उस परमात्मा की पूजा करने की आवश्यकता क्या है? प्रतिपल प्रतिक्षण उस परमात्मा की पूजा हो ही रही है। सूरज, चांद और तारे उसकी आरती कर रहे हैं। पृथ्वी और ग्रह उपग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं। फूल उस पर सुगंध अर्पित कर रहे हैं। संसार भर के अन्न और फल उसे नैवेद्य अर्पित कर रहे हैं। नीला अंबर उसका परिधान है। नरम नरम बादल रूई के पाहे हैं। इंद्रधनुष उसका यज्ञोपवीत है। पक्षी कलरव करके उसकी स्तुति गा रहे हैं। मोर नाच कर उसे रिझा रहे हैं। नदियां उसको स्नान करा रही हैं। बारिस की फुहारें उसे आचमन दे रही हैं। मस्त बसंती हवा उसे पंखा कर रही है। यह विराट पूजा अनन्त अनन्त काल से चल ही रही है। क्या है हमारे भीतर यह सामर्थ्य की ऐसी विराट पूजा कर सकें? नहीं है और न ही हो सकती है। और ऊपर से यह हम जो तुच्छ पूजा करते भी हैं उसमें अपनी तुच्छ मांग रख देते हैं। हमें इस पूजा के बदले यह दो, वह दे दो। उस परम आत्मा को अपने हृदय के मंदिर में बसा न सके और उसे चार दीवारी के भीतर पत्थर में चिनवा कर सलाखों के पीछे कैद कर दिया। फिर उस कैदी परमात्मा से अपने सुखी जीवन की दुआएं मांगते हैं! वह परमात्मा हमें क्या खाक देगा? मांग सको तो मांग लो उस प्यारे से एक प्यारी सी झप्पी, एक परम सुख का आलिंगन। और फिर शरीक हो जाओ उस विराट की परम पूजा में। हर पल हर क्षण निहारो उस विराट पूजा को। जीते जी मुक्त हो जाओगे। नहीं रहेगा मृत्यु का भय, नहीं रहेगी वासना की दीवार। शरीर के साथ रहने पर भी जीवित रहोगे और न रहने पर भी जीवित रहोगे। सदा अमर।
@विन्ध्येश्वरी
Sunday, 29 November 2020
विराट दर्शन
अर्जुन के बहुत कहने पर कृष्ण ने उसे अपना विराट रूप दिखाया। उसकी योग्यता न थी विराट-दर्शन की, साधना नहीं थी उसकी, उसने अपनी आंखों को परमात्मा के दर्शन के वियोग में रो रो कर लाल न किया था। उस राजकुमार अर्जुन की आंखें चुधिया गयीं। उसने कहा- हे प्रभु आप अपने इस विराट रूप को समेट लो मैं न देख पाऊंगा अब। क्या था उस विराट रूप में? पूरा ब्रह्मांड ही था। पृथ्वी, आकाश, नौ ग्रह, तारे, वृक्ष, पक्षी, देव, राक्षस, मनुष्य, प्रलय, सृजन, सुख, दुख, जीवन, मृत्यु सब कुछ था उसमें।
इस तथ्य का दूसरा पहलू यह भी है कि यदि यह सब कुछ परमात्मा में है तो क्या परमात्मा यही नहीं है? सच तो यही है यह सब परमात्मा के ही विभिन्न रूप हैं। अगर हम जन्म लेते हैं तो परमात्मा ही जन्म ले रहा है, हमारी मृत्यु में परमात्मा ही मरता है। हम सुखी हैं तो यह परमात्मा का ही सुख है और दुख भी परमात्मा ही है। सूरज का उगना और प्रकाश, पृथ्वी का घूर्णन और इस पर जीवन, पूर्णिमा का प्रकाश और चंद्रमा की शीतलता या अमावस्या की गहन रात्रि, वृक्षों का शांत स्थिर भाव से खड़े रहना या मस्ती से लहराना, पक्षियों की चहचहाहट, नदी का कलकल, भौरों का गुंजन, बच्चे की प्यारी मुस्कान या रुदन, प्रियतम का मधुर स्पर्श या दो घड़ी शुकून की नींद या सुबह की ताजगी। सब कुछ ही परमात्मा है। परमात्मा प्रतिपल हमारे पास है, उसे देखना सीख लो बस। उसे देखने के लिये अपनी नजर को निर्दोष रखना होगा। यानि उसमें किसी धर्म-मजहब, गुरु का मोतियाबिन्द न हुआ हो। वह चश्मा उतारना होगा जो किसी खास रंग का हो। उसे देखने के लिये निर्मल-अमल और शांत नजर चाहिए बस।
@विन्ध्येश्वरी
इस तथ्य का दूसरा पहलू यह भी है कि यदि यह सब कुछ परमात्मा में है तो क्या परमात्मा यही नहीं है? सच तो यही है यह सब परमात्मा के ही विभिन्न रूप हैं। अगर हम जन्म लेते हैं तो परमात्मा ही जन्म ले रहा है, हमारी मृत्यु में परमात्मा ही मरता है। हम सुखी हैं तो यह परमात्मा का ही सुख है और दुख भी परमात्मा ही है। सूरज का उगना और प्रकाश, पृथ्वी का घूर्णन और इस पर जीवन, पूर्णिमा का प्रकाश और चंद्रमा की शीतलता या अमावस्या की गहन रात्रि, वृक्षों का शांत स्थिर भाव से खड़े रहना या मस्ती से लहराना, पक्षियों की चहचहाहट, नदी का कलकल, भौरों का गुंजन, बच्चे की प्यारी मुस्कान या रुदन, प्रियतम का मधुर स्पर्श या दो घड़ी शुकून की नींद या सुबह की ताजगी। सब कुछ ही परमात्मा है। परमात्मा प्रतिपल हमारे पास है, उसे देखना सीख लो बस। उसे देखने के लिये अपनी नजर को निर्दोष रखना होगा। यानि उसमें किसी धर्म-मजहब, गुरु का मोतियाबिन्द न हुआ हो। वह चश्मा उतारना होगा जो किसी खास रंग का हो। उसे देखने के लिये निर्मल-अमल और शांत नजर चाहिए बस।
@विन्ध्येश्वरी
Thursday, 26 November 2020
सखी री! पनघट कितनी दूर
मनुष्य अपने परम स्वरूप के साक्षात्कार से कितना दूर है?
बहुत दूर नहीं है। उसे अपने सभी नाटक छोड़ने होंगे या नाटक में अभिनय का साक्षी होना होगा, बस। हम आप नाटक देखते हैं। नाटक में कई सारे पात्र होते हैं। हर पात्र की अलग अलग भूमिका होती है, अलग अलग संवाद होता है, अलग अलग कहानी होती है। वह अपने अभिनय में शादी, विवाह, बच्चे, नौकरी, मारकाट सब करता है। कल्पना कीजिये कि वह अपने अभिनय में गहरे तक डूब जाये। वह अपने को वही मान बैठे जिस भूमिका में है। फिल्म में सीन है कि अभिनेता को अपने सहअभिनेता की पिटाई करनी है। वह सचमुच उसे पीटने लगे। शादी हुई, सुहागरात है, अभिनेता अभिनेत्री सचमुच सुहागरात मनाने लगे। अभिनेता मर गया और अपने को सचमुच मरा मान बैठे। क्या होगा? आप कहेंगे ऐसा नहीं होता। हां! मैं भी यही कहता हूँ ऐसा नहीं होता और न ही ऐसा होना चाहिए।
हम भी इस संसार में एक नाटक खेल रहे हैं। हम भी वही सब कर रहे हैं जो परदे पर अभिनेता करता है। लेकिन हमारी भूल यह है कि हम अपने अभिनय को सच्चा मान ले रहे हैं। जिस प्रकार अभिनेता अभिनय के दौरान अपने वास्तविक स्वरूप को ध्यान रखता है, मार पीट, शादी, विवाह, बच्चे सब दिखावटी होते हैं, वह मरकर भी मरता नहीं। उसे पता होता है कि यह सब एक खेल है। उसी प्रकार हमें अपने निज स्वरूप का ज्ञान रहना चाहिए। सब कुछ करते हुए भी अकर्ता का भाव होना चाहिए। पत्नी को पत्नी, पति को पति, बच्चों को बच्चा, माता-पिता को माता-पिता, नौकरी को नौकरी, मृत्यु को मृत्यु, जीवन को जीवन मान कर नहीं चलना चाहिए। यह सब सांसरिक अभिनय के एक घटक मात्र हैं। कहानी खत्म अभिनय खत्म। अभिनय कीजिये उसमें उलझिये नहीं।
अभिनेता को अपने वास्तविक स्वरूप में आने के लिए अपने अभिनय से निकलना होगा। उसे वह होना होगा जो वह वास्तव में है। प्रश्न उठता है - "हम क्या हैं?" हम वही हैं जिस रूप में हम पैदा हुए हैं, नग्न, भाषा विहीन, सांसारिक ज्ञान से हीन, छल-छ्द्म विहीन, प्यारी सी मुस्कान के साथ सहज भाव और वर्तमान में जीने की ललक। न आने वाले कल की चिंता न गुजरे कल का मलाल। बस आज और सिर्फ़ आज। कभी आपने विचार किया कि कोई बच्चा इतना प्यारा क्यों लगता है? यही ऊपर कहे गये कारण हैं। और ज्यादा कुछ नहीं। वह परमात्मा के अधिक करीब है। हम भी परमात्मा के करीब पहुंच सकते हैं। हम भी अपने आपको जान सकते हैं। तरीका यही कि जैसा प्रभु ने हमें भेजा हम वैसा हो जायें।
@विन्ध्येश्वरी
बहुत दूर नहीं है। उसे अपने सभी नाटक छोड़ने होंगे या नाटक में अभिनय का साक्षी होना होगा, बस। हम आप नाटक देखते हैं। नाटक में कई सारे पात्र होते हैं। हर पात्र की अलग अलग भूमिका होती है, अलग अलग संवाद होता है, अलग अलग कहानी होती है। वह अपने अभिनय में शादी, विवाह, बच्चे, नौकरी, मारकाट सब करता है। कल्पना कीजिये कि वह अपने अभिनय में गहरे तक डूब जाये। वह अपने को वही मान बैठे जिस भूमिका में है। फिल्म में सीन है कि अभिनेता को अपने सहअभिनेता की पिटाई करनी है। वह सचमुच उसे पीटने लगे। शादी हुई, सुहागरात है, अभिनेता अभिनेत्री सचमुच सुहागरात मनाने लगे। अभिनेता मर गया और अपने को सचमुच मरा मान बैठे। क्या होगा? आप कहेंगे ऐसा नहीं होता। हां! मैं भी यही कहता हूँ ऐसा नहीं होता और न ही ऐसा होना चाहिए।
हम भी इस संसार में एक नाटक खेल रहे हैं। हम भी वही सब कर रहे हैं जो परदे पर अभिनेता करता है। लेकिन हमारी भूल यह है कि हम अपने अभिनय को सच्चा मान ले रहे हैं। जिस प्रकार अभिनेता अभिनय के दौरान अपने वास्तविक स्वरूप को ध्यान रखता है, मार पीट, शादी, विवाह, बच्चे सब दिखावटी होते हैं, वह मरकर भी मरता नहीं। उसे पता होता है कि यह सब एक खेल है। उसी प्रकार हमें अपने निज स्वरूप का ज्ञान रहना चाहिए। सब कुछ करते हुए भी अकर्ता का भाव होना चाहिए। पत्नी को पत्नी, पति को पति, बच्चों को बच्चा, माता-पिता को माता-पिता, नौकरी को नौकरी, मृत्यु को मृत्यु, जीवन को जीवन मान कर नहीं चलना चाहिए। यह सब सांसरिक अभिनय के एक घटक मात्र हैं। कहानी खत्म अभिनय खत्म। अभिनय कीजिये उसमें उलझिये नहीं।
अभिनेता को अपने वास्तविक स्वरूप में आने के लिए अपने अभिनय से निकलना होगा। उसे वह होना होगा जो वह वास्तव में है। प्रश्न उठता है - "हम क्या हैं?" हम वही हैं जिस रूप में हम पैदा हुए हैं, नग्न, भाषा विहीन, सांसारिक ज्ञान से हीन, छल-छ्द्म विहीन, प्यारी सी मुस्कान के साथ सहज भाव और वर्तमान में जीने की ललक। न आने वाले कल की चिंता न गुजरे कल का मलाल। बस आज और सिर्फ़ आज। कभी आपने विचार किया कि कोई बच्चा इतना प्यारा क्यों लगता है? यही ऊपर कहे गये कारण हैं। और ज्यादा कुछ नहीं। वह परमात्मा के अधिक करीब है। हम भी परमात्मा के करीब पहुंच सकते हैं। हम भी अपने आपको जान सकते हैं। तरीका यही कि जैसा प्रभु ने हमें भेजा हम वैसा हो जायें।
@विन्ध्येश्वरी
Tuesday, 24 November 2020
परमात्मा का दर्शन
कृष्ण गीता में कहते हैं- "स्व धर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मों भयावहः।" बुद्ध कहते हैं- "धम्मं शरणं गच्छामि।" जीसस कहते हैं- "प्रेम ही धर्म है।" महावीर कहते हैं- "एष धम्मो सनातनो।" आखिर ये लोग किस धर्म के बारे में कह रहे हैं? क्या कृष्ण हिंदू, बुद्ध बौद्ध, जीसस ईसाई या महावीर जैन धर्म के बारे में कह रहे हैं। मेरा मानना है - "नहीं"।दरअसल हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम, पारसी, सिक्ख आदि धर्म ही नहीं हैं। ये परमात्मा को देखने के चश्मे मात्र हैं। जो व्यक्ति जिस चश्मे में पला बढ़ा उसे परमात्मा उसी रंग में दिखने लगा। ईसाई का परमात्मा जीसस जैसा है, हिंदू के लिये करोड़ों भगवानों जैसा, बौद्ध के लिये बुद्ध जैसा, जैन के लिये महावीर जैसा, मुस्लमान के लिये देवदूत मुहम्मद जैसा और निराकार, सिक्ख के लिये नानक और गुरुग्रंथ जैसा आदि। लेकिन ये सभी रामपुर गांव के चार अंधों से अधिक नहीं हैं जिन्होंने गांव में आये हुए हाथी को अलग-अलग तरह से अनुभव किया। जिस अंधे ने हाथी का पैर छुआ उसे हाथी खंभे जैसा लगा, जिसने कान छुआ उसे हाथी सूप जैसा लगा, जिसने पूंछ छुआ उसे हाथी झाड़ू जैसा लगा और जिसने पेट छुआ उसे नगाड़े जैसा लगा। अब चारों आपस में झगड़ रहे हैं। हाथी ऐसा है, हाथी वैसा है। आपको क्या लगता है इसमें से कौन सही और कौन गलत है? क्या आप इनमें से किसी अंधे को यह प्रतीति दिला सकते हैं कि हाथी हाथी जैसा है। संभवतः नहीं।
दरअसल सभी सही हैं और कोई भी सही नहीं है। हाथी को समग्रता में जानने के लिए दृष्टि चाहिए लेकिन दुर्भाग्य है वे सभी अंधे हैं। अब हाथी को समझने के दो तरीके हो सकते हैं चारों अंधे यह मान लें कि जो अनुभव चारों को हुआ है हाथी वैसा है। या फिर ऐसी दृष्टि विकसित किया जाये जिससे हाथी समग्रता में दिखे। हाथी तो सिर्फ हाथी जैसा है। उसकी कोई परिभाषा नहीं है। कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। सभी परिभाषाएं, सभी सिद्धांत, सभी परिकल्पनाएं द्वंद पैदा करेंगी।
परमात्मा भी ऐसा ही है। अपरिभाषेय, अपरिकल्पनीय, असैद्धांतिक। परमात्मा सिर्फ परमात्मा जैसा है। उसे सभी धर्मों की सार बातों को मिलाकर भी नहीं जाना जा सकता क्योंकि फिर भी कुछ छूट जाता है, कुछ कसक रह जाती है, कुछ कमी बच जाती है। परमात्मा को जानने के लिए अपनी दृष्टि चाहिए। जो निर्दोष हो, शांत हो। क्या आपको लगता है कि यदि हमारी आंख में दोष होगा तो परमात्मा पूर्ण रूप से दिख जायेगा या अगर हमारी आंख किसी दूसरी चीज को देख रही होगी तो परमात्मा दिख जायेगा? नहीं। बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि अगर हम सिनेमा देख रहे और उस समय कोई हम से बात कर रहा हो या हमें कोई दूसरी चीज दिखा रहा हो तब हमारी आंख उस चीज को न तो देख पायेगी और कान उस बात को न सुन पायेगा। फिर हम उसे जान भी नहीं पायेंगे। इसी प्रकार परमात्मा भी शांत और निर्दोष चित्त में घटता है, यहीं उतरता है। या यूं कहें यहीं दिख जाता है। जैसे ही हम शांत होंगे, निर्दोष होंगे परमात्मा प्रकट हो जायेगा।परमात्मा का प्राकट्य, परमात्मा का साक्षात्कार "स्व धर्म" यानि स्वयं को जानने से होता है। इनमें से कोई भी धर्म स्वयं से साक्षात्कार करवाने में असमर्थ है। स्वयं को जानना के लिये हमें स्वयं पर भरोसा करना होगा और स्वयं उद्यम करना होगा। संसार में रहकर, सांसरिक कृत्य करते हुए भी संसार में उलझना नहीं है। जब हम सब कुछ देखते हुए भी अपनी प्रिय चीज को देख रहे होंगे तब सब कुछ देखते करते हुए भी हमें वही चीज दिखेगी। परमात्मा से प्रिय इस संसार में क्या हो सकता है? सब कुछ देखते हुए भी हमारी निर्दोष और शांत नजर बस उसी प्रियतम को ढूंढे। वह हमें दिखेगा ही दिखेगा।
@विन्ध्येश्वरी
दरअसल सभी सही हैं और कोई भी सही नहीं है। हाथी को समग्रता में जानने के लिए दृष्टि चाहिए लेकिन दुर्भाग्य है वे सभी अंधे हैं। अब हाथी को समझने के दो तरीके हो सकते हैं चारों अंधे यह मान लें कि जो अनुभव चारों को हुआ है हाथी वैसा है। या फिर ऐसी दृष्टि विकसित किया जाये जिससे हाथी समग्रता में दिखे। हाथी तो सिर्फ हाथी जैसा है। उसकी कोई परिभाषा नहीं है। कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। सभी परिभाषाएं, सभी सिद्धांत, सभी परिकल्पनाएं द्वंद पैदा करेंगी।
परमात्मा भी ऐसा ही है। अपरिभाषेय, अपरिकल्पनीय, असैद्धांतिक। परमात्मा सिर्फ परमात्मा जैसा है। उसे सभी धर्मों की सार बातों को मिलाकर भी नहीं जाना जा सकता क्योंकि फिर भी कुछ छूट जाता है, कुछ कसक रह जाती है, कुछ कमी बच जाती है। परमात्मा को जानने के लिए अपनी दृष्टि चाहिए। जो निर्दोष हो, शांत हो। क्या आपको लगता है कि यदि हमारी आंख में दोष होगा तो परमात्मा पूर्ण रूप से दिख जायेगा या अगर हमारी आंख किसी दूसरी चीज को देख रही होगी तो परमात्मा दिख जायेगा? नहीं। बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि अगर हम सिनेमा देख रहे और उस समय कोई हम से बात कर रहा हो या हमें कोई दूसरी चीज दिखा रहा हो तब हमारी आंख उस चीज को न तो देख पायेगी और कान उस बात को न सुन पायेगा। फिर हम उसे जान भी नहीं पायेंगे। इसी प्रकार परमात्मा भी शांत और निर्दोष चित्त में घटता है, यहीं उतरता है। या यूं कहें यहीं दिख जाता है। जैसे ही हम शांत होंगे, निर्दोष होंगे परमात्मा प्रकट हो जायेगा।परमात्मा का प्राकट्य, परमात्मा का साक्षात्कार "स्व धर्म" यानि स्वयं को जानने से होता है। इनमें से कोई भी धर्म स्वयं से साक्षात्कार करवाने में असमर्थ है। स्वयं को जानना के लिये हमें स्वयं पर भरोसा करना होगा और स्वयं उद्यम करना होगा। संसार में रहकर, सांसरिक कृत्य करते हुए भी संसार में उलझना नहीं है। जब हम सब कुछ देखते हुए भी अपनी प्रिय चीज को देख रहे होंगे तब सब कुछ देखते करते हुए भी हमें वही चीज दिखेगी। परमात्मा से प्रिय इस संसार में क्या हो सकता है? सब कुछ देखते हुए भी हमारी निर्दोष और शांत नजर बस उसी प्रियतम को ढूंढे। वह हमें दिखेगा ही दिखेगा।
@विन्ध्येश्वरी
Sunday, 8 November 2020
सुख और शांति
लोग कहते हैं - "सुख नहीं है, शांति नहीं है।"
मैं कहता हूँ - "न है और तब न ही हो सकती जब तक कि अपने घर नहीं लौटोगे। अपने घर लौट आओ। वहाँ सर्वत्र सुख, शांति, प्रेम, आनन्द और विश्राम लबालब है।"
आप कहेंगे कि "क्या हम घर नहीं आये हैं या आते हैं? हम तो रोज शाम को अपने घर लौटते हैं, काम से थके-मांदे और कुछ कमाकर।"
"सच कहते हैं लेकिन एक आपका भौतिक घर है दूसरा आपकी आत्मा का घर है।"
"जिस प्रकार काम से थक-मांद कर आप घर लौटते हैं। वहां पत्नी, मां-पिता और बच्चों का प्यार मिलता है, पीने को एक गिलास पानी, खाने को खाना मिलता है, सुख से सोने के लिए बिस्तर मिलता है। ठीक उसी प्रकार जब आप अपने भीतर प्रवेश करते हैं तब वहां आपको चिरशांति, प्रेम, आनन्द और रस आदि प्राप्त होता है।"
"इसके लिये आपको कुछ खास नहीं कर होता है। बैठ कर या लेट कर बस अपने आपको ढीला छोड़ देना है। सांस शिथिल, शरीर शिथिल। फिर विचारों को भी ढीला छोड़ देना है। विचार थोड़े हठी होते हैं। जब आप इनका साथ देते तब ये आपके साथ रहते हैं। बस इन्हें आने दीजिये और जाने दीजिये। इन्हें आता-जाता देखिये। कोई इनसे मिलिये मत। सिर्फ़ विचारों को देखिये। आप पायेंगे कि विचार एकदम शांत हो गये हैं। जिस क्षण शरीर, मन और विचार शांत होगें, उसी क्षण आप अपने भीतर प्रविष्ट हो जायेंगे। आपको अपना असली घर मिल जायेगा।"
मैं कहता हूँ - "न है और तब न ही हो सकती जब तक कि अपने घर नहीं लौटोगे। अपने घर लौट आओ। वहाँ सर्वत्र सुख, शांति, प्रेम, आनन्द और विश्राम लबालब है।"
आप कहेंगे कि "क्या हम घर नहीं आये हैं या आते हैं? हम तो रोज शाम को अपने घर लौटते हैं, काम से थके-मांदे और कुछ कमाकर।"
"सच कहते हैं लेकिन एक आपका भौतिक घर है दूसरा आपकी आत्मा का घर है।"
"जिस प्रकार काम से थक-मांद कर आप घर लौटते हैं। वहां पत्नी, मां-पिता और बच्चों का प्यार मिलता है, पीने को एक गिलास पानी, खाने को खाना मिलता है, सुख से सोने के लिए बिस्तर मिलता है। ठीक उसी प्रकार जब आप अपने भीतर प्रवेश करते हैं तब वहां आपको चिरशांति, प्रेम, आनन्द और रस आदि प्राप्त होता है।"
"इसके लिये आपको कुछ खास नहीं कर होता है। बैठ कर या लेट कर बस अपने आपको ढीला छोड़ देना है। सांस शिथिल, शरीर शिथिल। फिर विचारों को भी ढीला छोड़ देना है। विचार थोड़े हठी होते हैं। जब आप इनका साथ देते तब ये आपके साथ रहते हैं। बस इन्हें आने दीजिये और जाने दीजिये। इन्हें आता-जाता देखिये। कोई इनसे मिलिये मत। सिर्फ़ विचारों को देखिये। आप पायेंगे कि विचार एकदम शांत हो गये हैं। जिस क्षण शरीर, मन और विचार शांत होगें, उसी क्षण आप अपने भीतर प्रविष्ट हो जायेंगे। आपको अपना असली घर मिल जायेगा।"
@विन्ध्येश्वरी
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