Tuesday, 16 September 2025

छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति

वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे (10 सितम्बर) के आलोक में 10 सितम्बर 2025 से लेकर 16 सितम्बर 2025 तक छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति की रोकने, उन्हें जागरूक करने तथा सरकार द्वारा उठाये जा रहे विभिन्न कदमों की जानकारी देने के उद्देश्य कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. इसी क्रम में आज हमारे विद्यालय पं. दी. द. उपा. राजकीय इन्टर कॉलेज तेन्दुआकाजी दोस्तपुर सुलतानपुर में भी जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम की तैयारी के दौरान कई चौंका देने वाले तथ्य सामने आये. जैसे कला एवं मानविकी वर्ग के विद्यार्थियों की तुलना में विज्ञान और गणित खासकर आई आई टी और मेडिकल पृष्टभूमि वाले छात्र अधिक आत्महत्या करते हैं. Suicide Trends Among Indian Institutes of Technology Joint Entrance Examination (IIT JEE) and National Eligibility cum Entrance Test (NEET) Aspirants: A Comparative Study of Demographic and Situational Factors Devesh Gupta 1, Rajesh Ranjan 2, Meenakshi Singh 3, Chandan Kumar 4, Abhinav Kumar 5, Bhawna Kathuria 2, Tripti Srivastava 6 (DOI: 10.7759/cureus.85812) और विभिन्न मिडिया सर्वेक्षणों जिसमें विश्वविद्यालय स्तर के कला, विज्ञान एवं वाणिज्य विषय के 8542 छात्र शामिल हैं (2018 से 2023 के मध्य) में से 18 प्रतिशत छात्रों के मन में आत्महत्या का विचार आया जबकि इसी दौरान 6 प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या की योजना बनाया व प्रयास किया. इसमें से केवल 7.6% छात्रों ने आत्महत्या किया. इसी समयांतराल में NEET, IIT-JEE आदि की तैयारी कर रहे, या इंजीनियरिंग व मेडिकल आदि की पढाई कर रहे 34% छात्रों के मन में आत्महत्या का विचार आया और 26% प्रतिशत ने आत्महत्या की योजना बनाया व प्रयास किया. सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें से 73% से अधिक NEET व मेडिकल छात्र तथा 75% से अधिक IIT-JEE व इंजीनियरिंग छात्रों ने आत्महत्या कर लिया. ये वे बच्चे हैं जिन्होंने घर, मुहल्ला, स्कूल, जिला, प्रदेश आदि टॉप किया है. ये मेधावी हैं. निस्संदेह यह हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारी परवरिश, हमारे सामाजिक ताने-बाने की विफलता है. इसके पीछे पढाई, प्रतियोगिता और असफलता का तनाव, माता-पिता के उम्मीदों पर खरा न उतरने का दबाव, आर्थिक दबाव, सामाजिक ताने और फब्तियां उत्तरदायी हैं. लेकिन इसके पीछे जो मैं सबसे बड़ा कारण देख रहा हूँ वह है – भौतिकतावाद. आखिर क्यों यह सब एक बच्चे के मनोमष्तिक पर हाबी हो जाता है? क्योंकि उसे चाहिए लग्जरी जीवन, बड़ा सा घर, महंगी गाड़ी, लाखों-करोड़ों का पैकेज, उसे नहीं चाहिए तो माता-पिता को चाहिए, समाज को दिखाना है कि हम किसी से कम नहीं हैं. चूँकि प्रतियोगिता अधिक है, जब वह तनाव नहीं झेल पाता तब उसके सामने एक विकल्प दिखता है “मौत”. हर चीज से छुटकारा. वहीँ कला, मानविकी आदि विषयों के छात्र पहले से ही निरीह जैसे होते हैं. खुद को कमजोर मानते हैं. अतः इन पर माता-पिता या समाज का भी बहुत दबाव नहीं रहता है. हाईस्कूल, इंटर, बीए आदि कर लिए तो कर लिए नहीं तो अपना धंधा खोल लिया या दिल्ली-मुंबई-सूरत,लुधियाना आदि चले गये. 10 रुपया कमा रहें हैं 5 खा रहे हैं 5 घर-परिवार को दे रहे हैं. जबकि विज्ञान, गणित, NEET व मेडिकल, IIT-JEE व इंजीनियरिंग के छात्र यह सहूलियत नहीं पाते. फलतः बहुत सारी मासूम जिंदगियां उड़ान भरने से पहले ही दम तोड़ देती हैं. ऐसे में सामाजिक, पारिवारिक, विद्यालयी, सरकारी आदि पहलों के मैं जिस जगह ज्यादा सम्भावना देखता हूँ वह है धर्म, आध्यात्म, योग, ध्यान आदि. इन मेधावी बच्चों को अपने सपनों को परवान देने के साथ भौतिकतावाद के साथ भारतीयता का पुट रखना चाहिए. विज्ञान, गणित की पढाई अपनी जगह है और जीवन अपनी जगह. जीवन पहली प्राथमिकता है. अपने जीवन को बचाने के लिए थोडा सा ढोंगी, पाखंडी, पुरातनपंथी भी हो जाना चाहिए.  
डॉ. विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी प्रवक्ता भूगोल जी आई सी तेन्दुआकाजी दोस्तपुर सुलतानपुर

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