आज रात (30 जुलाई 2020) एक महीने के बाद एक ऐसा शानदार अनुभव हुआ जो संभवतः अब मिले न मिले। वह अनुभव है, मृत्यु का अनुभव। सच परम अनुभव था।
मैं विगत एक महीने से भौतिक शरीर से सूक्ष्म शरीर को निकालने का अभ्यास कर रहा था। प्रायः रात में। कभी-कभी दिन में भी। लेकिन अभी तक आंशिक सफलता ही मिलती थी। सूक्ष्म शरीर निकलने की कोशिश करता था किंतु नहीं कर पाता था। इसका नतीजा यह होता था कि काफी देर तक सिर और शरीर में दर्द रहता था। मगर आज तो कमाल ही हो गया।
आज रात जब मैं लेटकर अभ्यास कर था। मुझे अनुभव हुआ कि शरीर से आत्मा पृथक हो गयी है और यह भौतिक शरीर अचेत पड़ा हुआ है। मेरा सूक्ष्म शरीर उसे देख रहा है।*
अच्छा तो यह है मेरा शरीर!………
अच्छा तो अब यह अचेत पड़ा है!……
ठीक है!……
और फिर मैं आगे बढ़ गया। जहाँ तक मेरा अनुमान है लगभग एक घंटा मैं इसी अवस्था में रहा फिर वर्तमान अवस्था में वापस आ गया।
यह एक घंटा अविस्मरणीय क्षण है। इतना आनन्द, इतना शुकून, इतनी शांति, इतना निर्विकार, इतना निर्अहंकार। सचमुच अवर्णनीय। फिर यह ज्ञात हुआ कि
1- मृत्यु जैसा कुछ नहीं है। जीवन एक भ्रम है। ठीक वैसे जैसे समुद्र से एक गिलास पानी निकाल कर हम उसको फ्रीजर में रखकर जमा दें और उसे बर्फ मानकर खुश हो लें। ऐसे अनन्त ऊर्जा के समुद्र से थोड़ी सी ऊर्जा निकालकर अलग - अलग पिंडों (शरीरों) में रखकर जीवन बना है। जीवन बर्फ बनाना है और मृत्यु उस गिलास से मुक्त होना।
2- तुलसीदास ने लिखा है कि "जनमत मरत दुसह दुख होइ।" जन्म के समय का तो याद नहीं है लेकिन कम से कम आज मुझे तो मृत्यु में आनन्द, नहीं परमानन्द आया। शायद तुलसी की बात उनके लिए सच हो जो मरना नहीं चाहते। जिन्हें मरने से डर लगता है। ठीक वैसे ही जैसे गिलास में बना हुआ बर्फ बाहर न निकलना चाह रहा हो। और जब उसे जबर्दस्ती निकालना पड़े तो ठोक पीटकर निकाला जाये।
3- अब मैं सोंचता हूँ कि काश! मरने का यह अनुभव हर किसी को हो। संभव है पृथ्वी पर मृत्यु का भय न रह जाये।
4- मैंने महसूस किया कि इस ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जाएं मौजूद हैं। और उनका किसी से कोई बैर विरोध नहीं। सब स्वतंत्र और मुक्त हैं। काश ऐसी ही यह दुनिया भी हो पाती। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे - समुद्र से पानी निकाल कर अलग अलग पात्रों में रख दिया जाये। लोटा, गिलास, चम्मच, थाली, कढ़ाही, भगोना, भदेली, टब आदि। अब इन्हें अगर बर्फ बनाया जायेगा तो अलग अलग आकार-प्रकार में बर्फ बनेगा। कौन सा बर्फ श्रेष्ठ है, कौन सा घटिया कौन बता सकता है? अब यह प्रक्रिया अगर बार बार दुहरायी जाये। यानी इस बर्फ को फिर से पानी बनाकर फिर से विभिन्न बर्तनों में भरकर बर्फ बनाया जाये तो कौन बता सकता है कि किस बर्तन का पानी कहाँ है? मुझे महसूस हुआ कि इस अनन्त ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जा का समुद्र है। इसी में से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, मुस्लमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, ऊँचा, नीचा, गरीब, अमीर, स्त्री, पुरुष, जानवर, वृक्ष सब बनते हैं। यही प्रक्रिया अनन्त कालों से जारी है पता नहीं कौन सा व्यक्ति क्या था, क्या है और आगे क्या होगा। अगर मरने का सच सब अनुभव कर लें तो दुनिया का वितंडा ही खत्म हो जायेगा।
4- एक कसक बाकी रह गयी कि अगर इस दौरान किसी अन्य सूक्ष्म आत्मा से मुलाकात हो जाती तो कम से कम उसका भी अनुभव पूछ लिया जाता।
यह एक घंटा अविस्मरणीय क्षण है। इतना आनन्द, इतना शुकून, इतनी शांति, इतना निर्विकार, इतना निर्अहंकार। सचमुच अवर्णनीय। फिर यह ज्ञात हुआ कि
1- मृत्यु जैसा कुछ नहीं है। जीवन एक भ्रम है। ठीक वैसे जैसे समुद्र से एक गिलास पानी निकाल कर हम उसको फ्रीजर में रखकर जमा दें और उसे बर्फ मानकर खुश हो लें। ऐसे अनन्त ऊर्जा के समुद्र से थोड़ी सी ऊर्जा निकालकर अलग - अलग पिंडों (शरीरों) में रखकर जीवन बना है। जीवन बर्फ बनाना है और मृत्यु उस गिलास से मुक्त होना।
2- तुलसीदास ने लिखा है कि "जनमत मरत दुसह दुख होइ।" जन्म के समय का तो याद नहीं है लेकिन कम से कम आज मुझे तो मृत्यु में आनन्द, नहीं परमानन्द आया। शायद तुलसी की बात उनके लिए सच हो जो मरना नहीं चाहते। जिन्हें मरने से डर लगता है। ठीक वैसे ही जैसे गिलास में बना हुआ बर्फ बाहर न निकलना चाह रहा हो। और जब उसे जबर्दस्ती निकालना पड़े तो ठोक पीटकर निकाला जाये।
3- अब मैं सोंचता हूँ कि काश! मरने का यह अनुभव हर किसी को हो। संभव है पृथ्वी पर मृत्यु का भय न रह जाये।
4- मैंने महसूस किया कि इस ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जाएं मौजूद हैं। और उनका किसी से कोई बैर विरोध नहीं। सब स्वतंत्र और मुक्त हैं। काश ऐसी ही यह दुनिया भी हो पाती। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे - समुद्र से पानी निकाल कर अलग अलग पात्रों में रख दिया जाये। लोटा, गिलास, चम्मच, थाली, कढ़ाही, भगोना, भदेली, टब आदि। अब इन्हें अगर बर्फ बनाया जायेगा तो अलग अलग आकार-प्रकार में बर्फ बनेगा। कौन सा बर्फ श्रेष्ठ है, कौन सा घटिया कौन बता सकता है? अब यह प्रक्रिया अगर बार बार दुहरायी जाये। यानी इस बर्फ को फिर से पानी बनाकर फिर से विभिन्न बर्तनों में भरकर बर्फ बनाया जाये तो कौन बता सकता है कि किस बर्तन का पानी कहाँ है? मुझे महसूस हुआ कि इस अनन्त ब्रह्मांड में अनन्त ऊर्जा का समुद्र है। इसी में से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, मुस्लमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, ऊँचा, नीचा, गरीब, अमीर, स्त्री, पुरुष, जानवर, वृक्ष सब बनते हैं। यही प्रक्रिया अनन्त कालों से जारी है पता नहीं कौन सा व्यक्ति क्या था, क्या है और आगे क्या होगा। अगर मरने का सच सब अनुभव कर लें तो दुनिया का वितंडा ही खत्म हो जायेगा।
4- एक कसक बाकी रह गयी कि अगर इस दौरान किसी अन्य सूक्ष्म आत्मा से मुलाकात हो जाती तो कम से कम उसका भी अनुभव पूछ लिया जाता।
*चेतावनी- यदि आप यह अभ्यास कर रहे हैं तो कृपया ध्यान दें कि यदि आप अपने आपको संभाल न पाये तो दुनिया की नजर में आप मृत भी घोषित हो सकते हैं क्योंकि यह एक मृत्यु जैसा अनुभव ही है। अतः आप इसे अपने रिस्क पर करें। संभव है कि सूक्ष्म शरीर को आपका भौतिक शरीर पूरी तरह स्वीकार न कर सके अतः, पक्षाघात जैसी समस्या भी हो सकती है। क्योंकि कई बार यह करने पर मेरे शरीर में भिन्न-भिन्न अंगों में अनायास दर्द की समस्या हो चुकी है।
परम शांति- विन्ध्येश्वरी
परम शांति- विन्ध्येश्वरी
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