Wednesday, 23 December 2020

स्वप्रेम - 1

स्वप्रेम-1

स्वप्रेम क्या है?

पहले स्व का अर्थ -

स्व का अर्थ है "आप" यानि चैतन्य जो आपके भीतर मौजूद है। चैतन्य यानि परमात्मा का अंश। यह एक तरह से बूंद और सागर सा संबंध है। तुलसीदास ने इसे ही कहा है - "ईश्वर अंस जीव अविनासी।" किंतु आप सिर्फ आत्मा नहीं हैं। आत्मा का एक आवरण है आपका शरीर। यद्यपि आप शरीर ही नहीं हैं। शरीर एक आवरण मात्र है किंतु है महत्त्वपूर्ण। इसी शरीर के माध्यम से ही आप अपने आत्मतत्व को जान पायेंगे। अर्थात प्रथम दृष्ट्या आप शरीर और आत्मा दो तल पर हैं।

मनुष्य अपने जन्म के समय शरीर के तल पर शून्य होता है वह आत्मा के तल पर जीता है। जैसे-जैसे उसका विकास होता जाता है, सामाजीकरण की प्रकिया के तहत वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है और शरीर के तल पर प्रविष्ट होता जाता है। एक समय के बाद वह आत्मा को भूल ही जाता है सिर्फ वह देह रह जाता है। इस प्रक्रिया में ज्यों-ज्यों वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है उसके अंदर विकारों के विकृति की आवृत्ति बढ़ती जाती है। ये विकार जैसे - काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद आदि मूलतः न तो बुरे हैं और न ही अच्छे। ईश्वर द्वारा निर्मित कोई भी तत्व अच्छा बुरा नहीं है, उसे अच्छा या बुरा बनाती है हमारी दृष्टि और हमारे संस्कार। ये ऊर्जा के स्रोत हैं।

जब हम आत्मा के तल पर जीते हैं तब यही काम की ऊर्जा परमात्मा के लिए, क्रोध की ऊर्जा करुणा में, मोह ऊर्जा प्रेम में, लोभ ऊर्जा दान में, मद की ऊर्जा दया में परिणत हो जाती है। वहीं जब हम शरीर के तल पर जीते तब काम के ऊर्जा अतिशय संभोग में, क्रोध ऊर्जा विनाश में, मोह ऊर्जा बंधन में, लोभ ऊर्जा भ्रष्टाचार में, मद की ऊर्जा परपीडन में बदल जाती है।

जब मनुष्य एकदम देह के तल पर पहुंचता है तब वह समस्त विकारों से ग्रस्त एक दानव के रूप में बदल जाता है। ऐसा दानव जो पूरी मनुष्यता के लिये खतरा है। ऐसा सहस्राब्दियों में कभी कभार घटता है। जैसे रावण, हिटलर, मुसलोलिनी आदि। सामान्य मनुष्य इन दोनों के मध्य जूझता रहता है। आधा मानव आधा दानव। यदि हमें स्व से प्रेम करना है तब सबसे पहले हमें अपने मूल रूप को पहचानना होगा। हमारे व्यक्तित्व का झुकाव किधर है।

(क्रमशः)

@विनय नमन

संसार क्या है?


यह संसार हमारी ही निर्मिति है। हमारे विचार, हमारी इच्छाएं, हमारी वासनाएं इसे निर्मित करती हैं। आपको क्या लगता है कि कोई स्त्री या पुरुष सुंदर है? नहीं हमारी वासना उसे सुंदर या असुंदर बनाती है। एक ही वस्तु किसी को अच्छी या बुरी लगती है। क्या वह वस्तु अच्छी या बुरी है? नहीं हमारी धारणा उसे वह गुण प्रदान करती है। अर्थात जो वस्तु जैसी है हम उसे वैसा नहीं देख पाते। हमारे इंद्रिय रूपी प्रोजेक्टर संसार रूप परदे पर फिल्म भरते हैं और यह प्रोजेक्टर वह फिल्म दिखाता है जैसा हमारे विचार, संस्कार हैं। अगर हमारे सामने कोई बुरा या अच्छा दृश्य दिखता है या हमें कोई चीज़ बुरी या अच्छी लगती है तो इसका अर्थ है कि उस वस्तु में उक्त गुण हम प्रविष्ट करा रहे हैं। वह वस्तु तो जैसी है बस वैसी है।

एक पत्थर में किसी ईसाई मूर्तिकार को जीसस दिखेगा तो हिंदू को राम या कृष्ण, बौद्ध को बुद्ध तो जैन को महावीर। मुस्लमान को उसमें कुछ न दिखेगा। वह उससे मस्जिद बनाने की सोचेगा। अगर कोई बहेलिया उस पत्थर को देखेगा तो उसे चिड़िया मारने वाले कंकड़ में बदल लेगा लेकिन सड़क बनाने वाले को वही पत्थर सड़क निर्माण की कच्ची सामग्री प्रतीत होगा। मकान बनाने वाला उसी से मकान बनायेगा। आपको क्या लगता है वह पत्थर इनमें से क्या है? सच तो यह है कि पत्थर सिर्फ पत्थर है। उसे नाना प्रकार का आकार और कार्य सिर्फ हम देते हैं। यह संसार हमारी ही कल्पना, वासना, विचार और इच्छा का विस्तार है।

@विनय नमन🙏

पीढियों का अंतर्द्वंद

हमारे माता-पिता अपने माता-पिता के सपनों, अरमानों को जी रहे थे, हम अपने माता-पिता के और हमारे बच्चे हमारे सपनों और अरमानों को ढोयेंगे। लोग अपने ही सपनों को नहीं जी पाते फिर दूसरों के सपनों की कौन कहे। यह समस्या हजारों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी हम ढोते चले आ रहे हैं। हमारे माता-पिता के माता-पिता अपने समय के सपने 20-30 साल बाद अपने बच्चों से पूरा करवाने की जिद पाले थे। यही अपेक्षा हमारे माता-पिता हमसे करते हैं और यही हम अपने बच्चों से करेंगे। हम अपने पुराने सपने नये दौर में देखने की जिद करते हैं जो कि अप्रासंगिक हैं।

आज से 50 साल पहले का समय और उसकी मांग आज के समय से भिन्न थी। आज के 50 साल बाद समय और उसकी मांग भिन्न होगा ही। हम क्यों अपने बच्चों को 50 साल पुराने सपने देखने पर मजबूर करते हैं। हर आदमी के अपने सपने होते हैं, उन्हें खुद पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर न हो पाये तो नियति मानकर भूल जाना चाहिए किंतु नयी फसल को पुराने मौसम के नाम पर कुर्बान नहीं करना चाहिए। जब हम दूसरे से अपने सपने पूरा करने का सपना संजोते हैं तो अक्सर इसकी परिणति विषाद पूर्ण ही होती है। इसी कारण हर माता-पिता अपने बच्चों से दुखी होते हैं। इसीलिये दोनों के बीच वैमनस्य, कलह और अन्तर्द्वन्द चलता रहता है। इस समस्या से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, खुद को दूसरे के अरमानों और सपनों से मुक्त करो और अपनी संतानों को उनके अपने सपने और अरमान जीने दो। मत थोपो उनपर अपने जीर्ण सपने। 
©विन्ध्येश्वरी