उस परमात्मा की पूजा करने की आवश्यकता क्या है? प्रतिपल प्रतिक्षण उस परमात्मा की पूजा हो ही रही है। सूरज, चांद और तारे उसकी आरती कर रहे हैं। पृथ्वी और ग्रह उपग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं। फूल उस पर सुगंध अर्पित कर रहे हैं। संसार भर के अन्न और फल उसे नैवेद्य अर्पित कर रहे हैं। नीला अंबर उसका परिधान है। नरम नरम बादल रूई के पाहे हैं। इंद्रधनुष उसका यज्ञोपवीत है। पक्षी कलरव करके उसकी स्तुति गा रहे हैं। मोर नाच कर उसे रिझा रहे हैं। नदियां उसको स्नान करा रही हैं। बारिस की फुहारें उसे आचमन दे रही हैं। मस्त बसंती हवा उसे पंखा कर रही है। यह विराट पूजा अनन्त अनन्त काल से चल ही रही है। क्या है हमारे भीतर यह सामर्थ्य की ऐसी विराट पूजा कर सकें? नहीं है और न ही हो सकती है। और ऊपर से यह हम जो तुच्छ पूजा करते भी हैं उसमें अपनी तुच्छ मांग रख देते हैं। हमें इस पूजा के बदले यह दो, वह दे दो। उस परम आत्मा को अपने हृदय के मंदिर में बसा न सके और उसे चार दीवारी के भीतर पत्थर में चिनवा कर सलाखों के पीछे कैद कर दिया। फिर उस कैदी परमात्मा से अपने सुखी जीवन की दुआएं मांगते हैं! वह परमात्मा हमें क्या खाक देगा? मांग सको तो मांग लो उस प्यारे से एक प्यारी सी झप्पी, एक परम सुख का आलिंगन। और फिर शरीक हो जाओ उस विराट की परम पूजा में। हर पल हर क्षण निहारो उस विराट पूजा को। जीते जी मुक्त हो जाओगे। नहीं रहेगा मृत्यु का भय, नहीं रहेगी वासना की दीवार। शरीर के साथ रहने पर भी जीवित रहोगे और न रहने पर भी जीवित रहोगे। सदा अमर।
@विन्ध्येश्वरी
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