Friday, 10 October 2025
खाद्य पदार्थों एवं खाद्य प्रवृत्तियों से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन
खाद्य पदार्थों एवं खाद्य प्रवृत्तियों से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन
आज मानव सभ्यता जिस जलवायु संकट से जूझ रही है, उसके मूल में केवल उद्योग, ऊर्जा या परिवहन क्षेत्र ही नहीं, बल्कि हमारी खाने की थाली भी एक प्रमुख कारण बन चुकी है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, विश्वभर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा केवल खाद्य प्रणाली (Food System) से आता है — जिसमें कृषि, पशुपालन, फसल उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन, उपभोग और अपशिष्ट सभी शामिल हैं। इस प्रकार भोजन अब केवल जीवन निर्वाह का साधन नहीं, बल्कि पृथ्वी के भविष्य को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक बन गया है।
ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख स्रोत
खाद्य प्रणाली से तीन प्रमुख गैसें उत्सर्जित होती हैं — कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄) और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)। कार्बन डाइऑक्साइड मुख्यतः कृषि यंत्रों के संचालन, परिवहन, और वनों की कटाई से उत्पन्न होती है। मीथेन गैस पशुधन के पाचन-प्रक्रिया, धान के खेतों और सड़ते हुए खाद्य अपशिष्ट से निकलती है, जबकि नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन रासायनिक उर्वरकों और गोबर के अपघटन से होता है।
इनमें से मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 28 से 34 गुना अधिक प्रभावशाली है, जबकि नाइट्रस ऑक्साइड 265 से 300 गुना अधिक शक्तिशाली है। इसीलिए कृषि और भोजन से जुड़ी गतिविधियाँ जलवायु परिवर्तन को तेजी से बढ़ाती हैं।
खाद्य प्रणाली में उत्सर्जन का अनुपात
वैश्विक स्तर पर यदि खाद्य प्रणाली को देखा जाए, तो लगभग 31 प्रतिशत उत्सर्जन पशुधन और चारा उत्पादन से, 27 प्रतिशत फसल उत्पादन से, 24 प्रतिशत भूमि उपयोग परिवर्तन (जैसे वनों की कटाई) से, और शेष 18 प्रतिशत प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और भंडारण से होता है। इस प्रकार खेत से लेकर थाली तक हर निवाले के पीछे कार्बन उत्सर्जन की एक लंबी श्रृंखला छिपी होती है।
कौन से खाद्य पदार्थ सबसे अधिक उत्सर्जन करते हैं?
खाद्य पदार्थों में सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पशु-आधारित खाद्य पदार्थों से होता है।
उदाहरण के लिए, गाय के मांस (बीफ़) से लगभग 60 किलोग्राम CO₂e प्रति किलो मांस उत्सर्जित होता है।
भेड़ के मांस से लगभग 24 किलोग्राम, चीज़ या पनीर से 21 किलोग्राम, जबकि मुर्गी मांस से लगभग 6 किलोग्राम CO₂e उत्सर्जन होता है। इसके विपरीत, धान जैसी फसलों से लगभग 4 किलोग्राम, सब्ज़ियों से 2 किलोग्राम, और दलहनों से मात्र 1 किलोग्राम CO₂e प्रति किलो उत्सर्जन होता है। इससे स्पष्ट है कि पशु आधारित भोजन, पौधा आधारित भोजन की तुलना में 5 से 10 गुना अधिक प्रदूषणकारी होता है।
खाद्य अपव्यय: एक मौन जलवायु संकट
विश्व स्तर पर हर वर्ष लगभग 1.3 अरब टन भोजन बर्बाद हो जाता है। यह मात्रा विश्व में उत्पादित कुल भोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। इस बर्बाद भोजन से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसें कुल वैश्विक उत्सर्जन का 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं। लैंडफिल या कचरा स्थलों में सड़ते भोजन से मीथेन गैस निकलती है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज करती है। यदि खाद्य अपव्यय को एक देश माना जाए, तो यह चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक होता। इस प्रकार “Food Waste” एक छिपा हुआ, पर अत्यंत गंभीर जलवायु संकट है।
खाद्य अपव्यय के मुख्य कारणों में भंडारण की कमी, परिवहन सुविधाओं की अनुपलब्धता, उपभोक्ताओं द्वारा अति-खरीदारी और रेस्तरां व घरों में अतिरिक्त खाना बनाना शामिल है। इसका समाधान “Zero Food Waste Policy”, बेहतर भंडारण तंत्र, बायोगैस उत्पादन और अतिरिक्त भोजन को जरूरतमंदों तक पहुँचाने के प्रयासों में निहित है।
बदलती खाद्य प्रवृत्तियाँ और उनका प्रभाव
पिछले कुछ दशकों में वैश्विक स्तर पर भोजन की प्रवृत्तियों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। विकासशील देशों में मांस और डेयरी उत्पादों की खपत तेजी से बढ़ी है, जिससे पशुधन पालन बढ़ा और मीथेन उत्सर्जन में इज़ाफा हुआ। इसके विपरीत, विकसित देशों में अब पौधा-आधारित आहार (Plant-based diet) जैसे शाकाहार, वीगन और फ्लेक्सिटेरियन डाइट लोकप्रिय हो रही हैं, जो ग्रीनहाउस गैसों को 50 से 75 प्रतिशत तक घटा सकती हैं।
शहरी जीवनशैली में बढ़ते प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड ने ऊर्जा की खपत और पैकेजिंग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को बढ़ा दिया है। हालांकि, अब एक नया वैश्विक रुझान “Eat Smart, Save Planet” उभर रहा है, जो भोजन के चयन और उपयोग को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बना रहा है।
क्षेत्रीय भिन्नताएँ
उत्तर अमेरिका और यूरोप में जहाँ मांस और डेयरी उत्पादों से उत्सर्जन प्रमुख है, वहीं एशिया, विशेषकर भारत और चीन में, धान की खेती, पशुधन, और रासायनिक उर्वरक मुख्य कारण हैं। अफ्रीकी देशों में भूमि उपयोग परिवर्तन और वनों की कटाई से ग्रीनहाउस गैसें अधिक निकलती हैं। इन सभी क्षेत्रों में कृषि प्रणालियों का जैविकीकरण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है।
वैश्विक आँकड़े
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और IPCC की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व स्तर पर कुल खाद्य प्रणाली से लगभग 13.7 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष (CO₂e) गैसों का उत्सर्जन होता है। केवल पशुधन उत्पादन से ही लगभग 7.1 अरब टन CO₂e निकलता है, जबकि खाद्य अपव्यय से लगभग 4.4 अरब टन CO₂e प्रति वर्ष उत्सर्जन दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि विश्वभर में लोग सतत (Sustainable) आहार अपनाएँ, तो खाद्य प्रणाली से उत्सर्जन में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी संभव है।
उत्सर्जन घटाने की दिशा में कदम
ग्रीनहाउस गैसों में कमी लाने के लिए कुछ व्यवहारिक और नीतिगत कदम अत्यंत आवश्यक हैं — जैसे कि पौधा-आधारित भोजन को बढ़ावा देना, मांस और दुग्ध उत्पादन में दक्षता बढ़ाना, खाद्य अपव्यय को कम करना, जैविक और पुनरुत्पादक खेती को अपनाना, स्थानीय भोजन की संस्कृति को प्रोत्साहन देना तथा वनों की रक्षा करना। इन कदमों से न केवल कार्बन उत्सर्जन घटाया जा सकता है, बल्कि मिट्टी, जल और जैव विविधता की भी रक्षा होती है।
निष्कर्ष
भोजन अब केवल पोषण का माध्यम नहीं रहा — यह पृथ्वी के तापमान और मानवता के भविष्य का निर्धारक बन चुका है। यदि हम अपनी खाने की आदतों में थोड़ा परिवर्तन करें — मांस की जगह दालें और सब्ज़ियाँ चुनें, भोजन की बर्बादी रोकें, और स्थानीय व प्राकृतिक खेती का समर्थन करें — तो हम न केवल जलवायु परिवर्तन को धीमा कर सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित, स्वच्छ और संतुलित पृथ्वी छोड़ सकते हैं।
और अंत में
“भोजन बचाना ही धरती बचाना है — क्योंकि हर थाली में भविष्य की जलवायु छिपी है।”
Tuesday, 7 October 2025
पंचतत्वों में असंतुलन
पंचतत्वों में असंतुलन
स्थूल रूप से प्रकृति का सृजन, संचालन, संतुलन आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तत्वों से है। लेकिन लोभ, लालच, तृष्णा, सुख की खोज में अंधा मनुष्य इन्हीं पंच तत्वों में विकृति उत्पन्न कर रहा है। सबसे पहले उसने पृथ्वी तत्व को खोदना प्रारंभ किया। कृषि और खनिजों की खोज यही है। वह खोद-खोदकर पृथ्वी के गर्भ में छिपे रत्नों को बाहर निकलता रहा। पृथ्वी को खोखला करता रहा। आज भी कर रहा है।
उसने जल में हानिकारक विषैले अपशिष्ट पदार्थो के निक्षेपण द्वारा जल तत्व को प्रदूषित किया। कार्बनिक ईंधनों का दहन कर पृथ्वी के गर्भ में दबे कार्बन को वायुमंडल में मुक्त कर दिया। इससे वायु तत्व विकृत हुआ। परमाणु सहित विधि शस्त्रास्त्र का निर्माण, बिजली का निर्माण, एलपीजी एवं सीएनजी गैसों को संशाधित करना अग्नि तत्व में विकृति का कार्य कर रहा है। सौर ऊर्जा को नियंत्रित करना अग्नि तत्व की विकृति को और उद्दीप्त करेगा। विगत एक शताब्दी में मनुष्य ने आकाश तत्व को भी हठात विकृत करना प्रारंभ कर दिया है।
विज्ञान की अंधी दौड़ में वह जीवन के लिये आवश्यक हर घटक को तहस-नहस कर रहा है। और इसे वह अपनी उपलब्धि मानता है, विकास मानता है।
आगामी समय यह अंधी दौड़ रुकने वाली नहीं है। वर्तमान में विश्व की कुल जनसंख्या लगभग 8.1 अरब है। जिसमें 1.64 अरब चार-पहिया गाड़ियाँ हैं यानी प्रति 1000 व्यक्तियों पर 203 कार। वहीँ लगभग 70.6 करोड़ दो-पहिया वाहन हैं। दो-पहिया वाहनों का औसत प्रति 1000 व्यक्ति 87। इसके विपरीत वर्त्तमान में भारत की जनसंख्या लगभग 1.45 अरब है जिसमें 5 करोड़ लोगों के पास चार-पहिया गाड़ियाँ हैं यानी प्रति 1000 व्यक्तियों पर 34 कारें। जबकि लगभग 26 करोड़ लोगों के पास दो-पहिया वाहन हैं। दो-पहिया वाहनों का औसत प्रति 1000 व्यक्ति 178।
अगर वैश्विक और भारत के संदर्भ में बढ़ते जनसंख्या के अनुपात में प्रतिवर्ष केवल 1% की दर से वृद्धि माना जाये तो आगामी 25 वर्षों में (सन 2050 तक) विश्व में चार-पहिया गाड़ियों की संख्या 2.49 अरब (254 वाहन प्रति 1000 व्यक्ति), दो-पहिया वाहनों की संख्या 1.07 अरब (109 प्रति 1000 व्यक्ति) जबकि भारत में चार-पहिया गाड़ियों की संख्या 7.17 करोड़ (43 कार प्रति 1000 व्यक्ति), दो-पहिया वाहनों की संख्या 37.3 करोड़ (222 वाहन प्रति 1000 व्यक्ति) हो जाएगी। इन वाहनों को बनाने, इनके चलने योग्य सड़कें बनाने, खनिज तेल खनन एवं प्रसंस्करण आदि को मिलाकर केवल निजी वाहनों से इससे वैश्विक तापन में 0.5℃-1.0℃ की वृद्धि संभावित है जो धरती को खासकर के विषुवत रेखीय प्रदेशों और उपोष्ण प्रदेशों जैसे भारत आदि को और गर्म अनुभव कराने वाला होगा। तापमान में 0.5℃-1.0℃ की वृद्धि अनुभव में 5% सदृश लगेगा।
इसका तात्पर्य है गर्मियां और अधिक गर्म होने वाली हैं। संभवतः आगामी वर्षों में भारत के आंतरिक भागों में पारा 55 से 60 के बीच पहुँचने वाला है। इससे दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्य सर्वाधिक प्रभावित होंगे। आने वाले वर्षों में यहाँ गर्मी बढ़ेगी तथा वर्षा की मात्रा कम होगी। इसका अर्थ है कि इन राज्यों में मरुस्थलीकरण में वृद्धि होगी। जबकि तटवर्ती प्रदेशों और राजस्थान आदि में चरम मौसमी घटनाएँ जैसे चक्रवात और अत्यधिक वृष्टि अधिक होंगी। वहीँ पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं में लगभग 60% से 70% वृद्धि हो जाएगी। व्यापक जलवायविक परिवर्तन से फसल चक्र दुष्प्रभावित होगा, फसलोत्पादन घटेगा, जलवायुजन्य और दिनचर्याजन्य अनजानी बीमारियाँ उत्पन्न होंगी। इन सबका व्यापक असर आम आदमी पर पड़ने वाला है।
इसके साथ लोगों को पक्के मकान की भी आवश्यकता है। वैश्विक तापन में इसका भी अहम् योगदान होने वाला है। हमको लग रहा है कि हम और हमारा विज्ञान बहुत तरक्की कर रहा है लेकिन हम गर्त में जा रहे हैं। बहुत सम्भावना है कि हम समूची मानवता का विनाश करने जा रहे है। कारण वही है पञ्चतत्वों का असंतुलन।
बोनस प्वाइंट
*लगे हाथ आपको बता दें कि श्रीमद्देवीभागवत, श्रीमद्भागवत, भविष्य पुराण आदि में लिखा है कि कलिकाल के अंत में 12 सूर्य एक साथ चमकेंगे। मतलब चरम ग्लोबल वार्मिंग की भविष्यवाणी भी हमारे ग्रंथों में है। अभी बता दे रहा हूँ फिर यह मत कहना कि पहले नहीं बताया। भारत के पंडित, पुजारी या पोंगापंथी लोग तब बतातें जब कोई घटना घट जाती है। वे बाद में कहते हैं कि ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा है। पहले ही बता दे रहा हूँ। ऐसा लिखा है। और किसी की माँ ने दूध नहीं पिलाया है कि इसे रोक सके। ग्लोबल वार्मिंग होकर रहेगा। 12 सूर्य एक साथ चमकेंगे।
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