Friday, 25 May 2018

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग :-
आने वाला युग आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (ए आई) का युग होगा। आज कई ऐसे रणनीतिक, औद्योगिक और सामाजिक क्षेत्र हैं; जैसे, सुरक्षा, वित्त, निर्माण, ई-वाणिज्य, आवाज पहचान और परिवहन; जिनमें ए आई का उपयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है।

*सूचना एवं दूरसंचार में :-
ए आई के प्रयोग से सरकार को अनेक क्षेत्रों में सूचना एवं दूरसंचार प्रौद्योगिकी को सशक्त करने में मदद मिली है। इससे निश्चित रूप से विकास बढ़ा है, एवं ढांचागत बाधाओं को पार करने में भी मदद मिली है।

*न्याय और न्यायालय में :-
अगर हम भारत के सभी न्यायालयों के मुकदमों की बात करें, तो ए आई की मदद से हमें यह जानने में सुविधा हो सकती है कि किस कानून के किस भाग के अंतर्गत सबसे ज्यादा मुकदमें आ रहे हैं। ऐसा होने पर सरकार उस कानून में ही सुधार करने के बारे में सोच सकती है। नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड इस दिशा में काम भी कर रहा है।

*विकास परियोजनाओं पर निगरानी रखने में :-
राष्ट्रीय सूचना केंद्र ने जीपीएस वाले स्मार्टफोन से स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत शौचालय निर्माण योजना पर निगरानी रखने का काम शुरू कर दिया है। ए आई सॉफ्टवेयर से शौचालय निर्माण की जगह और लाभार्थी की पहचान की जा सकती है। अलग-अलग फोटो में से नकली दावों का पता लगाया जा सकता है। इस प्रकार असली दावेदारों की पहचान करके उन्हें प्रतिपूर्ति दी जा सकती है।

*सार्वजनिक बुनियादी ढांचों के रखरखाव के पूर्वानुमान में।

*आपदा के दौरान की प्रतिक्रिया से लेकर स्वास्थ्य सेवा में सुरक्षात्मक उपाय करने के लिये।

*आर्थिक घोटालों पर नकेल कसने के लिये।

*कृषि क्षेत्र में:-
हमारे किसानों को अगर मौसम, मृदा, भू-जल, फसल-पैटर्न, किस समय क्या उगाया जाए, कब खाद डाली जाए, सिंचाई की जाए एवं कटाई आदि की जानकारी मिलती रहेगी, तो वे अधिक ऊपज प्राप्त कर सकेंगे।

*एआई की फेस रेकगनिशन या चेहरा पहचान तकनीक से अपराधियों को आसानी से पकड़ा जा सकेगा।

ए आई से आशंकाएं और चुनौतियां –

* ए आई के कारण रोज़गार के अनेक अवसर खत्म हो जाएंगे।
(लेकिन यह पूरी तरह से सच नहीं है। उल्टे, यह काम करने की मानवीय क्षमता में कई गुणा संवर्द्धन करेगा। यह अकल्पनाशील एवं दोहराए जाने वाले कामों की जिम्मेदारी लेकर मनुष्य के मस्तिष्क को अधिक सृजनात्मक कार्यों के लिए मुक्त कर सकेगा। इसके विकास के साथ ही ए आई के क्षेत्र में ही रोज़गार के अनेक अवसर मिलेंगे।)

* ए आई का समुचित उपयोग तभी किया जा सकता है, जब इसके लिए सही और पर्याप्त डाटा मिल सके। डाटा सुरक्षा और निजता की रक्षा करते हुए इसे उपलब्ध कराने के बारे में जस्टिस श्रीकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई है।

* ए आई के ऐसे एल्गोरिदम विकसित करने होंगे, जो पक्के और मापयोग्य हों। साथ ही निरीक्षण के लिए पारदर्शी भी हों ताकि इनके दुरूपयोग से बचाया जा सके।

*एआई और मानवीय जीवन के अंतर्विभाजक के रूप में एक कानूनी ढांचा भी तैयार करना होगा।

ए आई के लिए नीति निर्माण हेतु समितियाँ:-
1- आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस के प्लेटफार्म और डाटा संबंधी समिति:- इस समिति का फोकस आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस के लिए मॉडल, उसका ढांचा और इसके लिए आवश्यक प्लेटफार्म विकसित करने पर होगा।

चेयरमैन - आइआइटी खड़गपुर के प्रोफेसर पीपी चक्रवर्ती।
सदस्य - नेशनल इन्फॉरमेटिक्स सेंटर की महानिदेशक सुश्री नीता वर्मा।

2- प्रमुख क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस के लिए नेशनल मिशन की पहचान समिति।

चेयरमैन -  आइआइटी बीएचयू के प्रोफेसर राजीव संगल। कमेटी में दस सदस्य।

3- तकनीकी क्षमताओं की मैपिंग समिति:-
सभी सेक्टरों के लिए किस प्रकार की नीतिगत जरूरतें हैं इस पर काम करेगी। इसके अलावा स्किलिंग और री-स्किलिंग व इस क्षेत्र में आर एंड डी की आवश्यकताओं पर काम करेगी।

चेयरमैन -  नासकॉम के प्रेसिडेंट आर चंद्रशेखर इस कमेटी के चेयरमैन होंगे।
अतिरिक्त छह सदस्य।

4- साइबर सुरक्षा, सेफ्टी, लीगल और एथिकल मुद्दों की समिति।
चेयरमैन - आइआइटी भिलाई के निदेशक प्रोफेसर रजत मूना।

नवाचार:-
पुणे में सी-डैक, ए आई तकनीक पर लगातार काम कर रहा है। जनवरी 2018 में अनेक उच्च शिक्षा संस्थानों और उद्योगों से जुडे़ विशेषज्ञों ने भारत में ए आई के विकास पर एक कार्यशाला में विचार-विमर्श किया।

Thursday, 24 May 2018

विंडफाल टैक्स

विंडफाल टैक्स चर्चा में क्यों?

नीति आयोग ने पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों पर अंकुश लगाने के लिये केंद्र सरकार को यह टैक्स लगाने का सुझाव दिया है।

क्या है विंडफाल टैक्स?

ऐसा कर जो अप्रत्याशित आय पर लागू होता है।

कहाँ लागू है?

विश्व में यह कर अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और चीन सहित कई देशों में लागू है।

अप्रत्याशित आय:- ऐसी आय जो किन्हीं बाहरी कारणों के चलते उत्पाद की बिक्री का मूल्य बढ़ा देते हैं।
तेल कंपनियों के मामले में यह मसला कच्चे तेल में हो रही सट्टेबाजी, वैश्विक मांग और ओपेक संघ की उत्पादन संबंधी साझा रणनीति से जुड़ा है। उनके उत्पादन का स्तर और उत्पाद गुणवत्ता समान स्तर पर रहने के बावजूद मूल्यों में बेहिसाब बढ़ोत्तरी हो रही है। ऐसी अप्रत्याशित आय पर लागू कर विंडफाल टैक्स कहलाएगा।

उद्भव:- यह शब्द औपनिवेशक युग की देन है। राजतंत्रवादी और सामा्रज्यवादी जमाने में कई उपनिवेशों में राजशाही कानून के मुताबिक एक निर्धारित मात्रा से अधिक लकड़ी का उपयोग कोई नहीं कर सकता था लेकिन अगर प्राकृतिक कारणों जसे तूफान आदि के चलते पेड़ किसी नागरिक की जमीन पर गिर तो वह उसका पूरा लाभ ले सकता था। यह अप्रत्याशित आय थी। इसी पर कर लागू होता था।

पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि


पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम कारण, परिणाम
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वर्तमान समय पेट्रोल और डीजल के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं। इस पर हर कोई हैरान, परेशान और अलग अल दृष्टिकोणों से विवेचना कर रहे हैं। निष्पक्ष भाव से इसके विविध तथ्य इस प्रकार हैं -
कारण :-

* क्रूड ऑयल के दामों में वृद्धि :- 2014 के मुकाबले 2018 में क्रूड ऑयल प्रति बास्केट दाम में लगभग 30% की वृद्धि हो चुकी है। यह 2014 में लगभग 50 डॉलर/बैरल था जो अब लगभग 80 डॉलर /बैरल हो चुका है। इस दाम में वृद्धि का कारण ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध, वेनेजुएला के पेट्रोलियम उत्पादन में कमी और विश्व पेट्रोलियम बाजार पर सउदी अरब के एकाधिकार की महत्त्वाकांक्षा है।


* डॉलर के तुलना में रूपये के मूल्य में कमी:- क्रूड ऑयल के दामों में बढ़ोत्तरी हो रही है अतः डॉलर की मांग में वृद्धि हो गयी। इस कारण रूपये की मांग में कमी हुई। जिससे इसके मूल्य में कमी आ गयी। इसी बीच फेडरल बैंक ने अपने ब्याज दर को बढ़ा दिया जिससे निवेशकों ने भारतीय बाजार से अपनी पूंजी निकालना शुरू कर दिया। इसका नतीजा डॉलर की मजबूती और रूपये की कमजोरी हुई।

* विश्व बाजार के अनुसार पेट्रोलियम के दामों का निर्धारण:- केंद्र सरकार के एक निर्णय के बाद पेट्रोलियम कंपनियां अब दैनिक आधार पर पेट्रोलियम पदार्थों के दाम घटा-बढ़ा रही हैं। चूंकि विश्व बाजार में क्रूड ऑयल के दामों में बेतहाशा वृद्धि जारी है अतः भारतीय बाजार में भी इसके दाम तेजी से बढ़ रहे हैं।


* मुनाफा कमाने की इच्छा / चालू खाता घाटा कम करना :- 2014 से पहले क्रूड ऑयल के दाम में वृद्धि के बावजूद सरकार सब्सिडी के माध्यम से दामों को नियंत्रित रखती थी। लेकिन 2014 में सत्ता परिवर्तन तथा क्रूड ऑयल के दाम में कमी के बाद सरकार ने चालू खाते का घाटा कम करने के लिये घटते दामों का लाभ जनता को नहीं दिया। नतीजतन जो चालू खाता घाटा 2014 से पहले लगभग 10% था वह अब लगभग 3% है। अब जबकि दामों में वृद्धि हो रही है तब भी सरकार अपने लाभ को छोड़ना नहीं चाहती।

* प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि :- 2014 में प्रति व्यक्ति आय प्रति वर्ष लगभग 65000 था जो इस 2017 - 18 में बढ़कर लगभग 1 लाख 3 हजार हो चुकी है। अतः सरकार लोगों की क्रय शक्ति का लाभ अधिक राजस्व जुटाने में करना चाहती है।
परिणाम:-
हानि:- डीजल पेट्रोल के दामों में वृद्धि से निम्नलिखित नुकसान हो सकता है -
* मंहगाई में वृद्धि :- डीजल - पेट्रोल के दाम बढ़ने से परिवहन शुल्क में वृद्धि होगी। इससे माल-ढुलाई लागत में वृद्धि होगी और मंहगाई भी इसी अनुपात में बढ़ेगी।
* औद्योगिक उत्पादन में कमी:- ईंधन की लागत बढऩे से या तो उत्पादक उत्पादन कम करेंगे या फिर तैयार माल के कीमत में वृद्धि करेंगे। दोनों ही स्थितियों में महंगाई में इजाफा होगा।
* आॅटो सेक्टर में मंदी:- पेट्रोलियम के दामों में वृद्धि के कारण लोग नयी गाड़ियां खरीदना कम करेंगे। इससे आटो सेक्टर में मंदी का दौर शुरू होगा। जिससे रोजगार में कमी होगी।
* कृषि लागत में बढ़ोत्तरी :- डीजल के दाम बढ़ने से कृषि लागत में भी इजाफा होगा। इसके कारण फल, सब्जी और खाद्यान्नों के मूल्य में भी वृद्धि होगी।
* चालू खाता और व्यापार घाटा में वृद्धि :- पेट्रोलियम के दामों में अधिक वृद्धि के कारण सरकार के व्यापार घाटा में भी इजाफा होगा। इसके कारण रूपये के मूल्य में भी कमी होगी। यदि राजनीतिक दबाव के कारण सरकार टैक्स घटा देती है तब चालू खाता घाटा भी बढ़ेगा। चालू खाता घाटा बढ़ने से सरकार जनकल्याणकारी योजनाओं के व्यय में कटौती करेगी।
लाभ:- पेट्रोलियम के दामों में वृद्धि से कुछ लाभ भी मिलेगा-
* सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा मिलेगा।
* हरित ऊर्जा के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
* कार्बन उत्सर्जन में कमी होगी।
* हरित ऊर्जा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।
* यह एक अच्छा अवसर है जब ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा आत्मनिर्भरता प्राप्त किया जा सकता है।

विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 

Friday, 11 May 2018

आयुष्मान भारत योजना

आयुष्मान भारत योजना
क्या है यह योजना? 
* इस योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचें रहने वाले परिवारों का बीमा कराया जायेगा व उनका मुफ़्त इलाज कराया जायेगा।
* बीमा का कवर 5 लाख रुपये तक होगा, जिसमे दूसरे व तीसरे स्तर की बीमारियों का इलाज होगा ।
* गरीबी रेखा के नीचे वाले लोगों के लिए चलाई जा रही राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की जगह आयुष्मान भारत योजना को चलाया जा रहा है। पहले सिर्फ तीस हजार रुपये तक का बीमा होता था।
योजना के दो भाग-
* पहला गरीब परिवारों का बीमा।
* दूसरा है देश के विभिन्न क्षेत्रों में हेल्थ वेलनेस केंद्र खोलना व मौजूदा स्वास्थ्य केंद्रों का सुधार व नवीनीकरण करना है।
देश में अनेकों मौजूदा स्वास्थ्य केंद्रों को सुधारा जायेगा।
इन केंद्रों पर कई बीमारियों का इलाज होगा व मुफ़्त दवाइयां दी जाएंगी।
असर-
* यह योजना जारी कर सरकार ने दलितों के हितैषी होनेे का दावा किया था।
* ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग इलाज के पैसे ना होने की वजह से मरते हैं। ऐसे में इस बीमा से बहुत सारे जरूरतमन्दों को फायदा मिलेगा।
समस्या - 
* जानकारी का अभाव
* योजना क्रियान्वयन की समस्या
* भ्रष्टाचार
* आधारभूत सुविधाओं  का अभाव
* राजनीतिक शोषण
विरोधाभास-
* चिकित्सा के नाम पर देश में कई प्रतिष्ठित संस्थान हैं। आये दिन कहीं ना कहीं एक नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान संस्थान की नींव रखी जाती है। सरकारी सदर अस्पतालों की भी किसी जिले में कमी नहीं है। व सब जानते हैं कि इन सरकारी अस्पतालों में मुफ़्त चिकित्सा सुविधा दी जाती है। तो अलग से स्वास्थ्य बीमा क्या गरीबों को प्राइवेट हॉस्पिटल भेजने की तैयारी है?
* क्या यह चिकित्सा के निजीकरण की तरफ पहला कदम है? क्या हम भी अमेरिका जैसी चिकित्सा व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं जहां दवाइयाँ नहीं बीमा लोगों की जान बचाता है।
* एक सवाल यह भी है कि क्या बीमा का यह पैसा सदर अस्पतालों के आधुनीकरण में नहीं लगाया जा सकता था? ताकि सिर्फ दलित नहीं बल्कि किसी भी जाति, सम्प्रदाय अथवा आय समूह का व्यक्ति मुफ़्त इलाज करवा सके।
* इन सरकारी अस्पतालों में ना सिर्फ स्टाफ की कमी रहती है बल्कि आये दिन लापरवाहियों व गलतियों की खबरें आती रहती हैं।
* तो क्या सरकार को खुद भी अपने सरकारी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था पर भरोसा नहीं है? तभी गरीबों को प्राइवेट अस्पतालों में भेजने की शुरुआत कर रही है?
निष्कर्ष-
योजनाएं देश में बहुत हैं। जरूरत है एक ऐसे तन्त्र के निर्माण की जो ऐसी योजनाओं को इनके पूर्ण स्वरूप में समाज के सबसे निचले व्यक्ति तक पहुंचा सके।

Sunday, 6 May 2018

सुशासन के पांच मंत्र

वर्तमान सरकार के गठन के साथ ही प्रधानमंत्री ने ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवरनेंस‘ का नारा दिया था परंतु सरकार के लगभग 4 वर्षों के कार्यकाल में ऐसे कोई संकेत दिखाई नहीं दिए हैं। कुछ माह पूर्व भारतीय व्यवसायी, सकल घरेलू उत्पाद के 10% तक हो जाने का अनुमान लगा रहे थे। सरकारी नीतियों के चलते सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर सुस्त पड़ी हुई है करोड़ों युवा बेरोज़गार है। ऐसे  अनेक किसान दुर्दशाग्रस्त हैं।हमें सुःशासन की स्थापना के लिए कुछ मूलभूत सुधारों की आवश्यकता है। इनके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने चाहिए। अगर सरकार इन पर अभी से भी काम करना शुरु करे, तो अगले लोकसभा चुनावों तक बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

सबसे पहला सुधार चुनाव व्यवस्था में होना चाहिए। आज भी संसद एवं विधान सभाओं में अपराधियों का चुनकर आना जारी है। इन सबके बीच ईमानदार और योग्य लोग पीछे छूट जाते हैं। उन्हें डर होता है कि एक बाहुबली के सामने उनका जीतना मुश्किल है, और वे अपनी ईमानदारी की कमाई डूब जाने के डर से पीछे हट जाते हैं।
चुनावों में प्रति वोट के हिसाब से सरकार ही उम्मीदवारों को धन दे।
दूसरा सुधार नौकरशाही में होना चाहिए। सुःशासन के लिए एक चुस्त-दुरूस्त और ईमानदार नौकरशाही का होना बहुत जरूरी है। विश्व के मानकों की तुलना में हमारी नौकरशाही अयोग्य और गैर-जवाबदेह है। आई.ए.एस. जैसी ही अन्य प्रशासनिक सेवाओं को निश्चित अवधि से हटाकर अनुबंध आधारित करके इन्हें अच्छी धन राशि दी जाए। इतने ही परिवर्तन से प्रशासनिक वर्ग जवाबदेह हो जाएगा। सेवांए न देने एवं भ्रष्टाचार की स्थिति में नौकरी से तुरंत निकाले जाने की भी व्यवस्था हो।
निजी संपत्ति की सुरक्षा की उचित व्यवस्था हो। हमारे संविधान में नागरिकों को संपत्ति खरीदने, रखने एवं उसे बेचने के अधिकार की गारंटी दी गई है। नेहरू व इंदिरा गांधी ने इस अधिकार में कमी करके ‘समाज की आपातकाल अवस्था में व्यक्तिगत अधिकारों को कम करने की व्यवस्था‘ कर दी थी। जनता पार्टी ने संविधान के 44 वें संशोधन के अनुच्छेद 19(1)(एफ) के द्वारा इसे खत्म कर दिया। जबकि किसी देश को सफलता तब तक नहीं मिल सकती, जब तक उसके नागरिकों की संपत्ति असुरक्षित रहती है। मोदी सरकार को चाहिए कि नागरिकों की संपत्ति के मौलिक अधिकार को बहाल करे।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक ऐसा फलक है, जिसमें भारत विश्व स्तर पर बहुत पिछड़ा हुआ है। इसी प्रकार आस्था की स्वतंत्रता पर लगाए जाने वाले पहरे हटाए जाने चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी देश की जनता के लिए एक ऐसा साधन है, जिसके माध्यम से आगे चलकर अन्वेषण होते हैं। वर्तमान सरकार को नागरिकों के इस अधिकार के सबसे बड़े रक्षक की भूमिका निभानी चाहिए।
सरकार को बेवजह के कामों में उलझने की बजाय प्रशासन के मूल मंत्र पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय विचारधारा में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। देश के लोग त्रस्त हैं, और विकास करने से वंचित हो रहे हैं। पूरे देश की सरकारें, प्रशासन की दृष्टि से बहुत लचर हैं। इनमें से बहुत सी ऐसी हैं, जो सिर्फ वोट की राजनीति में लगी हुई हैं।
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मोदी सरकार का अब तक का सफर

संस्थाओं को जवाबदेह बनाया जाए


हाल ही के पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले ने सरकार के कामकाज पर एक बार फिर से प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। मोदी सरकार बनने के साथ ही प्रधानमंत्री ने स्वयं को एक चैकीदार की भूमिका निभाने वाला बताया था। सरकार के चार वर्षों के कार्यकाल में ऐसे कोई परिवर्तन होते दिखाई नहीं दिए, जो ये दावा कर सकें कि प्रधानमंत्री की चैकीदारी ने फलां-फलां क्षेत्र में अराजकता या भ्रष्टाचार को कम कर दिया है। मुद्दे की बात यह है कि किसी एक नेता का भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई प्रण ले लेना स्वागत योग्य हो सकता है, परंतु भ्रष्टाचार एक संस्थागत कुरीति है, जिसके लिए संस्थाओं को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

चार वर्षों के कार्यकाल में सरकार ने एक भी लोकपाल नियुक्त नहीं किया है। सूचना आयोग के चारों पद खाली पड़े हुए हैं।
सीबीआई आज भी ‘पिंजरे में बंद‘ पक्षी है।
केंद्र सरकार ने गुजरात के आई. पी. एस. अधिकारी को जबरन विशिष्ट निदेशक पद पर नियुक्त कर दिया, जबकि उनके विरूद्ध अनियमितताओं की गंभीर शिकायतें थी। एक स्वतंत्र और संघीय पुलिस प्रणाली के गठन की सरकार की मंशा दिखाई ही नहीं देती।
चुनावों में आने वाली धनराशि पर बहुत समय से प्रश्न उठाए जा रहे हैं। इस पर कार्यवाही के रूप में चुनावी बांड की योजना लाई जा रही है। इससे दान के रूप में काला धन चुनावों में आता रहेगा।
सरकार का दावा है कि विमुद्रीकरण को भ्रष्टाचार के विरूद्ध एक मुहिम के रूप में देखा जाना चाहिए। परंतु देश में फैला पूरा काला धन बैंकों में वापस आ चुका है।
सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों का नेताओं के साथ पुराना गठजोड़ चला आ रहा है। केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा पंजाब नेशनल बैंक को पुरस्कार दिया जाना इस बात का जीता-जागता उदाहरण है।
सूचना के अधिकार को लगातार कमजोर किया जा रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय से मांगी गई अनेक सूचनाएं अनुत्तररित रहती हैं।
हाल ही में वित्तमंत्री ने कहा है कि नेता तो जवाबदेह हैं, परंतु नियमन संस्थाएं जवाबदेह नहीं हैं। इस संदर्भ में बैंकों की नियमन संस्था, आर बी आई, पर दोष मढ़ दिया गया है। सवाल यह है कि संस्थाओं को जवाबदेह बनाने के लिए क्या सरकार को उन्हें स्वायत्त और स्वतंत्र बनाने की ओर कदम नहीं उठाना चाहिए ? इन संस्थाओं को इतना आत्म-निर्भर बनाया जाए कि वे किसी बड़े-से-बड़े पदासीन व्यक्ति का दोष पाए जाने पर पीछे न हटें।

लोगों का हित तभी सधेगा, जब सरकार केंद्रीय सतर्कता आयोग, सीबीआई, न्यायालयों, सूचना के अधिकार तथा बैंकों की नियमन संस्थाओं को सशक्त, स्वायत्त एकता व अखंडता की भावना से उक्त लोगों के स्टाफ से परिपूर्ण रखेगी।

महिला विकास नीति

महिलाओं और बालकों के विकास का महत्व सर्वोपरि है और इसी से समग्र विकास की धारा बहती है। 30 जनवरी, 2006 को महिलाओं और बच्चों के मामलों में शासन की गतिविधियों में कमी को पूरा करने और अंतर मंत्रालयी व अंतर क्षेत्रीय समग्रता को संवर्द्धित करने की दृष्टि से एक पृथक् महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का गठन किया गया ताकि जा सके। महिलाओं और बच्चों के अधिकारों और चिंताओं पर काम करना और उनकी उत्तरजीविता, सुरक्षा, विकास और भागीदारी सुनिश्चित करना मंत्रालय के प्राथमिक कर्तव्य हैं।
सशक्त महिलाएं जो सम्मान सहित जीएं और हिंसा व भेदभाव से मुक्त वातावरण में प्रगति में बराबर योगदान दें। साथ ही, सुपोषित बालक जिन्हें सुरक्षित और देखभाल भरे माहौल में पनपने और विकसित होने के पूरे अवसर उपलब्ध हों। सुस्पष्ट नीतियों और कार्यक्रम, मुख्यधारा लैगिंक धारणाओं, और उनके अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के जरिए महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देना, उनमें अपने मानवाधिकारों की प्राप्ति और अपनी पूरी क्षमता तक विकसित होने की सक्षमतापैदा करने हेतु संस्थानिक और विधायी सहयोग उपलब्ध कराना। विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित नीतियों एवं कार्यक्रमों के माध्यम से बालकों के विकास, देख-रेख और सुरक्षा को सुनिश्चित करना, उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, शिक्षा, पोषण, संस्थानिक एवं विधायी सहायता तक पहुंच बनवाना ताकि वे अपनी पूरी क्षमता तक विकसित हो सकें।
महिलाओं और बच्चों से जुड़े कानून- महिला और बाल विकास विभाग पर निम्नलिखित अधिनियमों को लागू करने की जिम्मेदारी है-
  1. अनैतिक व्यापार (निरोधक) अधिनियम, 1956 (1986 में संशोधित)
  2. महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून, 1986,
  3. दहेज निरोधक कानून, 1961 (1986 में संशोधित),
  4. सती प्रथा (निरोधक) अधिनियम, 1987
  5. शिशु दुग्ध विकल्प, दुग्धपान बोतल और शिशु आहार (उत्पादन और आपूर्ति वितरण) अधिनियम, 1992
  6. बाल विवाह निषेध अधिनियम, (2006)
  7. राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990
  8. घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005
  9. बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005
  10. बाल न्याय (सुरक्षा और संरक्षण) अधिनियम, 2005
मंत्रालय के कार्यक्षेत्र में मुख्यतः महिलाओं और बच्चों के लिए योजनाएं, नीतियां और कार्यक्रम बनाना; उनसे सम्बंधित विधान करना और उसका कार्यान्वयन, तथा महिला और बाल विकास के क्षेत्र में कार्यरत सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों का मार्गदर्शन और समन्वयन करना शामिल है। मंत्रालय की योजनाएं और कार्यक्रम अन्य विकासात्मक कार्यक्रमों की सहायक भूमिका निभाते हैं।
महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति: सरकार द्वारा 20 मार्च, 2001 को लागू की गई महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य महिलाओं की प्रगति,विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना और महिलाओं के साथ हर तरह का भेदभाव समाप्त कर यह सुनिश्चित करना है कि वे जीवन के हर क्षेत्र और गतिविधि में खुलकर भागीदारी करें। इस नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार की गई।
लैंगिक समानता के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार ने महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण की दिशा में कई कदम उठाए हैं। योजना प्रक्रिया एक विशुद्ध कल्याण उपाय से आगे बढ़कर उन्हें विकास योजना के केंद्र में लाने के प्रयास तक आ पहुंची है। महिलाओं का भविष्य एक सशक्त, आत्मनिर्भर और स्वस्थ व सुरक्षित माहौल में सांस लेने वाले समाज का है।
राजीव गाँधी किशोरी सशक्तिकरण स्कीम-सबला: भारत सरकार ने वर्ष 2010-11 में आईसीडीएस प्लेटफार्म का इस्तेमाल करते हुए 200 जिलों में प्रायोगिक आधार पर यह नई स्कीम लागू की। यह राज्य सरकारों/संघ प्रदेशों के माध्यम से चलाई जाने वाली शत-प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषित स्कीम है। इसके अंतर्गत पूरक पोषण को छोड़कर अन्य सभी घटकों के लिए केंद्र सरकार वित्त पोषण करेगी और पूरक पोषण की लागत में राज्यों/संघ प्रदेशों के साथ 50 : 50 के आधार पर भागीदारी करेगी। इसके अंतर्गत 11 से 18 वर्ष की सभी और 14 से 18 वर्ष की स्कूली लड़कियों को पोषक आहार उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अतिरिक्त किशोरियों को पोषण, स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, प्रजनन और यौन स्वास्थ्य, बच्चों को देख-रेख और जीवन कौशल के बारे में शिक्षित भी किया जाएगा। इस प्रकार से अधिक स्वस्य, आत्म विश्वासपूर्ण और सही मायनों में सशक्त महिलाएं बन पाएंगी जो अपनी इच्छानुसार निर्णय ले सकेंगी और आने वाली बच्चियों की बेहतर देखभाल कर पाएंगी।

राज्यों/संघ प्रदेशों द्वारा किये गये सर्वेक्षण के अनुसार देश में लगभग 1 करोड़ किशोरियां सबला स्कीम के लाभ लेने के लिए अर्ह पायी गयी हैं।
इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना: प्रसूता एवं दुग्ध-पान कराने वाली माताओं के लिए 2010-11 में प्रायोगिक आधार पर 52 जिलों में यह नई स्कीम शुरू की गई। इसके अंतर्गत 19 वर्ष से अधिक आयु की गर्भवती महिलाओं को उनके पहले दो जीवित बच्चों के छह माह की आयु तक तीन किश्तों में ₹ 4000 की सहायता दी जाती है। इसका उद्देश्य गर्भावस्था के दौरान छुट्टी की वजह से होने वाली वेतन हानि की प्रतिपूर्ति करना है ताकि उन्हें आर्थिक कारणों से गर्भावस्था के अंतिम दिनों तक अथवा उसके तुरंत बाद काम पर न जाना पड़े। साथ ही मां और शिशु के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जा सकता है। यह स्कीम देश 52 जिलों में चलाई जा रही है।
स्टेप: महिलाओं को रोजगार और प्रशिक्षण के लिए सहायता देने का कार्यक्रम (स्टेप) वर्ष 1987 में केंद्रीय क्षेत्र की योजना के रूप में शुरू किया गया। इसका उद्देश्य परंपरागत क्षेत्रों में महिलाओं के कौशल में सुधार तथा परियोजना आधार पर रोजगार उपलब्ध कराके, महिलाओं की स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार करना है। इसके लिए उन्हें उपयुक्त समूहों में संगठित किया जाता है, विपणन संबंधी संपर्क कायम करने के लिए व्यवस्थित किया जाता है, सेवाओं में मदद दी जाती है और ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना में रोजगार के दस परंपरागत क्षेत्र शामिल हैं जो इस प्रकार हैं- कृषि, पशुपालन, डेयरी व्यवसाय, मत्स्य पालन, हथकरघा, हस्तशिल्प, खादी और ग्रामोद्योग, रेशम किट पालन, सामाजिक वानिकी और बंजर भूमि विकास। यह योजना सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों, और ऐसे पंजीकृत स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से लागू की जा रही है जो कम से कम तीन साल से अस्तित्व में हैं। परियोजना लागत का 90 प्रतिशत भारत सरकार देती है और 10 प्रतिशत कार्यान्वयन एजेंसी द्वारा दिया जाता है। इसमें प्रत्येक लाभार्थी पर र 16,000 तक खर्च किए जा सकते हैं, जबकि प्रति परियोजना 200 से 10,000 लाभार्थी शामिल हो सकते हैं। परियोजना की गतिविधियों की अवधि 2 से 5 वर्ष तक ही सकती है।
मध्य गांगेय क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण एवं आजीविका कार्यक्रम प्रदर्शनी: आईएफएडी की सहायता से यह प्रायोगिक परियोजना उत्तर प्रदेश के चार जिलों-श्रावस्ती, बहराइच, रायबरेली और सुल्तानपुर और बिहार के दो जिलों-मधुबनी और सीतामढ़ी के 13 ब्लाकों में चलाई जा रही है। इसका उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों के गठन के माध्यम से परियोजना क्षेत्र में कमजोर वर्गों की महिलाओं और किशोरियों का आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण है। 2016-17 में समाप्त हो रही परियोजना अवधि में एक लाख परिवारों को 7200 स्वयं सहायता समूहों में गठित करने का लक्ष्य रखा गया है। हालाँकि परियोजना आजीविका में सुधार को दृष्टि में रखकर तैयार की गई है, मगर लाभार्थी अंततः अपनी राजनैतिक, कानूनी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम होंगे।
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबाई) इसकी अग्रणी कार्यक्रम एजेंसी है। फील्ड स्तरीय सभी काम फील्ड एनजीओ करेंगे, जबकि रिसोर्स एनजीओ इसके प्रभावी कार्यान्वयन हेतु तकनीकी सलाह और सेवाएं प्रदान करेंगे। पिछले वित वर्ष के दौरान फील्ड स्तर पर इसे शुरू करने की शुरुआती तैयारियां की गई, जैसे ब्लाकों का चयन, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कार्यक्रम प्रबंधन ढांचे की स्थापना, परियोजना कार्यान्वयन इकाइयों का गठन और जिला स्तर पर स्टाफ की तैनाती रिसोर्स एनजीओ और फील्ड एनजीओ के चयन के बाद क्षेत्र में परियोजना की शुरुआत कर दी गई। योजना के उद्देश्य हैं-
  1. प्रत्येक व्लॉक में समुदाय सेवा केंद्र की स्थापना,
  2. महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों में एकत्र करना
  3. प्रशिक्षण एवं अन्य क्षमता निर्माणं गतिविधियां
  4. स्वयं सहायता समूहों, समुदाय सेवा केंद्रों और फील्ड स्तरीय परियोजना कार्यक्रमों के लिए दौरे आयोजित करना
  5. उपक्षेत्र अध्ययन
  6. बैंकरों और अन्य हितधारियों को संवेदनशील बनाना।
स्वाधार: कठिन परिस्थितियों में पड़ने वाली महिलाओं के लाभ के लिए विभाग ने वर्ष 2001-02 में केंद्रीय क्षेत्र में एक नई योजना स्वाधार शुरू की है। यह योजना निम्नलिखित महिलाओं के लिए है: दीन-हीन विधवा जिनके परिवार वालों ने उन्हें वृंदावन, काशी आदि धार्मिक स्थानों पर बेसहारा छोड़ दिया है, जेल से रिहा की गई महिला कैदी, जिसे परिवार का सहारा नहीं है, प्राकृतिक आपदा की शिकार ऐसी महिलाएं जो बेघर हैं और उनके पास कोई सामाजिक और आर्थिक सहारा नहीं है, वेश्यालयों या अन्य स्थानों से भागी या मुक्त कराई गई महिलाएं/बालिकाएं या यौन शोषण कोशिकार ऐसी महिलाएं/बालिकाएं, जिनके परिवारवालों ने उन्हें वापस लेने से मना कर दिया है या जो किसी अन्य कारणों से वापस अपने परिवार में नहीं लौटना चाहती हैं, आतंकवाद की शिकार महिलाएं जिन्हें परिवार का सहारा नहीं है, और जिनके पास जीने के लिए आर्थिक जरिया नहीं है, मानसिक रूप से विक्षिप्ति महिलाएं जिन्हें परिवार या रिश्तेदारों से कोई मदद नहीं मिलती, आदि।
इस योजना के अंतर्गत उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं में भोजन, कपड़ा, आवास, स्वास्थ्य देखभाल, परामर्श व्यवस्था शामिल है। इसके अतिरिक्त शिक्षा के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास, जागरूकता पैदा करने, कौशल बढ़ाने और व्यवहार संबंधी प्रशिक्षण का भी प्रबंध किया जाता है। इन श्रेणियों के तहत् महिलाओं के हेल्पलाइन और अन्य सेवाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
यह परियोजना समाज कल्याण/महिला एवं बाल विकास विभागों, महिला विकास निगमों, शहरी निकायों के निजी, सार्वजनिक ट्रस्टों या स्वैच्छिक संगठनों आदि के माध्यम से कार्यान्वित की जाती है लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि उन्हें अलग-अलग परियोजनाओं के आधार पर इस तरह की महिलाओं के पुनर्वास का वांछित अनुभव और कौशल हो।
अल्पावधि प्रवास गृह: अल्पावधि प्रवास गृह परियोजना वर्ष 1969 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य पारिवारिक विवादों, सामाजिक बहिष्कार, नैतिक पतन के लिए खतरे के कारण सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक परेशानियों से जूझ रही महिलाओं और बालिकाओं को संरक्षण देना और उनका पुनर्वास करना है। अप्रैल, 1989 से यह कार्यक्रम कार्यान्वयन के लिए केन्द्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड (सीएसडब्ल्यूवी) को सौंप दिया गया है। जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों को छह महीने से तीन साल तक अस्थायी आश्रय दिया जाता है। माताओं के साथ आए बच्चों या बाद में पैदा हुए बच्चों को सात साल तक आश्रयगृहों में रुकने की अनुमति होती है। उसके बाद उन्हें बच्चों के संस्थानों में स्थानांतरित किया जा सकता है या उन्हें पालनगृहों में भेजा जा सकता है। यहां रहने वाली महिलाओं को प्रशिक्षण और दक्षता विकास के जरिए आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाया जाता है।
कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल: कामकाजी महिलाओं सहित बच्चों की देखभाल के लिए हॉस्टल निर्माण या विस्तार के लिए यह योजना वर्ष 1972-78 से चल रही है। इसके अंतर्गत गैर-सरकारी शिक्षा आदि कार्यों में लगी अन्य एजेंसियों, सार्वजनिक उपक्रमों, महिला को कामकाजी महिलाओं के हॉस्टलों के निर्माण के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। इस योजना में कामकाजी महिलाओं (अकेली कामकाजी महिलाओं,ऐसी महिलाएं जिनके पति शहर से बाहर रहते हों, विधवाओं, परित्यक्ताओं, तलाकशुदा महिलाओं आदि), रोजगार के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रही महिलाओं और स्कूली शिक्षा के बाद व्यावसायिक पाठ्यक्रम पूरा कर रही महिलाओं के लिए सुरक्षित और किफायती आवास सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
अब तक 891 छात्रावासों को स्वीकृति दी गई है जिनमें लगभग 66299 महिलाएं रह सकती हैं, और उनसे संबद्ध दिवस देखभाल केंद्रों में लगभग 8532 बच्चों के लिए सुविधा शामिल है। स्कीम के अंतर्गत दी जाने वाली वित्तीय सहायता इस प्रकार है-
  1. सार्वजनिक भूमि पर छात्रावास निर्माण की लागत का 75 प्रतिशत
  2. किराये पर लिए भवन में छात्रावास चलाने के लिए वित्तीय सहायता
  3. छात्रावास शुरू करते समय फर्नीचर आदि की खरीद के लिए ₹ 75,000 प्रति रहवासी की दर पर एक बार दी जाने वाली सहायता
  4. स्कीम के तहत निर्मित छात्रावास भवन के रख-रखाव और मरम्मत के लिए ₹ 5 लाख तक का अनुदान
  5. केवल सार्वजनिक भूमि पर भवन निर्माण के लिए कॉरपोरेट घरानों को 50:50 अनुदान
  6. निर्माण कार्य के दौरान, निर्माण लागत बढ़ जाने के चलते मूल स्वीकृति राशि से अधिक अतिरिक्त अनुदान पर विचार किया जा सकता है।
स्थापित प्रक्रिया के तहत्, स्कीम के निर्देशों को पूरा करने वाले राज्य स्तरीय अधिकार प्राप्त समिति द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव मंत्रालय की परियोजना स्वीकृति समिति के विचारार्थ रखे जा सकते हैं।
उज्ज्वला: अवैध व्यापार को रोकने के लिए 4 दिसंबर, 2007 से उज्ज्वला नाम से एक व्यापक योजना शुरू की गई। इस योजना के पांच विशेष घटक हैं- रोकथाम, रिहाई, पुनर्वास, पुनःएकीकरण और स्वदेश भेजना।
इस योजना के पांच घटक निम्नलिखित हैं-
रोकथाम - सामुदायिक निगरानी दल/किशोरदल बनाना,पुलिस, सामुदायिक नेताओं को जागरूक करना, आईईसी सामग्री तैयार करना और कार्यशालाओं का आयोजन करना आदि।
रिहाई (मुक्त कराना) - शोषण किए जाने वाले स्थान से सुरक्षित रिहाई।
पुनर्वास- चिकित्सकीय सहायता, कानूनी सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण और आय उत्सर्जक गतिविधियों की भी व्यवस्था करना।
पुनः एकीकरण- पीड़ित की इच्छानुसार उसे परिवार/समुदाय में एकीकृत करना।
स्वदेश भेजना- सीमा पार चले गए पीड़ितों की सुरक्षित वापसी।
लिंग आधारित बजट: बजटीय प्रक्रिया में लिंग को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए लिंग आधारित बजट की शुरुआत की गई है। बजट की प्रक्रिया के दौरान ही लिंग संभावनाओं को हर स्तर और चरण में शामिल कर लिया जाता है। इसके साथ बजट में लिंगभेद आकलनका अनुमान लगाकर उन उपायों को बजट में ही पूरा कर लिया जाता है।
मंत्रालय द्वारा वर्ष 2004-05 में लिंग समानता बजट पर एक मिशन वक्तव्य स्वीकार किया गया था और उस मिशन को लागू करने के लिए रणनीतिक रूपरेखा भी तैयार की गई थी। वर्ष 2005 के बाद प्रशिक्षण, कौशल निर्माण, जागरूकता पैदा करना, पैरवी, आग्रहीकरण और लिंग उत्पादक अनुमान पर गहन कार्य किया गया। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को लिंग आधारित बजट के लिए नोडल मंत्रालय बनाया गया है। मंत्रालय ने इस कार्य के लिए अलग से लिंग आधारित बजट ब्यूरो का गठन किया है जिसे पूरा स्टाफ और सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। मंत्रालय लिंग आधारित बजट के लिए क्षेत्रीय संसाधन और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने के साथ-साथ प्रशिक्षण नियमावली तैयार करने की योजना भी बना रहा है। जनवरी 2009 में भारत सरकार के मंत्रालयाँ और विभागों के लिंग आधारित बजट पुस्तिका माननीय राज्य मंत्री द्वारा जारी की गई है। अब तक भारत सरकार ने 56 मंत्रालयों तथा विभागों ने लिंग आधारित बजट इकाइयां स्थापित की हैं।
राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संसथान जैसे, लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मंसूरी; भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली; बी.वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान, नोएडा और राज्यों के मुख्य प्रशिक्षण संस्थान जैसे राज्य कृषि विकास संस्थानों और प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों की रिसोर्स संस्थानों के रूप में विकसित किया गया है और उन्होंने अपने प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में जैन्डर बजटिंग को शामिल किया है। 1000 से अधिक केंद्रीय और राज्य सरकार के अधिकारियों और अन्य हितधारियों को पिछले तीन वर्षों में जैन्डर बजटिंग में प्रशिक्षित किया गया।
इस दिशा में एक अन्य महत्वपूर्ण कदम है व्यय बजट दस्तावेज में स्टेटमेंट 20 को शामिल करना जो महिलाओं के लिए आबंटित राशि को दर्शाता है। इसे शामिल करने वाले मंत्रालयों की संख्या 2005-06 के 9 से बढ़कर 2011-12 में 20 हो गई है। इस दौरान जैन्डर बजट दर्शाने की मात्रा भी 2.79 प्रतिशत से बढ़कर 6.22 हो गई।
राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन: विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों की स्कीमों/कार्यक्रमों के सम्मिलन द्वारा महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सशक्तिकरण के उद्देश्य से 8 मार्च, 2010 को यह नया कार्यक्रम शुरू किया गया। शीर्ष स्तर पर राष्ट्रीय मिशन प्राधिकरण नीतिगत दिशा-निर्देश करेगा, इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे और 13 मंत्री इसके सदस्य होंगे। इनकी सहायता के लिए केंद्रीय समिति और अंतर मंत्रालयी समन्वय समिति होंगी।
केंद्रीय स्तर परराष्ट्रीय महिला संसाधन केंद्र मिशन निदेशालय को तकनीकी सहायता देगा। यह केंद्र सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों और स्कीमों के संबंध में अनुसंधान और प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन आयोजित करेगा, और विद्यमान संस्थाओं/संस्थानों के सम्पर्क में रहेगा। सरकारी स्कीमों और कार्यक्रमों पर प्रकाश डालने के लिए यह मीडिया रणनीतियां तैयार करने के साथ-साथ समाज में अभिशप्त सामाजिक कुरीतियों के बारे में जागरूकता कार्यक्रम भी तैयार करेगा। इसी तर्ज पर राज्य स्तर पर राज्य मिशन अधिकरण और राज्य महिला संसाधन केंद्र होंगे।
आन्ध्र प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, मिजोरम, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, त्रिपुरा, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल, पंजाब राज्य और संघ प्रदेश चंडीगढ़ प्रशासन ने राज्य मिशन अधिकरण की स्थापना की सूचना दी है। गुजरात और जम्मू-कश्मीर ने राज्य महिला केंद्र भी गठित किया है।
राष्ट्रीय मिशन के प्रमुख कार्य हैं-
  • महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण
  • महिलाओं के प्रति हिंसा को समाप्त करना
  • स्वास्थ्य और शिक्षा पर विशेष जोर
  • प्रतिभागी मंत्रालयों,संस्थानों और संगठनों के कार्यक्रमों, नीतियों, संस्थानिक व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं के जैन्डर मेनस्ट्रीमिंग कार्य की निगरानी।
परिवार परामर्श केंद्र: 1983से शुरू इस स्कीम के तहत् अत्याचार की शिकार और पारिवारिक अहसयोग की समस्या का सामना कर रही महिलाओं और बच्चों को र्क्थं और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध करायी जाती हैं। ये केंद्र महिलाओं से संबंधित सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूकता सृजन और आम लोगों की राय बनाने का काम भी करते हैं। ये स्थानीय प्रशासन, पुलिस, न्यायालयों, कानूनी सलाह इकाइयों, गृहों आदि के निकट सहयोग से पुनर्वास सेवाएं चलाते हैं। इसके लिए उपयुक्त शैक्षिक पृष्ठभूमि वाले परामर्शदाताओं की मदद भी ली जाती है। कुछ राज्यों में तो घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम 2005 के अंतर्गत इन केंद्रों की सेवा प्रदाता और परामर्शदाताओं को संरक्षण अधिकारी घोषित किया गया है।
महिलाओं की शिक्षा के लिए कन्डेंस पाठ्यक्रम: वयस्क लड़कियों/महिलाओं जो शिक्षा की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पायी या जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी, उनकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए ये पाठ्यक्रम शुरू किये गये। इसके तहत् जनजातीय, पर्वतीय और पिछड़े क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाती है। 15 वर्ष से अधिक आयु की लड़कियों/महिलाओं को शिक्षा का अवसर प्रदान करते हुए दक्षता विकास/व्यावसायिक प्रशिक्षण की सुविधा प्राथमिक, माध्यमिक हाईस्कूल और मेट्रिक स्तर पर उपलब्ध करायी जाती है। पाठ्यक्रम आवश्यकता आधारित और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक तैयार किये जाते हैं।
जागरूकता सृजन कार्यक्रम: यह स्कीम 1986-87 में ग्रामीण और निर्धन महिलाओं की आवश्यकताओं की पहचान करने और विकास एवं अन्य संबंधित कार्यक्रमों में उनकी भूमिका सुनिश्चित करने की दृष्टि से शुरू की गई थी। इसके अंतर्गत कैम्प लगाकर स्थानीय मुद्दों सहित महिलाओं की स्थिति, महिलाएं और कानून, स्वास्थ्य, सामुदायिक स्वास्थ्य, साफ-सफाई, तकनीक, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था जैसे मसलों पर विचार-विमर्श किया जाता है। इन कैम्पों में महिलाएं इकट्टी होकर अपने अनुभव और विचार आपस में बांटती हैं और इस प्रकार सच्चाई से रूबरू होती हैं और अपनी समस्याओं से निपटने और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम बनती हैं।
आठ दिवसीय कैम्प और दो दिवसीय पश्च-कार्रवाई के लिए ₹ 10,000 का अनुदान दिया जाता है। कैम्प आयोजकों को प्रशिक्षित करने के लिए सभी 33 राज्यों में प्रशिक्षण संगठनों की पहचान की गई है। प्रक्स्हीं के लिए प्रशिक्षु ₹ 1000 की व्यवस्था है।
स्त्री शक्ति पुरस्कार: सामाजिक विकास के क्षेत्र में महिलाओं के व्यक्तिगत योगदान को पहचान देने के लिए केंद्र सरकार ने स्त्री शक्ति के नाम से पांच राष्ट्रीय पुरस्कारों की स्थापना की है। यह पुरस्कार भारतीय इतिहास को सम्मानित महिलाओं के नाम पर रखे गए हैं, जो अपने साहस और एकता के लिए विख्यात हैं, जैसे- देवी अहिल्याबाई होल्कर, कन्नगी, माता जीजाबाई, रानी गिडेनेलु जेलियांग, रानी लक्ष्मीबाई।
वर्ष 2007 से स्त्री शक्ति पुरस्कार की उपश्रेणी में रानी रुद्रम्मा देवी का नाम भी जोड़ा गया है। यह पुरस्कार उत्कृष्ट प्रशासनिक कौशल, नेतृत्व क्षमता और साहस के लिए व्यक्तिगत रूप से महिला और पुरुष को प्रदान किया जाता है। इन पुरस्कारों के तहत् ₹ 3 लाख नकद और एक प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।
ग्रामीण एवं निर्घन महिलाओं के लिए जागृति विकास परियोजनाएं: ग्रामीण एवं निर्धन महिलाओं हेतु जागृति विकास परियोजनाओं का आरम्भ 1987-88 में किया गया था। इन परियोजनाओं का उद्देश्य ग्रामीण एवं निर्धन महिलाओं की आवश्यकताएं ज्ञात करना, समाज एवं परिवार में उनके स्तर (status) के प्रति उनमें जागृति का विकास करना, सामुदायिक स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य तकनीक एवं पर्यावरण आदि जैसे सामाजिक मुद्दों से निपटना और अपने अधिकारों की प्राप्ति हेतु कार्य करने के लिए उन्हें सक्रिय बनाना है।
बालवाड़ी पोषाहार कार्यक्रम: बच्चों में व्याप्त कुपोषण की समस्या से निपटने हेतु सरकार ने 1970 में निम्न आय वर्ग के परिवारों से सम्बन्धित 3 से 5 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को पूरक पोषाहार उपलब्ध करवाने की योजना आरम्भ की। इस योजना में स्वास्थ्य सुविधाएं भी सम्मिलित होती हैं, जैसे-बच्चों का टीकाकरण, स्थानीय निकायों के सहयोग से बेहतर सफाई और पर्यावरण की व्यवस्था करना।
प्रौढ़ महिलाओं हेतु संक्षिप्त शैक्षिक पाठ्यक्रम एवंव्यवसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम: बोर्ड द्वारा प्रौढ़ महिलाओं के लिए संक्षिप्त शैक्षिक पाठ्यक्रम और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्बन्धी योजनाएं क्रमशः 1958 और 1975 में आरम्भ की गई थीं। 1988 और 1989 में इन योजनाओं में कुछ संशोधन किए गए। इन संशोधनों का उद्देश्य जरूरतमंद महिलाओं को शैक्षणिक योग्यताएं और कौशल प्रदान करना था, ताकि वे जीविकोपार्जन में सक्षम बन सकें तथा सामाजिक कार्यो में शक्ति सम्पन्न बन सकें। इन कार्यक्रमों हेतु अनुदान नॉनमैचिंग के आधार पर स्वीकार किए जाते हैं। संशोधित योजना 1990-91 से क्रियान्वित की जा रही है।
शिशुगृह कार्यकर्ता प्रशिक्षण: महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा 1986-87 में शिशुगृह कार्यकर्ता प्रशिक्षण कार्यक्रम आरम्भ किया गया था। इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य शिशुगृह संचालित करने हेतु शिशु सदन के कार्यकर्ताओं (creache workers) को प्रशिक्षण प्रदान करना था। 1989-70 इस कार्यक्रम का अंतरण केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड कीकर दिया गया ताकि इसका कार्यान्वयन स्वैचिठक संगठनों के माध्यम से हो सके।
सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम: बोर्ड द्वारा 1958 में आरम्भ सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम का उद्देश्य स्वैच्छिक संगठनों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है ताकि वे विशेष रूप से आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की जरूरतमंद महिलाओं को कार्य एवं मजदूरी के अवसर उपलब्ध करवा सकें तथा विभिन्न प्रकार के जीविकोपार्जन सम्बन्धी कार्य आरम्भ कर सकें। इन कार्यक्रमों में लघु औद्योगिक एकक, हथकरघा एवं हस्तशिल्प एकक, दुग्धशालाएं एवं अन्य पशुपालन कार्यक्रम अर्थात सूअर पालन, बकरी एवं भेड़पालन, कुक्कुटपालन इकाइयों और साथ ही स्व-रोजगार एकक स्थापित करने की व्यवस्था है। जीविकोपार्जन परियोजनाओं के नवीन क्षेत्रों का पता लगाने पर बल दिया गया है।
सामान्य सहायता अनुदान कार्यक्रम: इस योजना के अंतर्गत ऐसे स्वयंसेवी संगठनों को वार्षिक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, जो महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों, निराश्रितों, शारीरिक रूप से विकलांग, मानसिक रूप से अविकसित और कुष्ठ रोगियों आदि से सम्बन्धित विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों में संलग्न हैं।
सामुदायिक विकास परियोजनाएं: इन परियोजनाओं के उद्देश्य विविध प्रकार के हैं, जिनमें प्रमुख हैं- महिलाओं और बच्चों के लिए बालवाड़ी, शिल्पकला कार्यों एवं सामाजिक शिक्षा ,महिलाओं के लिए प्रसव सेवाएँ प्रदान करने, मनोरंजन कार्य-कलापों जैसी सुविधाओं हेतु सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
सीमावर्ती क्षेत्रों में कल्याण विस्तार परियोजनाएं: वर्तमान में देशभर के कुल पंद्रह राज्यों/संघ शासित प्रदेशों-अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, पंजाब, राजस्था, सिक्किम, त्रिपुरा, हिमांचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप-में 465 केन्द्रों वाली 95 परियोजनाएं कार्यरत हैं। इन बहु-उद्देश्यीय परियोजनाओं का व्यय बोर्ड एवं राज्य सरकार द्वारा 2:1 के अनुपात में वहन किया जाता है।
अवकाश शिविर: इस कार्यक्रम के अंतर्गत बोर्ड द्वारा विकलांग बच्चों के लिए सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों से आए 10 से 16 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए अवकाश शिविर आयोजित करने हेतु स्वयंसेवी संगठनों को अनुदान प्रदान किया जाता है। इन शिविरों के प्रमुख उद्देश्यों में सम्मिलित हैं- बच्चों को अनुशासन में रहने सम्वन्धी प्रशिक्षण प्रदान करना तथा उनमें नए वातावरण के अनुरूप स्वयं को दालने की टीम भावना एवं मिल-जुलकर रहने एवं कार्य करने की भावना जागृत करना, आदि।
महिला मण्डल: महिला मण्डल नामक इस कार्यक्रम का आरम्भ बोर्ड द्वारा 1961-62 में ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में आरम्भ किया गया था, जहां महिलाओं और बच्चों के लिए कल्याण कार्यक्रम संचालन हेतु कोई भी स्वयं सेवी संगठन नहीं था। महिला मंडलों का 75 प्रतिशत तक का व्य्व्व केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड द्वारा वहां किया जाता है। शेष 25 प्रतिशत तक का व्यय संगठन द्वारा अपने हिस्से के रूप में व्यय किया जाता है। एक विकेन्द्रित कार्यक्रम होने के कारण महिला मण्डलों से सम्बन्धित समस्त स्वीकृतियां एवं धनराशि देने की कार्यवाही सम्बन्धित राज्य बोर्ड द्वारा की जाती हैं।
स्वैच्छिक कार्य ब्यूरो एवं परिवार परामर्श केन्द्र: अत्याचार और शोषण के शिकार बच्चों एवं महिलाओं को निवारक, उपचारात्मक एवं पुनर्वासात्मक सेवाएं प्रदान करने हेतु 1982 में बोर्ड द्वारा स्वैच्छिक कार्य ब्यूरो एवं परिवार परामर्श केन्द्र कार्यक्रम आरम्भ किया गया।
स्वावलंबन (व्यवसायिक प्रशिक्षण): बोर्ड ने विभिन्न ट्रेइस में महिलाओं को प्रशिक्षित करने, जो विपणन योग्य होते हैं तथा बदलते कार्य दशाओं की मांग को पूरा करने के क्रम में उनके कौशल में वृद्धि भी करते हैं, के लिए 1975 के दौरान व्यावसायिक प्रशिक्षण योजना प्रारंभ की। व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को रोजगार अवसरों की प्राप्ति हेतु सक्षम बनाना है। वर्तमान में बोर्ड स्वावलम्बन योजना के तहत वित्त प्राप्त करता है। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड राज्यों से, जहां महिला विकास निगम स्थापित नहीं हुए हैं, प्रस्ताव स्वीकार करता है। स्वैचिठक संगठनों के आवेदनों को सम्बद्ध राज्य बोडों द्वारा प्राप्त किया जाता है और वे इस आवेदन को विभाग की प्रोजेक्ट अनुमोदन समिति द्वारा अनुदान की मंजूरी के लिए राज्य स्तरीय सशक्तीकरण समिति के समक्षविभाग में जमा करने के लिए प्रस्तुत करते हैं।