों के जुल्म की कहीं सुनवाई नहीं थी।
👉 गिरमिटिया प्रथा के विरुद्ध तोताराम सनाढय का अभियान :-
*तोताराम सनाढय का जन्म 1876 में हिरनगाँव जिला फीरोजाबाद उतर प्रदेश में हुआ था। इनको हिंदुस्तान से फिजी गिरमिटिया बनाकर ले जाया गया तोताराम सनाढय ने गिरमिट पर अपने अनुभव 'फिजी द्वीप में मेरे इक्कीस वर्ष' पुस्तक लिखी।
👉 गिरमिटिया प्रथा के विरूद्ध महात्मा गांधी का सहयोग:-
*इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से अभियान प्रारंभ किया।
* भारत में गोपाल कृष्ण गोखले ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में मार्च १९१२ में गिरमिटिया प्रथा समाप्त करने का प्रस्ताव रखा। काउंसिल के २२ सदस्यों ने तय किया कि जब तक यह अमानवीय प्रथा खत्म नहीं की जाती तब तक वे हर साल यह प्रस्ताव पेश करते रहेंगे।
* दिसंबर १९१६ में कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने भारत सुरक्षा और गिरमिट प्रथा अधिनियम प्रस्ताव रखा। इसके एक माह बाद फरवरी १९१७ में अहमदाबाद में गिरमिट प्रथा विरोधी एक विशाल सभा आयोजित की गयी। इस सभा में सीएफ एंड्रयूज और हेनरी पोलाक ने भी प्रथा के विरोध में भाषण दिया। इसके बाद गिरमिट विरोधी अभियान ज़ोर पकड़ता गया।
* मार्च १९१७ में गिरमिट विरोधियों ने अंगरेज़ सरकार को एक अल्टीमेटम दिया कि मई तक यह प्रथा समाप्त की जाये।

* लोगों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए अंतत: सरकार को गंभीरता से सोचना पड़ा। १२ मार्च को ही सरकार ने अपने गजट में यह निषेधाज्ञा प्रकाशित कर दी कि भारत से बाहर के देशों को गिरमिट प्रथा के तहत मज़दूर न भेजे जायें।

लाभ के पद

जनवरी 2018 के तीसरे सप्ताह में दिल्ली में लाभ के पद से जुड़े मामले में केजरीवाल सरकार के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी गई है। चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से इन विधायकों को 13 मार्च, 2015 से आठ सितंबर, 2016 के बीच 'लाभ के पद' के मामले में अयोग्य घोषित करने के लिए कहा था।
ऐसा नहीं है कि जनप्रतिनिधियों पर इस तरह की कोई पहली कार्रवाई हुई है। यूपीए-1 के समय 2006 में 'लाभ के पद' का विवाद शुरू होने की वजह से सोनिया गांधी को लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर रायबरेली से दोबारा चुनाव लड़ना पड़ा था। सांसद होने के साथ सोनिया को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का चेयरमैन बनाए जाने से लाभ के पद का मामला बन गया था।
लाभ के पद की संवैधानिकता:
भारत के संविधान में लाभ के पद (ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट) की स्पष्ट व्याख्या है। संविधान के अनुच्छेद 102 (1) A के अंतर्गत सांसद या विधायक ऐसे किसी अन्य पद पर नहीं हो सकते जहां वेतन, भत्ते या अन्य दूसरी तरह के फायदे मिलते हों।
इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 191 (1) (A) और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 9 (A) के तहत भी सांसदों और विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रावधान है।
लाभ के पद की सरल परिभाषा:
'लाभ के पद' का मतलब उस पद से है जिस पर रहते हुए कोई व्यक्ति सरकार की ओर से किसी भी तरह की सुविधा लेने का अधिकारी हो। सांसद या विधायक एक वित्तीय लाभ का पद है और इस पद में उसे तनख्वाह के साथ कार और अन्य चीजें भी उपलब्ध करवाई जा सकती है। इसके साथ ही वह सांसद या विधायक किसी भी ऐसे पद पर काम नहीं कर सकता जिससे उसे वेतन, भत्ता या अन्य कोई लाभ प्राप्त हो। ऐसा पद अन्य लाभ का माना जाएगा जो कानून में स्वीकार्य नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार, संविधान में ये धारा रखने का उद्देश्य विधानसभा को किसी भी तरह के सरकारी दबाव से मुक्त रखना था। क्योंकि अगर लाभ के पदों पर नियुक्त व्यक्ति विधानसभा का भी सदस्य होगा तो इससे प्रभाव डालने की कोशिश हो सकती है।

पद के अनुसार देखें तो संसदीय सचिव का कद किसी राज्य के मंत्री के बराबर होता है। इसके साथ ही संसदीय सचिव को मंत्री जैसी सुविधाएं भी मिल सकती हैं।

ला प्लाटा

स्पेनिश भाषा में अर्थ the silver
इसका प्रयोग कई प्रकार से किया गया है-
स्थान से संबंधित:-
१- ला प्लाटा अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स राज्य की राजधानी,
२- सं. रा. अ. में ला प्लाटा मेरीलैंड, ला प्लाटा मिसौरी, ला प्लाटा उटाह, ला प्लाटा माउंटेन कोलोरैडो,

नदी से संबंधित:-
१- अर्जेंटीना के पराना, पराग्वे, उरुग्वे, सलाडो आदि नदियों के सम्मिलित तंत्र को रियो द ला प्लाटा कहते हैं,
२- प्यूर्टोरिको में बहने वाली नदी तथा सं. रा. अ. में कोलोरैडो की सहायक नदी सान जुआन को भी ला प्लाटा कहते हैं,

अन्य:-
१- ला प्लाटा डाल्फिन, ला प्लाटा की लड़ाई, ला प्लाटा छोटा तारा आदि।

संविधान के सभी अनुच्छेद संक्षेप में

अनुच्छेद 1 :- संघ का नाम और राज्य क्षेत्र

अनुच्छेद 2 :- नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना

अनुच्छेद 3 :- राज्य का निर्माण तथा सीमाओं या नामों मे परिवर्तन

अनुच्छेद 4:- पहली अनुसूचित व चौथी अनुसूची के संशोधन तथा दो और तीन के अधीन बनाई गई विधियां

अच्नुछेद 5 :- संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता

अनुच्छेद 6 :- भारत आने वाले व्यक्तियों को नागरिकता

अनुच्छेद 7 :-पाकिस्तान जाने वालों को नागरिकता

अनुच्छेद 8 :- भारत के बाहर रहने वाले व्यक्तियों का नागरिकता

अनुच्छेद 9 :- विदेशी राज्य की नागरिकता लेने पर नागरिकता का ना होना

अनुच्छेद 10 :- नागरिकता के अधिकारों का बना रहना

नुच्छेद 11 :- संसद द्वारा नागरिकता के लिए कानून का विनियमन

अनुच्छेद 12 :- राज्य की परिभाषा

अनुच्छेद 13 :- मूल अधिकारों को असंगत या अल्पीकरण करने वाली विधियां

अनुच्छेद 14 :- विधि के समक्ष समानता

अनुच्छेद 15 :- धर्म जाति लिंग पर भेद का प्रतिशेध

अनुच्छेद 16 :- लोक नियोजन में अवसर की समानता

अनुच्छेद 17 :- अस्पृश्यता का अंत

अनुच्छेद 18 :- उपाधीयों का अंत

अनुच्छेद 19 :- वाक् की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 20 :- अपराधों के दोष सिद्धि के संबंध में संरक्षण

अनुच्छेद 21 :-प्राण और दैहिक स्वतंत्रता

अनुच्छेद 21 क :- 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अधिकार

अनुच्छेद 22 :- कुछ दशाओं में गिरफ्तारी से सरंक्षण

अनुच्छेद 23 :- मानव के दुर्व्यापार और बाल आश्रम

अनुच्छेद 24 :- कारखानों में बालक का नियोजन का प्रतिशत

अनुच्छेद 25 :- धर्म का आचरण और प्रचार की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 26 :-धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 29 :- अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण

अनुच्छेद 30 :- शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार

अनुच्छेद 32 :- अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार

अनुच्छेद 36 :- परिभाषा

अनुच्छेद 40 :- ग्राम पंचायतों का संगठन

अनुच्छेद 48 :- कृषि और पशुपालन संगठन

अनुच्छेद 48क :- पर्यावरण वन तथा वन्य जीवों की रक्षा

अनुच्छेद 49:- राष्ट्रीय स्मारक स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण

अनुछेद. 50 :- कार्यपालिका से न्यायपालिका का प्रथक्करण

अनुच्छेद 51 :- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा

अनुच्छेद 51क :- मूल कर्तव्य

अनुच्छेद 52 :- भारत का राष्ट्रपति

अनुच्छेद 53 :- संघ की कार्यपालिका शक्ति

अनुच्छेद 54 :- राष्ट्रपति का निर्वाचन

अनुच्छेद 55 :- राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीती

अनुच्छेद 56 :- राष्ट्रपति की पदावधि

अनुच्छेद 57 :- पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता

अनुच्छेद 58 :- राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए आहर्ताए

अनुच्छेद 59 :- राष्ट्रपति पद के लिए शर्ते

अनुच्छेद 60 :- राष्ट्रपति की शपथ

अनुच्छेद 61 :- राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया

अनुच्छेद 62 :- राष्ट्रपति पद पर व्यक्ति को भरने के लिए निर्वाचन का समय और रीतियां

अनुच्छेद 63 :- भारत का उपराष्ट्रपति

अनुच्छेद 64 :- उपराष्ट्रपति का राज्यसभा का पदेन सभापति होना

अनुच्छेद 65 :- राष्ट्रपति के पद की रिक्त पर उप राष्ट्रपति के कार्य

अनुच्छेद 66 :- उप-राष्ट्रपति का निर्वाचन

अनुच्छेद 67 :- उपराष्ट्रपति की पदावधि

अनुच्छेद 68 :- उप राष्ट्रपति के पद की रिक्त पद भरने के लिए निर्वाचन

अनुच्छेद69 :- उप राष्ट्रपति द्वारा शपथ

अनुच्छेद 70 :- अन्य आकस्मिकता में राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन

अनुच्छेद 71 . :- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधित विषय

अनुच्छेद 72 :-क्षमादान की शक्ति

अनुच्छेद 73 :- संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार

अनुच्छेद 74 :- राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद

अनुच्छेद 75 :- मंत्रियों के बारे में उपबंध

अनुच्छेद 76 :- भारत का महान्यायवादी

अनुच्छेद 77 :- भारत सरकार के कार्य का संचालन

अनुच्छेद 78 :- राष्ट्रपति को जानकारी देने के प्रधानमंत्री के कर्तव्य

अनुच्छेद 79 :- संसद का गठन

अनुच्छेद 80 :- राज्य सभा की सरंचना

अनुच्छेद 81 :- लोकसभा की संरचना

अनुच्छेद 83 :- संसद के सदनो की अवधि

अनुच्छेद 84 :-संसद के सदस्यों के लिए अहर्ता

अनुच्छेद 85 :- संसद का सत्र सत्रावसान और विघटन

अनुच्छेद 87 :- राष्ट्रपति का विशेष अभी भाषण

अनुच्छेद 88 :- सदनों के बारे में मंत्रियों और महानयायवादी अधिकार

अनुच्छेद 89 :-राज्यसभा का सभापति और उपसभापति

अनुच्छेद 90 :- उपसभापति का पद रिक्त होना या पद हटाया जाना

अनुच्छेद 91 :-सभापति के कर्तव्यों का पालन और शक्ति

अनुच्छेद 92 :- सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तब उसका पीठासीन ना होना

अनुच्छेद 93 :- लोकसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

अनुचित 94 :- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना

अनुच्छेद 95 :- अध्यक्ष में कर्तव्य एवं शक्तियां

अनुच्छेद 96 :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष को पद

से हटाने का संकल्प हो तब उसका पीठासीन ना होना

अनुच्छेद 97 :- सभापति उपसभापति तथा अध्यक्ष,उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते

अनुच्छेद 98 :- संसद का सविचालय

अनुच्छेद 99 :- सदस्य द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

अनुच्छेद 100 - संसाधनों में मतदान रिक्तियां के होते हुए भी सदनों के कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति

अनुच्छेद 108 :- कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक

अनुत्छेद 109 :- धन विधेयक के संबंध में विशेष प्रक्रिया

अनुच्छेद 110 :- धन विधायक की परिभाषा

अनुच्छेद 111 :- विधेयकों पर अनुमति

अनुच्छेद 112 :- वार्षिक वित्तीय विवरण

अनुच्छेद 118 :- प्रक्रिया के नियम

अनुच्छेद 120 :- संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा

अनुच्छेद 123 :- संसद विश्रांति काल में राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति

अनुच्छेद 124 :- उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन

अनुच्छेद 125 :- न्यायाधीशों का वेतन

अनुच्छेद 126 :- कार्य कार्य मुख्य न्याय मूर्ति की नियुक्ति

अनुच्छेद 127 :- तदर्थ न्यायमूर्तियों की नियुक्ति

अनुच्छेद 128 :- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति

अनुच्छेद 129 :- उच्चतम न्यायालय का अभिलेख नयायालय होना

अनुच्छेद 130 :- उच्चतम न्यायालय का स्थान

अनुच्छेद 131 :- उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता

अनुच्छेद 137 :- निर्णय एवं आदेशों का पुनर्विलोकन

अनुच्छेद 143 :- उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति

अनुच्छेद144 :-सिविल एवं न्यायिक पदाधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय की सहायता

अनुच्छेद 148 :- भारत का नियंत्रक महालेखा परीक्षक

अनुच्छेद 149 :- नियंत्रक महालेखा परीक्षक के कर्तव्य शक्तिया

अनुच्छेद 150 :- संघ के राज्यों के लेखन का प्रारूप

अनुच्छेद 153 :- राज्यों के राज्यपाल

अनुच्छेद 154 :- राज्य की कार्यपालिका शक्ति

अनुच्छेद 155 :- राज्यपाल की नियुक्ति

अनुच्छेद 156 :- राज्यपाल की पदावधि

अनुच्छेद 157 :- राज्यपाल नियुक्त होने की अर्हताएँ

अनुच्छेद 158 :- राज्यपाल के पद के लिए शर्तें

अनुच्छेद 159 :- राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

अनुच्छेद 163 :- राज्यपाल को सलाह देने के लिए मंत्री परिषद

अनुच्छेद 164 :- मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध

अनुच्छेद 165 :- राज्य का महाधिवक्ता

अनुच्छेद 166 :- राज्य सरकार का संचालन

अनुच्छेद 167 :- राज्यपाल को जानकारी देने के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य

अनुच्छेद 168 :- राज्य के विधान मंडल का गठन

अनुच्छेद 170 :- विधानसभाओं की संरचना

अनुच्छेद 171 :- विधान परिषद की संरचना

अनुच्छेद 172 :- राज्यों के विधानमंडल कि अवधी

अनुच्छेद 176 :- राज्यपाल का विशेष अभिभाषण

अनुच्छेद 177 सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार

अनुच्छेद 178 :- विधानसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

अनुच्छेद 179 :- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना या पद से हटाया जाना

अनुच्छेद 180 :- अध्यक्ष के पदों के कार्य व शक्ति

अनुच्छेद 181 :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प पारित होने पर उसका पिठासिन ना होना

अनुच्छेद 182 :- विधान परिषद का सभापति और उपसभापति अनुच्छेद 183 :- सभापति और उपासभापति का पद रिक्त होना पद त्याग या पद से हटाया जाना

अनुच्छेद 184 :- सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन व शक्ति

अनुच्छेद 185 :- संभापति उपसभापति को पद से हटाए जाने का संकल्प विचाराधीन होने पर उसका पीठासीन ना होना

अनुच्छेद 186 :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते

अनुच्छेद 187 :- राज्य के विधान मंडल का सविचाल.

अनुच्छेद 188 :- सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

अनुच्छेद 189 :- सदनों में मतदान रिक्तियां होते हुए भी साधनों का कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति

अनुच्छेद 199 :- धन विदेश की परिभाषा

अनुच्छेद 200 :- विधायकों पर अनुमति

अनुच्छेद 202 :- वार्षिक वित्तीय विवरण

अनुच्छेद 213 :- विधानमंडल में अध्यादेश सत्यापित करने के राज्यपाल की शक्ति

अनुच्छेद 214 :- राज्यों के लिए उच्च न्यायालय

अनुच्छेद 215 :- उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना

अनुच्छेद 216 :- उच्च न्यायालय का गठन

अनुच्छेद 217 :- उच्च न्यायालय न्यायाधीश की नियुक्ति पद्धति शर्तें

अनुच्छेद 221 :- न्यायाधीशों का वेतन

अनुच्छेद 222 :- एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में न्यायाधीशों का अंतरण

अनुच्छेद 223 :- कार्यकारी मुख्य न्याय मूर्ति के नियुक्ति

अनुच्छेद 224 :- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति

अनुच्छेद 226 :- कुछ रिट निकालने के लिए उच्च न्यायालय की शक्ति

अनुच्छेद 231 :- दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना

अनुच्छेद 233 :- जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति

अनुच्छेद 241 :- संघ राज्य क्षेत्र के लिए उच्च-न्यायालय

अनुच्छेद 243 :- पंचायत नगर पालिकाएं एवं सहकारी समितियां

अनुच्छेद 244 :- अनुसूचित क्षेत्रो व जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन

अनुच्छेद 248 :- अवशिष्ट विधाई शक्तियां

अनुच्छेद 252 :- दो या अधिक राज्य के लिए सहमति से विधि बनाने की संसद की शक्ति

अनुच्छेद 254 :- संसद द्वारा बनाई गई विधियों और राज्यों के विधान मंडल द्वारा बनाए गए विधियों में असंगति

अनुच्छेद 256 :- राज्यों की और संघ की बाध्यता

अनुच्छेद 257 :- कुछ दशाओं में राज्यों पर संघ का नियंत्रण

अनुच्छेद 262 :- अंतर्राज्यक नदियों या नदी दूनों के जल संबंधी विवादों का न्याय निर्णय

अनुच्छेद 263 :- अंतर्राज्यीय विकास परिषद का गठन

अनुच्छेद 266 :- संचित निधी

अनुच्छेद 267 :- आकस्मिकता निधि

अनुच्छेद 269 :- संघ द्वारा उद्ग्रहित और संग्रहित किंतु राज्यों को सौपे जाने वाले कर

अनुच्छेद 270 :- संघ द्वारा इकट्ठे किए कर संघ और राज्यों के बीच वितरित किए जाने वाले कर

अनुच्छेद 280 :- वित्त आयोग

अनुच्छेद 281 :- वित्त आयोग की सिफारिशे

अनुच्छेद 292 :- भारत सरकार द्वारा उधार लेना

अनुच्छेद 293 :- राज्य द्वारा उधार लेना

अनुच्छेद 300 क :- संपत्ति का अधिकार

अनुच्छेद 301 :- व्यापार वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 309 :- राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तों

अनुच्छेद 310 :- संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की पदावधि

अनुच्छेद 313 :- संक्रमण कालीन उपबंध

अनुच्छेद 315 :- संघ राज्य के लिए लोक सेवा आयोग

अनुच्छेद 316 :- सदस्यों की नियुक्ति एवं पदावधि

अनुच्छेद 317 :- लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को हटाया जाना या निलंबित किया जाना

अनुच्छेद 320 :- लोकसेवा आयोग के कृत्य

अनुच्छेद 323 क :- प्रशासनिक अधिकरण

अनुच्छेद 323 ख :- अन्य विषयों के लिए अधिकरण

अनुच्छेद 324 :- निर्वाचनो के अधिक्षण निर्देशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना

अनुच्छेद 329 :- निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप का वर्णन

अनुछेद 330 :- लोक सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये स्थानो का आरणण

अनुच्छेद 331 :- लोक सभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व

अनुच्छेद 332 :- राज्य के विधान सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण

अनुच्छेद 333 :- राज्य की विधानसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व

अनुच्छेद 343 :- संघ की परिभाषा

अनुच्छेद 344 :- राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति

अनुच्छेद 350 क :- प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं

अनुच्छेद 351 :- हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश

अनुच्छेद 352 :- आपात की उदघोषणा का प्रभाव

अनुछेद 356 :- राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध

अनुच्छेद 360 :- वित्तीय आपात के बारे में उपबंध

अनुच्छेद 368 :- सविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसकी प्रक्रिया

अनुच्छेद 377 :- भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के बारे में उपबंध

अनुच्छेद 378 :- लोक सेवा आयोग के बारे में