Friday, 31 July 2020

एक अनुभव : मृत्यु का अनुभव

एक अनुभव : मृत्यु का अनुभव

आज रात (30 जुलाई 2020) एक महीने के बाद एक ऐसा शानदार अनुभव हुआ जो संभवतः अब मिले न मिले। वह अनुभव है, मृत्यु का अनुभव। सच परम अनुभव था।

मैं विगत एक महीने से भौतिक शरीर से सूक्ष्म शरीर को निकालने का अभ्यास कर रहा था। प्रायः रात में। कभी-कभी दिन में भी। लेकिन अभी तक आंशिक सफलता ही मिलती थी। सूक्ष्म शरीर निकलने की कोशिश करता था किंतु नहीं कर पाता था। इसका नतीजा यह होता था कि काफी देर तक सिर और शरीर में दर्द रहता था। मगर आज तो कमाल ही हो गया।

आज रात जब मैं लेटकर अभ्यास कर था। मुझे अनुभव हुआ कि शरीर से आत्मा पृथक हो गयी है और यह भौतिक शरीर अचेत पड़ा हुआ है। मेरा सूक्ष्म शरीर उसे देख रहा है।*

अच्छा तो यह है मेरा शरीर!……… 
अच्छा तो अब यह अचेत पड़ा है!…… 
ठीक है!…… 

और फिर मैं आगे बढ़ गया। जहाँ तक मेरा अनुमान है लगभग एक घंटा मैं इसी अवस्था में रहा फिर वर्तमान अवस्था में वापस आ गया।

यह एक घंटा अविस्मरणीय क्षण है। इतना आनन्द, इतना शुकून, इतनी शांति, इतना निर्विकार, इतना निर्अहंकार। सचमुच अवर्णनीय। फिर यह ज्ञात हुआ कि

1- मृत्यु जैसा कुछ नहीं है। जीवन एक भ्रम है। ठीक वैसे जैसे समुद्र से एक गिलास पानी निकाल कर हम उसको फ्रीजर में रखकर जमा दें और उसे बर्फ मानकर खुश हो लें। ऐसे अनन्त ऊर्जा के समुद्र से थोड़ी सी ऊर्जा निकालकर अलग - अलग पिंडों (शरीरों) में रखकर जीवन बना है। जीवन बर्फ बनाना है और मृत्यु उस गिलास से मुक्त होना।

2- तुलसीदास ने लिखा है कि "जनमत मरत दुसह दुख होइ।" जन्म के समय का तो याद नहीं है लेकिन कम से कम आज मुझे तो मृत्यु में आनन्द, नहीं परमानन्द आया। शायद तुलसी की बात उनके लिए सच हो जो मरना नहीं चाहते। जिन्हें मरने से डर लगता है। ठीक वैसे ही जैसे गिलास में बना हुआ बर्फ बाहर न निकलना चाह रहा हो। और जब उसे जबर्दस्ती निकालना पड़े तो ठोक पीटकर निकाला जाये।

3- अब मैं सोंचता हूँ कि काश! मरने का यह अनुभव हर किसी को हो। संभव है पृथ्वी पर मृत्यु का भय न रह जाये।

4- मैंने महसूस किया कि इस ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जाएं मौजूद हैं। और उनका किसी से कोई बैर विरोध नहीं। सब स्वतंत्र और मुक्त हैं। काश ऐसी ही यह दुनिया भी हो पाती। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे - समुद्र से पानी निकाल कर अलग अलग पात्रों में रख दिया जाये। लोटा, गिलास, चम्मच, थाली, कढ़ाही, भगोना, भदेली, टब आदि। अब इन्हें अगर बर्फ बनाया जायेगा तो अलग अलग आकार-प्रकार में बर्फ बनेगा। कौन सा बर्फ श्रेष्ठ है, कौन सा घटिया कौन बता सकता है? अब यह प्रक्रिया अगर बार बार दुहरायी जाये। यानी इस बर्फ को फिर से पानी बनाकर फिर से विभिन्न बर्तनों में भरकर बर्फ बनाया जाये तो कौन बता सकता है कि किस बर्तन का पानी कहाँ है? मुझे महसूस हुआ कि इस अनन्त ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जा का समुद्र है। इसी में से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, मुस्लमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, ऊँचा, नीचा, गरीब, अमीर, स्त्री, पुरुष, जानवर, वृक्ष सब बनते हैं। यही प्रक्रिया अनन्त कालों से जारी है पता नहीं कौन सा व्यक्ति क्या था, क्या है और आगे क्या होगा। अगर मरने का सच सब अनुभव कर लें तो दुनिया का वितंडा ही खत्म हो जायेगा।

4- एक कसक बाकी रह गयी कि अगर इस दौरान किसी अन्य सूक्ष्म आत्मा से मुलाकात हो जाती तो कम से कम उसका भी अनुभव पूछ लिया जाता।

*चेतावनी- यदि आप यह अभ्यास कर रहे हैं तो कृपया ध्यान दें कि यदि आप अपने आपको संभाल न पाये तो दुनिया की नजर में आप मृत भी घोषित हो सकते हैं क्योंकि यह एक मृत्यु जैसा अनुभव ही है। अतः आप इसे अपने रिस्क पर करें। संभव है कि सूक्ष्म शरीर को आपका भौतिक शरीर पूरी तरह स्वीकार न कर सके अतः, पक्षाघात जैसी समस्या भी हो सकती है। क्योंकि कई बार यह करने पर मेरे शरीर में भिन्न-भिन्न अंगों में अनायास दर्द की समस्या हो चुकी है।

परम शांति- विन्ध्येश्वरी

Thursday, 30 July 2020

इतिहास में संख्यात्मक व्यवस्था

1- नवरत्न- चंद्रगुप्त द्वितीय और अकबर के शासनकाल में (नवरत्न में राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सभी प्रकार के लोग शामिल)

2- अष्टदिग्गज- विजयनगर साम्राज्य में कृष्णदेव राय के शासनकाल में (केवल सांस्कृतिक लोग)

3- अष्टप्रधान- मराठा साम्राज्य में (प्रशासनिक लोग)

4- अष्टछाप- भक्तिकाल में कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवियों का समूह

5- सप्तांग सिद्धांत- आचार्य चाणक्य द्वारा वर्णित शासन व्यवस्था (1- राजा-सिर, 2- अमात्य-आंख, 3- जनपद-जंघा,4- दुर्ग-बांह, 5- कोष - मुख, 6- दंड/बल/सेना - मस्तिष्क, 7- मित्र - कान)

6- पंच प्रांत - अशोक कालीन प्रांत (1- उत्तरापथ - तक्षशिला, 2- अवंति राष्ट्र - उज्जयिनी, 3- कलिंग प्रांत - तोसली, 4- दक्षिणापथ - सुवर्णगिरि, 5- प्राची (मध्यदेश) - पाटलिपुत्र)


@विन्ध्येश्वरी

अस्थायी वर्णव्यवस्था

वेद, पुराण और इतिहास से कुछ उदाहरण जहाँ वर्ण व्यवस्था स्थायी व्यवस्था नहीं थी। लोग एक वर्ण से दूसरे वर्ण में स्थानान्तरित हुए-

1- ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे। परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की। ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है।

2- ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे। जुआरी और हीन चरित्र भी थे। परन्तु बाद मेंं उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये। ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया। (ऐतरेय ब्राह्मण 2.19)

3- सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।

4- राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। (विष्णु पुराण 4.1.14)

5- राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए। पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। (विष्णु पुराण 4.1.13)

6- धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। (विष्णु पुराण 4.2.2)

7- आगे उन्हीं के वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए। (विष्णु पुराण 4.2.2)

8- भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए।

9- विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने।

10- हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए। (विष्णु पुराण)

11- क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। (विष्णु पुराण (4.8.1)
12- वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए। इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं।

13- मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने।

14- ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना।

15- राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ।

16- त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे।

17- विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया।
विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया।

18- विदुर दासी पुत्र थे तथापि वे ब्राह्मण हुए
और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया।

@विन्ध्येश्वरी

Wednesday, 29 July 2020

एलीफेंट बाॅण्ड

एलीफेंट बाॅण्ड

1 - सुरजीत एस. भल्ला की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय सलाहकार समूह द्वारा जारी करने का सुझाव।

2 - एलिफेंट बाॅण्ड के बारे में-
• एलिफेंट बाॅण्ड किसी राष्ट्र द्वारा जारी 25 वर्षीय - (20-30 वर्ष के रेंज में) सॉवरेन बाॅण्ड होते हैं।
• ये बाॅण्ड उन लोगों को जारी किये जाते हैं जो अपनी पहले से अघोषित आय को घोषित करते हैं।
• बाॅण्ड ग्राहक अपनी अघोषित आय का 40% एलिफेंट बाॅण्ड में निवेश करेंगे तथा उन्हें एक निश्चित कूपन प्रतिभूति (Fixed Coupon Security) जारी की जाएगी।
• बाॅण्ड से प्राप्त राशि का 45% जमाकर्त्ता के पास जमा की जाएगी तथा शेष 15% राशि सरकार द्वारा कर के रूप में वसूली जाएगी।
3 - सुझाव-
• इससे भारत का विदेशों में जमा काले धन का लगभग 500 बिलियन डॉलर तक प्राप्त किया जा सकता है।
• अवसंरचना परियोजनाओं को गति प्रदान किया जा सकता है।
• आय घोषित करने वालों को “विदेशी मुद्रा, काले धन कानूनों और कराधान कानूनों सहित सभी कानूनों से प्रतिरक्षा प्राप्त होगी।
• अघोषित संपत्ति वाले लोग केवल 15 प्रतिशत कर का भुगतान करेंगे और एलिफेंट बाॅण्ड के प्रावधानों के तहत उनके लिये कोई दंड नहीं होगा।
4- वैश्विक पहल
• इंडोनेशिया, पाकिस्तान, अर्जेंटीना और फिलीपींस जैसे देशों ने भी बिना किसी दंड के जोखिम के अघोषित आय का खुलासा करने वाले व्यक्तियों के लिये कर माफी योजनाएँ शुरू की हैं।
5- पूर्व में किया गया पहल-
• 1981 में कालेधन के लिए स्‍पेशल बियरर बांड अधिनियम 1981 को पेश किया गया था।
• मोदी सरकार ने 2016 में प्रधान मंत्री गरीब कल्‍याण डिपोजिट योजना (PMGKDS) को पेश किया था।

@विन्ध्येश्वरी

Monday, 27 July 2020

दुनिया में महिलाओं का सबसे बड़ा मेला (गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड के अनुसार)

दुनिया में महिलाओं का सबसे बड़ा मेला

गिनीज़ बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड के अनुसार भारत में केरल राज्य के थिरुवनंतपुरम में संसार में महिलाओं द्वारा आयोजित सबसे बड़ा धार्मिक अनुष्ठान होता है। जिसमे लाखों महिलाई जाति, धर्म, ऊँच नीच के भेदभाव को भुलाकर दूर दूर से चलकर थिरुवनंतपुरम के प्राचीन आट्टूकल भगवति (देवी) मंदिर के प्रांगण में बिना किसी बुलावे या निमंत्रण के एकत्रित होती हैं।

यहाँ इस मंदिर में प्रति वर्ष फरवरी मार्च के महीने में दस दिनों का उत्सव होता है। उत्सव भरणी /कृत्तिका नक्षत्र के दिन प्रारंभ होता है। नौवां दिन विशेष महत्त्व का रहता है जब सभी महिलाएं देवी के लिए नैवेद्य के रूप में वहीं चूल्हे जलाकर खीर पकाती हैं। इसलिए इस ख़ास अनुष्ठान का नाम है “पोंगाला” है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है उफनने तक उबालना। इस तरह के पोंगाला का प्रचलन तमिलनाडु में भी कई जगह है परन्तु जो बात आट्टूकल में है वह अन्यत्र नहीं।

पिछली बार यह संख्या 15 लाख थी। जहाँ देखो वहां चूल्हा, सड़क के दोनों ओर, स्थानीय निवासियों के घरों के कम्पाउंड, दफ्तरों के बाहर या कहें जहाँ जगह मिली वहीं। मंदिर के लगभग 5 किमी की परिधि में यत्र तत्र सर्वत्र परन्तु कतारबद्ध।

यह त्यौहार केवल महिलाओं के लिए है और पुरुष इसमें भाग नहीं ले सकते। मूलतः यह एक आदिम (अवैदिक) परंपरा रही है और समाज के निम्न वर्ग ही इसमें भाग लिया करते थे। परन्तु अब स्थितियां बदल गयी हैं। अब तो सभी वर्ण के लोग और बड़ी - बड़ी हस्तियां भी यहाँ देखी जा सकती हैं। इसलिए इस पोंगाला को महिलाओं की शबरीमला कहा जाता है।

@साभार अंतर्जाल

Saturday, 25 July 2020

नागपंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा

नागपंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा

उ. प्र. में नागपंचमी के दिन गुड़िया पीटने की प्रथा है। एक तरह से यह दासप्रथा और स्त्रियों के गौरव गरिमा के विरुद्ध प्रथा है। लेकिन हम इसे भी शान से मनाते आ रहे हैं।

इस संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। कुछ समय बाद तक्षक की चौथी पीढ़ी की बेटी/कन्या की शादी राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में हुई। जब वह शादी करके ससुराल में आई तो उसने यह राज एक सेविका को बता दिया और उससे कहा कि वह यह बात किसी से न कहें, लेकिन सेविका से रहा नहीं गया और उसने यह बात किसी दूसरी महिला को बता दी।

इस तरह बात फैलते-फैलते पूरे नगर में फैल गई। इस बात से तक्षक राजा को क्रोध आ गया और क्रोधित होकर उसने नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा होने का आदेश देकर कोड़ों से पिटवाकर मरवा दिया। उसके पीछे राजा को इस बात का गुस्सा था कि 'औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती'। माना जाता है कि तभी से गुड़िया पीटने की परंपरा मनाई जा रही है।

दूसरी कहानी यह है -

एक लड़की का भाई भगवान भोलेनाथ का परम भक्त था और वह प्रतिदिन मंदिर जाता था। उस मंदिर में उसे हर रोज 'नाग' देवता के दर्शन होते थे। वह लड़का हर दिन नाग देवता को दूध पिलाने लगा और धीरे-धीर दोनों में प्रेम हो गया। नाग देवता को उस लड़के से इतना प्रेम हो गया कि वो उसे देखते ही अपनी मणि छोड़ उसके पैरों में लिपट जाता था।

इसी तरह एक दिन श्रावण के महीने में दोनों भाई-बहन एकसाथ मंदिर गए। मंदिर में जाते ही 'नाग' देवता लड़के को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया और बहन ने जब यह नजारा देखा तो उसके मन में भय उत्पन्न हुआ। उसे लगा कि नाग उसके भाई को काट रहा है। तब लड़की ने भाई की जान बचाने के लिए नाग को पीट-पीटकर मार डाला।

इसके बाद जब भाई ने पूरी कहानी बहन को सुनाई तो वह रोने लगी। फिर वहां उपस्थित लोगों ने कहा कि 'नाग' देवता का रूप होते हैं इसीलिए तुम्हें दंड तो मिलेगा, चूंकि यह पाप अनजाने में हुआ है इसलिए कालांतर में लड़की की जगह गुड़िया को पीटा जाएगा। इस तरह गुड़िया पीटने की परंपरा शुरू हुई। 

Friday, 24 July 2020

क्या सांप दूध पीते हैं?

क्या सांप दूध पीते हैं?

जी नहीं, साँप दूध नहीं पीते ǀ आप कह सकतें हैं कि “आप क्या बात करतें हैं, हमनें कितनीं ही बार सपेरों (साँप पकडनें वाले) को दूध पिलाते देखा है”ǀ हाँ, आपनें अवश्य देखा होगा लेकिन उसकी वास्तविकता कुछ और ही हैǀ

पहले मैं आपको यह बता दूँ कि साँप दूध क्यों नहीं पीते? प्रकृति अपनें में ‘परफेक्ट’ और मितव्ययी हैǀ अर्थात वह प्राणियों में उन्हीं अंगों और रसायनों का निर्माण करती है जिसकी उस प्राणी को आवश्यकता होती हैǀ साँप के आमाशय या आँत में दूध को पचा सकनें वाले रसायन का निर्माण ही नहीं होता अतः दूध का पाचन संभव नहीं ǀ जिस भोजन का पाचन प्राणी नहीं कर पाता उसका सेवन भी नहीं करता ǀ अतः साँप भी दूध नहीं पीता ǀ

अब दूसरी बात कि क्या पी सकता है? तो उसका भी उत्तर है कि नहीं, क्यों कि लचीले गालों की अनुपस्थिति में वह तरल पदार्थों को मुँह में खींच नहीं सकता तथापि निचले जबड़े से जुडी बहुत सी त्वचा की सिकुड़न स्पंज की तरह पानीं को शोषित कर मुँह में डाल सकती है (Cundall, David. Drinking in Snakes: Resolving a Biomechanical Puzzel, 2012, Lehigh Univ , News Article), परन्तु दूध को नहीं क्यों कि दूध एक ‘कोल्याड़ल सल्यूशन’ होनें के कारण पानीं की सापेक्ष काफी गाढ़ा होता है/

सपेरे नाग पंचमी से एक महीने पहले से ही साँपों को पकड़ना प्रारम्भ कर देते है और इन्हे भूखा रखतेǀ साँप अपनीं पानी की जरूरत अपनें शिकार के शरीर में उपस्थित पानी से करता है और बहुत विवशता या फिर बहुत दिनों से शिकार न मिलनें पर प्यास से जूझ रहा हो तब ही वो किसी तरल पदार्थ की ओर आकर्षित होता है ǀ बहुत दिनों से भूखा-प्यासा साँप न केवल कमजोर हो जाता है वरन डिहाइड्रेशन का भी शिकार हो जाता हैǀ अब जब पीड़ित साँप के मुँह को दूध के पात्र में डाला जाता है तो ‘मरता क्या न करता’ की हालत में कुछ दूध वो पी लेता है लेकिन तुरंत ही अपना मुँह हटा लेता है ǀ लेकिन सपेरे को तो आज दिन भर उसी साँप को दूध पिलाना हैǀ तो वो क्या करता है, देखिये -

अब आता हूँ तीसरी बात पर कि फिर ये सपेरे क्या करतें है?उसका मैं चित्रों के माध्यम से बतानें का प्रयास करता हूँ -


चित्र संख्या ०१


चित्र संख्या ०२

पहले चित्र में ‘क्यू’ क्लिप के बीच में एक नली का खुला सिरा दिखाई दे रहा हैǀ यह ‘ग्लोटिस’ है और जो नली दिखाई दे रही है वह ‘ट्रैकिया’ या ‘विंड़ पाईप’ या स्वाँस नली हैǀ जैसा कि दोनों चित्रों में दिखाई दे रहा है कि ‘ग्लोटिस’ निचले जबड़े में सबसे आगे की ओर खुलता है और जब जबड़े बंद होते हैं तो खिंच कर बाहर तक पहुँच जाता हैǀ ‘ट्रैकिया’ या ‘विंड़ पाईप’ या स्वाँस नली एक लम्बी संरचना होती है और ह्रदय के पास पहुँच कर दो भागों में विभक्त हो जाती है – एक बाँया भाग और दूसरा दाहिना भागǀ दोनों भाग अपनी और के फेफड़ों से जुड़े रहते हैं ǀ बायाँ फेफड़ा छोटा और अविकसित होता है जब कि दाहिना पूर्ण विकसित और बहुत लम्बा होता हैǀ इसका हृदय की और का भाग स्वसन में भाग लेता है जब की पीछे वाला भाग एक गुब्बारे जैसा ही होता है जिसमे हवा भरी तो रह सकती है परन्तु उस भाग में स्वसन नहीं होता हैǀ वायु इसी क्रम में फेफड़ों में आती है और इसके विपरीत क्रम में बाहर जाती है ǀ नीचे दिया

चित्र संख्या ०३

अब जब सपेरे को दूसरी–तीसरी जगह साँप दूध पिलाना है तो वो साँप को नीचे दिखाये गये तरीके से पकड़ता है

चित्र संख्या ०४


चित्र संख्या ०५

स्वांस नली दबाव के कारण बंद हो जाती है ǀआठ-दस मिनट में उसके फेफड़े की ऑक्सीजन समाप्त होनें लगती है और अब जब सपेरा साँप के मुँह को दूध के पात्र में डालता है तो सांस खीचनें के साथ दूध उसके फेफड़ों में भर जाता है ǀ पात्र कुछ खाली हो जाता है और हम नाग देवता का आशीर्वाद मान खुश होतें है और अपनें ‘नाग देवता’ को धीमी परन्तु निश्चित मौत की ओर प्रयाण करनें के लिए हर्षित मन से बिदा कर देते हे ǀ

सपेरे जब साँपों को पकड़ते हैं तो सर्व प्रथम ज़हर के दाँत तोड़ देते है, उसकी पीड़ा, फिर भूख-प्यास की तड़प और अंत में जब दूध या तो पेट में गया या फिर फेफड़े मेंǀ पेट में जानें पर दूध की प्रोटीन और पानीं अलग हो गया ǀ पानीं से लाभ हुआ कि डिहाइड्रेशन की समस्या कुछ कम हुयी परन्तु प्रोटीन का पाचन तो संभव ही नहीं, क्योंकि दूध में पायी जानें वाली 'प्रोटीन' के पाचन के लिए जिस 'एंजाइम' की आवश्यकता होती है वह 'एंजाइम' साँप के आमाशय में नहीं पाया जाता है; और दूसरी ओर मुँह घायल अतः कुछ निगला भी नहीं जा सकता तो फिर कमजोर तो हो ही जाना है ǀ अब यदि दूध फेफेड़े में जमा हो गया जिसकी संभावना रहती ही रहती है, तो साँस भी नहीं ली जा सकती और तब उन नाग देवता को जिनकी हमनें 15-20 दिन पहले पूजा की थी हमनें ही स्वर्ग की राह दिखा दी ǀ अब यह तो आप ही निर्णय लें कि आपको श्राप मिला या आशीर्वादǀ मैनें इस प्रश्न के उत्तर के माध्यम से अपनीं बात आप सभी तक पहुँचानें का एक प्रयास किया है ǀ

©वेंकटेश शुक्ला
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
जीवविज्ञान विभाग
कानपुर

Thursday, 23 July 2020

क्या मोहनजोदड़ो का विनाश परमाणु विस्फोट से हुआ था?

क्या मोहनजोदड़ो का विनाश परमाणु विस्फोट से हुआ था?

क- रूसी आर्कियोलाजिस्ट A. Gorbovsky अपनी पुस्तक "Riddles of ancient history" में दावा करते हैं -

1- "मोहनजोदड़ो में ऐसे मानव-कंकाल मिले हैं जो एक दूसरे का हाथ ऐसे पकड़े हुए हैं मानों प्रलय में साथ-साथ प्राण त्यागेंगे। इन कंकालों में सामान्य मानव - कंकालों की तुलना में 50 गुना अधिक रेडियोएक्टिव रेडिएशन मौजूद है।"

2- "मोहनजोदड़ो में कुछ स्थानों पर ऐसे काले पत्थर मिले हैं जो संभवतः बर्तन रहे होंगे लेकिन अत्यधिक तापमान पर एकदम कठोर और काले पड़ गये।"

ख- ब्रिटिश भारतीय पुरातत्वविद डेविड ड्वेनपोर्ट तथा इंट्टोर विंसेंटी ने अपने लेख "Atomic Destruction - 2000 BC" में दावा किया है-

1- "मोहनजोदड़ो में 50 यार्ड का एक ऐसा अधिकेंद्र (epicentre) मिला है जहाँ ग्लासीफाइड चट्टानें मिली हैं। यह चट्टाने कम से कम 1500 डि. से. पर ग्लासी चट्टान के रूप में परिवर्तित हुई होगी।"

ग- इसके अलावा राजस्थान के जोधपुर जिले के उत्तर-पश्चिम में रेडियोएक्टिव राख पाये गये हैं।

घ- महाभारत तथा अन्य ग्रंथों का साक्ष्य-

1- तदस्त्रं प्रज्ज्वाल महाज्ज्वालं तेजोमंडल संवृतम।
सशब्दम्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम।
चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा।। महाभारत ।। 8-10-14 ।।

अर्थात : वह अस्त्र (ब्रह्मास्त्र) छोड़े जाने के बाद भयंकर वायु जोरदार तमाचे मारने लगी। सहस्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे। प्राणिमात्र को भयंकर महाभय उत्पन्न हो गया। आकाश में घनघोर ध्वनि हुई। आकाश जलने लगा। पर्वत, अरण्य, वृक्षों के साथ समूची पृथ्वी हिल गई।

2- श्रीकृष्ण अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र छोड़े जाने पर उसके विनाश की तीव्रता के बारे में बता कर अर्जुन द्वारा उसे आकाश में नष्ट करने के लिये कहते हैं।

3- रामायण में जब लक्ष्मण मेघनाद को मारने के लिये ब्रह्मास्त्र चलाना चाहते हैं तब राम उन्हें उसकी भयावहता बताकर चलाने से रोक देते हैं।

@विन्ध्येश्वरी

Tuesday, 21 July 2020

गुप्तकालीन वर्णव्यवस्था

गुप्तकालीन वर्णव्यवस्था
1- चार वर्णों में विभक्त
• ब्राह्मण
• क्षत्रिय
• वैश्य
• शूद्र
2- फाहियान के अनुसार - "गुप्तकाल में अस्पृश्य वर्ग था - अंत्यज तथा चांडाल।"
3- ह्वेनसांग के अनुसार - "शूद्रों की दशा में सुधार हुआ था। शूद्र बहुधा खेतिहर कृषक थे। वे सैनिक वृत्ति करते थे तथा उन्हें रामायण और महाभारत पढ़ने का भी अधिकार था।"
4- भूमि अनुदान प्रक्रिया के कारण "कायस्थ" जाति का उदय हुआ। "याज्ञवल्क्य संहिता" में पहली बार कायस्थ शब्द का उल्लेख मिलता है।
5- इस काल में वर्णव्यवस्था के आधार पर न्याय किया जाता था।
• मनुस्मृति के अनुसार चोरी करने वाले ब्राह्मण को सबसे अधिक दंड तथा शूद्र को सबसे कम दंड दिया जाता था जबकि हत्या करने पर शूद्र को सर्वाधिक दंड तथा ब्राह्मण को कम दंड मिलता था।
• ब्राह्मण मृत्युदंड से मुक्त था।
6- स्त्रियों का उपनयन संस्कार बंद हो गया था।
7- चांडाल समाज में सबसे निचला स्थान प्राप्त था। इनका मुख्य कार्य मछली मारना, शिकार करना और मांस बेचना था।

@विन्ध्येश्वरी

Monday, 20 July 2020

छोटी-छोटी मगर मोटी बातें

छोटी छोटी मगर मोटी बातें

1- रेप्को बैंक (Repco bank)
• बहुराज्यीय सहकारी समिति
• स्थापना 1969 में केंद सरकार द्वारा
• प्रशासनिक नियंत्रण गृहमंत्रालय
• म्यांमार और श्रीलंका से वापस आये लोगों के पुनर्वास के लिये
• चार राज्यों - आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में कार्यरत

2- उत्कर्ष 2022
• आर बी आई द्वारा प्रारंभ "मध्यम अवधि कार्य-नीतिगत रूपरेखा"
• उद्देश्य - अपने आदेशों के निष्पादन में उत्कृष्टता लाने और नागरिकों तथा अन्य संस्थाओं के विश्वास को दृढ़ करना
• तीन वर्षीय रोडमैप
• वैश्विक केंद्रीय बैंकों की योजना के अनुरूप

3- eBक्रय (eBkray)
• ई नीलामी मंच
• ई नीलामी हेतु संपत्तियों की जानकारी हेतु सिंगल विंडो सिस्टम
• सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ई नीलामी साइटों पर समान संपत्तियों की तुलना करने की सुविधा
• वित्त मंत्रालय द्वारा

4- आॅरेशन ट्विस्ट
• अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक की एक मौद्रिक नीति
• अर्थव्यवस्था में मौद्रिक तरलता प्रदान करने के लिये क्रय-विक्रय
• आर बी आई ने भी इसी के अनुरूप "ओपन मार्केट आॅपरेशंस (OMO)" प्रणाली के अंतर्गत सरकारी बाॅण्ड का क्रय-विक्रय करने की घोषणा की

@विन्ध्येश्वरी

Saturday, 18 July 2020

मौर्यकालीन स्त्रियों की स्थिति



मौर्यकाल में स्त्रियों की स्थिति-
1- स्मृति काल की तुलना में अधिक स्वायत्तता एवं सुरक्षा
2- विधवा पुनर्विवाह, पुनर्विवाह व नियोग (पति से संतान न उत्पन्न होने पर अन्य पुरुष से सहवास) की अनुमति
3- स्त्री और पुरुष दोनों को मोक्ष (वर्तमान संदर्भ में तलाक) का अधिकार
4- छंदवासिनी - वे विधवाएं जो स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करती थीं
5- रूपजीवा - स्वतंत्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाएं
6- अनिष्कासिनी - संभ्रांत कुल की स्त्रियां जो घर से बाहर नहीं निकलती थीं
7- स्त्रियों को प्रशासन में शामिल किया जाता था

@विन्ध्येश्वरी

मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था और वर्तमान स्थिति

मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था
1- सर्वप्रथम विशाल साम्राज्य (उत्तर-पश्चिम में फारस से लेकर पूर्व में बंगाल तथा उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक) का विभाजन चार प्रांतों में
• उत्तरापथ - राजधानी तक्षशिला
• दक्षिणापथ - राजधानी सुवर्णगिरि
• अवंति (पश्चिमी) - राजधानी उज्जयिनी
• प्राची (मध्य और पुर्वी समुद्र तटीय प्रदेश) - राजधानी पाटलिपुत्र
(यह व्यवस्था वर्तमान मारत में कमोबेश क्षेत्रीय परिषदों की तरह है। उत्तरी, मध्य - पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी तथा पूर्वोत्तर परिषद)
2- मौर्यकालीन प्रशासन का स्तरीकरण और वर्तमान स्थिति
• केंद्र (मौर्य शासन) - वर्तमान भारत सरकार
• प्रांत (राजकुमार या आर्यपुत्र) - वर्तमान में राज्य
• मंडल (प्रदेष्टा या प्रादेशिक) - मंडल
• आहार या विषय (विषयपति) - जिला
• स्थानीय (800 ग्रामों का समूह - स्थानिक) - तहसील
• द्रोणमुख (400 ग्रामों का समूह) - विकासखंड या क्षेत्रपंचायत
• खार्वटिक (200 ग्रामों का समूह) - न्याय पंचायत
• संग्रहण (10 ग्रामों का समूह) - ग्राम पंचायत
• ग्राम (प्रशासन की सबसे छोटी इकाई - ग्रामणी) - राजस्व ग्राम
• ग्राम सभा से राजस्व संग्रहण में सहायता हेतु एक अधिकारी - गोप - वर्तमान में ग्राम पंचायत अधिकारी

@विन्ध्येश्वरी

Friday, 10 July 2020

काम - ऊर्जा (energy of sex)

मानव सभ्यता के इतिहास में विभिन्न दमनों में काम (sex) का दमन भी उतना ही घृणित है जितना कि दलित, स्त्री, दास आदि। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? कुछ बिंदुओं पर गौर करते हैं -
1- "पत्नी और पति शब्द"- 
पत्नी का व्युत्पत्ति मूलक अर्थ है - पत् (गिरना) +नी (ले जाना)। यानि पतन की ओर ले जाने वाली। पति शब्द भी पत् धातु में ई प्रत्यय लगाकर बना इसका अर्थ है गिरने वाला। यह शब्द कितना सही? ऎसा क्यों कहा गया? दरअसल समाज में आम अवधारणा है कि पत्नी काम वासना में डुबाकर पति को ईश्वर से दूर करती है। यह मोक्ष के मार्ग में बाधक है। इसी लिये कबीरदास जैसे भक्त कवि व क्रांतिकारी समाज सुधारक भी कहते हैं -
कबीर नारि की प्रीति से, केते गये गरंत।
केते और जाहिंगे, नरक हसंत हसंत॥


अर्थात नारी को प्रेम करने से कितने ही लोग गर्त में जा चुके हैं और कितने ही लोग अभी हंसते-हंसते नरक में जायेंगे।
इसके अलावा वे कहते हैं कि नारी की छाया मात्र पड़ने से सांप तक अंधा हो जाता है। उनकी क्या गति होती होगी जो हमेशा स्त्री के साथ रहते हैं।
"नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।
कबीरा तिनकी का गति, जिन नित नारी संग॥" 


वस्तुतः यहाँ नारी विरोध की जगह काम का विरोध अधिक है। अधिकांश समाजों और लोगों का मानना है कि स्त्री ही पुरुष को काम के गर्त में ढकेलती है। जबकि बायोलॉजिकली यह सरासर गलत है। हालांकि यह बात विषयेतर है तथापि यह जानना आवश्यक है कि स्त्री की कामेच्छा (Sexuality) पुरुषों की तुलना में दबी हुई होती है। एक स्त्री बिना संबंध बनाये कई दिनों तक रह सकती है लेकिन पुरुष नहीं। पत्नी (स्त्री) पति (पुरुष) को पतन की ओर नहीं ले जाती बल्कि पुरुष स्त्री को काम वासना की ओर उद्वेलित करता है। किंतु इसी बिना पर काम को ही, न केवल घृणास्पद, बुरा, बेकार सिद्ध करने का यत्न किया बल्कि समाज में इसकी चर्चा करना भी पाप करार दिया गया।

2- क्या काम वासना पाप है? 
लगभग सभी सभ्य समाजों में काम को पाप की दृष्टि से ही देखा जाता है। इसे गंदी बात माना जाता है। क्या ऐसा सचमुच है? मेरा मानना है कि हम एक बहुत बड़े छल और झूठ में जी रहे हैं। एक बच्चा सबसे पहले अपने आपको लैंगिक पहचान से ही जानता है कि वह क्या है। जो लोग इसे पाप समझते हैं वे भी दबी जुबान यह स्वीकार ही करेंगे कि अगर किसी एक चीज से इस सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन हो रहा है तो वह काम है। पशु - पक्षी, पेड़ - पौधे, मनुष्य सभी में यह एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसीलिए प्रकृति ने इसे केंद्रीय अंग के रूप में बनाया है।

इतना ही नहीं योगशास्त्र के अनुसार शरीर में सात चक्र होते हैं। इसमें तीन चक्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, मूलाधार, आज्ञा और सहस्रसार। मूलाधार का केंद्र बिल्कुल लैंगिक स्थान के एकदम समीप है। इस केंद्र में कुंडलिनी शक्ति स्थिति होती है। इसी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर योगी त्रिकालदृष्टि (भूत, भविष्य, वर्तमान को जानना) अष्टसिद्धियों (1-अणिमा-अणु की तरह छोटा होना, 2-महिमा- बहुत विशाल होना, 3-गरिमा - बहुत वजनी होना, 4-लघिमा - बहुत हल्का होना, 5-प्राप्ति - कुछ भी पाने की क्षमता, 6-प्रकाम्य - किसी के मन की बात जानना, 7-ईशिता - दुनिया पर शासन, 8-वशिता - किसी को वश में करना ) और नवनिधियों (पद्म, महापद्म, नील, नंद, मुकुंद, मकर, कच्छप, शंख और खर्ब ) को प्राप्त करता है। योगी इसी कुंडलिनी शक्ति को सहस्रसार चक्र में स्थापित कर ईश्वर से साक्षात्कार करता है। यानि यह केंद्र अथाह, अपार ऊर्जा का केंद्र है। फिर यह घृणित कैसे हो सकता है?

3- कामशास्त्र की कोई पाठशाला नहीं-
यह कितना अद्भुत है कि कामशास्त्र सिखाने की कोई पाठशाला नहीं है और न ही कोई खास किताब। ऊपर से इतना कठोर प्रतिबंध भी है। लेकिन हर व्यक्ति यही करता है, हमारे पूर्वज भी और हम भी। आखिर यह कैसे हो जाता है। दरअसल काम और कामेच्छा प्राकृतिक है। हम इसका दमन करते हैं और यह मान लेते हैं कि इसका दमन करके हम इसे शांत कर देंगे। यह ठीक वैसे है जैसे ज्वालामुखी का चैंबर पृथ्वी के गर्भ में सैकड़ों किमी. मोटी चट्टानी परत से ढंका होता है लेकिन मैग्मा (पृथ्वी के भीतर द्रव और गर्म रूप में इक्ट्ठा पदार्थ) की अधिकता हो जाने पर यह धरती की छाती को फाड़कर बाहर आ जाता है। हम कथित संस्कारों और ब्रह्मचर्य के नाम पर इस विशाल ऊर्जा भंडार को झुठलाने और दबाने का अनावश्यक और निरर्थक यत्न करते हैं। नतीजतन हमारे माँ-बाप और समाज को लगता है कि बच्चा/बच्ची बिगड़ गया/गयी है। इस प्रकार बिगड़ने वाला बच्चा/बच्ची प्रकृति के हाथ से मजबूर है। बाकी वह बेकसूर है।

4- एक हास्यास्पद सामाजिक प्रथा-
विवाह- समाज में काम और कामेच्छा को दबाने और चर्चा का विषय न बनाये जाने के बावजूद माता-पिता और समाज पूरे विधि-विधान और गाजे बाजे के साथ से अपने बच्चे/बच्ची की शादी करते हैं। वे सभी यह भी जानते हैं कि आज क्या होने वाला है। वह समाज जहाँ काम की बात करना भी पाप है उसी समाज में इतने धूमधाम से काम का उत्सव मनाना आश्चर्य में डालता है। तरीके से अतार्किक भी। क्योंकि बिना किसी जानकारी के किसी को किसी विशेष पद पर बैठा देना, बंदर के हाथ में उस्तरा देने जैसा है। अगर प्रयोगात्मक जानकारी न सही कम से कम सैद्धांतिक जानकारी होनी ही चाहिए ताकि न्याय-निर्णयन में सुगमता हो। मुझे लगता है कि हम सभ्य लोगों से ज्यादा वैज्ञानिक वे आदिवासी (बैगा जनजाति) हैं जो विवाह पूर्व अपनी संतानों को एक साथ रहने की अनुमति देते हैं। फिर जब दोनों को लगता है कि साथ में निबाह हो सकता है तब माता-पिता और समाज धूमधाम से विवाह संपन्न कर देते हैं।

5- गाली-
समाज में माँ, बहन की गाली दी जाती है। लेकिन यह गाली माँ, बहन से ज्यादा जननेंद्रियां और मलेंद्रिय (private part) को दी जाती है। ऐसा क्यों? समझ से परे है। जहाँ तक मैं समझता हूँ यह भी काम और कामेंद्रिय को घृणित बताने का ही दुष्प्रयत्न है।

6- गोपनीयता-
कामेंद्रियों के प्रति घृणा भाव के कारण इतनी गोपनीयता बरती जाती कि उसे छूना भी पाप माना जाता है। जब बच्चा अपने जननेंद्रिय को हाथ लगाता है तब माँ-बाप उसे गंदा और बुरा अंग बताते हुए छूने से मना करते हैं। इसका सर्वाधिक बुरा परिणाम बच्चियों को भुगतना पड़ता है। वे अपने उस अंग की साफ-सफाई को उपेक्षित करती हैं जिससे उन्हें अनेक यौन - संक्रमण को झेलना पड़ता है। बच्चे भी एक खास दुष्परिणाम भुगतते हैं- हस्तमैथुन। जो उन्हें शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से कमजोर करता है। हम लाख छुपाने के बावजूद दिनरात सिर्फ काम का ही चिंतन करते हैं। यहाँ तक कि हमारे सपने भी इससे अछूते नहीं रह जाते। यह हमारे चेतन मन से निकल कर अवचेतन मन में घर कर जाता है। यही कारण है कि समाज में दुष्कर्म की घटनाएँ अधिक होती हैं।

7- समस्या कहाँ है?
असल समस्या है काम की ऊर्जा के महत्त्व को न समझने में और बिना समझे ही दमन करने में। समाज में काम की ऊर्जा और कामेंद्रिय का केवल एक मतलब लगाया जाता है - कामक्रीड़ा (sexual act) और संतानोत्पत्ति। जो सरासर गलत है। यह इस पवित्र और अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा का केवल एकमुखी प्रयोग है। आप इसकी तुलना विद्युत ऊर्जा से कर सकते हैं। विद्युत ऊर्जा सही भी हो सकती है और गलत भी। अगर आप विद्युत के खुले तार को पकड लेंगे तो मृत्यु तय है या कम से कम मरने जैसी अवस्था में अवश्य पहुंच जायेंगे। किंतु इस एक उपयोग के अलावा आप इसका और भी कई तरीकों से उपयोग कर सकते हैं। जैसे- प्रकाश, ए. सी., फ्रिज, कूलर, पंखा, हीटर, ओवन, उद्योग, विद्युत बैट्री, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम इस महान ऊर्जा का उपयोग कैसे करें। हमारे भीतर मौजूद काम की ऊर्जा इससे भी कहीं अधिक शक्तिशाली है। इसके कई सारे प्रमाण भी उपलब्ध हैं। जैसे- हनुमान, परशुराम, कृष्ण, कबीर, बुद्ध, महावीर, जीसस आदि।

8- समस्या का उपाय-
• ध्यान- बच्चों को समय से पहले (14 वर्ष की आयु पूरा करने से पहले) ही ध्यान में उतरने की प्रेरणा दी जाये। दरअसल काम (sex) के समय हमें आनन्द इसलिए मिलता है कि हम "समय शून्यता (timelessness)" और "घंमड शून्यता (egolessness)" की स्थिति में पहुंच जाते हैं। यह दोनों स्थितियां परमशांति की स्थिति हैं। सही से ध्यान लगाने पर हम इन्हीं दोनों स्थितियों में पहुंच जाते हैं। फिर कामेच्छा उतनी प्रबल नहीं हो पाती जितनी की ध्यान गहराई में न जाने पर।
• ब्रह्ममुद्रा- यह मुद्रा काम ऊर्जा के ऊर्ध्व प्रवाह का एक बेहतरीन उपकरण है। इसमें हम सांस को बाहर छोड़कर, गुदाद्वार को ऊपर खींचते हैं। फिर पेट को नाभि से पीठ की तरफ दबाकर ऊपर खींचते हैं। इसके बाद ठुड्डी को कंठ-कूप में लगाते हैं। यह क्रिया 10-15 मिनट प्रतिदिन करने पर काम ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होने लगता है।
• सादा भोजन- गरिष्ठ, मांसाहार और तामसी भोजन काम विकार को उद्दीप्त करता है। अतः सादा भोजन करना काम ऊर्जा के नियमन का एक शानदार तरीका है।
• रचनात्मक श्रम- हमारे भीतर मौजूद ऊर्जा को किसी न किसी माध्यम से निकलना चाहिये। संभोग के माध्यम से निकलता है तब वह हमारी जीवनी शक्ति का ह्रास करता है। अतः रचनात्मक कार्य जैसे- गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला, बागवानी, समाज सेवा आदि करने से वह ऊर्जा जो अधोमुखी गमन करती है ऊर्ध्वगमन करने लगती है।
• प्रार्थना - प्रार्थना एक ऐसी क्रिया है जो बड़े से बड़े संकट और समस्या का सरलतम निदान प्रस्तुत करती है। हमें अपने इस ऊर्जा के परम पवित्र और कल्याणकारी होने के बारे में सकारात्मक धारणा बनाने की आवश्यकता है। प्रार्थना के माध्यम से हम इसे शक्ति के रूप में बदल सकते हैं। "हे! शुद्ध, चैतन्य, दिव्य परमात्मा, मैं आपका अंश हूँ। आपसे ही मेरा जन्म हुआ है। आप मेरी शक्तियों को सकारात्मक, रचनात्मक दिशा प्रदान कीजिये। इसे ऊर्ध्वगामी बनाइये।"
• काम ऊर्जा के बारे में सही समय पर बच्चों को शुद्ध और सही जानकारी प्रदान करना। जैसे- यह क्या है?इसकी शक्ति क्या है? इससे क्या - क्या होता है? इसके साथ कौन सी अच्छाई या बुराई जुड़ी हुई है? इस ऊर्जा को कैसे सही दिशा दें? आदि।

©विन्ध्येश्वरी

Thursday, 9 July 2020

"ढोल, गंवार, सूद्र, पसु, नारी" चौपाई की नयी व्याख्या

तुलसीदास जी लिखते हैं - "ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥"
यह चौपाई सुंदरकांड की है। राम समुद्र से लंका जाने के लिए मार्ग मांगते हैं लेकिन वह नहीं देता। फिर राम को क्रोध आता है और वे समुद्र को सोखने के लिये बाण का संधान करते हैं। फिर समुद्र डर से कांपता हुआ आता है। वही राम से यह चौपाई कहता है।

इस चौपाई को लेकर दो अर्थ लगाये जाते हैं-
एक अर्थ वह है जिसमें "ताड़ना" शब्द का अर्थ "मारना" या "प्रताड़ित" करना लगाया जाता है। यह अर्थ वे लोग लगाते हैं जो मानते हैं कि तुलसीदास की दृष्टि स्त्री और शूद्रों के प्रति दोषपूर्ण है। यह वर्ग प्रायः दलितों और दलित चिंतकों का है।

दूसरा अर्थ वह है जिसमें "ताड़ना" शब्द का अर्थ "अच्छे से देखना" या "निगरानी" करना लगाया जाता है। इस वर्ग का मानना है कि जो तुलसी स्त्री को देवी मानते हैं, वे इस अर्थ में यह चौपाई नहीं लिखेंगे। साथ ही इनका यह भी दावा है कि जो राम निषाद जोकि एक शूद्र है उसे गले लगाते हैं, शबरी के जूठे बेर खाते हैं, तो वे शूद्रों के बारे में इस कुत्सित अर्थ में यह चौपाई नहीं लिखेंगे।

इसका सही अर्थ क्या हो सकता है? यद्यपि इसका सही अर्थ तो केवल ईश्वर या तुलसी को पता है बाकी अटकलें हैं। हम भी एक अटकल लगाते हैं।

वस्तुतः ताड़ना शब्द के दोनों ही अर्थ सही हैं और अलग - अलग संदर्भों में इसके अलग - अलग अर्थ लगाये जाते हैं। अगर आप किसी को ध्यान से देख रहे हैं तब उसे "ताड़ना" कहते हैं। जैसे - "क्या ताड़ रहे भाई?" या जब कोई किसी को बहुत सताता या मारता है तब कहा जाता है कि उसे प्रताड़ित किया जा रहा है। "प्रताड़ना" में "प्र" उपसर्ग के साथ "ताड़ना" शब्द जुड़ा है। इसमें "प्र" उपसर्ग विशेषार्थक है। "प्र" का अर्थ होता "भलीभांति", "अच्छे से" और "ताड़ना" शब्द का अर्थ "मारना" है। यानि ठीक तरीके से मारना।

हालांकि उपसर्ग के आधार पर शब्द का अर्थ निकालना युक्ति पूर्ण नहीं है। क्योंकि उपसर्ग शब्दों के अर्थ बदल देते हैं। जैसे एक शब्द है - "प्रहार"। प्रहार में "प्र" उपसर्ग के साथ "हार" शब्द जुड़ा हुआ है। "हार" शब्द का अर्थ "माला" और "हारना" दोनों है। लेकिन "प्र" उपसर्ग जुड़ने से इसका अर्थ होता है "वार करना" या "मारना"। यानी शब्दार्थ के आधार पर पर हम इस चौपाई की सही व्याख्या नहीं कर सकते। जो लोग केवल शब्दार्थ से किसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं/पहुंचते हैं वे एकांगी दृष्टिकोण वाले हैं।

एक दृष्टिकोण तुलसी के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझ कर अर्थ निकालना है। तुलसी का मूल व्यक्तित्व सवर्णवादी, वर्णव्यवस्था को मानने वाला, और प्रायः स्त्री के प्रति कुंठाग्रस्त है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिये क्योंकि तुलसी उच्च जाति में जन्मे। उनका लालन-पालन भी उच्च जाति और ब्राह्मणधर्मी आश्रमों में हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा भी शास्त्रीय पद्धति से हुई। एतदर्थ वे सवर्णवादी मानसिकता और वर्णाश्रम धर्म को मानने वाले हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

"पूजिय विप्र ग्यान गुनहीना। सूद्र नहीं गुन ग्यान प्रवीना॥"

अर्थात गुण और ज्ञान से हीन होने पर भी ब्राह्मण पूज्य है किंतु तमाम गुण और ज्ञान होने पर भी शूद्र पूज्य नहीं है। यह बात सवर्णवादी मानसिकता वाला व्यक्ति ही कह सकता है।

वर्णाश्रम धर्म के समर्थन में वे कहते हैं-

"बरनाश्रम निज निज धरम, निरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं, नहिं भय सोक न रोग॥"


अर्थात रामराज्य में हर कोई अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करता है। वेद के पथ पर चलता है। इससे सभी सुख प्राप्त करते हैं। किसी को कोई रोग-शोक नहीं है। यद्यपि तुलसीदास को स्वयं भी सवर्णवाद और वर्णाश्रम व्यवस्था का दंश झेलना पड़ा। जिसकी पीड़ा उनके रचनाकर्म में झलकती भी है। जैसे-

"धूत कहौं, अवधूत कहौं, रजपूत कहौं, जुलहा कहौ कोई। 
काहू की बेटी सो बेटा न ब्याहब, काहु की जाति न बिगारबो सोई॥"

तुलसीदास नारी के प्रति कुंठा से भी ग्रस्त हैं (इसका मूल कारण पत्नी से दुत्कारा जाना है)। जगह-जगह उनकी रचनाओं में यह कुंठा झलकती है। जैसे -

"नारि सुभाव सत्य कवि कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं॥
साहस, अनृत, चपलता, माया। भय अबिबेक, असौच, अदाया॥"


अर्थात कवि लोग सत्य ही कहते हैं कि नारियों के भीतर आठ प्रकार के अवगुण - साहस, झूठ बोलना, चंचलता, भ्रमित करना, डर, बुद्धिहीनता, अपवित्रता और निर्दयता आदि सदा रहते हैं।

स्त्री की तुच्छता के बारे में उन्हें राम के मुख से भी कहलवाने में कोई संकोच नहीं हुआ -

"जस अपजस सहतेउं जग माहीं। नारि हानि विशेष छति नाहीं॥

अर्थात मैं संसार में स्त्री को खोने का अपयश सह लेता क्योंकि स्त्री की हानि को विशेष क्षति नहीं है।

हालांकि वे कई जगह स्त्री को सम्मान भी देते हैं। वे स्त्रियों की दुर्दशा के प्रति चिंता भी प्रकट करते हैं। जैसे - "कति बिधि सृजी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं॥"

उपर्युक्त विवेचन से भी हम किसी खास निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाते क्योंकि तुलसीदास के साहित्य में इसके पक्ष - विपक्ष में बहुतायत रचनाएं मिल जाती हैं।

एक तीसरा दृष्टिकोण ऐतिहासिक हो सकता है। यदि साहित्य समाज का दर्पण है तब तुलसी के साहित्य में सम्मिलित ये सारी बातें एकदम सच हैं। क्योंकि समाज में स्त्रियों और शूद्रों की दशा जग विदित है। इन्हें हमेशा समाज के निचले पायदान पर रखने के साथ ही दास्तान-ए-जुल्म-ओ-सितम भी खूब रहा है। ऐसे में यह मानने में कतई संकोच नहीं है कि यदि तुलसी ने यह लिखा "ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥" तो हम इसमें मार-पीट, प्रताड़ना, दमन और उत्पीड़न वाला अर्थ - पक्ष अधिक प्रबल है।

जब ढोल पर थाप पड़ती है तब क्या ढोल यह दावा कर सकता है कि उसे मारा नहीं जा रहा बल्कि बजाया जा रहा है। वह मारे जाने पर ही बजता है। कक्षा में सबसे भोंदू टाइप बच्चे को मास्टर साहब घंटों मुर्गा बना के रखतें हैं। मास्टर साहब यह दावा जरूर कर सकते हैं कि वे उसे सुधार रहे हैं लेकिन जो दर्द उसे सहना पड़ रहा है उसका क्या? शूद्रों के गले में मटका लटकाना (ताकि अगर उन्हें थूकना हो तो उसी में थूके बाहर नहीं) और पीछे झाड़ू बांधना (ताकि जिस रास्ते से वे जा रहे हैं उसे बुहारते जायें जिससे अपवित्र हुआ मार्ग साफ हो सके और सवर्णों को पवित्र रास्ता मिले सके) यह कौन सा सुधारवादी कदम था? एक पशु को हांकने के लिये गाड़ीवान के हाथ में बड़ा सा चाबुक होता है। थोड़ा सा भी धीमा चलने या दायें-बायेंं करने पर पीठ पर पड़े चाबुक की मार उसमें किस पुनर्जजागरण का प्रयत्न है? इससे किस सुधार और कौन सा ज्ञान प्रदान करने का दावा किया जाता है? जब एक स्त्री को पैर की जूती, पति की दासी, नरक का द्वार कहा जाता है, उसके उग्रता को दबाने के लिये विभिन्न आभूषणों का जाल पहनाया जाता है तो यह केवल पातिव्रत्य धर्म निभाने का उपक्रम मात्र नहीं है। यह पातिव्रत्य धर्म भी उसके साथ एक छल है। इसी धर्म के कारण उसे सहचरी से परिचरी (दासी) बनाया गया।
 
हम इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि यह तुलसी का मत नहीं हो सकता, अतः वे निर्दोष हैं। क्योंकि वे स्वयं कहते हैं - "नाना पुराण निगामागम सम्मतं यत, रामायणे निगदितं क्वचिदन्नयतोपि॥" अर्थात विभिन्न पुराणों, वेदों, शास्त्रों आदि से सम्मत तथ्य रामायण में लिखा गया है लेकिन इसमें कुछ मेरे भी मत शामिल हैं। क्या पता कि इस चौपाई में भी क्वचिदन्नयतोपि हो? इसके अलावा हम इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी का देखभाल, संस्कार नहीं होना चाहिए। निश्चित रूप से होना चाहिए। हालांकि मैं कोई निष्कर्ष नहीं देने जा रहा। निष्कर्ष निकालने का कार्य आप स्वयं कर लेंगे।

©विन्ध्येश्वरी

Saturday, 4 July 2020

ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत और कृष्ण की गीता

ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत (आइंस्टीन और अन्य कई विद्वान भी) कहता है कि "ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है।"

श्रीकृष्ण कहते हैं -
"नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेद्येन्तयापो, न शोषयति मारुतः॥"

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृहणाति नरोपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाती नवानि देही॥

अर्थात् आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकता, न पानी गला सकता है और न ही पवन सुखा सकता है।
जिस प्रकार मनुष्य अपने पुराने वस्त्र छोड़कर नये वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण कर लेती है।

बात तो वही है। खतां सिर्फ इतनी है कि संस्कृत में है। पंडितों और पोंगापंथियों की भाषा में। शोषितों की भाषा में। इतिहास को काले अक्षरों में लिखने वालों की भाषा में।

और दूसरी खतां ये कि भारतीय मनीषा ने कभी अपने ज्ञान पर कापीराइट का दावा नहीं किया। ज्ञान सबका है। हर किसी को मिलना चाहिए। क्या तेरा क्या मेरा।

ऊर्जा का मुख्य उपयोग है "कार्य का होना"। जब यह ऊर्जा नहीं होती तब हम निष्क्रिय हो जाते हैं। आत्मा भी ऊर्जा का एक रूप है। आत्मा के न रहने पर हम मृत हो जाते हैं। फिर वह आत्मा नये शरीर (दूसरे रूप) में चली जाती है।

©विन्ध्येश्वरी

Friday, 3 July 2020

सृष्टि निर्माण का सिद्धांत

शास्त्रों में वर्णित है कि सृष्टि के आरंभ में सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। कहीं कुछ नहीं था। इसी अंधकार से एक ज्योति प्रकट होती है जिसे तारा कहा गया। अघोर साधना में इन्हीं शक्ति को माँ तारा के नाम से पूजा जाता है। फिर इसी ज्योति पुंज तारे से सात अन्य ज्योति प्रकट हुईं।
1- परा
2- परात्परा
3- अतीता
4- चित्परा
5- तत्परा
6- तदतीता
7- सर्वातीता

फिर इन्हीं की सहायता से ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया।

यह कहानी कमोबेश "सौरमंडल निर्माण के वर्तमान सिद्धांतों" से मेल खाता है। सौरमंडल के निर्माण के संदर्भ में वर्तमान में मूलतः तीन सिद्धांत प्रचलित है -
1- एक तारक परिकल्पना
2- द्वै तारक परिकल्पना
3- महाविस्फोट सिद्धांत

सारी परिकल्पनाएं शुरू में यही कहती हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मांड में कुछ नहीं था सिर्फ़ अंधकार था। इसमें एक तारक परिकल्पना में कहा गया है कि दूर से आते एक तारे में विस्फोट हुआ जिससे सौरमंडल में ग्रहों और उपग्रहों का निर्माण हुआ।
द्वै तारक परिकल्पना में एक तारे की जगह दो तारे की बात है। इन्हीं दोनों तारों की टक्कर से ग्रहों का निर्माण हुआ। जबकि महाविस्फोट सिद्धांत में कहा गया है कि सृष्टि का निर्माण एक विशाल तारें में महाविस्फोट के कारण हुआ। यह तारा कहीं से आया नहीं था बल्कि इसी अंधकार में मौजूद था।

आपको इससे क्या लगता है? क्या भारतीय ग्रंथों में वर्णित सृष्टि के प्रारंभ में अंधकार और माँ तारा के जन्म से सृष्टि की उत्पत्ति की कथा महज कपोल कल्पना है? यद्यपि आज की पीढ़ी जो नवीन वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त कर चुकी है संभव है इसे ढोंग ही समझे। लेकिन जरा ठहर कर विचार कीजिये। सृष्टि उत्पत्ति की वर्तमान संकल्पनाएं और वह कथा कुछ मेल खाती है या नहीं। ये संकल्पनाएं 18वीं और 19वीं शताब्दी की हैं लेकिन ये पुरानी साधना पद्धतियां और कथा कम से कम दो हजार साल पुरानी है।

©विन्ध्येश्वरी

सापेक्षता का सिद्धांत : भारतीय कथाएं तथा कथापात्र

आइंस्टीन के "सापेक्षता सिद्धांत" के अनुसार - "अगर कोई प्रकाश की गति से यात्रा करे तो सामान्य मनुष्य के समय की तुलना में उसका समय काफी धीमा हो जायेगा यानि पृथ्वी के सामान्य समय का उस पर बहुत कम प्रभाव पड़ेगा। या यूं कहें कि वह एक ही समय में दो जगह भी हो सकता है।"

अब असली बात। हमने पढ़ा है कि अभी भी हनुमान, परशुराम, विभीषण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, व्यास, बलि आदि चिरजीवी है।
कृष्ण ने "महारास" के समय एक ही समय सभी गोपिकाओं के साथ नृत्य किया था।
शास्त्रीय कथाओं के अनुसार - देवता प्रकट होकर अन्तर्ध्यान हो जाते थे।

तो प्रश्न उठता है कि

क्या इनकी गति प्रकाश की गति से तेज थी या है?

जैसाकि कथा कहती है हनुमान और परशुराम की गति तो तीव्र है। दोनों की गति मन के वेग से भी तीव्र है। अगर यह सच है तब ये जीवित होंगे। क्योंकि ये दो ऐसे व्यक्तित्व हैं जो त्रेतायुग और द्वापर में भी थे। संभव है कलयुग में भी हों। और अन्य लोग कैसे जीवित हैं? यह अभी शोध का विषय है। संभव है इनकी भी गति प्रकाश के गति से तेज हो।

अब दूसरी अवधारणा
अगर चिरंजीवी होने, रास प्रसंग और अन्तर्ध्यान होने की बात कपोलकल्पित है तब भी यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि ऐसी कहानी आइंस्टीन के कम से कम दो हजार साल पहले लिखी गयी। तो वास्तव में कायदे से "सापेक्षता के सिद्धांत" पर भारत का © कापीराइट होना चाहिए।

©विन्ध्येश्वरी

"रिवर्स लाॅ आफ नेचर"


हमारे अंदर एक सामान्य आदत है कि हम किसी चीज के "घटित होने से" ज्यादा "घटित न होने" के बारे में सोचते हैं। जैसे - अगर हम कहीं जा रहे हैं, तब हम यह नहीं सोचते कि हमें जल्दी पहुंचना है बल्कि हम हम सोचते हैं कहीं देर न हो जाये। या हम अपने बच्चों को यह नहीं बताते कि क्या सही है बल्कि यह सिखाते हैं कि क्या गलत है। अथवा उन्हें सही चीज करने के लिए प्रेरित करने के बजाय गलत काम न करने से रोकते हैं। या हम परीक्षा में उत्तीर्ण होने की चिंता से ज्यादा अनुत्तीर्ण होने को लेकर सोचते हैं।

इस तरह हम सकारात्मक "घटित होने" के बारे में न सोंच कर नकारात्मक "न घटित होने" के बारे में सोचते हैं। ऐसा सोंच कर हम दरअसल अशुभ को ही सोंच रहे होते हैं। और वैसा हो भी जाता है। तब हम यही कहते हैं "मैं जानता था कि ऐसा ही होगा।" वास्तव में आप जानते थे कि वैसा ही होगा क्योंकि आप ही वैसा सोंच रहे थे। और पुरानी कहावत है - "जो जैसा सोचता है वैसा हो जाता है।" यह फिजूल नहीं है। हम वास्तव में वही हो जाते हैं जैसा सोंचते हैं। कैसे? आइये विचार करते हैं।

एक गेंद लीजिये और उसे धीरे से धरती पर पटकिये। आप देखेंगे कि गेंद धीरे से उछली। आप उसे दुगनी तेजी से पटकिये आप देखेंगे कि इस बार गेंद पहले की अपेक्षा ज्यादा उछली है। अब आप बार बार यही दुहरा सकते हैं। हाथ से गेंद को धरती पर मारिये उछालिये। यह क्रिया कितनी देर चल सकती है। जब तक आप मारते और उछालते रहेेंगे। यह क्या है?………

एक काम और कीजिये किसी को अनायास गंदी सी गाली दीजिये या एक चाटा मारिये। आप पायेंगे कि एक गंदी सी गाली या एक झन्नाटेदार चाटा आपको भी मिल चुका है। अगली प्रतिक्रिया में आप फिर उसे मारते हैं। वह फिर पुनरावृत्ति करता है। क्या लगता है यह सीन कितना लंबा खिंच सकता है? जब तक कि आप बंद नहीं करते। यह क्या है?………

अथवा आप एक बार जोर से चीखिये। क्या होगा? आपकी प्रतिध्वनि आपको सुनायी पड़गी। आप फिर चीखिये। और बार बार चीखिये। यह चीख आपको कब तक सुनायी देगी। जब तक आप ऐसा करते रहेंगे। क्यों हुआ ऐसा?………

यह क्या है? यह सिर्फ इतना है कि प्रकृति हमें वही चीज वापस करती है जो हम उसे देते हैं। अगर हम प्रकृति में एक बुरा विचार भेजते हैं तब बदले में वह भी हमें बुरा विचार भेजती है। फिर हम और बुरा विचार भेजते हैं फिर वह हमें और बुरा विचार भेजती है। और यह सिलसिला अंतहीन चलता रहता है। नतीजा वही होता जो आप सोंच रहे हैं। आपकी भविष्यवाणी सच हो गयी है। किसी फिल्म का डायलॉग है - "अगर तुम किसी चीज को शिद्दत से चाहोगे तो पूरी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की साजिश में लग जााती है।" यह साजिश इसी सिद्धांत पर कार्य करता है।

इसका एक अर्थ यह भी है कि अगर बुरी चीज प्रकृति वापस करती है तो संभव है अच्छी चीज भी वापस करती होगी। आपने किसी भूखे को भरपेट खाना खिलाया। खाया तो उसने लेकिन तृप्ति आपको अनुभव हुआ। आप आनन्द से भर उठे। किसी फूल को आपने प्यार से सहलाया और आपको ऐसा लगा कि वह फूल प्यार से आपको देख रहा है। एक कुत्ते को आपने पुचकारा और वह आपके पैरों के पास आकर लोटने लगा। क्यों हुआ ऐसा?………

यहाँ भी प्रकृति का वही नियम कार्य कर रहा है। "जो चीज आप प्रकृति को देते हैं, प्रकृति आपको वही चीज लौटाती है।" इसका अर्थ है कि यदि हम प्रकृति में एक अच्छा विचार संप्रेषित करते हैं तब प्रकृति भी हमें उतनी ही शक्ति का एक अच्छा विचार संप्रेषित करेगी। हम फिर से उसे संप्रेषित करते हैं। वह पुनः ऐसा ही करेगी। आप पायेंगे कि "इसबार भी आपकी भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। लेकिन अच्छा घटने के बारे में।"

हमें अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति का आभारी होना चाहिए कि उसने इस विधा को न केवल खोजा था बल्कि बहुत गहरे तक आत्मसात भी किया था। प्रकृति के हर एक अवयव में देवत्व की कल्पना प्रकृति को सदसंप्रेषण की कला थी। सारगर्भित मंत्रों का जाप केवल ढोंग या पोंगापंथ नहीं था बल्कि प्रकृति को शक्ति भेजकर पुनः वही शक्ति स्वयं में आत्मसात करने की प्रक्रिया थी। (क्योंकि हर मंत्र अपने आप में गूढ़ अर्थ और शक्ति लिये हुए है। जैसे गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र आदि) इससे जीवन में सकारात्मकता का, दिव्यता का संचार होता था। हालाांकि ये मंत्र कुछ नहीं हैं सिवाय एक शक्तिशाली विचार के।

यदि हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में सकारात्मक घटित हो तो हमें अपने विचार की धारा को बदलना होगा। हमें प्रकृति में केवल सद संदेश भेजना होगा। जैसे-

"मैं एक सज्जन व्यक्ति हूँ, बजाय इसके कि मैं बुरा नहीं हूँ।"
"मैं एक सफल आदमी हूँ, बजाय इसके कि मैं असफल नहीं हूँ।"
"मैं आनन्द स्वरूप हूँ, बजाय इसके कि मैं दुखी नहीं हूँ।"

©विन्ध्येश्वरी

Wednesday, 1 July 2020

किसने तोड़ा शिव - धनुष?

एक विद्यालय में एक इंस्पेक्टर निरीक्षण करने गया। वहाँ एक कक्षा में रामचरितमानस पढ़ाया जा रहा था। इंस्पेक्टर ने सोचा - "क्यों न बच्चों से रामायण के बारे में कुछ पूछा जाये।" उन्होंने बच्चों से पूछा- "बच्चों मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, तो मुझे यह बताइये कि शिव का धनुष किसने तोड़ा?" कक्षा में सन्नाटा पसर गया। कुछ क्षण के बाद एक बच्चे ने हाथ ऊपर उठाया। कक्षा अध्यापक ने उसे देखा तो उनका मुंह सूख गया। वह कक्षा का सबसे गधा विद्यार्थी था। लेकिन अब जब उसने हाथ उठा दिया है वह भी इंस्पेक्टर के सामने तब उसे मना करना मुनासिब न था। वे चुप रह गये।

इंस्पेक्टर ने कहा - "हाँ बेटा, बताओ। किसने तोड़ा शिव का धनुष?" बच्चा - "मुझे नहीं पता किसने तोड़ा लेकिन मैंने नहीं तोड़ा है।" इंस्पेक्टर हतप्रभ रह गया। उसने अध्यापक की ओर देखते हुए कहा - "देख रहे हैं मास्टर साहब, यह बच्चा क्या कह रहा है?"

"हाँ सर, देख रहा हूँ। यह चाहे जितना कहे कि इसने नहीं तोड़ा है तोड़ा इसी ने है। क्योंकि यह खिड़की के कांच, दरवाजे की कुंढी, इस कुर्सी का हत्था, और यहाँ तक कि मेरे चश्मे की एक डंडी इसी कमबख्त ने तोड़ा है। यह बहुत दुष्ट और पाजी है। आप इसकी बात में मत आइयेगा। तोड़ा इसी ने है।" मास्टर साहब ने बड़ी बेबाकी से अपना उत्तर पेश किया और फिर वे हौले से मुस्कराये। उन्होंने इतनी बड़ी समस्या का हल इतनी आसानी से जो दे दिया था।

इंस्पेक्टर का सिर चकराया। वह सीधे प्रधानाध्यापक के कमरे में गया। उसने कहा -"देखिये प्रिंसीपल सर, आपके ये अध्यापक क्या कह रहे हैं? मैंने कक्षा में पूछा कि शिव का धनुष किसने तोड़ा? तब एक बच्चे ने जवाब दिया कि किसी ने भी तोड़ा हो, मैंने नहीं तोड़ा। और ये महाशय कह रहे हैं कि इसी ने तोड़ा। आप बताइये? क्या किया जाये। इन्हें यह नहीं पता कि शिव का धनुष किसने तोड़ा?"

"अरे साहब, खामख्वाह परेशान हो रहे हैं आप, बच्चे हैं कुछ न कुछ तोड़ते फोड़ते रहते हैं। कितना ध्यान दिया जाये इन पर। तोड़ - फोड़ करने पर हम दंड भी बहुत देते हैं लेकिन फिर भी ये बाज नहीं आते। छोड़िये ये सब बेकार की झंझट, बताइये क्या लेंगे आप? कुछ चाय-काफी मंगवाये या सीधे मुद्दे पर आये?" - प्रधानाध्यापक ने मामले को हलके से निपटा दिया था। जिस तरह एक कुशल प्रधानाध्यापक गंभीर से गंभीर मामले भी चुटकियों में निपटा देता है। उनका गर्वित चेहरा बता रहा था कि कोई कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न बन जाये वह एक अध्यापक की बुद्धिमत्ता और समस्या समाधान क्षमता का कभी मुकाबला नहीं कर सकता, आखिर है तो किसी अध्यापक का ही पढ़ाया न! अध्यापक अध्यापक ही होता है। जगत को ज्ञान के दीपक से प्रज्ज्वलित करने वाला, अधिकारियों यहां तक कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और भगवान को भी को सिखाने - पढ़ाने वाला।

इंस्पेक्टर बौखलाया सा मालूम हो रहा था। उसने सोचा कि विद्यालय के प्रबंधन से इन सबकी शिकायत की जाये। फिर आगे की कार्यवाही किया जाये। वह सीधे प्रबंधन बोर्ड के पास गया। उसने पहले घटित सारी राम - कहानी कह सुनाया। प्रबंधक ने कहा - "आप भी इंस्पेक्टर साहब! छोटी सी बात का इतना बड़ा मुद्दा? तोड़ दिया होगा किसी ने। हमारे यहाँ एक बढ़ई लगा रहता है टूटी - फूटी चीजों की मरम्मत के लिये। आप परेशान न होइए। बनवा दिया जायेगा, शिव का धनुष। आप आराम से घर जाइये। अन्यथा विद्यालय के मामले में फालतू में टांग अटाने के चक्कर में आप नौकरी से भी हाथ धो बैठेंगे। अपनी बहुत ऊपर तक पहुंच है, सीधा मुख्ययमंत्री जी से। आखिर किसी ने शिव का धनुष ही तो तोड़ा है। किसी ने देश तो नहीं फूंका है न?"

इंस्पेक्टर को लग रहा था, वह पागल है। या नहीं है तो हो जायेगा। क्योंकि वह खुद दुविधा में पड़ चुका था कि शिव का धनुष है भी या नहीं? एक बारगी उसे लगा शायद शिव का कोई धनुष ही नहीं है। और अगर होगा भी तो किसी ने तोड़ा नहीं होगा।

कहानी का मंतव्य-
इस संसार में हर कोई यूँ ही कुछ न कुछ कहे जा रहा है। वास्तविकता क्या है, सत्य क्या है किसी को नहीं पता। हर कोई बस यूँ ही "टाइमपास" कर रहा है क्योंकि जीवन तो काटना है किसी न किसी तरह। सच तो यह है कि जीवन का असली सत्य क्या है, यह हम जानने की जरूरत ही नहीं महसूस करते। अगर सौभाग्य से किसी को यह सच्चाई पता चल जाती है तब भी हम उसे नहीं मान पाते। होता तो यहाँ तक कि सच जानने वालों को ताउम्र समाज की लानत - मलानत झेलनी पड़ती है। कइयों को तो जीवन से भी हाथ धोना पड़ता है। आखिर क्या हुआ बुद्ध, महावीर और विवेकानंद के साथ? जहर देकर मारा गया। क्या हुआ जीसस के साथ? सूली पर चढ़ा दिया गया। क्या हुआ मंसूर के साथ? उसका अंग-अंग बेहरमी से धीरे-धीरे अलग किया गया। क्या हुआ कबीर और मीरा के साथ? सामाजिक तिरस्कार और प्रताड़ना। क्या हुआ प्रेम और अहिंसा के पुजारी गांधी के साथ? हिंसात्मक तरीके से मृत्यु।

यह समाज एक अंधे कुएं की तरह सिर्फ अंधा ही बना रहना चाहता है। ज्ञान की ज्योति, परमात्मा की ज्योति इसे भयभीत करती है। वह बस यह दिखाना चाहता है कि परमात्मा, जीवन का सत्य है कोई अदृश्य, विशाल चीज जिसे वह पाने का यत्न कर रहा है। फालतू के ढोंग और आडंबरों को वह इसका जरिया बनाता है। जबकि परमात्मा और वास्तविक सत्य इतना सस्ता और आसान है कि पलक झपकते ही अंतस में उतर जाता है। उसके लिये चाहिये केवल प्रेम और निर्अहंकार….…………।

प्रेम का अर्थ केवल खुद से, और अपनों से प्रेम करना नहीं होता बल्कि जीवमात्र के लिये प्रेम होता है। प्रेम का अर्थ सिर्फ संबंध तक सीमित नहीं होता बल्कि यह "मन की दशा" होती है जिसमें हर किसी के लिये "समाने की जगह" होती है। आज का प्रेम सिर्फ यह है कि "मैं तुम्हारी माँ हूँ, मैं तुम्हारा पिता हूँ, मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, मैं तुम्हारा पति हूँ, मैं तुम्हारा पुत्र हूँ, मैं तुम्हारी पुत्री हूँ, मैं तुम्हारा प्रेमी हूँ, मैं तुम्हारी प्रेमिका हूँ, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ, इसलिए मुझे प्रेम करो। मैं तुमसे इतना प्रेम करता हूँ तुम मुझसे कितना करते हो?" यह प्रेम का सबसे निचला स्तर है। इस स्तर पर प्रेम का अर्थ है "केवल मुझसे प्रेम" और किसी से नहीं। इस तरह का प्रेम एक छल है। जो किसी खास से प्रेम करता है, 99.99% संभवाना है वह दूसरों के प्रति प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता।

जब तक हम दूसरों के लिए प्रेमपूर्ण नहीं होगें दूसरा हमारे लिये प्रेमपूर्ण कैसे हो सकता है। यही कारण है कि संसार अपने जन्म काल से ही तमाम उपदेशों, शास्त्रों, पोथियों और उसके विचारकों के बावजूद अनेक युद्ध और शत्रुताओं का सामना कर रहा और आज भी यह जारी है। जबकि प्रेम के उपदेशों का पहाड़ हमारे सामने खड़ा है।हमारा प्रेम मानवमात्र, जीवमात्र, पशु-पक्षी, चर - अचर, देशी - विदेशी, शत्रु - मित्र, अपना - पराया सबके लिये समान होना चाहिए। यह मन की दशा होनी चाहिए।

इसी प्रकार निर्अहंकार होना भी आवश्यक है। निर्अहंकार होने का अर्थ है - "मैं कुछ नहीं, मेरा कुछ नहीं।" जब तक भीतर "मैं" की दीवाल खड़ी रहेगी परमात्मा का प्रकाश, सत्य का प्रकाश भीतर के कमरे में प्रकट नहीं हो सकता। हमें परमात्मा इसलिये नहीं मिल पाता कि वह अदृश्य है, विशाल है, असीम है, बल्कि वह हमें इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि हम मिलना नहीं चाहते। हम यह दो चीज़ें नहीं कर पाते इसलिए नहीं मिल पाता। हम सिर्फ़ उसे पाने का ढोंग करते हैं। क्योंकि हमें कुछ करना है बस यूँ ही……………

©विन्ध्येश्वरी