Friday, 16 July 2021

माँ छिन्नमस्ता

कथा कहती है कि देवासुर संग्राम में असुरों के संहार और उनके रक्तपान करने के बाद भी माँ चिंतपूर्णी की सखियों नील वर्णी जया और श्वेत वर्णी विजया की रक्तपिपासा शांत नहीं हुई। वे बार बार माँ से रक्त पिलाने को कह रही थीं। माँ ने उन्हें रुकने के लिये कहा लेकिन वे फिर भी नहीं शांत हो रही थीं। माँ उस समय रतिशील कामदेव के मर्दन में व्यस्त थीं। फिर भी जया और विजया शांत न रहीं। फिर माँ चिंतपूर्णी ने अपना शीश काटकर जया औय विजया को रक्तपान कराया। तब उनकी पिपासा शांत हुई। माँ चिंतपूर्णी माँ छिन्नमस्ता कहायीं। ये दस महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर प्रतिष्ठित हैं।


अघोर, शाबर, योग, वज्रयान आदि तंत्र प्रथाओं में माँ छिन्नमस्ता की साधना अति प्रचलित और सम्माननीय साधना है। इस कथा और रूपक का अत्यंत महत्त्व है। चाहे आप गोरें हों या काले दुनिया में तमाम लूट घसोट मचाने के बाद भी, तमाम यत्न-उपाय कर सृजन, संग्रह करने के भाद भी मनुष्य की "कुछ और पाने की पिपासा/महत्त्वाकांक्षा" शांत नहीं होती। इसे शांत करने का एक ही उपाय बचता है, समस्त समस्याओं की जड़ शीश यानि बुद्धि और मन को अलग कर दिया जाये। जब मन और बुद्धि आत्मतत्व से अलग हो जाता है, जब भीतर "मैं" नहीं बचता, तब अंतरतम से अजस्र आनन्द और तृप्ति के रस का उदय होता है। कबीरदास जी इसे कहते हैं -
"कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुईं धरे, सो घर पैठे माहिं॥"


यह रूपक बताता है कि काम हमारा शत्रु नहीं है हमारा शत्रु है हमारा मन, हमारी विचारणा, हमारी बुद्धि। हम नाहक काम के दमन में संलग्न होते हैं। मन को जीतो लो तो सब कुछ जीता हुआ ही है। फिर कुछ जीतना शेष नहीं रह जाता।

माँ छिन्नमस्ता अपने ही रुधिर धार को खुद भी पी रही हैं। इसका एक अर्थ यह है कि मनुष्य खुद ही दाता और खुद ही ग्रहीता है। वह वही प्राप्त करता है जो देता है। अपना खुदा आप ही है। अगर आप ईश्वर पाना चाहते हैं तो खुद ईश्वर होना पड़ेगा। ईश्वर कहीं बाहर से नहीं आता है। जब आपका ही अहमतत्व मिट जाता है फिर परम तत्व का प्राकट्य हो जाता है। कबीर कहते हैं -
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।"


कामाख्या के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय है। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है। यह मंदिर लगभग 6000 साल पुराना बताया जाता है।

माँ छिन्नमस्ता के परम, अद्वितीय, अद्भुत विग्रह को नमन, वंदन, अर्चन। माँ मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकार करें।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

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