एक कहानी बताता हूँ.
कहानी यह है कि आप का एक घर है जिसे कोई दुष्ट तोड़ देता है, नष्ट कर देता है और लूट लेता है. अब तीन बातें हो सकती हैं-
1-
आप
उस घर में हैं ही नही.
2-
आप
हैं लेकिन उस दुष्ट से डर गये हैं.
3-
अथवा
आपको उस घर के टूटने, लुटने से कोई फर्क नही पड़ता है.
अब
आता हूँ अपनी मूल बात पर. महमूद गजनवी, बाबर, खिलजी, ग्यासुद्द्दीन तुगलक, औरंगजेब
या और भी कई आक्रमणकारियों ने हमारे मंदिरों को तोडा, लुटा. मूर्तियों को तोड़ा.
मंदिर
क्या है? प्रचलित मान्यता के अनुसार भगवान का घर. जहाँ बाकायदा प्राणप्रतिष्ठित
मूर्तियाँ विराजमान होती हैं. जहाँ बाकायदा वेदपाठी पण्डे-पुजारियों द्वारा
मंत्रोच्चार के द्वारा विधिविधान से उस परमशक्तिशाली, जगतनियंता भगवान की पूजा की
जाती है. भक्तों की पूरी फ़ौज उस मंदिर में दर्शन पूजन करती है. और चढ़ावा इत्यादि
चढ़ाती है.
अब
ऊपर की कहानी को यहाँ लागू कीजिये. यानि जिस मंदिर को उन आततायियों ने तोडा उसमें
भगवान नहीं थे? मतलब आप जिस आदमी के दरवाजे पर रोज जाकर उसकी बेल बजाते हैं वह वहाँ है ही नही? शायद इसीलिए वे दुष्ट लोग
उसका घर तोड़ने में कामयाब हो गये. यह बात कुछ पचती नही कि भगवान वहाँ है नही.
क्योंकि अभी तक की मान्यता तो यही कहती है कि वह कण-कण में विद्यमान है. फिर क्यों
वे लोग उसका घर तोड़ने में सफल हो गये?
संभव
है वह व्यक्ति वहां मौजूद था लेकिन वह डर गया इसलिए वे सब उसके घर को तोड़ने और
लूटने में सफल हुए? क्या शंकरजी, रामजी, कृष्णजी, दुर्गाजी आदि महमूद गजनवी, बाबर,
खिलजी, ग्यासुद्द्दीन तुगलक, औरंगजेब आदि से डर गये थे? अरे बाप रे! लवनिमेश में
सृष्टि का प्रलय करने वाले शंकर जी, रावण जैसे दुर्दांत राक्षस का वध करने वाले
रामजी, दुनिया के पहले और आखिरी अद्वितीय पुरुष कृष्ण जी, अष्ट भुजाओं वाली शेर पर
सवार महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा जी उन से डर जायेगे? यह बात अस्वीकारनीय है. या
शायद..................................
शायद
उस व्यक्ति को घर टूटने और लुटने से कोई फर्क नही पड़ता. संभव है भगवान को भी इससे
कोई मतलब न हो कि कौन उसका घर तोड़ रहा है और कौन बना रहा है. उसे इससे भी फर्क नही
पड़ता कि कौन उसके घर की रोज घंटी बजा रहा है. कौन कितना चढ़ा रहा है और कौन खाली
हाथ आ रहा है. यही सही होना चाहिए. क्योंकि समदर्शी सब नाम कहावत. वह ईश्वर मान-अपमान,
स्तुति-प्रार्थना, भोग-चढ़ावा, आरती-पूजा से परे है. वह सत चित और आनंद है. वह मस्त
है अपने आप में.
तो
फिर?
मंदिर
वन्दिर झूठा है?
हाँ
भगवान के लिए झूठा है. आप उसको घर में रखो या बाहर वह चिंतामुक्त है.
तो
फिर मंदिर न बने?
न
न. मंदिर तो वहीँ बनेगा. क्योंकि वह हमारी विरासत है. हमारी संस्कृति का प्रमाण है.
हमारे इतिहास का अंग है. वह हमारी चेतना में रचा बसा हमारे अस्तित्व की कहानी है. मंदिर
इसलिए बनना चाहिए. लेकिन कृपा पूर्वक उसे पाखंड से मुक्त रखना है. मंदिर के चढ़ावे
से अस्पताल बनवाना. अनाथालय चलवाना. वृद्धों- विधवाओं को आश्रय उपलब्ध कारवाना. उसे
पण्डे-पुजारियों के आडम्बर से मुक्त रखना. मैं सोचता हूँ मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मस्थली
पर एक मंदिर ऐसा बने जो वास्तव में उनके आदर्शों के अनुरूप हो न कि पण्डे-पुजारियों
की मंशा के अनुरूप.
विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी