Friday, 10 October 2025

खाद्य पदार्थों एवं खाद्य प्रवृत्तियों से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन

ाद्य पदार्थों एवं खाद्य प्रवृत्तियों से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन आज मानव सभ्यता जिस जलवायु संकट से जूझ रही है, उसके मूल में केवल उद्योग, ऊर्जा या परिवहन क्षेत्र ही नहीं, बल्कि हमारी खाने की थाली भी एक प्रमुख कारण बन चुकी है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, विश्वभर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा केवल खाद्य प्रणाली (Food System) से आता है — जिसमें कृषि, पशुपालन, फसल उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन, उपभोग और अपशिष्ट सभी शामिल हैं। इस प्रकार भोजन अब केवल जीवन निर्वाह का साधन नहीं, बल्कि पृथ्वी के भविष्य को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक बन गया है। ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख स्रोत खाद्य प्रणाली से तीन प्रमुख गैसें उत्सर्जित होती हैं — कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄) और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)। कार्बन डाइऑक्साइड मुख्यतः कृषि यंत्रों के संचालन, परिवहन, और वनों की कटाई से उत्पन्न होती है। मीथेन गैस पशुधन के पाचन-प्रक्रिया, धान के खेतों और सड़ते हुए खाद्य अपशिष्ट से निकलती है, जबकि नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन रासायनिक उर्वरकों और गोबर के अपघटन से होता है। इनमें से मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 28 से 34 गुना अधिक प्रभावशाली है, जबकि नाइट्रस ऑक्साइड 265 से 300 गुना अधिक शक्तिशाली है। इसीलिए कृषि और भोजन से जुड़ी गतिविधियाँ जलवायु परिवर्तन को तेजी से बढ़ाती हैं। खाद्य प्रणाली में उत्सर्जन का अनुपात वैश्विक स्तर पर यदि खाद्य प्रणाली को देखा जाए, तो लगभग 31 प्रतिशत उत्सर्जन पशुधन और चारा उत्पादन से, 27 प्रतिशत फसल उत्पादन से, 24 प्रतिशत भूमि उपयोग परिवर्तन (जैसे वनों की कटाई) से, और शेष 18 प्रतिशत प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और भंडारण से होता है। इस प्रकार खेत से लेकर थाली तक हर निवाले के पीछे कार्बन उत्सर्जन की एक लंबी श्रृंखला छिपी होती है। कौन से खाद्य पदार्थ सबसे अधिक उत्सर्जन करते हैं? खाद्य पदार्थों में सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पशु-आधारित खाद्य पदार्थों से होता है। उदाहरण के लिए, गाय के मांस (बीफ़) से लगभग 60 किलोग्राम CO₂e प्रति किलो मांस उत्सर्जित होता है। भेड़ के मांस से लगभग 24 किलोग्राम, चीज़ या पनीर से 21 किलोग्राम, जबकि मुर्गी मांस से लगभग 6 किलोग्राम CO₂e उत्सर्जन होता है। इसके विपरीत, धान जैसी फसलों से लगभग 4 किलोग्राम, सब्ज़ियों से 2 किलोग्राम, और दलहनों से मात्र 1 किलोग्राम CO₂e प्रति किलो उत्सर्जन होता है। इससे स्पष्ट है कि पशु आधारित भोजन, पौधा आधारित भोजन की तुलना में 5 से 10 गुना अधिक प्रदूषणकारी होता है। खाद्य अपव्यय: एक मौन जलवायु संकट विश्व स्तर पर हर वर्ष लगभग 1.3 अरब टन भोजन बर्बाद हो जाता है। यह मात्रा विश्व में उत्पादित कुल भोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। इस बर्बाद भोजन से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसें कुल वैश्विक उत्सर्जन का 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं। लैंडफिल या कचरा स्थलों में सड़ते भोजन से मीथेन गैस निकलती है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज करती है। यदि खाद्य अपव्यय को एक देश माना जाए, तो यह चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक होता। इस प्रकार “Food Waste” एक छिपा हुआ, पर अत्यंत गंभीर जलवायु संकट है। खाद्य अपव्यय के मुख्य कारणों में भंडारण की कमी, परिवहन सुविधाओं की अनुपलब्धता, उपभोक्ताओं द्वारा अति-खरीदारी और रेस्तरां व घरों में अतिरिक्त खाना बनाना शामिल है। इसका समाधान “Zero Food Waste Policy”, बेहतर भंडारण तंत्र, बायोगैस उत्पादन और अतिरिक्त भोजन को जरूरतमंदों तक पहुँचाने के प्रयासों में निहित है। बदलती खाद्य प्रवृत्तियाँ और उनका प्रभाव पिछले कुछ दशकों में वैश्विक स्तर पर भोजन की प्रवृत्तियों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। विकासशील देशों में मांस और डेयरी उत्पादों की खपत तेजी से बढ़ी है, जिससे पशुधन पालन बढ़ा और मीथेन उत्सर्जन में इज़ाफा हुआ। इसके विपरीत, विकसित देशों में अब पौधा-आधारित आहार (Plant-based diet) जैसे शाकाहार, वीगन और फ्लेक्सिटेरियन डाइट लोकप्रिय हो रही हैं, जो ग्रीनहाउस गैसों को 50 से 75 प्रतिशत तक घटा सकती हैं। शहरी जीवनशैली में बढ़ते प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड ने ऊर्जा की खपत और पैकेजिंग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को बढ़ा दिया है। हालांकि, अब एक नया वैश्विक रुझान “Eat Smart, Save Planet” उभर रहा है, जो भोजन के चयन और उपयोग को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बना रहा है। क्षेत्रीय भिन्नताएँ उत्तर अमेरिका और यूरोप में जहाँ मांस और डेयरी उत्पादों से उत्सर्जन प्रमुख है, वहीं एशिया, विशेषकर भारत और चीन में, धान की खेती, पशुधन, और रासायनिक उर्वरक मुख्य कारण हैं। अफ्रीकी देशों में भूमि उपयोग परिवर्तन और वनों की कटाई से ग्रीनहाउस गैसें अधिक निकलती हैं। इन सभी क्षेत्रों में कृषि प्रणालियों का जैविकीकरण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है। वैश्विक आँकड़े संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और IPCC की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व स्तर पर कुल खाद्य प्रणाली से लगभग 13.7 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष (CO₂e) गैसों का उत्सर्जन होता है। केवल पशुधन उत्पादन से ही लगभग 7.1 अरब टन CO₂e निकलता है, जबकि खाद्य अपव्यय से लगभग 4.4 अरब टन CO₂e प्रति वर्ष उत्सर्जन दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि विश्वभर में लोग सतत (Sustainable) आहार अपनाएँ, तो खाद्य प्रणाली से उत्सर्जन में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी संभव है। उत्सर्जन घटाने की दिशा में कदम ग्रीनहाउस गैसों में कमी लाने के लिए कुछ व्यवहारिक और नीतिगत कदम अत्यंत आवश्यक हैं — जैसे कि पौधा-आधारित भोजन को बढ़ावा देना, मांस और दुग्ध उत्पादन में दक्षता बढ़ाना, खाद्य अपव्यय को कम करना, जैविक और पुनरुत्पादक खेती को अपनाना, स्थानीय भोजन की संस्कृति को प्रोत्साहन देना तथा वनों की रक्षा करना। इन कदमों से न केवल कार्बन उत्सर्जन घटाया जा सकता है, बल्कि मिट्टी, जल और जैव विविधता की भी रक्षा होती है। निष्कर्ष भोजन अब केवल पोषण का माध्यम नहीं रहा — यह पृथ्वी के तापमान और मानवता के भविष्य का निर्धारक बन चुका है। यदि हम अपनी खाने की आदतों में थोड़ा परिवर्तन करें — मांस की जगह दालें और सब्ज़ियाँ चुनें, भोजन की बर्बादी रोकें, और स्थानीय व प्राकृतिक खेती का समर्थन करें — तो हम न केवल जलवायु परिवर्तन को धीमा कर सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित, स्वच्छ और संतुलित पृथ्वी छोड़ सकते हैं। और अंत में “भोजन बचाना ही धरती बचाना है — क्योंकि हर थाली में भविष्य की जलवायु छिपी है।”

Tuesday, 7 October 2025

पंचतत्वों में असंतुलन

पंचतत्वों में असंतुलन स्थूल रूप से प्रकृति का सृजन, संचालन, संतुलन आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तत्वों से है। लेकिन लोभ, लालच, तृष्णा, सुख की खोज में अंधा मनुष्य इन्हीं पंच तत्वों में विकृति उत्पन्न कर रहा है। सबसे पहले उसने पृथ्वी तत्व को खोदना प्रारंभ किया। कृषि और खनिजों की खोज यही है। वह खोद-खोदकर पृथ्वी के गर्भ में छिपे रत्नों को बाहर निकलता रहा। पृथ्वी को खोखला करता रहा। आज भी कर रहा है। उसने जल में हानिकारक विषैले अपशिष्ट पदार्थो के निक्षेपण द्वारा जल तत्व को प्रदूषित किया। कार्बनिक ईंधनों का दहन कर पृथ्वी के गर्भ में दबे कार्बन को वायुमंडल में मुक्त कर दिया। इससे वायु तत्व विकृत हुआ। परमाणु सहित विधि शस्त्रास्त्र का निर्माण, बिजली का निर्माण, एलपीजी एवं सीएनजी गैसों को संशाधित करना अग्नि तत्व में विकृति का कार्य कर रहा है। सौर ऊर्जा को नियंत्रित करना अग्नि तत्व की विकृति को और उद्दीप्त करेगा। विगत एक शताब्दी में मनुष्य ने आकाश तत्व को भी हठात विकृत करना प्रारंभ कर दिया है। विज्ञान की अंधी दौड़ में वह जीवन के लिये आवश्यक हर घटक को तहस-नहस कर रहा है। और इसे वह अपनी उपलब्धि मानता है, विकास मानता है। आगामी समय यह अंधी दौड़ रुकने वाली नहीं है। वर्तमान में विश्व की कुल जनसंख्या लगभग 8.1 अरब है। जिसमें 1.64 अरब चार-पहिया गाड़ियाँ हैं यानी प्रति 1000 व्यक्तियों पर 203 कार। वहीँ लगभग 70.6 करोड़ दो-पहिया वाहन हैं। दो-पहिया वाहनों का औसत प्रति 1000 व्यक्ति 87। इसके विपरीत वर्त्तमान में भारत की जनसंख्या लगभग 1.45 अरब है जिसमें 5 करोड़ लोगों के पास चार-पहिया गाड़ियाँ हैं यानी प्रति 1000 व्यक्तियों पर 34 कारें। जबकि लगभग 26 करोड़ लोगों के पास दो-पहिया वाहन हैं। दो-पहिया वाहनों का औसत प्रति 1000 व्यक्ति 178। अगर वैश्विक और भारत के संदर्भ में बढ़ते जनसंख्या के अनुपात में प्रतिवर्ष केवल 1% की दर से वृद्धि माना जाये तो आगामी 25 वर्षों में (सन 2050 तक) विश्व में चार-पहिया गाड़ियों की संख्या 2.49 अरब (254 वाहन प्रति 1000 व्यक्ति), दो-पहिया वाहनों की संख्या 1.07 अरब (109 प्रति 1000 व्यक्ति) जबकि भारत में चार-पहिया गाड़ियों की संख्या 7.17 करोड़ (43 कार प्रति 1000 व्यक्ति), दो-पहिया वाहनों की संख्या 37.3 करोड़ (222 वाहन प्रति 1000 व्यक्ति) हो जाएगी। इन वाहनों को बनाने, इनके चलने योग्य सड़कें बनाने, खनिज तेल खनन एवं प्रसंस्करण आदि को मिलाकर केवल निजी वाहनों से इससे वैश्विक तापन में 0.5℃-1.0℃ की वृद्धि संभावित है जो धरती को खासकर के विषुवत रेखीय प्रदेशों और उपोष्ण प्रदेशों जैसे भारत आदि को और गर्म अनुभव कराने वाला होगा। तापमान में 0.5℃-1.0℃ की वृद्धि अनुभव में 5% सदृश लगेगा। इसका तात्पर्य है गर्मियां और अधिक गर्म होने वाली हैं। संभवतः आगामी वर्षों में भारत के आंतरिक भागों में पारा 55 से 60 के बीच पहुँचने वाला है। इससे दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्य सर्वाधिक प्रभावित होंगे। आने वाले वर्षों में यहाँ गर्मी बढ़ेगी तथा वर्षा की मात्रा कम होगी। इसका अर्थ है कि इन राज्यों में मरुस्थलीकरण में वृद्धि होगी। जबकि तटवर्ती प्रदेशों और राजस्थान आदि में चरम मौसमी घटनाएँ जैसे चक्रवात और अत्यधिक वृष्टि अधिक होंगी। वहीँ पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं में लगभग 60% से 70% वृद्धि हो जाएगी। व्यापक जलवायविक परिवर्तन से फसल चक्र दुष्प्रभावित होगा, फसलोत्पादन घटेगा, जलवायुजन्य और दिनचर्याजन्य अनजानी बीमारियाँ उत्पन्न होंगी। इन सबका व्यापक असर आम आदमी पर पड़ने वाला है। इसके साथ लोगों को पक्के मकान की भी आवश्यकता है। वैश्विक तापन में इसका भी अहम् योगदान होने वाला है। हमको लग रहा है कि हम और हमारा विज्ञान बहुत तरक्की कर रहा है लेकिन हम गर्त में जा रहे हैं। बहुत सम्भावना है कि हम समूची मानवता का विनाश करने जा रहे है। कारण वही है पञ्चतत्वों का असंतुलन। बोनस प्वाइंट *लगे हाथ आपको बता दें कि श्रीमद्देवीभागवत, श्रीमद्भागवत, भविष्य पुराण आदि में लिखा है कि कलिकाल के अंत में 12 सूर्य एक साथ चमकेंगे। मतलब चरम ग्लोबल वार्मिंग की भविष्यवाणी भी हमारे ग्रंथों में है। अभी बता दे रहा हूँ फिर यह मत कहना कि पहले नहीं बताया। भारत के पंडित, पुजारी या पोंगापंथी लोग तब बतातें जब कोई घटना घट जाती है। वे बाद में कहते हैं कि ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा है। पहले ही बता दे रहा हूँ। ऐसा लिखा है। और किसी की माँ ने दूध नहीं पिलाया है कि इसे रोक सके। ग्लोबल वार्मिंग होकर रहेगा। 12 सूर्य एक साथ चमकेंगे।

Monday, 29 September 2025

भारत की सबसे बड़ी समस्या : सामूहिक चेतना का अभाव

भारत एक प्राचीन संस्कृति और सभ्यता वाला राष्ट्र है। यहाँ वेदों, उपनिषदों, गीता और महापुराणों की परंपरा रही है, जिन्होंने मानवता को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे उच्च आदर्श दिए। किंतु दुःखद विडम्बना यह है कि आज भारतीय समाज अपनी जड़ों से कटकर एक ऐसे दौर में प्रवेश कर गया है जहाँ सामूहिक चेतना (Collective Consciousness) का गंभीर अभाव दिखाई देता है। लोग अपने निजी जीवन, व्यक्तिगत लाभ और छोटे-छोटे स्वार्थों तक ही सीमित हो गए हैं। समाज, राष्ट्र और सार्वजनिक हितों के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, सार्वजनिक सम्पत्तियों की दुर्दशा और समाज-विरोधी तत्वों का वर्चस्व बढ़ रहा है। सामूहिक चेतना क्या है? सामूहिक चेतना से तात्पर्य है—समाज के प्रत्येक व्यक्ति का यह बोध कि वह किसी बड़े तंत्र या व्यवस्था का हिस्सा है और उसकी जिम्मेदारी केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के लिए भी है। यह चेतना हमें बताती है कि सार्वजनिक सम्पत्ति मेरी भी है, राष्ट्र की गरिमा मेरी भी जिम्मेदारी है, और कानून-व्यवस्था का पालन केवल मजबूरी नहीं बल्कि मेरा कर्तव्य है।
भारत में सामूहिक चेतना का अभाव – कुछ उदाहरण 1. सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उदासीनता रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, सरकारी स्कूल, अस्पताल और सड़कें – यह सब जनता के टैक्स से निर्मित होती हैं। लेकिन इनकी देखभाल में हममें से बहुत कम लोग रुचि लेते हैं। ट्रेन की सीटों पर नाम लिखना, सरकारी भवनों की दीवारों पर पान-गुटखा थूकना, सड़क पर कचरा फेंकना आम व्यवहार बन गया है। 2. सार्वजनिक मुद्दों पर चुप्पी भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, लापरवाही, नियमों की अनदेखी जैसी समस्याएँ सबको दिखाई देती हैं। लेकिन हममें से अधिकांश लोग इन्हें ‘सिस्टम की समस्या’ कहकर किनारा कर लेते हैं। हम सोचते हैं कि “जब सब ऐसा कर रहे हैं, तो मैं अकेला क्यों आवाज़ उठाऊँ?” 3. व्यक्तिगत स्वार्थ सर्वोपरि ट्रैफिक सिग्नल तोड़ना, सड़क पर गाड़ी गलत दिशा में चलाना, ट्रैफिक नियमों की अवहेलना, लाइन तोड़ना, अवैध काम करवाने के लिए घूस देना – ये सब व्यक्तिगत स्वार्थ के उदाहरण हैं। ऐसे छोटे-छोटे स्वार्थ जब समाज में बढ़ जाते हैं, तो बड़े अपराध और सामाजिक अन्याय को भी जगह मिलती है। 4. दुर्जनों का वर्चस्व जब समाज के सज्जन व्यक्ति चुप रहते हैं और केवल अपने हितों में लगे रहते हैं, तब दुष्ट, शोषक और भ्रष्ट लोग निर्भीक होकर आगे बढ़ते हैं। यही कारण है कि राजनीति और प्रशासन में आज भी अनेक भ्रष्ट व असामाजिक तत्व हावी हो जाते हैं। सामूहिक चेतना के अभाव के कारण 1. औपनिवेशिक मानसिकता अंग्रेज़ों ने भारत को 200 वर्षों तक शोषित किया। उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि सरकार ‘हमारी नहीं’ बल्कि ‘विदेशियों की’ है। स्वतंत्रता के बाद भी यह मानसिकता पूरी तरह नहीं बदली। आज भी लोग मानते हैं कि “सरकारी चीज़ किसी की नहीं होती,” जबकि असलियत यह है कि सरकारी संपत्ति सबसे पहले हमारी अपनी है। 2. शिक्षा व्यवस्था की विफलता हमारी शिक्षा ज्ञान तो देती है, लेकिन चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध नहीं कराती। स्कूल और कॉलेजों में बच्चों को यह सिखाया ही नहीं जाता कि राष्ट्रहित और समाजहित उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। 3. अत्यधिक व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद आधुनिक समय में प्रतिस्पर्धा, आर्थिक लालसा और उपभोक्तावादी संस्कृति ने व्यक्ति को केवल अपने करियर, अपनी कमाई और अपने आराम तक सीमित कर दिया है। “मैं और मेरा परिवार” से बाहर सोचने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ चुकी है। 4. कानून के प्रति उदासीनता भारत में कानून का पालन करने की मानसिकता अभी भी कमजोर है। यहाँ लोग नियमों को तोड़ने को चतुराई और शान का विषय समझते हैं। जब तक सख्त दंड न मिले, तब तक नियमों का पालन नहीं किया जाता। और जितने अधिक सख्त नियम उतना अधिक भ्रष्टाचार। 5. सामाजिक संगठन और नेतृत्व का अभाव पश्चिमी देशों में नागरिक संगठन और लोक-आंदोलन बहुत सक्रिय रहते हैं। वे सरकार को जवाबदेह बनाते हैं। भारत में ऐसी परंपरा बहुत कमजोर है। यहाँ जनता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के लिए संगठित नहीं होती।
सामूहिक चेतना के अभाव के दुष्परिणाम 1. भ्रष्टाचार का प्रसार जब जनता ही रिश्वत देने में संकोच नहीं करती, तब अधिकारी भी निर्भीक होकर रिश्वत लेते हैं और इसे अपना अधिकार समझते हैं। यदि कोई नहीं देना चाहता है तो उसे जबरन देना पड़ता है। समाज चुपचाप इसे स्वीकार करता है, और धीरे-धीरे यह व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। 2. सार्वजनिक सम्पत्ति की दुर्दशा सड़कें गड्ढों से भर जाती हैं, स्कूलों और अस्पतालों की हालत जर्जर हो जाती है, रेल की बोगियाँ गंदी रहती हैं – क्योंकि जनता इन्हें अपना नहीं मानती और सरकार भी जानती है कि जनता सवाल नहीं पूछेगी। 3. सामाजिक असमानता और शोषण जब सामूहिक चेतना कमजोर होती है, तो गरीब और कमजोर वर्गों का शोषण बढ़ता है। समाज के ताकतवर लोग नियमों को अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं। 4. राष्ट्रीय प्रगति में बाधा सामूहिक चेतना की कमी के कारण प्रतिभा और संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। कोई भी देश तभी आगे बढ़ सकता है जब उसकी जनता मिलकर काम करे। लेकिन भारत में हम व्यक्तिगत लाभ के लिए मिलकर राष्ट्रीय हित की अनदेखी कर देते हैं। 5. नैतिक पतन जब लोग केवल अपने बारे में सोचते हैं, तो सत्य, ईमानदारी, करुणा और सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्य खो जाते हैं। यह समाज को भीतर से खोखला बना देता है। समाधान : सामूहिक चेतना कैसे विकसित हो? 1. शिक्षा में सुधार शिक्षा केवल अंकों और डिग्रियों तक सीमित न हो। इसमें नैतिक शिक्षा, सामाजिक जिम्मेदारी और नागरिक कर्तव्यों का बोध कराया जाए। बच्चों को छोटी उम्र से ही यह सिखाना होगा कि सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना उनका कर्तव्य है। 2. धर्मनीति का पालन धर्म हमें न केवल ईश्वर से जोड़ता है बल्कि यह हमें नैसर्गिक रूप से सचरित्र और नीतिवान बनाता है। समाज में धर्म का अभाव घोर दुश्वृतियों को जन्म देता है। 3. सामाजिक आंदोलन और संगठन हमें ऐसे नागरिक संगठनों को बढ़ावा देना होगा जो सार्वजनिक मुद्दों पर आवाज़ उठाएँ। जब जनता संगठित होकर प्रश्न पूछेगी, तभी व्यवस्था बदलेगी। 4. सख्त कानून और अनुशासन नियम तोड़ने वालों के प्रति सख्त कार्रवाई जरूरी है। जब तक लोग कानून का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक सामूहिक चेतना मजबूत नहीं हो सकती। 5. मीडिया और जनजागरूकता मीडिया का दायित्व है कि वह जनता को जागरूक करे। टीवी, रेडियो, अख़बार और सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश बार-बार दिया जाना चाहिए कि राष्ट्रहित व्यक्तिगत हित से बड़ा है। 6. सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की ओर लौटना भारतीय संस्कृति हमेशा से सामूहिकता पर आधारित रही है। “एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसे आदर्श फिर से जनमानस में स्थापित करने होंगे। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी हमें यह समझना होगा कि हम सब एक ही ब्रह्म के अंश हैं। 7. व्यक्तिगत पहल परिवर्तन की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर से करनी होगी। यदि हम स्वयं नियमों का पालन करेंगे, कचरा सही स्थान पर डालेंगे, रिश्वत नहीं देंगे, सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करेंगे और दूसरों को प्रेरित करेंगे, तभी सामूहिक चेतना जागृत होगी। निष्कर्ष भारत की सबसे बड़ी समस्या गरीबी, बेरोजगारी या भ्रष्टाचार नहीं है। इन सबकी जड़ में है – सामूहिक चेतना का अभाव। जब तक हम केवल अपने छोटे-छोटे स्वार्थों तक सीमित रहेंगे, तब तक समाज और राष्ट्र की समस्याएँ बढ़ती रहेंगी। हमें यह समझना होगा कि “मैं” और “हम” के बीच की खाई को पाटे बिना सच्ची प्रगति संभव नहीं। यदि प्रत्येक भारतीय यह संकल्प ले कि वह समाज और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखेगा, तो भारत फिर से विश्वगुरु बन सकता है। लेकिन इसके लिए हमें अपने भीतर सोई हुई सामूहिक चेतना को जगाना होगा। यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

Tuesday, 16 September 2025

छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति

वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे (10 सितम्बर) के आलोक में 10 सितम्बर 2025 से लेकर 16 सितम्बर 2025 तक छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति की रोकने, उन्हें जागरूक करने तथा सरकार द्वारा उठाये जा रहे विभिन्न कदमों की जानकारी देने के उद्देश्य कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. इसी क्रम में आज हमारे विद्यालय पं. दी. द. उपा. राजकीय इन्टर कॉलेज तेन्दुआकाजी दोस्तपुर सुलतानपुर में भी जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम की तैयारी के दौरान कई चौंका देने वाले तथ्य सामने आये. जैसे कला एवं मानविकी वर्ग के विद्यार्थियों की तुलना में विज्ञान और गणित खासकर आई आई टी और मेडिकल पृष्टभूमि वाले छात्र अधिक आत्महत्या करते हैं. Suicide Trends Among Indian Institutes of Technology Joint Entrance Examination (IIT JEE) and National Eligibility cum Entrance Test (NEET) Aspirants: A Comparative Study of Demographic and Situational Factors Devesh Gupta 1, Rajesh Ranjan 2, Meenakshi Singh 3, Chandan Kumar 4, Abhinav Kumar 5, Bhawna Kathuria 2, Tripti Srivastava 6 (DOI: 10.7759/cureus.85812) और विभिन्न मिडिया सर्वेक्षणों जिसमें विश्वविद्यालय स्तर के कला, विज्ञान एवं वाणिज्य विषय के 8542 छात्र शामिल हैं (2018 से 2023 के मध्य) में से 18 प्रतिशत छात्रों के मन में आत्महत्या का विचार आया जबकि इसी दौरान 6 प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या की योजना बनाया व प्रयास किया. इसमें से केवल 7.6% छात्रों ने आत्महत्या किया. इसी समयांतराल में NEET, IIT-JEE आदि की तैयारी कर रहे, या इंजीनियरिंग व मेडिकल आदि की पढाई कर रहे 34% छात्रों के मन में आत्महत्या का विचार आया और 26% प्रतिशत ने आत्महत्या की योजना बनाया व प्रयास किया. सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें से 73% से अधिक NEET व मेडिकल छात्र तथा 75% से अधिक IIT-JEE व इंजीनियरिंग छात्रों ने आत्महत्या कर लिया. ये वे बच्चे हैं जिन्होंने घर, मुहल्ला, स्कूल, जिला, प्रदेश आदि टॉप किया है. ये मेधावी हैं. निस्संदेह यह हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारी परवरिश, हमारे सामाजिक ताने-बाने की विफलता है. इसके पीछे पढाई, प्रतियोगिता और असफलता का तनाव, माता-पिता के उम्मीदों पर खरा न उतरने का दबाव, आर्थिक दबाव, सामाजिक ताने और फब्तियां उत्तरदायी हैं. लेकिन इसके पीछे जो मैं सबसे बड़ा कारण देख रहा हूँ वह है – भौतिकतावाद. आखिर क्यों यह सब एक बच्चे के मनोमष्तिक पर हाबी हो जाता है? क्योंकि उसे चाहिए लग्जरी जीवन, बड़ा सा घर, महंगी गाड़ी, लाखों-करोड़ों का पैकेज, उसे नहीं चाहिए तो माता-पिता को चाहिए, समाज को दिखाना है कि हम किसी से कम नहीं हैं. चूँकि प्रतियोगिता अधिक है, जब वह तनाव नहीं झेल पाता तब उसके सामने एक विकल्प दिखता है “मौत”. हर चीज से छुटकारा. वहीँ कला, मानविकी आदि विषयों के छात्र पहले से ही निरीह जैसे होते हैं. खुद को कमजोर मानते हैं. अतः इन पर माता-पिता या समाज का भी बहुत दबाव नहीं रहता है. हाईस्कूल, इंटर, बीए आदि कर लिए तो कर लिए नहीं तो अपना धंधा खोल लिया या दिल्ली-मुंबई-सूरत,लुधियाना आदि चले गये. 10 रुपया कमा रहें हैं 5 खा रहे हैं 5 घर-परिवार को दे रहे हैं. जबकि विज्ञान, गणित, NEET व मेडिकल, IIT-JEE व इंजीनियरिंग के छात्र यह सहूलियत नहीं पाते. फलतः बहुत सारी मासूम जिंदगियां उड़ान भरने से पहले ही दम तोड़ देती हैं. ऐसे में सामाजिक, पारिवारिक, विद्यालयी, सरकारी आदि पहलों के मैं जिस जगह ज्यादा सम्भावना देखता हूँ वह है धर्म, आध्यात्म, योग, ध्यान आदि. इन मेधावी बच्चों को अपने सपनों को परवान देने के साथ भौतिकतावाद के साथ भारतीयता का पुट रखना चाहिए. विज्ञान, गणित की पढाई अपनी जगह है और जीवन अपनी जगह. जीवन पहली प्राथमिकता है. अपने जीवन को बचाने के लिए थोडा सा ढोंगी, पाखंडी, पुरातनपंथी भी हो जाना चाहिए.  
डॉ. विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी प्रवक्ता भूगोल जी आई सी तेन्दुआकाजी दोस्तपुर सुलतानपुर

Wednesday, 10 September 2025

वेद, कुरआन एवं बाइबल

मनुस्मृति पढ़ते समय वेद की बात आयी तो उस समय मन में भाव आया कि वेद किसे कहते हैं। समाधान मिला कि "वेद" शब्द धातु "विद्" (विद् ज्ञाने) से बना है। धातु : विद् (अर्थ = जानना, समझना, ज्ञान प्राप्त करना) प्रत्यय : “घञ्” (ल्युट्) → यह प्रत्यय धातु से भाववाचक संज्ञा बनाता है। परिणाम : विद् + घञ् = वेद इसलिए व्याकरण के अनुसार “वेद” का अर्थ है – ज्ञान। “वेद” शब्द के अन्य कई अर्थ हैं : 1. ज्ञान– मूल अर्थ है “वह जो ज्ञान है, या जिसके द्वारा ज्ञान होता है।” 2. श्रुति शास्त्र – चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद)। 3. प्रमाण / धर्मज्ञान– धर्म का मूल आधार। 4. तत्त्वज्ञान– आत्मा, ब्रह्म और सृष्टि का ज्ञान। 5. निरुक्त वाक्य “वेदो नाम धर्मज्ञानम्” – वेद का अर्थ है धर्म का ज्ञान। “यतो वेदः स वेदः” – जिसके द्वारा ज्ञान होता है, वही वेद है। मनुस्मृति कहती है कि सृष्टि के प्रारंभ से भी पहले वेद यानि ज्ञान प्रकट हुआ। अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्‌ध्यर्थमृग्यजुःसाम लक्षणम्॥25॥ इसके उपरान्त उस परमेश्वर ने यज्ञ की सिद्धि के लिए तीन देवों-अग्नि, वायु और सूर्य को क्रमशः ब्रह्ममय और सनातन तीनों वेद-ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को दोहा, अर्थात् प्रकट किया। टिप्पणी (1) प्रारम्भ में वेद एक ही था। उसके दोहन से तीन वेद हुए। कालान्तर में इन तीनों वेदों के अभिचार तथा अनुष्ठानपरक कुछ मन्त्रों को पृथक् करके अथर्व अथवा अथर्वणवेद नाम से चतुर्थ वेद अस्तित्व में आया। इस चतुर्थ वेद के सम्पादक महर्षि अंगिरा थे और वे ही कदाचित अभिचार विद्या के भी पुरोहित थे। अतः जहां अभिचार के लिए 'अंगिरस' शब्द का प्रयोग चल पड़ा, वहां 'अथर्वणवेद' का भी एक दूसरा नाम 'अंगिरस वेद' प्रचलित हो गया। फिर मन में यह भाव आया कि कुरआन और बाइबल का क्या अर्थ है तो पता चला- कुरआन का अरबी व्युत्पत्ति (Etymology in Arabic) परक अर्थ मूल शब्द है : قَرَأَ (qara’a)→ अर्थ : "पढ़ना, तिलावत करना, उच्चारण करना।" इससे बना संज्ञा रूप : قُرْآن (Qur’ān) → अर्थ : “पाठ, तिलावत, पाठ्यग्रंथ।” इसलिए “कुरआन” का शाब्दिक अर्थ है "पढ़ा जाने वाला" या "पाठ।" Bible का व्युत्पत्ति (Etymology) परक अर्थ "Bible" शब्द यूनानी (Greek) भाषा से आया है। मूल ग्रीक शब्द : **βιβλία (biblia)** → अर्थ: "पुस्तकें" (Books) यह शब्द βίβλος (biblos) से बना है, जिसका अर्थ है पपीरस की पुस्तक (Papyrus plant से बना लेखन सामग्री)। लैटिन में यह "Biblia" हुआ और फिर अंग्रेज़ी में "Bible" डाॅ. विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी प्रवक्ता भूगोल जी आई सी दोस्तपुर सुलतानपुर

Sunday, 31 August 2025

विज्ञान की महिमा और महानता

विज्ञान की महिमा और महानता विज्ञान की महिमा और महानता जगजाहिर है। हवा दूषित है। क्यों? पानी दूषित है। क्यों? भूमि दूषित है। क्यों? भोजन दूषित है। क्यों? नित नई बीमारियाँ (औद्योगिक रसायन, रेडिएशन और प्रदूषण से कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, एलर्जी) पैदा हो रही हैं। क्यों? एंटीबायोटिक रेज़िस्टेन्स बढ़ रहा है। क्यों? मानसिक रोग (तकनीकी दबाव, सोशल मीडिया, तनाव और अवसाद की दर) बढ़ रहे हैं। क्यों? मोटापा और जीवनशैली रोग से पूरी दुनिया कराह रही है। क्यों? पालीथीन और प्लास्टिक धरती के सीने पर अमरबेल की तरह फैल रहे हैं। हजारों सालों के लिये। न नष्ट होने के लिये। क्यों? ई-बेस्ट जमीन, पानी, अंतरिक्ष हर जगह तहलका मचा रहे हैं। क्यों? आये दिन पहाड़ों पर ध्वंसकारी घटनाएं हो रही हैं। सैकड़ों लोग मर रहे हैं। हजारों घायल व लापता हो रहे हैं। अरबों का नुकसान हो रहा है। क्यों? करोड़ों की संख्या में हर साल पेड़ कट रहे हैं। क्यों? खनिजों के लिये धरती का सीना चीर का खोखला किया जा रहा है। जिससे भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। क्यों? संसार जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन की भट्टी में झुलसने को अभिशप्त है। क्यों? ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है। क्यों? वर्षा का प्रतिरूप बदल रहा है। मौसम का मिजाज़ बदल रहा है। क्यों? परमाणु हथियार, जैविक हथियार, डेटा हथियार आदि का भय व्याप्त है। क्यों? मानव की निजी जानकारी के लीक होने, दुरूपयोग होने, गोपनीयता का संकट है। क्यों? नशा (Addiction) – मोबाइल, इंटरनेट और गेमिंग पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती जा रही है। क्यों? साइबर क्राइम – हैकिंग, फ्रॉड और ऑनलाइन धोखाधड़ी तेजी से बढ़ा है। क्यों? डीपफेक टेक्नोलॉजी (गलत वीडियो और आवाज़ें बनाकर धोखाधड़ी व अपराध) का खतरा हर किसी के ऊपर मंडरा रहा है। क्यों? फेक न्यूज़ और गलत सूचना की भरमार हो रही है। क्यों? कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का खतरा बढ़ रहा है। मशीनों के निर्णय से नैतिक संकट, मानव स्वतंत्रता के ह्रास की सम्भावना बढ़ रही है। क्यों? क्लोनिंग और जेनेटिक इंजीनियरिंग के दुरूपयोग की पूरी सम्भावना है। क्यों? मानव संबंधों में दूरी, सामाजिक संवाद कम हो रहा है। क्यों? सामाजिक, पारिवारिक रूप से मनुष्य टूट रहा है। क्यों? मनुष्य व्यक्तिवाद और अकेलेपन का शिकार हो रहा है। क्यों? जनसंख्या बेतहाशा बढ़ती जा रही है। क्यों? लोगों की उपभोगवृत्ति बदल रही है। जरूरत से ज्यादा उत्पादन और खपत हो रहा है। क्यों? मानव का प्रकृति से अलगाव हो रहा है। वैज्ञानिक जीवनशैली ने प्राकृतिक जीवन को पीछे छोड़ दिया है। क्यों? फास्ट फूड और प्रोसेस्ड फूड का सेवन बढ़ा है जिससे लोगों में मोटापा, हृदय रोग और डायबिटीज़ का प्रसार हुआ है। क्यों? जीएम खाद्य पदार्थ (GM Crops) व इनके दीर्घकालिक प्रभाव अज्ञात, स्वास्थ्य और पर्यावरण संकट बना हुआ है। क्यों? प्राकृतिक संसाधनों की कमी हो रही है। पानी, ऊर्जा और भूमि पर दबाव बढ़ रहा है। क्यों? प्रयोगशाला में वायरस का निर्माण किया जा सकता है। क्यों? जैविक युद्ध और वैश्विक महामारी की आशंका है। क्यों? अंतरिक्ष कचरा (Space Debris) से पूरा आसमान भरा पड़ा है जिसके दिनोंदिन और भी बढ़ते जाने की सम्भावना है। क्यों? इसकी पूरी संभवना है कि मनुष्य को बचाने के लिए मनुष्य अगला विश्वयुद्ध पृथ्वी पर न लड़कर अन्तरिक्ष में लड़ेगा। इससे पूरे आकाशगंगा या कम से कम सौरमंडल के तंत्र में असंतुलन हो सकता है। क्यों? इन सबका एक उत्तर है "विज्ञान"। बन्दर के हाथ में उस्तरा देने का परिणाम है। जाहिर है अब हर कोई मेडिकल साइंस की उपलब्धियों का राग अलापेगा। क्योंकि प्रकट रूप से यही ज्यादा दिखता है। एक अनपढ़ आदमी भी बुखार से पीड़ित होने पर पैरासीटामाल खा कर आराम महसूस करता है। तो वह भी विज्ञान के चमत्कार को समझ सकता है। दूसरा उदाहरण लोगों की रफ़्तार भारी जिन्दगी का दिया जायेगा। आदमी कहाँ से कहाँ से पहुँच गया? आइये सबसे पहले मेडिकल साइंस की उपलब्धियों की पड़ताल करते हैं। क्या सचमुच में मेडिकल साइंस ने हमें वही दिया है जो दिखता है या दिखाया जाता है? आखिर मेडिकल साइंस ने हमें क्या दिया है? 1- हर व्यक्ति को दवा विज्ञानवादियों का दावा है कि अब हर किसी को दवा आसानी से उपलब्ध है। मेरा प्रश्न है कि हर किसी को दवा देना ही क्यों? उसे दीजिए साफ हवा, साफ पानी, साफ और साफ भोजन। 99 प्रतिशत दशाओं में वह स्वस्थ रहेगा। जो 1 प्रतिशत नहीं स्वस्थ हो पा रहे हैं। दरअसल वह स्वस्थ होने के लिये बने ही नहीं है। 2- हर मर्ज की दवा एक तर्क यह हो सकता है कि मेडिकल साइंस ने हर मर्ज की दवा ढूढ़ लिया है। क्या सच में? आइये देखते हैं- 1. जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ (Lifestyle Diseases) जैसे डायबिटीज़ (Type-1, Type-2), हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉल/ट्राइग्लिसराइड, फैटी लिवर (NAFLD) का आधुनिक मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं है, केवल दवा से रोग को दबाया जा सकता है। 2. इसी प्रकार श्वसन रोगों (respiratory diseases) जैसे अस्थमा, क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस, COPD (Chronic Obstructive Pulmonary Disease), एलर्जिक राइनाइटिस, नींद में सांस रुकना आदि का भी आधुनिक मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं है। 3. त्वचा और प्रतिरक्षा रोगों (Skin & Autoimmune Diseases) जैसे सोरायसिस, विटिलिगो (सफेद दाग), एक्ज़िमा (Chronic Eczema), ल्यूपस (SLE – Systemic Lupus Erythematosus), रूमेटाइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis), ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis), गाउट (Gout – दवा से कंट्रोल, पर जड़ से इलाज नहीं) आदि का भी इन विज्ञानवादियों के कोई विशिष्ट इलाज उपलब्ध नहीं है। 4. तंत्रिका एवं मानसिक रोग (Neurological & Psychiatric Diseases) जैसे माइग्रेन (Migraine), अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s disease), पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease), मिर्गी (Epilepsy – lifelong medicines, complete cure rare), मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS), ऑटिज़्म (Autism spectrum disorder), स्किज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia), बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar disorder), डिप्रेशन (कई बार lifelong therapy की ज़रूरत होती है) आदि का भी स्थायी इलाज नहीं है। 5. पाचन एवं मेटाबॉलिक रोग (Digestive & Metabolic Diseases) जैसे - क्रॉनिक गैस्ट्राइटिस / एसिडिटी, इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS), अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative colitis), क्रोहन डिज़ीज़ (Crohn’s disease), पाइल्स (बार-बार हो सकता है, सर्जरी के बाद भी), फैटी लिवर / लिवर सिरोसिस भी अभी लाइलाज हैं। 6. गुर्दा और हृदय रोग (Kidney & Heart Diseases) जैसे - क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD), नेफ्रोटिक सिंड्रोम (Nephrotic syndrome), हार्ट फेल्योर (Heart failure – lifelong management, cure नहीं), कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ (CAD – स्टेंट/बायपास से सुधार) आदि का स्थायी इलाज संभव नहीं है। 7. वायरल बीमारियाँ (Viral Diseases) जैसे - HIV/AIDS, हर्पीज़ (Herpes simplex virus), हेपेटाइटिस-B, कॉमन कोल्ड (Common Cold – अब तक कोई स्थायी दवा नहीं), चिकनपॉक्स/शिंगल्स (Varicella zoster virus latent रहता है) आदि का स्थायी इलाज संभव नहीं है। 8. इसी प्रकार कुछ अन्य अन्य आम बीमारियाँ (Other Common Diseases) जैसे - थायरॉयड रोग (Hypothyroidism / Hyperthyroidism), एनीमिया (कुछ प्रकार – जैसे Thalassemia, Sickle cell anemia), क्रॉनिक बैक पेन / सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, बांझपन (Infertility – कुछ केसों में), बाल झड़ना / गंजापन (Alopecia – स्थायी इलाज नहीं), दाँतों की बीमारियाँ (Pyorrhea, Gum disease – बार-बार लौट आती हैं) आदि का स्थायी इलाज संभव नहीं है। यहाँ लगभग 45 रोगों को बताया गया जिसका आधुनिक मेडिकल साइंस के पास कोई इलाज नहीं है सिवाय रोग को टालने के। अगर ढूढ़ा जाये तो और भी मिलेंगे। तो घमंड किस बात का है भाई? 3- कुछ लोग कह सकते हैं कि उपर्युक्त रोगों के रोगी ही कितने हैं? तो आप की खास जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया भर में लगभग 40% लोग (≈ 3.4 अरब लोग) मस्तिष्क-सम्बंधित रोगों जैसे एल्ज़ाइमर, स्ट्रोक, माइग्रेन आदि से प्रभावित हैं। 2022 तक दुनिया में 83 करोड़ लोग डायबिटीज से प्रभावित हैं, जो वयस्क आबादी का लगभग 1/7 (≈14%) हिस्सा है। 2021 में दुनिया में 55 मिलियन लोग डिमेंशिया से ग्रस्त थे। कुल जनसंख्या में इसका प्रतिशत कम दिखाई देता है (~0.7% वैश्विक स्तर पर), लेकिन 65+ आयु वालों में यह लगभग 7% है। अनुमान है कि दुनिया की 2/3 आबादी (≈ 4 अरब लोग) हर्पीज़ वायरस से संक्रमित हैं, हालांकि यह कई बार लक्षणहीन रहता है। लगभग 3.67 करोड़ लोग HIV/AIDS से ग्रस्त हैं। 213 मिलियन लोग (~2.7% वैश्विक जनसंख्या) COPD (जीर्ण श्वसन रोग) से ग्रस्त हैं। 67.3 करोड़ लोग, ~= 8.5% वैश्विक जनसंख्या क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD) से पीड़ित हैं। ~300 मिलियन लोग, लगभग 4.4% वैश्विक जनसंख्या अवसाद (Depression) से ग्रस्त है। वयस्कों का ≈43%, यानी लगभग 2.5 अरब लोग अस्वस्थ वज़न (Overweight) से ग्रस्त हैं। Hypertension (उच्च रक्तचाप) से लगभग 1.28 अरब वयस्क प्रभावित (~33%) है। यह तो कुछ रोगों के रोगियों की बानगी भर है। दुनिया की कुल आबादी 8 अरब से अधिक है। और उपर्युक्त डेटा के अनुसार 13.9 अरब लोग रोगी हैं। जितनी आबादी है उससे अधिक आबादी किसी न किसी रोग से ग्रस्त है। किसी को एक किसी को दो किसी को चार-छह रोग घेरे हैं। शायद ही कोई महापुरुष इस धरती पर हो जिसे कोई रोग न हो। भाई जब सभी रोगी ही हैं तो इलाज किसका हो रहा है? स्वस्थ कौन है? और यह झांसा किसे दे रहे हैं? कि आधुनिक मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर लिया है। फलाफला रोगों का इलाज हो रहा है। 4- आधुनिक मेडिकल साइंस की तरक्की का एक नमूना मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी के रूप में पेश किया जाता है। निश्चय ही दर में कमी आयी है। लेकिन जो कमी आयी है उससे जो संसाधनों और पृथ्वी पर जनसंख्या दबाव बढ़ा है उसका क्या? 2021 में वैश्विक स्तर पर करीब 2.6 लाख माताओं की मृत्यु प्रसव के दौरान या उसके कुछ समय बाद हुई है वहीँ 49 लाख शिशुओं की मृत्यु हुई है। जबकि 1901 में दस लाख माताओं की मृत्यु हुई थी वहीँ लगभग 3.9 करोड़ शिशुओं की मृत्यु हुई। एक अनुमान के आधार पर 1901 में लोगों का काम आधी धरती (0.50) में चल सकता था जबकि 1961 में यह आवश्यकता 0.75 पृथ्वी हो गयी। 2021 में अब लोगों को अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु 1.75 पृथ्वी चाहिए। अनुमान है कि वर्तमान जनसंख्या वृद्धिदर और उपभोग वृत्ति के अनुसार 2051 में हमें 2 पृथ्वी की जरुरत है। वहीँ सन 2100 में 3 पृथ्वी की जरूरत होगी। यह आधुनिक विज्ञान कहाँ से लायेगा 3 पृथ्वी? 5- दूसरी जो चीज विज्ञान की शानदार उपलब्धि के रूप में गिनाया जाता है वह है मनुष्य की तेज रफ़्तार जिन्दगी। जैसे जहाँ लोग पहले दिनों में पहुँचते हैं वहीँ अब घंटों में। जहाँ घंटों में पहुँचते थे अब मिनटों में। मेरा मूल प्रश्न फिर वही है कि कीमत क्या है? अख़बार पलटिये रोज दो-चार एक्सीडेंट की खबर होती है। भयानक ख़बरें जैसे मरने और गंभीर रूप से घायल होने वाली ही अख़बार में जगह बना पति हैं। सामान्य लड़ने-भिड़ने की ख़बरों का पता भी नहीं चलता। 2021 में सड़क दुर्घटनाओं में विश्व में 11.9 लाख लोग मारे गये। भारत में 2023 में 1.74 लोग मारे गये। मतलब प्रतिदिन 474 मौतें और हर 3 मिनट में एक मौत। इन मारे गये 60 प्रतिशत 10-25 आयु वर्ग वाले युवाओं का है। 6- इसके साथ ही वाहन चलाने से मस्कुलो-स्केलेटल समस्याएँ (पीठ, गर्दन और कंधे में दर्द (long sitting posture, vibrations), आंखों की थकान, मानसिक तनाव (ट्रैफिक जाम, हॉर्न, प्रदूषण और दुर्घटना का डर), हृदय रोग का खतरा (लगातार बैठे रहने से हाई BP, मोटापा, कोलेस्ट्रॉल बढ़ना) प्रदूषण जनित रोग (फेफड़ों पर असर, अस्थमा/ब्रॉन्काइटिस का खतरा) होने की भी सम्भावना रहती है। 7- परिवहन से तीसरा खतरा प्रदूषण का है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 16% है। यह 8.4 गीगाटन सीओ2 का उत्सर्जन करता है। शहरी क्षेत्रों में, सड़क-वाहन 50–90% एयर पॉल्यूशन के उत्तरदायी होते हैं। वाहन उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा non-exhaust (गैस के अलावा) पार्टिकुलेट मैटर (PM) जैसे टायर, ब्रेक, रोड़ स्लाइड आदि का है। यह कुछ स्थानों पर 60–73% तक भाग होता है। 8- विज्ञान की तीसरी उपलब्धि के रूप कम्प्यूटर, मोबाईल आदि क्रांतियों की चर्चा की जाती है। जाहिर है पहला आक्षेप मुझ पर ही होगा कि आपने इसे मोबाइल या कंप्यूटर पर ही लिखा होगा। नहीं लिखना था। आदि। अभियोग स्वीकार है। लेकिन फिर वही प्रश्न कीमत क्या है? 1. पर्यावरणीय समस्याएँ कम्प्यूटर, मोबाईल के उपयोग से E-waste (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) उत्पन्न होता है। पुराने मोबाइल, कंप्यूटर और उपकरणों का निपटान न होने से भारी धातुएँ (lead, mercury, cadmium) मिट्टी और पानी को प्रदूषित करती हैं। भारत दुनिया में e-waste उत्पादन में तीसरे स्थान पर है। इंटरनेट सर्वर, डेटा सेंटर और डिवाइस चार्जिंग से भारी बिजली की खपत होती है। यह अप्रत्यक्ष रूप से कार्बन उत्सर्जन बढ़ाती है। मोबाइल टावर और डिवाइस लगातार electromagnetic field (EMF) पैदा करते हैं। इसका लंबी अवधि में जैव विविधता (विशेषकर मधुमक्खियों और पक्षियों) पर असर देखा गया है। 2. स्वास्थ्य समस्याएँ कम्प्यूटर, मोबाईल के उपयोग से आंखों की समस्या (Computer Vision Syndrome) जैसे जलन, धुंधलापन, सूखापन, मांसपेशियों और हड्डियों की समस्या जैसे गर्दन दर्द, पीठ दर्द, “Text neck syndrome”, मानसिक स्वास्थ्य तनाव, नींद की कमी, कार्य थकान होता है। इन इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के उपयोग से रेडिएशन प्रभाव उत्पन्न होता है जिससे मस्तिष्क पर असर, नींद की गड़बड़ी आदि समस्याएं देखी जाती हैं। यह उपकरण एक तरीके से लत (Addiction) का भी कार्य करते हैं। इससे चिंता, अवसाद, “Nomophobia” (फोन न होने पर डर)। इनके लगातार उपयोग से शारीरिक समस्याएँ जैसे उंगलियों में दर्द (Texting thumb), गर्दन दर्द आदि हो सकता है जो आगे चलकर सर्वकाइल के रूप में बदल सकता है। अंत में वही प्रश्न है कि हम अपना समय बचाकर कर क्या रहे हैं? कीमत क्या चुका रहे हैं? स्वस्थ होने के लिए बीमार क्नयों हो रहे हैं? विज्ञान हमारे लिए, हमारे समाज के लिए बहुत जरुरी है लेकिन क्या हम उसे प्राप्त कर पा रहे हैं? और सबसे बड़ा प्रश्न भविष्य क्या है? हम क्या बनने जा रहे हैं? मानव से मशीन? डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी

Sunday, 20 July 2025

धर्म क्यों जरूरी है?

धर्म क्यों जरूरी है? पहले ससुराल वाले मिलकर पत्नी/बहू/भाभी आदि को जला देते थे, मार डालते थे। यह लालच और लोभ की लड़ाई थी। इस कहानी में प्रायः पति निर्दोष ही होता था। बेचारा होता था। असली खलनायक प्रायः सास, ननद या कभी-कभी ससुर और जेठ हुआ करते थे। कहावत चलती थी कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु है। समय बदला किस्सा बदला। आजकल खबरों में पति-पत्नी के मध्य द्वंद्व के कई सारे किस्से हैं। एक में पत्नी पति को काटकर नीले ड्रम में भर देती है और सीमेंट से ढक देती है। एक कहानी में पत्नी हनीमून पर जाकर अपने प्रेमी संग मिलकर पति को मार देती है। एक कहानी में लगभग 10 साल पुराने संबंध को एक पत्नी श्रद्धांजलि दे देती है। एक कहानी मेरे मित्र की है। पत्नी उससे विवाह ही इसलिए करती है ताकि बाद में उसे दहेज आदि के मामले में फंसाया जा सके। एक कहानी मेरे एक और मित्र की है। उसमें पिता और बेटियों का काम ही यही है कि विवाह करके पति को फंसाओ और फिर पैसा बनाओ। कुछ कहानी मेरे भुक्तभोगी मित्र ने सुनाया। उनकी एक कहानी में पत्नी विवाह के बाद अपने प्रेमी संग जाने की जिद करती है। सब राजी भी हो जाते हैं। लेकिन प्रेमी अपनाने से मना कर देता है। पत्नी फिर पति के पास जाना चाहती है लेकिन इस बार पति मना कर देता है। उन्होंने ही एक कहानी और बताया। शादी हल्दी से पहले ही टूट जाती है। कारण वही प्रेमी-प्रेमिका। ऐसे सैकड़ों नहीं लाखों-करोड़ों किस्से होंगे। कुछ जगजाहिर कुछ अभी भी दबे हुए। क्या हो गया है आजकल लोगों? यही प्रश्न होगा न? नहीं अतीत में भी ऐसी कहानियां घटित हुई होंगी। यह कोई नई कहानियां नहीं हैं। लेकिन इन कहानियों को पाप की दृष्टि से देखा जाता रहा है। इसे धर्म का लोप माना जाता है। धर्म क्यों? धर्म का कार्य है लोगों को जीवन दृष्टि प्रदान करना, जीवन जीने का सही मार्ग दिखाना, सिखाना। इसे भगवान व धार्मिक कथाओं के माध्यम से लोगों के मध्य स्थापित किया गया है। भगवान और नरक का भय लोगों को अनीति, अनाचार, पापाचार करने से रोकता है। सदवृत्ति पर जोर देने का तात्पर्य यह है कि लोग ईश्वर को डर के कारण नहीं प्रेम के कारण भजें। पुराण, महाभारत, रामायण आदि में कहानियों के माध्यम से लोगों को धर्म और नीति का प्रयोगात्मक पहलू समझाया गया है। यह ग्रंथ धर्म और नीति के केस स्टडी हैं। इन्हें पढ़ने से जीवन दृष्टि मिलती है। लेकिन आज तो आदमी तरक्की कर गया। उसे पता चल गया कि चंद्रमा एक देवता नहीं है, बल्कि पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उपग्रह है। उसे पता चल गया है कि धरती माँ नहीं एक ग्रह है। उसे पता चल गया है कि यह ब्रह्माण्ड किसी शेषनाग ने नहीं बल्कि गुरुत्वाकर्षण ने धारण किया है। आज आदमी पक्षियों से तेज उड़ सकता है, मछली से तेज तैर सकता है, घोड़े से तेज दौड़ सकता है। आज आदमी स्वयं आकाशवाणी कर सकता है। आज दो दिन पहले मौसम की झूठी-सच्ची भविष्यवाणियां हो सकती हैं। आज हम मोबाइल हाथ में लेकर दुनिया को मुट्ठी में कर सकते हैं। आज हम चैट जीपीटी, ए आई तकनीक आदि के कारण झूठ को सच व सच को झूठ में बदल सकते हैं। हमारे खाने-पीने का तरीका, सलीका, जायका सब आधुनिक हो गया है। आज हम वर्षों का काम घंटों या मिनटों में कर लेते हैं। मनोजवं मारुततुल्य वेगं, बुद्धिमतां वरिष्ठं हो गये हैं। इतनी तरक्की, इतना उत्थान, इतना विकास, इतना धन, ऐसे में धर्म का क्या काम? भगवान का क्या काम? धार्मिक कथाओं का क्या काम? इसे कहने-सुनने वाले पोंगापंथी, ढोंगी, ब्राह्मणों, पंडितों का क्या काम? और यह भी तो उसी भौतिकतावाद और आधुनिकीकरण के वशीभूत हो गये हैं। इनका भी तो प्रभाव क्षीण से क्षीणतम हो रहा है। तो याद रखना, अभी तो कहानी शुरू भी नहीं हुई है। आरंभ है प्रचंड है। अभी आगाज है तेरा अभी अंजाम बाकी है। यदि समाज से ईश्वर, धर्म, नीति, सदाचार का लोप होगा तो अभी इतना सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक आर्थिक, विघटन, अनाचार, कदाचार, भ्रष्टाचार, पतन देखना पड़ेगा कि रूह कांप जायेगी। अभी इससे भी जघन्यतम और वीभत्स दौर देखना बाकी है। और याद रखना इसे कोई विज्ञान, कोई संविधान, कोई कानून, कोई सरकार, कोई प्रशासन, कोई सत्ता नहीं रोक सकती, सिवाय धर्म और बिजूका (हमारे यहाँ इसे वूढ़ कहते हैं) ईश्वर के। समाज, परिवार, देश, संबंध, प्रेम को बांधे रखने के लिए जिंदा रखने के लिए अधिकार बोध नहीं कर्त्तव्य बोध जरूरी है। नैतिकता और सदाचार जरूरी है। और यह बात कोई विज्ञान, कोई संविधान, कोई कानून नहीं सिखा सकता। कोई आर्थिक, वैज्ञानिक तरक्की इसे नहीं मुहैया करा सकती। इसे सिर्फ धर्म और अज्ञात ईश्वर के नाम से उपलब्ध कराया जा सकता है।

Saturday, 5 July 2025

असली यदुवंशी

वाह क्या भागवत कथा है? श्री कृष्ण भगवान ने इन्हीं यदुवंशी (?) राक्षसों के महिमामंडन हेतु यदुकुल में अवतार लिया था? जिस यदुकुल का वर्णन सुनकर मोक्ष प्राप्त हो जाता है? लेकिन रुको जरा…… आपको बता दें कि संभवतः कोई वास्तविक यदुवंशी बचा ही नहीं है (दावे से नहीं कह सकता लेकिन 99.99 प्रतिशत संभावना यही है)। श्रीमद्भागवत जी में कथा आती है कि मथुरा पर बार बार जरासंध के आक्रमण से त्रस्त होकर यदुवंशियों को बचाने के लिये श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा जी द्वारा चारों तरफ से समुद्र से सुरक्षित द्वारिका नगरी का निर्माण करवाया। फिर सारे यदुवंशियों को ले जाकर वहीं बसाया। श्रीकृष्ण जी के रहते ही धीरे-धीरे सारे यदुवंशी इतने मदमत्त, उपद्रवी, अधर्मी और आततायी हो गये थे कि श्री कृष्ण चिंतित हो गये। उन्होंने विचार किया कि जिस धर्म की स्थापना करने के लिये उन्होंने अवतार लिया, जन्म से लेकर आज तक असुरों, राक्षसों का नाश किया, महाभारत करवाया, उसे तो उनके ही वंशज नष्ट कर रहे हैं। फिर उन्होंने अपनी माया प्रेरित कर महर्षि दुर्वासा द्वारा यदुवंशियों को शाप दिलाकर, (गांधारी का भी शाप इसमें जुड़ता है - जिस प्रकार तुमने मेरे कुल का नाश करवाया है उसी प्रकार तुम्हारे भी कुल का नाश होगा)। तो प्रभास क्षेत्र में ले जाकर सभी यदुवंशियों को आपस में लड़ाकर मरवा दिया है। स्त्रियों को श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ भेज दिया था। जिसे भीलों ने लूट लिया। अर्थात कुल मिलाकर श्रीकृष्ण के कुल में किसी सदस्य के बचने की संभावना नगण्य है। अब अगर यदुवंशी यादवों का नाश हो गया, यहाँ तक कि कृष्ण भी बहेलिया द्वारा मारे गये। उनकी स्त्रियों को भीलों ने लूट लिया तो आज के यदुवंशी कौन हैं? संभावना यह है कि गोकुल, वृंदावन क्षेत्र के ग्वाल, ढंढोर, अहिर आदि ही आज के यदुवंशी बन गये हैं जो कि कृष्ण के वंशज नहीं हैं। (मूलतः तो श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंशी क्षत्रिय वासुदेव जी के यहाँ हुआ था, नन्द जी वासुदेव जी के मित्र थे, ग्वाल थे। वहाँ श्रीकृष्ण जी का पालन-पोषण हुआ, जन्म नहीं) तो श्रीकृष्ण भगवान के नाम पर उछलने वालों सबसे पहले अपना इतिहास पता कर लो, अपना कुल गोत्र पता कर लो फिर यह कहो कि आप यदुवंशी हो। या फिर कुछ और सादर नमन डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी

Thursday, 3 July 2025

ब्राह्मण से परमेश्वर हारो - क्या सच में?

एक बहु प्रचलित छंद है ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा में। ब्राह्मण पैर पताल छलो, औ ब्राह्मण ही साठ हजार को जारो। ब्राह्मण सोख समुद्र लियो औ ब्राह्मण ही यदुवंश उजारो॥ ब्राह्मण लात हनी हरि के तन ब्राह्मण ही क्षत्रिय दल मारो। ब्राह्मण से जिन बैर करो, ब्राह्मण से परमेश्वर हारो॥ और इसे कहकर लोग दंभ भरते हैं कि ब्राह्मण से पंगा मत लेना ब्राह्मण बहुत खतरनाक जीव है। ब्राह्मण से भगवान भी हार गये। कड़वी बात कह रहा हूँ लेकिन सोचना जरूर। मेरी पंक्तियों को ध्यान रखकर अपना मुंह दर्पण में जरूर देखना एकबार। किस ब्राह्मण ने राजा बलि को छला था? किस ब्राह्मण ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को भस्म किया था? किस ब्राह्मण ने समुद्र को सोख लिया था? किस ब्राह्मण ने यदुवंश के विनाश का शाप दिया था? किस ब्राह्मण ने विष्णु की छाती पर लात मारा था? किस ब्राह्मण ने क्षत्रियों का संहार किया था? कौन थे वे? शिखा, सूत्र, तिलक, संध्या, गायत्री उपासना हीन ब्राह्मण? भक्ष्याभक्ष्य का विवेक न रखने वाले ब्राह्मण? शौच-अशौच का पालन न करने वाले ब्राह्मण? मांस-मदिरा का सेवन करने वाले ब्राह्मण? कुलाचार, तपश्चर्या से हीन ब्राह्मण? वेद, शास्त्र पारायण हीन ब्राह्मण? चिंदी-चिंदी सिक्कों के लिये भगवान और शास्त्र का सौदा करने वाले ब्राह्मण? पोथी-पत्तरा कांख में दबा सीधा उगाहने वाले ब्राह्मण? चंद से लाभ के लिये दुम हिलाने वाले, जी हजूरी करने वाले ब्राह्मण? नहीं। वे थे महर्षि कपिल। वे थे महर्षि अगस्त्य। वे थे महर्षि दुर्वासा। वे थे महर्षि भृगु। वे थे भगवान परशुराम। और इनसे आप अपनी तुलना करते हैं? लज्जा नहीं आती अपने आपको इन महर्षियों के समक्ष रखते समय? आप इनके हजारवें अंश के एकांश भी हैं? भूल कर भी इनके बरक्स कभी स्वयं को खड़ा मत करना। आपकी क्षमता नहीं है इनसे तुलना की। आप हिमालय के समक्ष चींटी को खड़ा कर रहे हैं। इन्होंने अपना पूरा जीवन तपश्चर्या को समर्पित कर दिया था। इनके जीवन में अगर कुछ था तो तप, तप और तप। इन्होंने तप बल से बलि को छला, सगर पुत्रों को अधर्म का दंड दिया, तपबल से समुद्र पान किया। यदुवंशियों की उद्दंडता का दंड तपबल से दिया। तपबल था महर्षि भृगु जी के पास कि वे विष्णु लोक जाते थे अबाध, बेरोक-टोक, जहाँ देवता का भी प्रवेश निषेध था। परशुराम जी स्वयं भगवान के आवेशावतार थे। और आप? आपने कौन सा तप किया है जो इनसे अपनी तुलना करते हैं? सादर नमन 🙏🙏🙏 डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी

Wednesday, 2 July 2025

शास्त्रानुसार अग्राह्य, पतित ब्राह्मण

शास्त्रानुसार अग्राह्य ब्राह्मण, पतित ब्राह्मण इस समय लोग ब्राह्मण की पूजनीयता के संदर्भ में शास्त्रों से विविध प्रमाण दे रहे हैं। ध्यान रहे शास्त्र एकांगी निर्णय नहीं देते। जिन शास्त्रों में ब्राह्मणों की पूजनीयता का वर्णन है उन्हीं शास्त्रों ने इन्हें ब्राह्मणत्व के पालन का भी निर्देश किया है। ब्राह्मणत्व की कसौटी बताया है। तब क्यों भूल जाते हैं शास्त्र को? धर्मग्रंथों में ब्राह्मण का स्वरूप न केवल जन्म से, अपितु आचरण, ज्ञान, तप, शुचिता और वेदाध्ययन से निर्धारित किया गया है। यदि कोई ब्राह्मण शास्त्रीय नियमों की अवहेलना करता है, तो उसे धार्मिक कार्यों से वर्जित भी घोषित किया गया है, यहाँ तक कि कुछ विशेष स्थितियों में उसे 'चाण्डाल' के समान भी कहा गया है। "शिखाहीनं द्विजं विद्धि मन्त्रहीनं च पार्थिव। यज्ञोपवीतहीनं च तं मुन्याः चाण्डालसंज्ञितम्॥" (स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, 5.3.45) स्कन्दपुराण के अनुसार यदि ब्राह्मण शिखा, यज्ञोपवीत और तिलक धारण नहीं करता तो वह चाण्डालतुल्य होता है। "वेदवर्जितशौचाभ्यां पतितः स्यात् द्विजः खलु। न स धर्मेऽधिकारी स्यात् यज्ञादौ न च तर्पणे॥" (याज्ञवल्क्य स्मृति 1.158) याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि जो ब्राह्मण वेद, शौच, और आचार से भ्रष्ट हो गया हो, वह धर्मकार्य का अधिकारी नहीं होता। "शौचवर्जितं आचारहीनं वेदवर्जितं द्विजम्। चाण्डालतुल्यमेवं स्यात् यज्ञदानविवर्जितम्॥" (गौतम धर्मसूत्र 12.4) गौतम धर्मसूत्र में वर्णन है कि जो ब्राह्मण शास्त्रीय विधियों का त्याग करता है और शुचिता से रहित होता है, वह चाण्डाल के समान समझा जाता है। वेदबहिष्कृतं विप्रं मन्त्रहीनं शुचिं शुचिम्। शूद्रादधममिच्छन्ति क्रियतश्चानपात्रकः॥ जो ब्राह्मण वेदपाठ से रहित है, वह चाहे शुचि (पवित्र) दिखता हो, परंतु वह शूद्र से भी अधम है और दान आदि के लिए अपात्र माना गया है। शिखी सूत्री च यस्त्वेति तिलकं ललाटके स्थितम्। न तं दृष्ट्वा हविर्ग्राह्यं ब्राह्मणोऽपि च चाण्डालवत्॥ (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 62, श्लोक 28) जो ब्राह्मण शिखा, यज्ञोपवीत और ललाट पर तिलक धारण नहीं करता, उसे देखकर भी यज्ञ में आहुति ग्रहण नहीं करनी चाहिए; वह ब्राह्मण भी चाण्डाल के समान है। ब्राह्मणो वेदहीनो यो नास्तिको लौकिको नरः। स एव द्रव्यदानेषु यजनेषु च वर्जितः॥ (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 142, श्लोक 35) जो ब्राह्मण वेदविहीन, नास्तिक और केवल लौकिक दृष्टिकोण वाला है, वह दान और यज्ञादि धार्मिक कार्यों में वर्जित है। शाठ्यं मायां च दम्भं च केवलं याचकं तथा। निष्ठुरं नास्तिकं तीर्थं हन्तारं वर्जयेद्विपम्॥ (मनुस्मृति 4.80) जो ब्राह्मण कपटी, मायावी, ढोंगी, केवल याचना करने वाला, कठोर, नास्तिक, पवित्रता का अपमान करने वाला और हिंसक हो, ऐसे ब्राह्मण को वर्जित करना चाहिए। न स्नायाद्यो न जपते न हुतं यो न वेदपाठः। स ब्राह्मणोऽप्यधो गम्यः स चाण्डाल समो मतः॥ (कात्यायन स्मृति) जो ब्राह्मण न स्नान करता है, न जप, न हवन करता है, न वेद का स्वाध्याय करता है, वह ब्राह्मण होते हुए भी अधम गति को प्राप्त होता है और चाण्डाल के समान माना गया है। सुरापानं च गम्भीरं ब्राह्मणस्य विशेषतः। न देयं भोज्यं च तस्मै द्रव्यं चोक्तं च किञ्चन॥ (मनुस्मृति 11.60) जो ब्राह्मण मद्यपान करता है, उसे कोई भी दान, अन्न या धन नहीं देना चाहिए। वह विशेष रूप से पतित माना गया है। (महाभारत, शांति पर्व): जातिमात्रेण यो गर्वं कुरुते ब्राह्मणो द्विजः। न स विप्रः सुदुर्धर्षः पतितो जातिभाज्यतः॥ जो ब्राह्मण केवल जाति के आधार पर गर्व करता है, वह ब्राह्मण नहीं, बल्कि जाति के कारण पतित है। सारांश यह है कि यज्ञ, हवन एवं अग्निहोत्र — वेदहीन व अशुद्ध ब्राह्मण को यज्ञ में आहुति देना वर्जित है। दान देना या लेना — पतित ब्राह्मण को दान देना निषिद्ध है। श्राद्ध कार्य — शास्त्रों में कहा गया है कि यदि पतित ब्राह्मण को पिण्ड या तर्पण दिया जाए, तो पितरों को हानि होती है। पूजा-पाठ कराना — ऐसे ब्राह्मण द्वारा की गई पूजा स्वीकार्य नहीं होती। अस्तु यदि किसी ब्राह्मण के पास शिखा, सूत्र, संध्या, गायत्री का जप, पुरश्चरण, पंचबलि, भगवती की उपासना/साधना, कुलाचार अनुसार कुलदेवी/देवता की पूजा, गुरु दीक्षा, शौच-अशौच का विवेक, संयम, शील, संतोष, तपश्चर्या नहीं है तो मुझे आपके ब्राह्मण नामधारी होने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरी दृष्टि में आपमें और एक शूद्र में विशेष अंतर नहीं है। सिवाय एक अंतर के कि आपके पास अभी भी अपने मूल में वापस आने का विकल्प है। और ध्यान रहे मुझे यह कहने के लिये शंकराचार्य होने की आवश्यकता नहीं है, शास्त्रों का अध्ययन ही पर्याप्त है। सादर नमन

Monday, 30 June 2025

धर्म एक धंधा है

भगवान शिव की कृपा से आज मैं अकबरपुर के निकटस्थ पवित्र, प्रसिद्ध, सिद्ध धार्मिक स्थल शिव बाबा के स्थान पर गया था। शिव बाबा का धाम मेरे ख्याल से कोई सौ सवा सौ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ। हर तरफ आदमी थे। जिस समय (सुबह 10.30 बजे) मैं गया था, उस समय लगभग चार-पांच हजार की भीड़ तो रही होगी। अगर गणना करूं तो सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक तकरीबन 50 हजार लोग दर्शन पूजन करेंगे ही। यह आज के सोमवार की बात है हर सोमवार यही होता होगा। आम दिनों में भी चार-छः हजार लोग आ ही जाते होंगे। श्रद्धा, भक्ति, आस्था, विश्वास अपनी जगह है। आज मैं बात करूंगा धर्म के धंधे की। हर तरफ दूकानें सजी हैं - फूल-माला, पूजन सामग्री, मूर्ति-चित्र-डमरू-त्रिशूल, मिठाई, जलेबी, लइया, रेवड़ी, झाल-पूड़ी, नमकीन, मूंगफली, रामदाना, चिक्की, खिलौना, चाट-फुलकी-टिक्की, समोसा-पकौड़ा-चाय, चाउमीन-बर्गर, कपड़ा, बर्तन, शृंगार, हंसिया-खुरपी-चाकू-छूरी, गन्ने का रस, कुल्फी-आइसक्रीम, कोल्ड-ड्रिंक, घोड़ा-झूला, चकरी-झूला, स्लाइडर, छुकछुक रेल, जम्पर, नाई, पार्किंग वाले, चंदन लगाने वाले, रक्षासूत्र बांधने वाले, कथा बांचने वाले (पंडित), फोटो खींचने वाले, गोदना गोदने वाले, रिक्शा वाले आदि। मुख्य प्रवेशद्वार वाले मार्ग के एक ओर की पटरी पर लगी दूकानों को मैंने गिना कुल 36 दूकानें लगीं थीं। दूसरी पटरी पर भी कमोबेश 30 दुकानें तो रहीं ही होगी। इस तरह की 20 गलियां बनी हैं जहाँ दूकानें लगी थीं। हर गली में औसतन मैं 30 दूकान भी मान लूं तो करीब 600 दूकानें लगी होगीं। 600 दूकान बराबर 600 परिवार। हर परिवार से यदि 2 व्यक्ति भी वहाँ लगे हों तो 1200 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। अकेले मैंने ही कुल 9 दूकानों से 720 रूपये की खरीददारी किया। मैं यह मानकर चलता हूँ कि हर व्यक्ति न अधिक पांच सौ रूपये खर्च करें। और सभी न खर्च करें केवल दो हजार लोग ही खर्च करें तो पांच सौ के हिसाब उस दो घंटे में 10 लाख की खरीदारी हुई होगी। एक घंटे के लिहाज से 5 लाख। यदि शिव बाबा का धाम केवल 12 घंटे ही खुला रहे तो पूरे दिन में 60 लाख का धंधा होगा। हर दूकान पर न्यूनतम 5 हजार का व्यापार होगा। जिसमें से हजार-बारह सौ मुनाफा तो बनेगा ही। यह न्यूनतम अनुमान है। इतनी गणना करने और इतना बोर करने के पीछे मेरा एक उद्देश्य है कि धर्म धंधा तो है। इतना अच्छा धंधा कि एक क्षेत्र के करीब बारह सौ लोगों को रोजगार मिला हुआ। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उद्योग में संलग्न कर्मचारियों की संख्या के आधार (सूक्ष्म उद्योग 1-9, लघु उद्योग 10-49, मध्यम उद्योग 50-249, बृहद उद्योग 250 से अधिक) यह शिव बाबा का धाम बृहद उद्योग से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। और आश्चर्य की बात यह कि न्यूनतम निवेश में। शिव बाबा के रूप में एक पीपल का पेड़ है। उसी के इर्द-गिर्द यह सारा धंधा फैला हुआ है। है किसी व्यवस्था में दम जो एक पेड़ के सहारे एक दिन में न्यूनतम 60 लाख का धंधा करके दिखा दे? दूसरा आश्चर्य यह है कि यहाँ केवल ब्राह्मणों की दुकानें नहीं हैं बल्कि हर जाति बिरादरी की दुकानें हैं। मैंने मिठाई यादव दूकान की से, नारियल, फूल, माला, अगरबत्ती की डलिया वर्मा की दुकान से, माला-फूल की छोटी डलिया सैनी की दूकान से, लइया, पेठा, चिक्की प्रजापति की दूकान से, डमरू, माला और कटोरी ब्रिजेश नामक व्यक्ति के यहाँ से खरीदा। गन्ने का रस पिया था अमन हरिजन के यहाँ, झूला और स्लाइडर वाले भी हरिजन थे। बेलन और एक खिलौना लिया अग्रवाल के यहाँ से। तो जातीय समीकरण के हिसाब से भी लगभग सभी जातियों की भागीदारी रही होगी। नजरी तौर पर मेरा अनुमान है कि 8-10 पंडित जी कथा का सेटअप बनाकर रखे थे कुछ लोग खाली बैठे थे कुछ के यहाँ 2-4 लोग बैठकर कथा सुन रहे थे। 4-5 लोग चंदन लगाने का का भी कम कर रहे थे। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि धर्म (यहाँ धर्म का वही अर्थ ग्राह्य है जो लोग समझते हैं मेरी दृष्टि में यह धर्म नहीं, कर्मकांड है धर्म का आभास है) एक धंधा है लेकिन जैसाकि मूढ़ लोग कहते हैं वैसा नहीं। यह सतत, संधृत, सम्यक धंधा है। न किसी को कोई नुकसान न ज्यादा मुनाफा। सबकी रोजी रोटी चलती रहे। हाँ बेशक यहाँ से कुछ उत्पादन नहीं हो रहा है लेकिन इस बाजार के भरोसे कितनी फैक्टारियां खड़ी होंगी, अंदाजा भी है किसी वामी, कामी, मतिभ्रष्ट पथभ्रष्ट हिन्दू को? याद रखना भारतीय चिन्तन का जोर मुनाफा कमाने पर नहीं है सबकी आजीविका चलते रहने पर है वह भी बिना किसी बाधा, अवरोध, प्रतिरोध, प्रतिस्पर्धा के, बिना किसी तनाव-दबाव-दुराव के, बिना किसी विद्वेष-ईर्ष्या के। हमारा उद्देश्य मोटा माल बनाना नहीं प्रेम, शांति, सौहार्द्य, समरसता, बंधुत्व बनाये रखना था, समाज और देश को एकजुट रखना था। संसार की कोई भी व्यवस्था ले आइये वह उपर्युक्त बातों के साथ ही हर हाथ को काम, हर मुंह को निवाला और हर व्यक्ति को उसकी न्यूनतम आवश्यकता पूर्ति का साधन नहीं दे सकती। कोई कितना भी विकसित देश क्यों क्यों न हो कुछ न कुछ बेरोजगारी वहाँ होती ही है (जैसे- अमेरिका 4.2%, चीन 5.1% भारत 4.9 %, जापान 2.5%, जर्मनी 6.3%, यूनाइटेड किंगडम 4.5%, फ़्रांस 7.3%, ब्राजील 7.2% आदि)। लेकिन हमारी व्यवस्था ने यह कर दिखाया था जिसे लूट के चक्कर में मुस्लिम तथा ब्रिटिश काल में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया और स्वतंत्र भारत में तो उसकी चूलें तक हिला दी गयीं। हाँ इस व्यवस्था के दोष भी बहुत हैं। दोष यह है कि हमारी भौतिक प्रगति बाधित हो जाती है, हम कोई मल्टीनेशनल कम्पनी नहीं खड़ा कर सकते, हम बिलगेट्स, वारेन बफेट, जेफ़ बेजोस, मार्क जुकरबर्ग, कोलम्बस, वास्कोडीगामा, राबर्ट क्लाइब नहीं पैदा कर सकते। हम विश्व को उपनिवेशवाद के चंगुल में नहीं जकड़ सकते। हम विश्व के संसाधनों को लूटने के लिए नये-नये तरीके नहीं ढूढ़ सकते। अफ्रीकी देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों, भारत सहित तमाम दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों, आस्ट्रेलिया आदि को रौंद नहीं सकते। वहाँ के मूलनिवासियों का सफाया नहीं कर सकते। रबर का कोटा न पूरा होने पर हम बेल्जियम की तरह कांगो में नरसंहार तथा लोगों के हाथ नहीं काट सकते। स्पेनियों की तरह अजटेक, माया और इंका लोगों का समूल नाश नहीं कर सकते। अफ्रीकी गुलामों को लैटिन अमेरिका में बेंच नहीं सकते। हम तेल के लिए ईरान, इराक, यमन आदि पर झूठा युद्ध नहीं थोप सकते। हम विश्व को नव उपनिवेशवाद में नहीं जकड़ सकते। चूँकि मुनाफा कमाने पर हमारा बहुत जोर नहीं है, जीवन चल ही रहा है, शांति है संतोष है, तो नवाचार, खोज, आविष्कार नहीं होगा, तकनीकी क्रांति, मोबाईल क्रांति, ए आई क्रांति नहीं होगा। धरती का सीना चीरकर खनिज नहीं निकाला जायेगा, पेड़ नहीं कटेगा, पहाड़ नहीं टूटेगा, हवा, पानी, नदियाँ, भूमि नहीं दूषित होंगी। वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन नहीं होगा। सामाजिक प्रदूषण, वैचारिक प्रदूषण, पारिवारिक प्रदूषण नहीं होगा। समाज देश जैसा चल रहा था वैसा ही सहस्राबदियों तक चलता रहेगा, अपनी धुन में मस्त।

Saturday, 28 June 2025

क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है?

क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है? हम अपने आसपास देखते हैं कि कई सारे ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत कथा, श्रीमद्भागवत कथा, रामायण कथा, पूजा-पाठ भी आदि करते करवाते हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या यह ब्राह्मणों का कार्य है? इसके पहले कि मैं इस बात का उत्तर दूँ, एक जिज्ञासा है कि क्या भगवान परशुराम, इनके पिता महर्षि जमदग्नि, इनके पिता महर्षि भृगु, महर्षि जाबालि, महर्षि वसिष्ठ, महर्षि भारद्वाज, महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि अत्रि, महर्षि अगस्त्य, महर्षि दुर्वासा, महर्षि असित, महर्षि देवल, महर्षि कश्यप, महर्षि कणाद, महर्षि पतंजलि, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग, भगवान कपिल, ऋषि गालव, ऋषि उद्दालक, ऋषि शांडिल्य, ऋषि गौतम, ऋषि च्यवन आदि ने किसी के यहाँ कथावाचन किया, यजमानी किया, पूजा-पाठ करवाया? जैसाकि शास्त्रों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनका मुख्य काम तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, शास्त्र का अध्ययन करना, यज्ञ करना व करवाना आदि था। इन्होंने आजन्म यही किया। कभी-कभी किसी के विशेष आग्रह पर इन्होंने पूजा-पाठ, करवाया होगा। उसमें भी यज्ञ को वरीयता देते थे। हाँ, महर्षि वशिष्ठ, देवगुरु बृहस्पति, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग आदि ने देवताओं तथा भगवान राम व भगवान कृष्ण के कुल में उनके दर्शनार्थ उनका कुलगुरु व कुलपुरोहित होना स्वीकार किया। उन्होंने भगवान से नीचे कुछ भी स्वीकार नहीं किया। और हम आज के ब्राह्मण क्या कर रहे हैं? एक झोले में पोथीपत्तरा रखकर घर-घर सीधा उगाह रहे हैं? शालिग्राम पर अक्षत-फूल-फल-दक्षिणा चढ़वा रहे हैं? रामायण गाते फिर रहे हैं? मारे-मारे फिर रहे हैं? दूसरी बात ब्राह्मणों का कर्तव्य स्वयं वेदाध्ययन करना, सुयोग्य पात्र शिष्य को वेदाध्ययन, शास्त्राध्ययन करवाना, यज्ञ करना व करवाना, दान लेना व देना है। इन सबसे ऊपर उनका मूल कर्तव्य तपस्या है, शक्तियों की उपासना-साधना करना है। न भागवत या रामायण या सत्यनारायण कथा एक कथा करना है। यह कब से धर्म हो गया? यह कब से ब्राह्मण का कर्म हो गया? व्यास जी ने पुराणों का सृजन इसलिये किया था कि जिन्हें वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है वे भी भगवत प्रीत्यर्थ कार्य कर सकें, वे भी भगवत भक्ति कर सकें। यह ब्राह्मणों का दुर्भाग्य है, उनकी असफलता है कि उन्हें अपने कर्तव्यों को छोड़कर नाचनौटंकी करना शुरु कर दिया। चंद सिक्कों के लिये शक्ति की उपासना छोड़कर सत्यनारायण कथा, भागवत कथा कहना शुरु कर दिया। "गंगधाम को छोड़कर दुरमति कूप खनवा रहा है।" यह सब हुआ। तो कुछ कारण हैं - 1- हर ब्राह्मण तपस्या नहीं कर सकता था। उसकी क्षमता नहीं रही उतनी। तो उसने अपने मूल कर्म को छोड़कर नौटंकी-नाच करना शुरू कर दिया। यह ब्राह्मणत्व की असफलता है। 2- समय बदला चीजें बदलीं। मनुष्यों की आवश्यकताएं बदलीं। ब्राह्मणों की भी। उन्होंने उन चीजों को भी समाज में प्रतिष्ठित करना शुरु कर दिया जो चीजें गौण हुआ करती थीं। नतीजा दुर्दिन तो होगा ही। 3- पहले लोग इतने सुशिक्षित होते थे कि वे अपना पूजा-पाठ स्वयं कर सकें। लेकिन धीरे-धीरे उनके जीवन में आपाधापी, भौतिकता का समावेश इतना जबर्दस्त हुआ कि वे सब इसे छोड़ते गये। लेकिन संस्कार मन में वही था कि पूजा-पाठ करना है तो फिर ब्राह्मणों को ढूंढा गया जो यह सब करवा सकते थे। फिर यह रीति बन गया। मैं यह बात कहने का जोखिम ले रहा हूँ कि ब्राह्मण का कर्तव्य वास्तव में यह सब करना नहीं है। उसका कर्म है तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, वेदों का अध्ययन उसके नये-नये अर्थों की निष्पत्ति करना था। और ध्यान रखना यदि ब्राह्मण अपने मूल धर्म से विरत होगा तो उसका अधःपतन निश्चित है, निश्चित है, निश्चित है। उसे कोई बचा नहीं सकता। जो ब्राह्मण अपना कल्याण चाहते हैं वे सारी नौटंकी, कक्थकड़ी छोड़ शक्ति की शरण में आयें। अपने कुलाचार का पालन करें। कुलदेवी की आराधना उपासना करें। सर्वप्रथम तो संध्यावंदन करें हीं। गायत्री का जप करें। उसका पुरश्चरण करें। दुर्गासप्तशती का पारायण करें। नवार्ण दीक्षा लेकर उसका पुरश्चरण करें। विभिन्न तंत्र ग्रंथों का अध्यवसाय करें। योग्य तंत्राचार्यों का शरण ग्रहण कर कुछ सिद्धियां-शक्तियां प्राप्त करें। आयुर्वेद, ज्योतिष आदि का गहन अध्ययन करें। और इनमें से कुछ भी न हो सके तो दुर्गा चालीसा/दुर्गा/बंगलामुखी/काली/पीतांबरा आदि नामों का ही 21, 51,, सवा लाख, 5 लाख, 11 लाख का जप करें पुरश्चरण करें। फिर देंखे अपने जीवन में घट रहे अप्रत्याशित, चमत्कारिक परिणाम को।

Friday, 27 June 2025

ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया?

ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया? हमने कुछ लोगों को पकड़ा 10, 20, 50, 100, 1000 आदि गायें दिया, बना दिया यादव। काहे कि हम दूध, घी बहुत पीते-खाते थे? हमने कुछ लोगों को बंधक बनाया और भैंसे दिया बना दिया महिषवाल। हमने फिर कुछ लोगों को पकड़ा, भेड़ दिया, बना दिया गड़रिया। क्योंकि हम लोग ऊन के कपड़े बहुत ज्यादा पहनते थे फिर भी अधनंगे रहते थे? कुछ को बकरी दिया बना दिया बकरवाल, गुज्जर। क्योंकि हम बकरी का मांस भी खाते थे? हमने फिर कुछ मजलूमों को जबरन पकड़ा और चमड़ा दिया, बना दिया चमार। क्योंकि हम लोग चमड़े का जूता सिर से पैर तक खूब पहनते थे? कुछ को पहले से बने जूतों की मरम्मत का काम जबरन सौंपा वे बने मोची। क्योंकि ज्यादा चलने के कारण हमारे जूते टूटते बहुत थे? कुछ लोगों को फिर दबोच लिया उन्हें सुअर दिया, बना दिया डोम/भंगी। क्योंकि सुअर का मांस भी हमें खाना पसंद था? इनसे हमने शवों को जलाने तथा विष्ठा साफ करवाने का घृणित कार्य भी करवाया क्योंकि हमारे यहाँ पहले से ही शौचालय बना होता था। हम लोग बाहर लैट्रिन करने नहीं जाते थे और विष्ठा भी बहुत ज्यादा करते थे न? कुछ लोगों को ताड़ी के पेड़ पर चढ़ा कर ताड़ी लाने और बेचने का काम सौंपा वे बन गये पासी। भाई हम रात दिन ताड़ी पीकर टुन रहते थे, तभी हमें मानवता नहीं दिखती थी और दलितों को लूटने का काम आसानी से हो जाता था। कुछ लोगों को नाव दिया, बना दिया केवट व मल्लाह क्योंकि हम नदी मार्ग से बहुत आते-जाते थे। दिन में दस बीस चक्कर तो ही जाता था? कुछ लोगों को जाल पकड़ाकर नदी या ताल में धकेल दिया वे बन गये निषाद, मछुआरा क्योंकि हमें मछली खाना बहुत भाता था? बिना मछली के हमारा आहार सूना रहता था? कुछ लोगों को जमीन दिया, हल बैल दिया, बीज दिया बना दिया मौर्य। कुछ को कहा कि तुम केवल इन मौर्यों के यहाँ उगी सब्जी का व्यापार करोगे, वे बन गये कुजड़ा। हम कभी-कभी सब्जी भी खा लिया करते थे? कुछ बेहद मासूम लोगों को जमीन देकर कहा कि तुम केवल अनाज उगाओ, वे कुर्मी बन गये। कुछ को धागा बनाने की मशीन दिया बना दिया जुलाहा, कुछ को रुई धुनने का काम दिया बना दिया धुनिया। महाराज हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कपड़े पहनने का बेहद शौक था? कुछ को लकड़ी बसुली, रुखान, दिया बना दिया बढ़ई। क्योंकि हम दिन भर लकड़ी के सामानों में ही घुसे पड़े रहते थे। कुछ लोहा और निहाई देकर विश्वकर्मा बना दिया। लोहे के हथियार भी हमारे बहुत काम आते थे। मजलूमों दलितों का वध करने में बड़ा उपयोगी होता था लोहे का हथियार। कुछ को उस्तरा और नहन्नी देकर नाई बना दिया। काहे कि हमारे दाढ़ी, बाल बहुत जल्दी-जल्दी उग आते थे। दिन में चार-छः बार बाल बनवाना पड़ता था? कुछ से कहा कि तुम लोग फूल तोड़ो माला बनाओ और माली बनो। हम फूलों की माला पहनने के भी बड़े शौकीन थे? कुछ बांस और मूंज का ढकिया, मौनी बनाने का काम दिया वे बने धरिकार। कुछ को रस्सी में बांधा और उन्हें लोटा, गगरा व उबहन (पानी निकालने की रस्सी) दे, पानी भरने का काम सौंपा वे बेचारे दलित बने महार। कुछ को पालकी ढोने का काम दिया वे बने कहार। अब पैदल कौन आये जाये जब मानवयान की सवारी मिल जाती है? कुछ को चाक और मिट्टी देकर कुम्हार बना दिया। क्योंकि हमें रोज मिट्टी के बर्तनों की आवश्यकता पड़ती थी? कुछ लोगों से हमने कहा कि तुम लड्डू व मिठाई बनाओ वे बेचारे बन गये मोदनवाल। भई हमें मिठाई खाना बेहद पसंद था? कुछ को कपड़ा बेचने का धंधा दिया वे बन गये बजाज, कुछ को चूड़ियां बेचने का काम सौंपा वे बने चूड़ीवाल। कुछ हमारे बड़े अजीज थे उन्हें हमने सोना-चांदी का काम सौंपा दिया वे बने सोनार। कुछ लोगों को फरसा, भाला, तलवार, धनुष-बाण सौंपा और कहा कि तुम क्षत्रिय बन गये। जाओ सबको मारो काटो। और खुद अधनंगा बदन लेकर सिर पर शिखा, माथे पर चंदन, कांधे पर जनेऊ और बगल में पोथी दबा लगे भागवत बांचने, कथा सुनाने, ज्ञान बघारने, मासूम निरीह, लोगों को लूटने, मूर्ख बनाने। और इतिहास में हमने एकबार यह व्यवस्था बैठा दिया तो फिर बैठा दिया, हजारों साल तक कोई चूं नहीं बोला। सिर नहीं उठाया। बस दुम दबाकर फाओअप करते रहे। ऐसा फाओअप कर रहे हैं कि अब भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। है कि नहीं। देख रहा विनोद कैइसा गोल-गोल घुमा रहा है ई लोग। या तो आप हमें मूर्ख समझ रहे या फिर खुद हैं और हमें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। या फिर यह बहुत बड़ा खेल है, जिसके हाथ की हम आप सब कठपुतली बन रहे हैं और वह मजे लेकर खेल रहा है। @ डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी

क्या सच में ब्राह्मणों ने जाति बनाया?

समाज में कुछ थ्योरियां प्रचलित है कि 1- "ब्राह्मणों ने समाज को जातियों में बांट दिया।" 2- "ब्राह्मणों ने शूद्रों को लूट लिया।" 3- "उन्होंने शुद्रों को पढ़ने नहीं दिया।" मेरा प्रश्न यह है कि 1- इस सिद्धांत के पक्ष में क्या कोई साक्ष्य है? आप में से जितने भी पढ़े लिखे बुद्धिमान, विद्वान, वैज्ञानिक लोग हों कोई शास्त्रीय, अभिलेखीय, शिलालेखीय, ताम्रपत्रीय प्रमाण ले आना जिसमें ब्राह्मणों द्वारा विभाजित जातियों का उल्लेख हो, उस क्रूर ब्राह्मण का नाम हो, मैं पहला ब्राह्मण होऊंगा जो उसका पुतला दहन कर ब्राह्मणत्व का त्याग करूंगा। वर्ण की बात मत करना क्योंकि ब्राह्मणों ने अपनी कुटिलता से उसे ईश्वरीय घोषित कर दिया है। उसमें उनकी कोई खतां नहीं है। भगवान जाने उसकी बात। 2-दूसरा प्रश्न यह है कि जब मुट्टी भर (3-5%) अधनंगे तिलक, चुटिया, जनेऊ, खड़ाऊं और पोथी-पत्तरा धारी ब्राह्मण समाज को बांट रहे थे तब सिकंदर जैसे विश्व विजेता को धूल चटाने वाले, मछली से तेल निकाल देने वाले, लट्ठ को तेल पिलाकर चिकना करने वाले, धरती का सीना चीर कर सोने की फसल निकाल देने वाले वीर बांकुरे, उनके राजा, उनकी सेना, उनके हथियार, क्या कर रहे थे? क्यों बंटने दिया समाज को? 3- तीसरा प्रश्न यह है कि उन ब्राह्मणों के पास ऐसा क्या था कि वे इतनी आसानी से 80-90% प्रतिशत धाकड़, जांबाज, बुद्धिजीवी आबादी को बांटने में सफल हो गये? 4-चौथा प्रश्न जब मनुवादी ब्राह्मण फर्जी (?) मनुस्मृति लिखकर समाज को तोड़ रहे थे, आप लोगों को दबाने, कुचलने, सताने की साजिश रच रहे थे तब आप क्या कर रहे थे? कहाँ सो रहे थे? 5- ऐसा कैसे हो सकता है कि 3-5% प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी वाले लोग 80-90% बहुसंख्यक आबादी वाले लोगों को पढ़ने न दें? क्या आपके पास इतनी अक्ल, क्षमता, साहस, संसाधन नहीं था कि आप अपनी समानान्तर शिक्षण व्यवस्था खड़ी कर सकें, अपनी पाठशाला, अपनी भाषा, अपना पुस्तक, अपना ज्ञान, अपना वेद, अपना शास्त्र रच सकें? 6- या इन सबमें आपकी भी मिलीभगत थी अथवा यह अब तक सबसे बड़ा प्रोपेगेंडा है? @ डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी प्रवक्ता भूगोल जी आई सी दोस्तपुर सुलतानपुर

Thursday, 26 June 2025

ब्राह्मण होना पाप है

रावण को सीता का हरण करना था उसने वेष बनाया ब्राह्मण का। हनुमानजी को राम का भेद लेना हुआ उन्होंने वेष बनाया ब्राह्मण का। कालनेमी को हनुमानजी को उनसे मार्ग से भटकाना हुआ उसने वेष बनाया ब्राह्मण का। कर्ण को परशुराम जी से धनुर्वेद का ज्ञान लेना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। श्रीकृष्ण को कर्ण को छलना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। श्रीकृष्ण सहित भीमादि पांडवों को छल से जरासंध का वध करना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। वरुण को राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। विश्वामित्र को राजा हरिश्चंद्र को छलना को हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। विष्णु को राजा बलि को छलना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। अश्विनी कुमारों को च्यवन ऋषि की पत्नी सत्यवती की परीक्षा लेना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव सहित कुंती तथा द्रौपदी ने कई बार ब्राह्मण का वेश धारण किया। जब जब किसी को कोई क्रूर कर्म करना हुआ उसने ब्राह्मण का वेश धारण किया। क्यों? क्योंकि ब्राह्मण नाम है एक भरोसे का। ब्राह्मण नाम है एक विश्वास का। ब्राह्मण नाम है सत्य का। ब्राह्मण नाम है धर्म का। ब्राह्मण नाम है त्याग, तप, शील और संयम का। इसलिए उसके नाम का फायदा उठाना बहुत आसान था। उसके वेश से, उसके नाम से लोगों को मूर्ख बनाना आसान था। उसके नाम से लोगों को ठगना आसान था। आज भी यही हो रहा है। हालांकि अब ब्राह्मण नाम ब्रांड नहीं धब्बे जैसा लगता है। ब्राह्मण होना पाप जैसा लगता है। आखिर हम इतने कुकर्मी हैं? हमने सदियों तक मौर्यवंशी सम्राटों, चंवर वंशी क्षत्रिय राजाओं (अब चमार), अहीर-यदुवंशी राजाओं, महार-कहार-कुर्मी-पासी-मल्लाह-निषाद जाति के राजाओं, नाई जाति के राजाओं, डोम राजाओं, नागवंशी राजाओं, हैहय वंशी राजाओं, जाट-गुर्जर-पाल-परमार-प्रतिहार राजाओं, चोल-चालुक्य-वेंगी-वर्मन वंशी राजाओं, सूर्यवंशी, चंद्रवंशी राजाओं का शोषण किया? उन्हें दबाया कुचला, पीड़ित और प्रताड़ित किया। वे 80-90% और हम 3-5%। उनके हाथ में सेना, उनके हाथ में शस्त्र, उनके हाथ में खजाना, उनके हाथ में ताकत, उनकी बिरादरी का बल और अल्पसंख्यक होते हुए भी हमने एक धोती, चुटिया, जनेऊ, तिलक धारण कर उन्हें लूट लिया? बर्बाद कर दिया है? तबाह कर दिया? और इस कदर तबाह किया वे अपना सिर ही न उठा सके? अब इतिहास का बदला लिया जा रहा है? अफसोस। लेकिन, लेकिन रुको या तो तुम इतने अंधे, मूर्ख, बकलोल, निर्बुद्धि, कायर, निर्बल थे कि तुम्हें हमारा कमीनापन दिखा नहीं अथवा हम लोग वाकई इतने काबिल, योग्य, सामर्थ्यवान थे कि तुम लोग चकरघिन्नी की तरह सहस्राब्दियों तक नाचते रहे, नट-मरकट की तरह अथवा यह अब तक सबसे बड़ा झूठ है, षड्यंत्र है, धोखा है।