Wednesday, 23 September 2020

लिंग परिवर्तन करने वाली मछलियां

लिंग परिवर्तन करने वाली मछलियां-
1- ब्लूहेड रेस्से- यह कैरेबियाई क्षेत्र में प्रवाल भित्तियों में छोटे सामाजिक समूहों में निवास करती है। केवल नर का सिर नीला होता है, जो पीली धारीदार मादाओं के समूह पर इसके सामाजिक प्रभुत्व का संकेत देता है। यदि नर मछली समूह से निकल/मर जाता है तब कुछ असाधारण घटित होता है। समूह की सबसे बड़ी मादा मछली लिंग परिवर्तित कर नर बन जाती है। उसका व्यवहार कुछ मिनटों में ही बदल जाता है। दस दिनों के भीतर उसके अंडाशय, शुक्राणु उत्पन्न करने वाले वृषण में बदल जाते हैं। 21 दिनों के भीतर वह पूर्णतया नर हो जाती है।

ब्लूहेड रेस्से मछली

2- क्लाउनफिश- इस मत्स्य समूह के शीर्ष पर हमेशा कोई मादा मछली होती है। जब उसकी मृत्यु हो जाती तब समूह का सबसे प्रभावशाली नर लिंग परिवर्तित कर मादा बन जाता है और उसका स्थान ले लेता है।

क्लाउन फिश

3- अन्य - मोरे ईल, गोबी, रेस्से अदि भी लिंग परिवर्तन करती हैं।

ईल

गोबी मछली

©विन्ध्येश्वरी

Saturday, 19 September 2020

मानव विकास रिपोर्ट और तुंबाड प्रभाव

मानव विकास रिपोर्ट (human development report) - में कहा गया कि विश्व में दो तरह के देश हैं एक वे जिनकी आय 100 डाॅलर/वर्ष से भी कम है (जैसे- जिंबाब्वे, नाइजीरिया, घाना आदि) जबकि कुछ देश ऐसे जहाँ प्रतिव्यक्ति आय 125000 डाॅलर/वर्ष से भी अधिक है (जैसे - लक्जमबर्ग, स्वीडन, कतर आदि)। किंतु इसके बावजूद HDR में अधिकतम प्रतिव्यक्ति आय 75000 डाॅलर/वर्ष ही माना गया है। क्योंकि UNDP (HDR जारी करने वाला) का मानना है कि प्रतिव्यक्ति आय 75000 डाॅलर/वर्ष से अधिक होने के बावजूद मनुष्य के औसत कल्याण स्तर में कोई वृद्धि नहीं होती।

निष्कर्ष फिर मनुष्य हाय धन हाय धन के पीछे क्यों मरा जा रहा है? क्योंकि नहीं एक औसत आय के बाद वह अन्य लोगों के बारे में सोंचना शुरु करता? इसका एक ही कारण नजर आता है "तुंबाड प्रभाव" (तुंबाड फिल्म में हस्तर नामक देवता ने सोने और धन के लालच में अपनी माँ के खजाने से धन चुरा लिया जिसके दंड स्वरूप उसे कभी न पूजे जाने का श्राप मिला। आगे चलकर फिल्म का नायक सदाशिव राव, विनायक राव इसी हस्तर से सोने के सिक्के प्राप्त करता है लेकिन अंततः वह अपने इस लालच में अपने प्राण को त्याग देता है। किंतु उसका बेटा इससे कोई सीख न लेकर इसी राह पर चल निकलता है। यानि पूरी दुनिया बार बार एक ही गलती को दुहरा रही है और अपना जीवन नर्क बना रही है)। मनुष्य अपने लालच और अहंकार की तुष्टि में धन के पीछे मरा जा रहा है।

©विन्ध्येश्वरी