Tuesday, 20 July 2021

परमात्मा का अनुभव

परमात्मा का अनुभव


आपको भूख लगती है, प्यास लगती है, पीड़ा होती है, प्रेम होता है, घृणा होती है, क्रोध आता है, दया आती है। ये सभी वे भाव हैं जिन्हें आप अनुभव कर सकते हैं, कुछ कुछ बता सकते हैं दिखा नहीं सकते। जब आपको भूख लगती है तब खाने को व्याकुल हो जाते हैं। आपका रोम-रोम, प्राण-प्राण भोजन को ढूंढने लगता है। प्यास की स्थिति भी ठीक ऐसे ही है। पीड़ा होने पर आपका पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है। घृणा की दशा में संसार वितृष्णा से भर जाता है। क्रोध आने पर सबकुछ स्वाहा कर देने का मन होता है। दया आने पर सर्वस्व लुटा देने का मन करता है।

परमात्मा भी एक अनुभव है। जब परमात्मा आपको अनुभव में आता है, जब परमात्मा आपको घटता है तब कई सारी घटनाएं अकस्मात घट जाती हैं। आप आनन्द, प्रेम, करुणा से भर जाता है। मनुआ बेपरवाह सा हो जाता है। आनन्द ऐसा कि कोई कीचड़ (मुहम्मद साहब) और गाली (कबीर) भी उछाल दे आप पर तो भी कोई हर्ज नहीं। मार भी दे (महावीर) या मार ही डाले (मंसूर) तो कोई गिला नहीं। प्रेम ऐसा कि कोई नहीं पराया रह गया। तृण, लता-गुल्म, कंकड़-पत्थर, जीव-अजीव सब अपने हो जाते हैं। करुणा ऐसी कि अगर किसी का भला खुद की बलि देने से भी हो जाये तो कर देता है। बेपरवाही ऐसी कि कहीं आग लग जाये, प्रलय आ जाये तो भी कोई फिक्र नहीं। यही दशाएं या ऐसी ही अन्य दशाएं भी परमात्मा के मिलन की सूचना होतीं हैं।

आम आदमी की भाषा में आप इन्हें पागल कह सकते हैं क्योंकि पागलपन में भी यही सब घटता है। लेकिन दोनों के मध्य बारीक सा अंतर है। अंतर यह कि पागल बेहोश है और जिसे परमात्मा घटा है वह होश में होता है। पागल को अपने करने का भान नहीं होता जबकि जिसे परमात्मा घटा है वह अपनी मौज में सब करता है। क्योंकि उसके पास फिर ऐसा कुछ बचा नहीं जिसके लिये वह संताप करे, घृणा करे, क्रोध करे, लोभ करे। उस परमहंस को ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि उसके पास अब और कुछ करने को रहा नहीं।

क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि जब आप किसी से भी द्वेष न कर सकेंगे तो क्या करेंगें? प्रेम ही बचता है। जब आप किसी पर क्रोध न कर सकेंगे तो क्या करेंगे? करुणा ही बचती है। जब आपको लोभ न रहेगा फिर क्या करेंगें? दान करेंगें। जब कोई आपका अपना न रहा सब अपने हो गये फिर आप क्या करेंगें? अपना सर्वस्व लुटा देगें। और अगर यह सब आपके साथ घट रहा है फिर दुखी होने और संताप करने के लिए बचा ही क्या? फिर तो नैसर्गिक आनन्द होगा। परमात्मा आपको घट चुका है।

जिस प्रकार आप कहीं यात्रा पर जाते हैं और वहाँ की सुरम्यता, रमणीयता को अनुभव करते हैं। ठीक ऐसे ही परमात्मा की यात्रा पर गया परमहंस भी उसे अनुभव करता है। किंतु जैसे आप उस यात्रा की कुछ तस्वीर ला सकते हैं वह स्थान नहीं, उसकी रमणीयता और सुरम्यता नहीं। ठीक वैसे ही आप परमात्मा की तस्वीर ला सकते हैं, परमात्मा नहीं। उस तस्वीर के साथ आपकी अनुभूति जुड़ी हो सकती है, वह आपके लिये आनन्दप्रद हो सकती है। लेकिन दूसरे के लिये महज तस्वीर देखकर उस आनन्द को प्राप्त करना स्वप्न में राजा बनने जैसा ही है। हां उस तस्वीर को, उस अनुभव को सुनकर आप उस तक पहुंचने का मन जरूर बना सकते हैं लेकिन तस्वीर देख लेना ही यात्रा का आनन्द नहीं। परमात्मा तो सिर्फ आपके जीवन में, आपकी आत्मा में घटता है। उसके सिवा और कहीं नहीं।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

Friday, 16 July 2021

वासना से लड़ो मत

*लड़ो मत वासना से*


झेन फकीरों की कथा है। एक बूढ़ा फकीर और एक युवक फकीर आश्रम वापस लौट रहे हैं। छोटी-सी नदी पड़ती है। और एक सुंदर युवती नदी पार करने को खड़ी है, लेकिन डरती है। अनजानी नदी है, पहाड़ी नदी है, गहरी हो, खतरनाक हो, बड़ी तेज धार है। बूढ़ा संन्यासी तो नीचे आंख करके जल्दी से नदी में प्रवेश कर जाता है क्योंकि वह समझ जाता है कि यह पार होना चाहती है, हाथ का सहारा मांगती है, लेकिन वह डर जाता है। हाथ का सहारा! इस बात में पड़ना ठीक नहीं! लेकिन युवक संन्यासी उसके पीछे ही चला आ रहा है। वह युवती से पूछता है कि क्या कारण है? सांझ हुई जा रही है, जल्दी ही सूरज डूब जाएगा और युवती अकेली छूट जाएगी। युवती कहती है- मैं बहुत डरी हुई हूं। पानी में उतरते घबराती हूँ। मुझे उस पार जाना है।

तो वह युवक संन्यासी उसे कंधे पर ले लेता है। बूढ़ा संन्यासी उस पार पहुंच गया, तब उसे याद आती है कि मेरे पीछे एक युवा संन्यासी भी आ रहा है, कहीं वह इस झंझट में न पड़ जाए! लौटकर देखता है तो उसकी आंखों को भरोसा ही नहीं आता है : वह कंधे पर बिठाए हुए लड़की को नदी पार कर रहा है! बूढ़ा तो आग से जल-भुन गया। युवक संन्यासी ने युवती को दूसरे किनारे उतार दिया, फिर दोनों चुपचाप चलने लगे। दो मील तक कोई बात न हुई। दो मील बाद बूढ़े को बर्दाश्त के बाहर हो गया। उसने कहा - यह ठीक नहीं हुआ और मुझे गुरु को जाकर कहना ही पड़ेगा; नियम का उल्लंघन हुआ है। तुमने उस सुंदर युवती को कंधे पर क्यों बिठाया!

उस युवक ने जो कहा, वह याद रखना। युवक ने कहा - "आप बहुत थक गए होंगे। मैं तो युवती को नदी के तट पर ही उतार आया; आप अभी कंधे पर बिठाए हुए हैं! आप बहुत थक गए होंगे! बात आई और गई भी हो गई, अभी तक आप भूले नहीं!"

जिसको तुम महात्मा कहते हो, वह आंख तो झुका लेगा; लेकिन आंख झुकाने से कहीं वासनाएं समाप्त होती हैं! आंख फोड़ भी लो तो भी वासनाएं समाप्त नहीं होती। आंखों पर पट्टियां बांध लो, तो भी वासनाएं समाप्त नहीं होती, वासनाओं का आंखों से क्या संबंध है? क्या तुम सोचते हो, अंधे को वासना नहीं होती? अंधे को इतनी ही वासना होती है, जितनी तुमको; शायद थोड़ी ज्यादा ही होती है। क्योंकि उसके पास, बेचारे के पास, उपाय भी नहीं; असहाय है, वह तड़फता है। उसके भीतर भी प्रबल आकांक्षा है, प्रबल वेग है। तो आंख बंद कर लेने से, आंख झुका लेने से क्या होगा? किसको धोखा दे रहे हो?

तो एक तो साधारण आदमी है, जिसके शरीर में ज्वर उठता है वासना का, सौंदर्य को देखकर। और एक तुम्हारा तथाकथित महात्मा है; उसके भीतर भी ज्वर उठता है, लेकिन वह आंख झुका लेता है। दोनों के भीतर शरीर भागना चाहता है। एक भागने देता है, दूसरा शरीर को जबरदस्ती रोक लेता है। शायद लौटकर वह दो दिन उपवास करेगा पश्चात्ताप में या शरीर पर कोड़े मारेगा।

हिंदू फकीर, सूफी फकीर, ईसाई फकीर, झेन फकीर, सारी दुनिया में हजारों किस्म के फकीर हुए, जिनमें न मालूम कितने-कितने ढंग के रोग व्याप्त हो गए। कोड़े मारनेवालों की जमात रही है। उपवास करने वालों की जमात रही है रात-रात भर जागन वालों की जमात रहती है। कमर में कीले चुभाने वाले, बैल्ट बांध लेनेवालों की जमात रही है। जूतों में कीले अंदर की तरफ निकालकर घाव पैरों में बनाकर चलनेवालों की जमात रही है। आंखें फोड़ लेनेवाले, जननेंद्रियां काट देनेवालों की जमात रही है। ये बीमार जमातें हैं। मैं इसके समर्थन में नहीं हूँ।

एक और रास्ता है। लड़ो मत वासना से। लड़कर कहां जाओगे? घाव बन जाएंगे। कुछ और बड़ी वासना को जगा लो–परमात्मा की वासना। किसी और बड़े प्रेम से थोड़े भर जाओ। थोड़ी आंख ऊपर उठाओ। इस सौंदर्य में भी इसीलिए रस है कि इस सौंदर्य में क्षणभर को परमात्मा के सौंदर्य की थोड़ी-सी छाया पड़ी है। तुम छाया से ग्रसित हो जाते हो, क्योंकि मूल को नहीं देखा है। तुम तस्वीर से जकड़ जाते हो, क्योंकि जिसकी तस्वीर है उसको तुमने नहीं देखा है। उसको देख लो, मिल गई जागीर। फिर लड़ना नहीं पड़ता। फिर जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती। फिर एक मालकियत आती है, जो बड़ी सहज है।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

माँ छिन्नमस्ता

कथा कहती है कि देवासुर संग्राम में असुरों के संहार और उनके रक्तपान करने के बाद भी माँ चिंतपूर्णी की सखियों नील वर्णी जया और श्वेत वर्णी विजया की रक्तपिपासा शांत नहीं हुई। वे बार बार माँ से रक्त पिलाने को कह रही थीं। माँ ने उन्हें रुकने के लिये कहा लेकिन वे फिर भी नहीं शांत हो रही थीं। माँ उस समय रतिशील कामदेव के मर्दन में व्यस्त थीं। फिर भी जया और विजया शांत न रहीं। फिर माँ चिंतपूर्णी ने अपना शीश काटकर जया औय विजया को रक्तपान कराया। तब उनकी पिपासा शांत हुई। माँ चिंतपूर्णी माँ छिन्नमस्ता कहायीं। ये दस महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर प्रतिष्ठित हैं।


अघोर, शाबर, योग, वज्रयान आदि तंत्र प्रथाओं में माँ छिन्नमस्ता की साधना अति प्रचलित और सम्माननीय साधना है। इस कथा और रूपक का अत्यंत महत्त्व है। चाहे आप गोरें हों या काले दुनिया में तमाम लूट घसोट मचाने के बाद भी, तमाम यत्न-उपाय कर सृजन, संग्रह करने के भाद भी मनुष्य की "कुछ और पाने की पिपासा/महत्त्वाकांक्षा" शांत नहीं होती। इसे शांत करने का एक ही उपाय बचता है, समस्त समस्याओं की जड़ शीश यानि बुद्धि और मन को अलग कर दिया जाये। जब मन और बुद्धि आत्मतत्व से अलग हो जाता है, जब भीतर "मैं" नहीं बचता, तब अंतरतम से अजस्र आनन्द और तृप्ति के रस का उदय होता है। कबीरदास जी इसे कहते हैं -
"कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुईं धरे, सो घर पैठे माहिं॥"


यह रूपक बताता है कि काम हमारा शत्रु नहीं है हमारा शत्रु है हमारा मन, हमारी विचारणा, हमारी बुद्धि। हम नाहक काम के दमन में संलग्न होते हैं। मन को जीतो लो तो सब कुछ जीता हुआ ही है। फिर कुछ जीतना शेष नहीं रह जाता।

माँ छिन्नमस्ता अपने ही रुधिर धार को खुद भी पी रही हैं। इसका एक अर्थ यह है कि मनुष्य खुद ही दाता और खुद ही ग्रहीता है। वह वही प्राप्त करता है जो देता है। अपना खुदा आप ही है। अगर आप ईश्वर पाना चाहते हैं तो खुद ईश्वर होना पड़ेगा। ईश्वर कहीं बाहर से नहीं आता है। जब आपका ही अहमतत्व मिट जाता है फिर परम तत्व का प्राकट्य हो जाता है। कबीर कहते हैं -
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।"


कामाख्या के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय है। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है। यह मंदिर लगभग 6000 साल पुराना बताया जाता है।

माँ छिन्नमस्ता के परम, अद्वितीय, अद्भुत विग्रह को नमन, वंदन, अर्चन। माँ मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकार करें।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

Tuesday, 13 July 2021

सत्य क्या है?

आप न तो पूरा सच जानते हैं और न ही पूरा झूठ कह पाते हैं। वास्तविक सत्य, आपके द्वारा कहे गये झूठ और सच के बीच कहीं होता है। मान लो आपसे किसी ने पूछा कितना समय हुआ। आप बोले कि 12 बजकर 15 मिनट। क्या आप दावा कर सकते हैं कि आपने सच बोला या झूठ? सामान्यतया आप कहेंगे हां सही है। घड़ी में इतना ही बज रहा था। नहीं। इतना ही नहीं बज रहा था। कुछ सेकेंड जरूर आगे पीछे रहा होगा। अब आप कहेंगे कि सेकेंड कौन देखता है? मेरा मत है कि आपने जितना सेकेंड या फिर नैनो सेकेंड छोड़ा होगा आप उतनी मात्रा में झूठे हो गये। लेकिन आप पूरी तरह झूठे भी नहीं है। वास्तविक सत्य कहीं इसके मध्य में है।

चलिए मान लेते हैं कोई पूरा सच कहने की कोशिश करने वाला सत्यवादी है। क्या वह कह सकता है? ऊपर के ही उदाहरण को देखते हैं। मान लो कि उस सत्यवादी ने नैनौ सेकेंड या इससे भी छोटी इकाई तक समय बताने के बारे में वीणा उठाया है। उसने बताया भी। 12 बजकर 15 मिनट 10 सेकेंड और फलां नैनो सेकेंड। क्या वह पूरा सच है? नहीं। वह मेरे पास तक पहुंचते-पहुंचते झूठा हो गया। उसने जब कहा था तब वह सच था लेकिन अब झूठा। वह उसका सच हो सकता है मेरा नहीं। वास्तविक सत्य भी छूट गया।

यह अनादि काल से होता आ रहा है कि लोग सच कहने की कोशिश करते हैं लेकिन वह कभी कह नहीं पाते। सच हमेशा छूट जाता है। कहने के बाद जो बचा रह जाता है वही सदासत्य है। वह अज्ञेय ज्ञेय है। वही ईश्वर है।

लोग कहते हैं कि सच कड़वा होता है। नहीं सच न तो कड़वा होता है न मीठा। सच सिर्फ सच होता है। ऊपर के समय वाले उदाहरण को देखते हैं। समय का सच कड़वा है या मीठा? आप कहेंगे नहीं, न मीठा न कड़वा। नहीं, आप पूरा सच नहीं कह रहे हैं। मान लो किसी को 12 बजकर 12 मिनट वाली ट्रेन पकड़ना है। आपने उसे 12 बजकर 15 मिनट बता दिया। सच बता दिया। यानि उसकी ट्रेन छूट गयी। अब उसके लिये यह सच कड़वा हो गया। इसी तरह रात के 12 बजकर 12 मिनट पर किसी की हसीं रात (सुहागरात) का मुहुर्त है और आपने उसे बताया दिया। उसके लिये यह सच मीठा हो गया। लेकिन झोपड़ी में पड़े दादा जी के लिए दोनों में से कोई भी स्थिति नहीं है। न मीठा न तीखा। तात्पर्य यह है कि किसी सत्य के प्रति हमारा झुकाव क्या है? हमारा स्वार्थ क्या है? हमारी धारणा क्या है? इससे तय होता है कि सच कड़वा है या मीठा या फिर तटस्थ।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

Saturday, 10 July 2021

माँ और पत्नी


संबंधों में नरम-गरम, खट्टा-मीठा लगा रहता है। फिर भी संबंध संबंध होते हैं। कुछ जैविक होते और कुछ जैविक जैसे होते। माता-पिता और भाई-बहन का संबंध जैविक है जबकि पति-पत्नी का संबंध जैविक जैसा है। माता-पिता के बाद अगर हमारे जीवन को बनाने में कोई सर्वाधिक त्याग और योगदान करता है तो वह एक सद्पत्नी होती है। मैं इस बात में कम भरोसा करता हूँ कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं क्योंकि अगर वहां बनतीं तो बनने के बाद टूटती नहीं। फिर भी जोड़ियां बनती हैं यह सच है।

माता का पद संसार में सर्वाधिक उच्च कहा गया है। है भी। मैं थोड़ी सी धृष्टता करते हुए सद्पत्नी को भी लगभग माँ के बराबर रखने की वकालत करता हूँ। वजह यह है कि अगर-

1- माँ ने हमें अपने कोख में नौ महीने पाला और टट्टी-पेशाब में लोटकर हमें बड़ा किया तो पत्नी उसके साथ ऐसा ही करने वाले अपने माता-पिता को छोड़कर एक पराये पुरुष के साथ चली आयी। उसने अपनी उस मिट्टी, उन संगी-साथियों को छोड़ा जिसमें वह पली-बढ़ी और खेली कूदी। मुझे लगता है कि यह त्याग उसे माँ के बरक्स ही खड़ा करता है।

2- माँ अपनी संतान के लिये सिवाय काम-संबंध बनाने के बाकी वो सारे कार्य करती है। नहलाना-धुलना, वस्त्र धुलना, खाना पकाना - खिलाना, पढ़ना-लिखना आदि। पत्नी माँ द्वारा छोड़े गये इस एक कार्य सहित और भी सारे कार्य करती है। इससे भी पत्नी का दर्जा माँ के समानांतर ही हो जाता है।

3- माँ अपनी संतान से बेहद दर्जे का प्यार करती है। एक स्त्री माँ बनकर स्त्रीत्व की पराकाष्ठा या कहें कि प्रेम की ऊंचाई को पार करती है। पत्नी थोड़ा सा इस मामले में माँ से पीछे रह जाती है। वह अपने पति को वैसा प्रेम नहीं कर पाती जैसा वह अपनी संतान को करती है। लेकिन इसके लिये वह दोषी नहीं है। पति दोषी है। एक सदपत्नी तो अपना पूरा समर्पण पति को देती है किंतु पति ठहरा उथला गड्ढा़ वह प्रेम के जरा से अति बहाव से ही भर जाता है और पत्नी का प्रेम उसके ऊपर से बहकर निकल जाता है। पत्नी का प्रेम पति की आत्मा तक नहीं पहुंच पाता। इसी कारण वह अधूरी रह जाती है। किंतु जब वह संतानवती होती है, वह अपने अधूरे किंतु लबालब भरे प्रेम को अपनी संतान पर उड़ेल देती है और फिर वह और उसका प्रेम परिपूर्ण हो जाता है। मेरा मानना है कि अगर पति पत्नी के मध्य माँ और पुत्र सा प्रेम हो जाये तो दुनिया स्वर्ग हो जाये। फिर संसार में सिर्फ प्रेम ही प्रेम बचेगा।

4- एक सद्पत्नी एक माँ की तरह ही अपने पति के जीवन में सुख-दुख, जय-पराजय आदि की संगिनी होती है। उसके जीवन को बनाने-संवारने में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करती है।

अस्तु मेरा तो मानना है कि एक पत्नी को माँ का दर्जा भले न दिया जाये किंतु माँ के समानांतर एक प्रतिष्ठित जगह जरूर मिलनी चाहिये। माँ, माँ होती है और पत्नी, पत्नी। दोनों की त्याग और महत्ता अद्वितीय, अवर्णनीय और अतुलनीय है। हम माँ को सम्मान तो देते हैं लेकिन एक पत्नी अपने सम्मान और गरिमा के लिये हमेशा जूझती और गुहार करती दिखती है। इसलिये उसे उसका हक मिलना चाहिए। 

आज ही के दिन मेरे जीवन में एक सद्पत्नी के रूप में आपका आगमन मेरे जीवन की सुंदरतम घटना थी। मुझे नहीं पता कि मैं कितना आपका साथ निभा पाया लेकिन आपने काफी साथ निभाया। उसके लिये आपको और पराअंबा भगवती, आदि शक्ति को अशेष आभार धन्यवाद। आप सदैव स्वस्थ, सुखी और प्रसन्न रहें।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

Thursday, 24 June 2021

चालाक लोमड़ी और भगवान के ठेकेदार

चालाक लोमड़ी और भगवान के ठेकेदार



एक घना जंगल था उस जंगल में एक शेर रहता था। शेर बहुत ही खूंखार और ताकतवर था। जंगल के सभी जानवर उससे थर-थर कांपते थे। उसी जंगल में एक लोमड़ी रहती थी लोमड़ी बहुत चालक थी। एक बार लोमड़ी जंगल में अपना शिकार तलाश रही थी कि अचानक ही शेर उसके सामने आ गया और उसने लोमड़ी पर हमला कर उसे दबोच लिया। लोमड़ी ने जैसे-तैसे अपने आप को संभाला और शेर से बोली - "शेर भाई मुझे इस जंगल में भगवान ने भेजा है और अगर तुम ने मुझे मारा तो वो तुम्हे इसकी सजा भी देंगें।"

लोमड़ी कि बात सुनकर शेर कुछ असमंजस में पड़ गया और लोमड़ी से बोला- "मैं तुम्हारी बातों पर कैसे विश्वास कर लूँ और भला तुमें भगवान ने यहाँ क्यूँ भेजा है?"

लोमड़ी बोली- "यह जंगल बहुत बड़ा है और इस जंगल में आपका राज है। आप इस जंगल का संचालन अच्छी तरह से कर सकें इस कारण आपकी सहायता के लिए भगवान ने मुझे भेजा है।"

शेर बोला- "हो सकता है तुम अपनी जान बचाने के लिए झूंठ बोल रही हो, इस बात का क्या प्रमाण है कि तुम्हे भगवान ने ही भेजा है?"

लोमड़ी बोली - "मैं एक लोमड़ी हूँ और जंगल के अधिकांश जानवर लोमड़ी से नहीं डरते किन्तु मुझे देखकर जंगल का बड़े से बड़ा जानवर भी भाग जाता है अगर आपको यकीन ना हो तो आप मेरे पीछे-पीछे आइये और खुद ही देख लीजिये।"

शेर लोमड़ी कि बातों पर यकीन कर उसके पीछे-पीछे चलने लगा और जैसे ही कोई जानवर मिलता वो लोमड़ी को देख कर भाग जाता। अब शेर को यकीन हो गया कि इस लोमड़ी को भगवान ने ही भेजा है। असल में हुआ यह कि लोमड़ी के पीछे शेर था जंगल के जानवर शेर को देख कर भाग रहे थे जबकि शेर समझ रहा था कि जानवर लोमड़ी को देखकर भाग रहें हैं।

अब शेर भी लोमड़ी को सम्मान देने लगा और उसे अपना प्रमुख सलाहकार बना लिया।लोमड़ी को अब भोजन के लिए भटकना भी नहीं पड़ता था क्यूंकि शेर लोमड़ी को भगवान द्वारा भेजा गया प्राणी समझकर जो शिकार करता था उसी में से कुछ हिस्सा भी दे देता था।इस प्रकार लोमड़ी अपनी चालाकी से ना सिर्फ अपनी जान बचाई अपितु शेर कि सलाहकार बनकर आनन्द पूर्वक जीवन यापन करने लगी।

कुछ कुछ हाल धर्म के ठेकेदारों का भी है। उन्होंने खुद को भगवान के द्वारा भेजा हुआ, पैदा किया हुआ उनका बेटा घोषित कर धर्म की सारी ठेकेदारी खुद ले ली, और दूसरों की कमाई और साधन पर गुल छर्रे उड़ाने लगे।

Saturday, 12 June 2021

दरिद्र नारायण


आप कहते हैं "भारत के लोग सदियों से गुलाम और गरीब रहने के कारण भयानक हीनता के भाव से पीड़ित हैं...।''

मैं कहता हूँ कि कौन इन्हें गरीब कर रहा है ???

कौन इन्हें दीन कर रहा है ???

कौन इन्हें दास बना रहा है ???

आपकी मनोवृत्ति अभी भी पीछा नहीं छोड़ रही।

महात्मा गांधी दरिद्रों को नया नाम दे गए--दरिद्रनारायण। 

अब जब दरिद्र नारायण हो तो दरिद्र को मिटाना कैसे ?

नारायण को मिटाओगे क्या ?

नारायण की तो पूजा होती है। मंदिर में स्थापित करो गरीब को, पूजा करो इसकी! धन्यभागी है, गरीब है! 

अछूतों को हरिजन कह गए। कहां तो हम हरिजन कहते थे उन लोगों को जिन्होंने परमात्मा को पा लिया। हरि को तो जाना नहीं और हरिजन हो गए! इससे तो अछूत शब्द अच्छा था। उसमें दंश था, पीड़ा थी। हरिजन शब्द तो बड़ा मिठास भरा हो गया। भीतर जहर है, ऊपर थोड़ी-सी चासनी है। अब गटक जाओ। अब तो हरिजन होने में बड़ा मजा आ गया!

दरिद्रता को मिटाना है कि पूजा करनी है उसकी ???

 दरिद्रनारायण! तो मंदिर बनाओ!

रवींद्रनाथ ने कहा है, मेरा परमात्मा तो वहां है जहां मजदूर पत्थर तोड़ रहा है। मेरा परमात्मा तो वहां है जहां किसान भरी दुपहरी में जब सूरज आग बरसाता है तो अपने खेत में बीज बो रहा है।

तो ठीक है, फिर जितने ज्यादा लोग सड़कों पर बैठ कर पत्थर तोड़ें, उतने ज्यादा भगवान। फिर जितनी धूप तेज बरसे और जितने लोगों का पसीना बहे, जितने लोगों का खून पसीना बने, उतने ज्यादा भगवान।

इस सारी रुग्ण अवस्था को शृंगार दे-देकर सजा-सजा कर बचा रहे हो! 

और कौन है जिम्मेवार इसके लिए ???

जिम्मेवार है तुम्हारा भाग्यवाद। 

सदियों से तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरु और तुम्हारे पावन शास्त्र तुम्हें समझा रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जैसा है वह भाग्य से निर्मित है। गरीब है तो भाग्य से और अमीर है तो भाग्य से। करने को तो कुछ बचता नहीं। भाग्य ही सब कुछ है तो पुरुषार्थ मर जाता है। पुरुषार्थ के लिए उपाय नहीं बचता। 

और संपदा पैदा होती है पुरुषार्थ से, भाग्य से नहीं। शक्ति पैदा होती है पुरुषार्थ से, भाग्य से नहीं। 

यह भाग्यवादी देश गरीब और गुलाम न होता तो क्या होता!

@विनय नमन 🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️

Tuesday, 4 May 2021

लाशों के सौदागर

दुनिया मर रही है और गिद्धों को लूट-खसोट कर सहेजने की पड़ी है। कथित तौर पर रावण के एक लाख पुत्र और सवा लाख नाती हुआ करते थे। उसने दशों दिशाओं और स्वर्ग लोक तक को जीत लिया था, चला गया। सिकंदर जो विश्व विजेता बनने निकला था, बीच रास्ते ही मर गया। नेपोलियन का भी सपना विश्व विजय ही था, वह भी सेंट हेलेना द्वीप पर भूख-प्यास से तड़प कर मरा। राम और कृष्ण जो कि भगवान माने जाते हैं, राम सरयु नदी में डूब कर मरे। कृष्ण को बहेलिये ने मार दिया। इच्छा मृत्यु का वरदान पाने वाले भीष्मपितामह बाणों से बींध दिये गये। राज्य की प्राप्ति के लिये बंधु-बांधवों को मार देने वाले पांडव हिमालय पर भूख-प्यास से तड़प कर मरे।

ये वे लोग हैं जो अपने आप में लगभग अजेय थे। तुम्हारी क्या औकात है? किस दिन के लिये, किसके लिये लोगों को लूट रहे हो। यह धरती, अकूत धन-सम्पत्ति किसी की नहीं हुई है। तुम्हारी भी नहीं होगी। कल्पना करो कि सारा देश समाप्त हो जाये और लूटने वालों कहीं एक कोने में तुम पड़े हो। आइने के सामने खड़े होने पर खुद का ही चेहरा भूतिया सा नजर आयेगा तुम्हें। तुम पागल होकर मर जाओगे। तुम्हारा लूटा हुआ माल, कुमार्ग से अर्जित सारा वैभव-साम्राज्य धरा रह जायेगा।

"सज धज कर जिस दिन मौत की शहजादी आयेगी।
न सोना काम आयेगा न चांदी आयेगी॥"

अगर जमीर बचा है, तो महज मुनासिब दाम लो। लोगों की मदद करो। ताकि खुद को ही मुंह दिखाने लायक बच सको। मैं तुम्हें जहन्नुम, दोजख या नर्क का वास्ता नहीं दे रहा, तुम्हें अपने जमीर का वास्ता है। तुम्हें अपनी आत्मा का वास्ता। मत बेंचो चंद सिक्कों और नोटों के लिये अपनी आत्मा। उस पर बड़ा बोझ हो जायेगा।

@विनय नमन 🙏🧘‍♂️

Saturday, 1 May 2021

मनुष्य एक कमजोर पशु है

आदमी एक कमजोर पशु है


कारण बड़ा अजीब है--वह भी खयाल में नहीं आता--क्योंकि आदमी कमजोर है। सारे पशुओं में आदमी कमजोर से कमजोर पशु है। अगर निहत्थे आप एक कुत्ते से भी लड़ें तो नहीं लड़ सकते। न तो आपके पास उतने मजबूत दांत हैं और न उतने नुकीले नाखून। जानवरों के पास दांत और नाखून उनके अस्त्र-शस्त्र हैं, उनके औजार हैं। आदमी बिलकुल कमजोर है। निहत्था आदमी किसी जानवर से जीत नहीं सकता। यही कमजोरी हिंसा की खोज बन गई। क्योंकि आदमी के पास नाखून न थे, इसलिए उसे छुरीत्तलवारें बनानी पड़ीं। वे नाखून की पूरक हैं। आदमी के पास इतने बड़े दांत न थे जितने पशुओं के पास थे, तो उसे औजार के दांत बनाने पड़े, जो पशुओं की छाती में घुस जाएं, उनका कलेजा बाहर खींच लें।

आदमी कमजोर है, इसलिए हिंसक हो गया। यह बड़े मजे की बात है। इसका मतलब यह होगा कि जब तक आदमी की भीतरी कमजोरी न मिट जाए, तब तक वह अहिंसक नहीं हो सकता। और तब इसका मतलब भी यह हुआ कि जितना बड़ा हिंसक आदमी हो, समझना कि उतना भीतर कमजोर है। और इसका यह भी मतलब हुआ कि जितना शक्तिशाली मनुष्य होगा, उतना अहिंसक हो जाएगा।

भय के कारण हिंसा पैदा हुई। आदमी भयभीत है, तो उसने हिंसा खोजी। और उसके पास हाथ थे, अंगूठा था, कमजोर मनोदशा थी--उसने चीजें फेंक कर मारनी शुरू कर दीं। उसके अस्त्र-शस्त्रों की खोज शुरू हो गई। फिर आदमी ने पत्थर के औजार से लेकर एटम बम तक की यात्रा की।

यह भी थोड़ा समझने जैसा है कि जैसे-जैसे आदमी के पास ताकतवर अस्त्र-शस्त्र बनते चले गए, वैसा-वैसा आदमी और कमजोर होता चला गया। आज से दस हजार साल पहले की कब्रों में अगर हम आदमी को देखें, तो वह शरीर की दृष्टि से हमसे बहुत मजबूत था। हमारे पास एटम बम हैं। अगर हम दस हजार साल के पहले के आदमी से युद्ध करें, तो वह हमसे जीत नहीं सकेगा। बाकी वह हमसे शरीर में मजबूत था। अगर हम अस्त्र-शस्त्रों को अलग कर दें और निहत्था लड़ें, तो हम पीछे के आदमियों से जीत नहीं सकते। आज भी जो जंगल में आदिवासी रह रहा है, उससे हम जीत नहीं सकते। शारीरिक रूप से वह ताकतवर है। क्यों?

एक दुष्चक्र है। कमजोर आदमी कमजोरी के कारण हिंसा के अस्त्र खोजता है। फिर हिंसा के अस्त्र जितने मिल जाते हैं, उतनी ही ताकत की जरूरत कम होती चली जाती है, तो वह कमजोर होता चला जाता है। जिस दिन हमारे पास सब तरह के स्वचालित यंत्र होंगे, उस दिन आदमी बिलकुल कमजोर होगा।

जो लोग पैदल चलते थे, उनके मुकाबले हमारे पैर कमजोर हैं। होंगे ही। क्योंकि हम पैदल तो चलने का कोई काम ही नहीं कर रहे हैं। पैर का कोई उपयोग नहीं है। जिन चीजों का उपयोग खोता चला जाता है, वे कमजोर होती चली जाती हैं। अब हमने कंप्यूटर खोज लिया है। जल्दी ही आदमी के मस्तिष्क की ज्यादा जरूरत नहीं रह जाएगी, और आदमी का मस्तिष्क भी कमजोर होता चला जाएगा। जिस चीज का हम यंत्र बना लेते हैं, उसकी फिर हमारे शरीर में कोई जरूरत नहीं रह जाती।

कमजोरी के कारण आदमी हिंसक हुआ। हिंसक होने के कारण और कमजोर होता चला गया। एक तरफ बड़ी ताकत है हमारे हाथ में कि हम लाखों लोगों को एक सेकेंड में मिटा दें; और दूसरी तरफ हम इतने निहत्थे हैं कि एक छोटा सा जानवर भी हम पर हमला कर दे तो हम सीधा उससे जीत नहीं सकते। हमारा बड़े से बड़ा सेनापति भी निहत्था जीत नहीं सकता एक साधारण जंगली पशु से।

@विनय नमन 🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️

Friday, 30 April 2021

क्यों रोते हो


मृत्यु से वही घबराता है जो जीवन को नहीं समझता, जो देह को ही जीवन समझता है। मृत्यु ही जीवन है और जीवन ही मृत्यु। देह जीवन नहीं है। जीवन इससे परे है। देह इस धरा का अंग था और यही रह जाता है। इसे जीवन समझने की भूल ही मृत्यु का कष्ट देती है। "जल में कुंभ कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, तत्व कहैं सब ज्ञानी।"

किस बात का रोना है? देह के लिये या उसके भीतर मौजूद परमात्मा के लिये। अगर देह के लिये रोना है तो वह तुम्हारे पास ही पड़ा है। अथवा इसके भीतर मौजूद परमात्मा के लिये रोना है? लेकिन जब वह इसमें मौजूद था तो आपने कभी सोंचा भी नहीं था उसके बारे में। फिर उसकी चिंता क्यों? यद्यपि वह अभी भी है, किसी और रूप में। क्यों रोते हैं फिर?


तुम इसलिए नहीं रोते कि अमुक मर गया बल्कि इसलिए रोते हो कि उसका मरना तुम्हें अपने मौत की आहट लगती है। तुम्हें लगता है "अब हमारी बारी है क्या?" मृत्यु के प्रति खौफ तुम्हें भयभीत करता है। फिर तुम उस परमात्मा को दोष देते हो, हे प्रभु रहम कर अब रुक जा! इतनी भी तल्खी क्यों है हम से……….

या फिर उससे जुड़ा स्वार्थ तुम्हें रुलाता है। अब मेरा क्या होगा रे? कौन ये करेगा? कौन वो करेगा? फिर धीरे-धीरे जब सब अपने ढर्रे पर आने लगता है तुम्हें उस अतीत में जाने वाले का ख्याल भी नहीं आता है। आता भी है तो फिर उस याद को झिड़क कर अलग खड़े हो जाते हो और अपने कार्य में मशरूफ।

@विनय नमन 🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️

ईश्वर निर्दोष है

ईश्वर किसी भी कृत्य के लिये निर्दोष है

ईश्वर एक नियम है। प्राकृतिक नियम। प्राकृतिक नियम सदा सर्वदा तटस्थ होते हैं। वे समदर्शी होते हैं। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। वह न तो किसी पर कोई विपत्ति थोपता है और न ही दूर करता है। न तो वह किसी के खरबों चढ़ावे से प्रसन्न होता है, न दीनता, दुखता या प्रार्थना से द्रवित होता है। उसे इससे भी फर्क नहीं पड़ता किसको पुत्र पैदा हुआ किसको पुत्री और किसका कौन सगा-संबंधी-अपना-पराया मरा। मनुष्य का आज का कर्म ही उसका प्रारब्ध है। मनुष्य अपने चयन का उत्पाद है। ईश्वर सदैव तटस्थ था, है और रहेगा।

यह हम ही होते हैं जो अपने समाज की बुराइयों, उसकी समस्याओं का समाधान करने हेतु प्रतिबद्ध हो जाते हैं। अगर हम उसे दूर ले जाते हैं तब यही समाज उस अमुक को महापुरुष या भगवान का दर्जा दे देता है। ये वही लोग होते हैं जो आम आदमी की क्षमता, कल्पना और शक्ति से परे काम कर जाते हैं। इनमें जो खास बात होती है वह है साहस, धैर्य, लगनशीलता। और सबसे बड़ी बात समाज के बुराई की समझ, संवेदना और उसे दूर करने की ललक। जो जितना ज्यादा अपने इस अभियान में सफल होता है वह उतना बड़ा और महान भगवान बना दिया जाता है।

कल्पना कीजिये कि राम ने अपने समय की अहम बुराई "रावण" और उससे संबंधित अन्य बुराइयों को न खत्म किया होता तो राम क्या होते? महज, एक था राजा और उसकी तीन रानियां। उनसे चार लड़के हुए लड़कों की शादी हुई, बच्चे पैदा किये, राज्य पर शासन किया और फिर सामान्य तरीके से प्राकृतिक मौत मर गये। कौन याद करता इस कहानी को? एक व्यक्ति भी नहीं। इतिहास में कहीं राम का नाम भी न होता। ऐसे हजारों राजा हुए, आये और गये। कहीं जिक्र तक नहीं है। 

ऐसे ही कृष्ण की कहानी ले लीजिये। कृष्ण को राम से भी बड़ा यानि 16 कला संपन्न भगवान क्यों कहा जाता है? क्योंकि उन्होंने समाज के लिये वह सब कुछ किया जो नहीं भी किया जा सकता था। उन्होंने लोगों को नयी जिंदगी देने के लिये, उन्हें सबक सिखाने के लिये, समाज में नयी मिसाल खड़ी करने के लिये हर सीमा को तोड़ दिया। हो गये वे भारतीय इतिहास के सबसे बड़े भगवान।

बुद्ध, महावीर, मुहम्मद, ईसा, गांधी, अंबेडकर, तिलक, भगतसिंह, आजाद आदि को कौन पूछता अगर उन्होेंने अपनी सीमाओं को नहीं तोड़ा होता? ये सभी इंसान ही थे। जब इंसान अपनी सीमा को लांघ जाता है तब वह भगवान हो जाता है और जब उसका पतन हो जाता है तब वह राक्षस हो जाता है।

हमारे आसपास हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं जो इंसान पैदा होने के बाद राक्षस हो गये। हिटलर, मुसोलिनी, रावण, कंस, लादेन आदि ऐसे ही राक्षस हैं। इनका विनाश हुआ। आज भी हमारे बीच लाखों - करोड़ों राक्षस, महाराक्षस घूम रहे हैं। बर्बरता की सारी हदें पार कर रहे हैं। आॅक्सीजन, जरूरी दवाइयों, दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुओं आदि की कालाबाजारी कर रहे हैं। लाश पर राजनीति कर रहे हैं।
हम ही लोग भगवान हैं और हम ही राक्षस। यह हमारे ऊपर निर्भर है हमें क्या बनना है। हम जो भी बने राक्षस या भगवान, उस परम शक्ति को रंचमात्र भी फर्क नहीं पड़ता। वह अपने तरीके से काम करती रही है, कर रही है और करेगी भी। वह कोई कार्य स्वयं करता ही नहीं। फिर दोष किस बात का? करते हम हैं। चाहे हम भगवान बने या राक्षस। हमें हमारी सारी प्रभुता छोड़कर यहीं जाना है। हम उसमें से बाल की नोक बराबर भी कुछ नहीं ले जा पायेंगे। हम भगवान बनकर जिस संसार या समाज के लिये अच्छा करेंगे वह भी हमें दफना या जला देगा या फिर राक्षस बनकर जिस समाज को नुकसान पहुंचा कर हम जिन अपनों का पोषण करेंगे, उनकी जिंदगी सुखी बनायेंगे वे भी हमें दफना या जला ही देंगे।

सारांशतः मनुष्य हैं हम, हम भगवान बनकर भी तुच्छ रहेंगे और राक्षस बनकर भी। फर्क बस इतना है कि अच्छा बनकर स्वयं को अच्छा लगता है और बुरा बनकर आत्मा पर एक बोझ बना रहता है। यही बोझ या खुशी लेकर हम मरते हैं। मरते समय अगर प्रसन्न चित्त मरे तो वही स्वर्ग का सुख मिल जाता है या फिर अगर ग्लानि से भरकर मरे तो मरते समय नर्क जैसा अनुभव होता है।

@विनय नमन 🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️

Friday, 23 April 2021

परतंत्रता प्रिय मनुष्य


मनुष्य स्वभावतः परतंत्रता प्रिय है।वह बातें तो स्वतंत्रता की करता है लेकिन परतंत्रता उसे सुखकर लगती है,सुरक्षा का भान करवाती है। उसने स्वयं को एक घर में कैद कर लिया और सुरक्षित अनुभव करने लगा।वह जिसे भी प्रेम(भौतिक स्तर)करता है उसे कैद करने की कोशिश करता है।पत्नी अगर पति को प्रेम करने लगी तो पति को शाम ढलने से पहले घर आ जाना चाहिए,किसी अन्य स्त्री से बात नहीं करना चाहिए।पति भी स्त्री के विषय में यही सोंचता है।माता-पिता पुत्र-पुत्री के विषय में यही सोंचते हैं।मनुष्य जब पशु-पक्षियों को प्रेम करता है तब उन्हें पिंजरे या जंजीर में जकड़ देता है।अगर वह ईश्वर को मानता है तो उन्हें भी मंदिर/मस्जिद/चर्च/गुरुद्वारा बना सलाखों के पीछे डाल देता है।आजादी का स्वाद न खुद चखा,न औरों को चखने दिया।@विनय नमन🙏🏻🧘🏻‍♂️

Wednesday, 21 April 2021

ईश्वर नियम है या नियम ही ईश्वर है

ईश्वर नियम है या नियम ही ईश्वर


ईश्वर नियम है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाये तो नियम ही ईश्वर है। प्रकृति में सर्वत्र नियम ही कार्य करते हैं। हम उसे जाने या न जाने, हम उसे अनुभव करें या न करें। नियम से परे इस ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है। सत्य जानने के हमेशा कई मार्ग रहे हैं। धर्म और विज्ञान इन्हीं नियमों की खोज में अपने-अपने तरीके से संलग्न हैं। ये भी महज एक मार्ग हैं। एक अंतर्मुखी (धर्म) है और दूसरा बहिर्मुखी (विज्ञान) है। दोनों एक ही सत्य तक पहुंचे हैं और पहुंचेंगे भी।

आप दीवार पर जिस बल से गेंद मारते हैं दीवार उसी गति से गेंद हमारी तरफ वापस मारता है। इसे "क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया का नियम" कह लीजिये। धर्म इसे "करनी-भरनी" का नियम कहता है। इसी से पुण्य-पाप भी सिद्ध होता है। आप कुछ भी करेंगे सद या असद आपको उसका प्रतिफल भुगतना ही पड़ेगा। विज्ञान कहता है कि ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। धर्म कहता है - "नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि.………" । विज्ञान कहता है कि संसार "जैव भू रासायनिक चक्र" से काम करता है और धर्म कहता है कि संसार में "आवागमन" लगा रहता है। विज्ञान कहता है कि संसार "इलेक्ट्रान, प्रोटाॅन और न्यूट्रॉन" से बना है और इनमें सदैव परिवर्तन होता रहता है। धर्म कहता है कि जगत का "सृजन, पालन पोषण और संहार" "ब्रह्मा, विष्णु और महेश" करते हैं। दोनों अंततः एक ही जगह पहुंचते हैं। इससे कतई फर्क़ नहीं पड़ता कि आप धर्म को नहीं मानते या विज्ञान को नहीं मानते। किसी को भी मत मानिये (यानि नास्तिक) आप नियम से परे नहीं जा सकते।

अगर आप संभलकर नहीं चलते तो इसके लिये गुरुत्वाकर्षण या फिर ईश्वर दोषी नहीं है। अगर आप बिना तैरने का नियम समझे नदी में तैरने जाते हैं और डूब जाते हैं तो दाब उत्प्लावकता का बल या फिर वरुण देवता दोषी नहीं हैं। अगर आप चाकू को जोर से अपनी छाती में घोंपते हैं तो आप उसे बनाने वाला पुर्तगाली मनुष्य या फिर शनि देवता को अपराधी नहीं ठहरा सकते।

सारांश यह है कि नियम सर्वत्र कार्य कर रहे हैं। नियमों/ईश्वर को इससे कतई असर नहीं पड़ेगा कि हम उससे अंजान हैं या फिर उसे कितने मूल्य का चढ़ावा चढ़ाते हैं। वह अपनी गति से कार्य करेगा। फिर क्यों लड़ते हो फर्जी भगवानों, अल्लाहों और गाॅडों के नाम पर? क्यों माथा रगड़ते हो मुर्दा कब्रों के सामने? अपने हृदय में करुणा का बीज बोओ, प्रेम का फूल खिलाओ और भाईचारे की लहलहाती फसल को देखकर आनन्दित होओ। अगर कहीं ईश्वर है तो वह तुम्हारी इस प्रसन्नता को देखकर फूला न समायेगा। उसकी अजस्र करूणा, प्रेम और कृपा तुम पर बरसेगी। तुम फिर से ईश्वरत्व से सराबोर हो जाओगे।तुम भी ईश्वरमय हो जाओगे।

@विनय नमन🙏🧘‍♂️

Sunday, 18 April 2021

पंथ

इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई सड़क पर दायें (जैसा कि अमेरिका में) चलता है या कोई बायें (जैसा कि भारत में)। मार्ग पर दायें या बायें चलना महत्त्वपूर्ण नहीं है और न ही मार्ग। तुम वाममार्गी हो या दक्षिण, यह महत्त्वपूर्ण नहीं।अगर वाममार्गी हुए तो तुम्हारा दायां मेरे लिए बायां है और अगर मैं दक्षिणमार्गी हूँ तो मेरा मेरा बायां तुम्हारे लिये दायां। मैं दक्षिणमार्गी होते हुए भी तुम्हारे लिये वामपंथी हुआ और तुम वामपंथी होते हुए भी मेरे लिये दक्षिणपंथी। लेकिन हम अपने आप में दक्षिणपंथी ही हैं या फिर इसका उल्टा भी। पंथ या दिशा महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण है पंथ पर चलना। सत्य तो अंततः एक ही है। और वह है "तुम्हारा सत्य"। बाकी सब सत्य तुम्हारे लिये असत्य हैं। वह किसी और का सत्य हो सकता है आपका नहीं।

अगर हम निश्चित तरफ से और निश्चित तरीके से चले तो आप अपने गंतव्य/सत्य तक पहुंच जायेगें। सत्य जानने के कई मार्ग हैं। आप शून्य से शुरू करके अनन्त तक पहुंच सकते हैं या फिर अनन्त से शुरु करके शून्य तक। अनन्त शून्य है और शून्य अनन्त। आगमनिक या निगमनिक कोई भी विधि अपनाइये। संसार वर्तुलाकार है। सूर्य, चंद्रमा, तारे, ग्रह, उपग्रह, जन्म-मृत्यु, हमारी संरचना सब कुछ। आप वर्तुल में चलकर सत्य को जान सकते हैं।


@विनय नमन 🙏🏻🧘🏻‍♂️

स्वयं की खोज

न तो आज जमीन पर हिंदू हैं, न मुसलमान, न बौद्ध। आज कैदी हैं। कोई हिंदू कैदखाने में है, कोई मुसलमान कैदखाने में है, कोई जैन कैदखाने में है।
कैदखाना इसलिए कहता हूं कि आपने कभी सोचा ही नहीं कि आपको जैन होना है, कि हिंदू होना है, कि मुसलमान होना है। आपने चुना नहीं है। यह आपकी गुलामी है। लेकिन गुलामी इतनी सूक्ष्म है कि आपको पता नहीं चलता, क्योंकि आपके होश में नहीं डाली गई है। जब आप बेहोश थे, तब यह गुलामी, यह जंजीर आपके हाथ में पहना दी गई। जब आपको होश आया तो आपने जंजीर अपने हाथ में ही पाई। और इसे जंजीर भी नहीं कहा जाता है। इसे आपके मां बाप ने, परिवार ने, समाज ने समझाया है कि यह आभूषण है! आप इसको सम्हालते हैं, कोई तोड़ न दे। यह आभूषण है और बड़ा कीमती है, आप इसके लिए जान लगा देंगे।

एक बड़े मजे की घटना घटती है। अगर हिंदू धर्म पर खतरा हो तो आप अपनी जान लगा सकते हैं। आप हिंदू धर्म, मुसलमान या ईसाई, किसी भी धर्म के लिए मर सकते हैं, लेकिन जी नहीं सकते। अगर आपसे कहा जाए कि जीवन हिंदू की तरह जीयो, तो आप जीने को राजी नहीं हैं। मुसलमान की तरह जीयो, जीने को राजी नहीं हैं। लेकिन अगर झगड़ा-फसाद हो तो आप मरने के लिए राजी हैं! वह आदमी हिंदू धर्म के लिए मरने के लिए राजी है, जो हिंदू धर्म के लिए जीने के लिए कभी राजी नहीं था! क्या मामला है?

कहीं कोई रोग है, कहीं कोई बीमारी है। जीने के लिए हमारी कोई उत्सुकता नहीं है। मार-काट के लिए हम उत्सुक हो जाते हैं। क्योंकि जैसे ही कोई हमारे धर्म पर हमला करता है, हमें होश ही नहीं रह जाता। वह हमारा बेहोश हिस्सा है, जिस पर हमला किया जा रहा है।

इसलिए जब भी हिंदू-मुसलमान लड़ते हैं, तो आप यह मत समझना कि वे होश में लड़ रहे हैं। वे बेहोशी में लड़ रहे हैं। बेहोशी में वे हिंदू-मुसलमान हैं, होश में नहीं हैं। इसलिए कोई भी उनके अचेतन मन को चोट कर दे, तो बस वे पागल हो जाएंगे। न तो हिंदू लड़ते हैं, न मुसलमान लड़ते हैं-पागल लड़ते हैं। कोई हिंदू मार्का पागल है। कोई मुसलमान मार्का पागल है। यह मार्कों का फर्क है, लेकिन पागल है।

और आपके भीतर धर्म उस समय डाला जाता है, जब तर्क की कोई क्षमता नहीं होती।

इसलिए मैं कहता हूं कि यह सबसे बड़ा पाप है। और जब तक यह पाप बंद नहीं होता, जब तक हम प्रत्येक व्यक्ति को अपने मार्ग की खोज की स्वतंत्रता नहीं देते, तब तक दुनिया धार्मिक नहीं हो सकेगी। क्योंकि धार्मिक होने के लिए स्वयं का निर्णय चाहिए।

@विनय नमन🙏🧘‍♂️

Saturday, 17 April 2021

शेरों की सभ्यता


शेर को आदमियों ने पिंजरे में कैद कर दिया। उसे बिजली के झटके दे दे कर सभ्य बनाया। कैसे उठना है, कैसे बैठना है, कैसे चलना है, कैसे खाना है आदि। बच्चे पैदा करने के लिये शेर का प्राकृतिक सहवास छीन कर कृत्रिम गर्भ धारण कराया गया। जिस तरह से शेरों की आबादी खत्म होने की ओर है, उस अनुपात में अगर यह मान लिया जाये कि आने पांच-छः सौ सालों में शेर खत्म हो जायें। केवल चिड़ियाघरों, सर्कसों में पाले गये शेर ही बचे। तो आप किस प्रकार के शेर होने की उम्मीद करते हैं?

लेकिन आपने किताबों में एक ऐसे शेर के बारे में लिखा है जो आक्रामक, शिकारी और जंगल का राजा हुआ करता था। जब आपका बच्चा छः सौ साल या हजार साल बाद आपकी इस बात को पढ़ेगा तब वह आपके बारे में, आपकी इस किंवदन्ती के बारे में क्या सोंचेगा? उसे यह सब एक दंतकथा लगेगी। उसे शेर-सभ्यता के पतन की कहानी नहीं मालूम है। क्योंकि उसके सामने दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाला शेर, पिंजरे में भीगी बिल्ली सा शेर, हंटर की मार से मिमियाने वाला शेर, लोगों के लिये तमाशा बना, शेर दिख रहा है।

ठीक इसी तरह हमारी भारतीय सभ्यता का हाल है। मुसलमानों, मुगलों, गोरों ने हमें गुलाम बनाकर, पिंजरे में कैद करके रखा। हंटर, चाबुक की मार से हमें विवश किया। हमारी सभ्यता की निशानियों को गिन गिन कर मिटाया। हमें एक शेर से भीगी बिल्ली बना दिया। हजारों सालों की गुलामी ने उस सभ्यता का पतन कर दिया, जो आज की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक विकसित थी। जिसमें आज की तुलना सैकड़ों गुना अधिक घातक अस्त्र-शस्त्र थे, हजार गुना अधिक विकसित तकनीक थी और वो सभ्यता विकास के चरम पर थी। आज जब किताबों में हम और हमारे बच्चे, तथाकथित आधुनिक और सभ्य लोग जब इन आख्यानों को पढ़ते हैं तब उन्हें यह दंतकथा प्रतीत होती है। बौद्धिक जुगाली और ब्राह्मणों का प्रपंच प्रतीत होता है। लेकिन उन्हें कौन समझाये कि यह दंतकथा नहीं तुम्हारी और तुम्हारे पूर्वजों के कृत्यों की महागाथा है। तुम भीगी बिल्ली नहीं शेर हो।

इस महापरिवर्तन के लिये, पिंजरे में कैद शेरों को उनका शेरत्व याद कराने के लिये एक ऐसे शेर की आवश्यकता जो सचमुच जंगल का राजा हो। शिकार करता हो। उसकी शक्ल भी शेरों से मिलती हो। फिर वह उन्हें उन पिंजरों से मुक्त कराये। उन्हें जंगल में ले जाये और दिखाये यह है तुम्हारा साम्राज्य, यह तुम्हारे शिकार का हुनर।

भारतीयों को भी उनका गौरवशाली इतिहास याद दिलाने, उन्हें फिर वही उन्नत तकनीक, मंत्र-यंत्र विज्ञान समझाने उसकी प्रासंगिकता को सिद्ध करने वाले, एक महापुरुष की जरूरत है। जो खुद भी इन सबको बखूबी जानता है। जो सिद्ध कर सके अपने आपको, अपनी भारतीय तकनीकी को। लेकिन दुर्भाग्य यही है कि अभी तक कोई ऐसा शेर नहीं आया। जो आये भी वे खुद ही भ्रमित हैं। आधे-अधूरे ज्ञान वाले हैं। वे भारतीयता की प्रासंगिकता को सिद्ध करने में असमर्थ हैं। भारतीयता और उसकी गौरवशाली परंपरा को दिखाने, समझाने, बताने वाले करोड़ में से निन्यानबे लाख निन्यानबे हजार नौ सौ निन्यानबे लोग फर्जी हैं। धोखेबाज हैं। इससे हमारी गौरवशाली परंपरा, उन्नत तकनीक, विलक्षण विज्ञान और भी कलुषित, दूषित और निंदा का पात्र हुआ है। यह लोग गौरवमयी भारतीयता के दुश्मन ही सिद्ध हुए हैं और हो रहे हैं। इन विकट परिस्थितियों में आशा की एक ज्योति तो जलनी चाहिये लेकिन कहाँ से? और कब?……………

©विन्ध्येश्वरी

Saturday, 10 April 2021

कहत कठिन समुझत कठिन

कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक।होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥(रामचरित मानस-उत्तरकांड,118 ख)
भावार्थ
पहले तो ज्ञान/विवेक/बात कहना ही कठिन है क्योंकि जो हम सोंचते हैं जरूरी नहीं है उसे सही तरह,सही शब्द,सही रूप में प्रकट कर सकें।फिर अगर किसी तरह से कह भी दिया जाये तो समझना कठिन है क्योंकि आदमी वही समझता है जितना वह समझना चाहता है,जितना उसका विवेक,ज्ञान,अनुभव,संस्कार आदि होता है।किंतु अगर समझ भी लिया तो फिर उसे साधना कठिन है।यानि उसका कार्य रूप में परिणत होना कठिन है और यदि संयोगवश(घुणाक्षर न्याय से)कभी हो भी जाये तो हूबहू होना तो बिल्कुल ही कठिन है।@विनय नमन 🙏🏻🧘🏻‍♂️

युद्ध क्यों होते हैं?

युद्ध क्यों होते हैं?




दो दुनियाएं हैं। जहां दो व्यक्ति मिलते हैं, वहां दो संसार मिलते हैं। और जब दो संसार करीब आते हैं, तो उपद्रव होता है; क्योंकि दोनों भिन्न हैं।

मुल्ला नसरुद्दीन का छोटा बच्चा जिसका नाम रमजान है, घर के लोग उसे रमजू कहते हैं वह इतिहास की किताब पढ़ रहा था। अचानक उसने आंख उठाई और अपने पिता से कहा, “पापा, युद्धों का वर्णन है इतिहास में…युद्ध शुरू कैसे होते हैं?’

पिता ने कहा, “समझो कि पाकिस्तान हिंदुस्तान पर हमला कर दे। मान लो……।’

इतना बोलना था कि चौके से पत्नी ने कहा, “यह बात गलत है। पाकिस्तान कभी हिंदुस्तान पर हमला नहीं कर सकता और न कभी पाकिस्तान ने हिंदुस्तान पर हमला करना चाहा है। पाकिस्तान तो एक शांत इस्लामी देश है। तुम बात गलत कह रहे हो।’

मुल्ला थोड़ा चौंका। उसने कहा कि मैं कह रहा हूं, सिर्फ समझ लो। सपोज…। मैं कोई यह नहीं कह रहा हूं कि युद्ध हो रहा है और पाकिस्तान ने हमला कर दिया है; मैं तो सिर्फ समझाने के लिए कह रहा हूं कि मान लो…।

पत्नी ने कहा, “जो बात हो ही नहीं सकती, उसे मानो क्यों? तुम गलत राजनीति बच्चे के मन में डाल रहे हो। तुम पहले से ही पाकिस्तान विरोधी हो, और इस्लाम से ही तुम्हारा मन तालमेल नहीं खाता। तुम ठीक मुसलमान नहीं हो। और तुम लड़के के मन में राजनीति डाल रहे हो, और गलत राजनीति डाल रहे हो। यह मैं न होने दूंगी।’

वह रोटी बना रही थी, अपना बेलन लिए बाहर निकल आई। उसे बेलन लिए देखकर मुल्ला ने अपना डंडा उठा लिया। उस छोटे बच्चे ने कहा, “पापा रुको, मैं समझ गया कि युद्ध कैसे शुरू करते हैं। अब कुछ और समझाने की जरूरत नहीं है।’

जहां दो व्यक्ति हैं, जैसे ही उनका करीब आना शुरू हुआ कि युद्ध की संभावना शुरू हो गई। दो संसार हैं; उनके अलग अलग सोचने के ढंग हैं; अलग अलग देखने के ढंग हैं; अलग उनकी धारणाएं हैं; अलग परिवेश में वे पले हैं; अलग अलग लोगों ने उन्हें निर्मित किया है; अलग अलग उनके धर्म हैं, अलग अलग राजनीति है; अलग अलग मन हैं सारसंक्षिप्त। और जहां अलग अलग मन हैं, वहां प्रेम संभव नहीं वहां कलह ही संभव है।

 इसलिए तो संसार में इतनी कठिनाई है प्रेमी खोजने में। मित्र खोजना असंभव मालूम होता है। मित्र में भी छिपे हुए शत्रु मिलते हैं। और प्रेमी में भी कलह की ही शुरूआत होती है।

दो संसार कभी भी शांति से नहीं रह सकते।

उसका कारण?

एक संसार भी अपने भीतर कभी शांति से नहीं रह सकता; दो मिलकर अशांति दुगुनी हो जाती है।

तुम अकेले भी कहां शांत हो? तुम्हारा मन वहां भी अशांति पैदा किए हुए है। फिर जब दोनों मिलते हैं तो अशांति दुगुनी हो जाती है।

जितनी ज्यादा भीड़ होती जाती है उतनी अशांति सघन होती जाती है, क्योंकि उतने ही कलह में पड़ जाते हैं।

जिस दिन तुम इस सत्य को देख पाओगे कि तुम्हारा संसार तुम्हारे भीतर है और तुम उसी संसार के आधार पर बाहर की खूंटियों पर संसार निर्मित कर रहे हो। इसलिए सवाल बाहर के संसार को छोड़कर भाग जाने का नहीं है; भीतर के संसार को छोड़ देने का है तब तुम कहीं भी रहो, तुम जहां भी होओगे, तुम वहीं सन्यस्थ हो। तुम कैसे भी रहो महल में या झोपड़ी में, बाजार में या आश्रम में, कोई फर्क न पड़ेगा। तुम्हारे भीतर से जो भ्रांति का सूत्र था, वह हट गया।

@विनय नमन 🙏🧘‍♂️

प्रत्यक्षवाद का असली प्रवर्तक

प्रत्यक्षवाद का असली प्रवर्तक
अभी तक हम किताबों में यह पढ़ते आये हैं कि प्रत्यक्षवाद का जनक आगस्ट काम्टे को माना जाता है। मेरा मत है कि यह सरासर झूठ है। विश्व में प्रत्यक्षवाद के सिद्धांत का प्रथम प्रतिपादन चार्वाक द्वारा किया गया। चार्वाक दर्शन में प्रत्यक्षवाद के प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित हैं। जैसे -
1- चार्वाक दर्शन में शरीर का निर्माण 4 महाभूतों - पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु से माना जाता है। यानी शरीर निर्माण के पंचमहाभूत सिद्धांत में आकाश तत्व जो कि प्रत्यक्षतः ज्ञेय नहीं है उसे शरीर के निर्माण का घटक नहीं माना गया है।
2- चार्वाक दर्शन का प्रसिद्ध कथन - "यावत जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनः कुतः॥" अर्थात् जब तक जीओ सुख से जिओ भले ही उधार लेकर घी पीओ, क्योंकि शरीर के जल जाने के बाद पुनः आगमन कहाँ होता है?" इस पंक्ति से प्रत्यक्षवाद का स्पष्ट प्रमाण प्राप्त होता है। इसका मानना है "जो है अभी है, बाद में कौन देखता है, कौन जानता है।"
3- चार्वाक दर्शन में ज्ञान के दो प्रकार भी बताये गये हैं -
• बाह्य प्रत्यक्ष
• मानस प्रत्यक्ष
यानी हम किसी चीज के बारे में दो तरह से जान सकते हैं एक तो प्रत्यक्ष देखकर और दूसरा उसके बारे में अनुमान करके। जैसे -
• पर्वत पर आग है। (अनुमान)
• क्योंकि वहाँ धुआं है। (प्रत्यक्ष)
• जहां आग होता है वहाँ धुआं होता है (निष्कर्ष)
• पर्वत पर धुआं है (प्रत्यक्ष)
• अतः वहाँ आग है (अनुमान)
उपर्युक्त 5 कथनों से यह निष्कर्ष निकलता है कि
• एक प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर हम निष्कर्ष निकालते हैं।
• कुछ अनुमानों के आधार पर हम निष्कर्ष निकलाते हैं।
इस सिद्धांत में चार्वाक दर्शन ने प्रत्यक्ष ज्ञान को ही ज्ञान असली आधार मानने पर जोर दिया है।
4- चार्वाक के अनुसार - शब्द ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं है क्योंकि वह या विश्वसनीय पुरुष के वचनों पर आधारित है या फिर विश्वसनीय शास्त्र पर। किंतु शब्द श्रवण का विषय है और श्रवण विभिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसके अलावा विश्वसनीय पुरुष या शास्त्र भी महज एक अनुमान है। आखिर इनकी विश्वसनीयता का आधार क्या है। यह महज एक अनुमान है। अतः शब्द प्रत्यक्ष ज्ञान का उपाय नहीं है।
5- इन्होंने इसी आधार पर स्वर्ग, नर्क, ईश्वर, वेद आदि को अप्रामाणिक माना है।

अस्तु उक्त तर्काधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षवाद का जनक कांट नहीं बल्कि चार्वाक हैं। क्योंकि कांट (18वीं शदी) से बहुत पहले चार्वाक (चौथी शदी ई. पू.) ने प्रबल रूप से प्रत्यक्षवाद को परिभाषित वा स्पष्ट किया था।

©विन्ध्येश्वरी

Monday, 22 March 2021

अंतः अस्ति प्रारम्भः

 तुम न तो पूरा जीते हो और न ही पूरा मरते हो। तुम आधे अधूरे ढंग से जीते हो, मरते भी आधा अधूरा ही हो। जीवन पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है लेकिन मरने पर है। अंतः अस्ति प्रारम्भः। अंत ही आरम्भ है। अगर तुम सोते समय होश से सोओगे तो नींद ध्यान बन जायेगी और फिर तुम्हारा पूरा दिन ध्यानमय रहेगा। तुम मस्त रहोगे। इसी तरह अगर मरते समय होश से भर जाओ तो जीवन लेते समय तुम होश में ही रहोगे। फिर तुम्हारा पूरा जीवन परमात्मा के आनन्द में बीतेगा। तुम्हें उसे ढूंढने के लिए कंकड़ पत्थर के मकानों में नहीं जाना पड़ेगा। तुम स्वयं परमात्मा ही हो जाओगे। बल्कि हो ही। बस अंजान अपने परमात्मापन से। @विनय नमन 🙏🧘‍♂️

Tuesday, 9 March 2021

असली त्याग



अगर तुम निर्धन हो और फिर तुम्हारे मन में धन के प्रति वितृष्णा का भाव जगे, अगर तुम शक्तिहीन हो और तब तुम्हारे मन में अहिंसा का भाव जगे, अगर तुम असफल हो और तब तुम्हारा पद-प्रतिष्ठा से मोह भंग हो, अगर तुम घर-परिवार-पत्नी-संतान से हीन हो और तब तुम्हारे मन में संसार की निस्सारता का भाव जगे, अगर तुम बेईमानी करने में असमर्थ हो फिर तुम ईमानदारी प्रदर्शित करो तब समझ लेना तुम बहुत बड़े, मक्कार, झूठे और फरेबी हो। सब कुछ पाने के बाद अगर तुम्हारे भीतर कुछ पाने की चाह न बचे, सब कुछ कर चुकने के बाद तुम ऊब जाओ, सब कुछ भोग लेने के बाद उस सबकी निस्सारता का भाव जगे तो ही समझना की तुम सच्चे वैरागी हुए। अन्यथा घर छोड़ने के बाद आश्रम बना लोगे, परिवार छोड़ने के बाद चेला-चपाटी बना लोगे, धन छोड़ने के बाद आश्रमों का साम्राज्य खड़ा कर लोगे, पद-प्रतिष्ठा छोड़ने के बाद लोगों से पैर छुआकर, पदवंदना करवा लोगे, वैराग्य धारण करने के बाद भी, प्रथम द्रष्टया सब कुछ छोड़ने के बाद भी कुछ नहीं छूटेगा। न तो कुछ छोड़ो न ही कुछ पकड़ो। बस द्रष्टा बनो, साक्षी बनो।

©विनय नमन🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

महिला सशक्तिकरण

आज मैंने महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक छोटा सा कदम रखा। इस कदम का परिणाम क्या होगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है किंतु एक बात का अहसास जरूर हुआ कि अधिकांश महिलाओं में "अकेलेपन का डर", अपने ऊपर "अविश्वास", पुरुषों द्वारा थोपी गयी बाध्यताओं का सामना करने में "हिचक", अनिर्णय की स्थिति, भविष्य के आंकलन में अक्षमता आदि कुछ जन्मजात और ज्यादातर परिवार, समाज आदि द्वारा कूट -कूट कर भरा गया है। अपने भीतर एक विराट संभावना और क्षमता समेटे होने के बावजूद एक महिला अपने आपको जब असहाय और दीन समझती है तब मैं इसे सिर्फ उसकी नाकामी के रूप में नहीं देखता बल्कि आज भी "लगभग जड़ समाज" की नाकामी के रूप देखता हूँ। हे नारी! तुम बस अपने ऊपर लिपटे खोल को एक बार तोड़ भर दो, असीम संभावना को समेटे समस्त आकाश तुम्हारा है।

©विनय नमन🙏🙏

Thursday, 4 March 2021

जिंदगी और सुकून की तलाश

*जिंदगी और सुकून की तलाश*

जो जिंदगी नहीं है जब तक उसे जिंदगी समझा जायेगा तक सुकून की तलाश बेईमानी है। जो जैसा है उसे वैसा स्वीकार कर लेने में ही सुकून है।
यद्यपि यह जीवन ही बेईमानी है। कितना भी कर लो, कुछ भी बन जाओ, कुछ भी पा जाओ, कुछ भी खा पी घूम लो मौज मस्ती कर लो लेकिन हाथ कुछ नहीं आने वाला है। जब तक हम बाहर सुकून की तलाश करेंगे तब तक सुकून आयेगा और चला जायेगा। क्षणिक होगा वह।

कभी आपने गौर किया है कि जब भी कुछ हम पाते हैं, खाते हैं, बनते हैं तब हमें एक सुख की अनुभूति होती है। जैसे - हमने एक नयी कार ले ली। बहुत सुख मिल रहा है। सीना चौड़ा करके चल रहे हैं। पड़ोसियों और दोस्तों को दिखा रहे हैं। लोगों की नजरों को भांप रहे हैं। इससे आपके अभिमान की तुष्टि हो जाती है। आप प्रसन्न हो जाते हैं। धीरे-धीरे लोगों की रुझान आपकी उपलब्धि में कम होने लगती है। लोग तारीफ करना बंद कर देते हैं। फिर धीरे-धीरे आपकी खुशी जाने लगती है। आप किसी अन्य चीज में खुशी तलाशने में जुट जाते हैं।

दरअसल आपको लगता है कि खुशी वस्तुओं, व्यक्तियों, पदों आदि में है लेकिन नहीं, वह आपके भीतर है, जिससे आप अंजान हैं। जब कोई इच्छित वस्तु, पद, प्रतिष्ठा, प्रेम, धन आदि मिल जाता है तब वह आपके भीतर से बाहर आ जाता है बिल्कुल एक बच्चे की तरह। लेकिन बच्चे की खुशी और आपकी खुशी में अंतर है। बच्चे की खुशी जिज्ञासा भाव के कारण है। वह तुच्छ कंकड़ से भी उतना ही खुश हो जाता जितना कि आप हीरे के कंकड़ को पाकर भी नहीं होते। लेकिन आपकी खुशी अभिमान जनित है। कल्पना कीजिये कि आपने करोड़ों रूपये वाली हीरे की अंगूठी पहनी और किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। आप दुखी हो जायेगें। वह हीरे की अंगूठी आपको सुख नहीं दे पायेगी। आपका अहंकार संतुष्ट नहीं हुआ।

कुल जमा मतलब यह है कि अहंकार जनित लालसा, अभिलाषा, तृष्णा ही आपके दुख का कारण है। अहंकार इसलिये कि आप मूलतः कुछ भी नहीं है लेकिन आप कुछ होना चाहते हैं। आप हैं तो सिर्फ वीर्य की एक बूंद की उपज यानी शून्य। लेकिन कुछ होने की छटपटाहट ही अशांति का कारण है। शांति चाहिए तो "कुछ होना" नहीं है, "बस होना है" just being. 

सुकून तलाशना है तो धारा के विपरीत मत बहो धारा के साथ बहो और छोड़ खुद को धारा के साथ। संभव है इस स्थिति में हम कहीं पहुंचे नहीं। हम वैसे भी कहीं पहुंचते नहीं। लेकिन इससे व्यर्थ तैरने का श्रम न करना पड़ेगा। जीवन भी ऐसा ही है। नियति के हाथों बहो। नियति के साथ बहो। तैरो मत। जीवन जीने का मजा और सुकून दोनों मिल जायेगा। दरअसल ये दोनों सहोदर ही हैं। यही जीवन में शांति का एक मार्ग है।

विनय नमन🙏😊