Monday, 29 August 2022

हम क्यों जिंदा हैं?

#हृदय_की_बात #आत्मा_की_बात आप में से हर कोई जो भी इस लेख को पढ़ रहा है, शायद जिंदा है। वाकई? जिंदा है? क्या आपने कभी स्वयं से पूछा कि आप क्यों जिंदा हैं? क्या आप बुद्धिमान हैं, इसलिये जिंदा हैं या बलवान है इसलिये जिंदा हैं? पैसा कमा रहे हैं और कामकाजी हैं, इसलिये जिंदा हैं या बेरोजगार हैं, निठ्ठले हैं, इसलिए जिन्दा हैं? आप वैज्ञानिक, अध्यापक, पुलिस, मंत्री, प्रधानमंत्री हैं इसलिये जिंदा हैं या नेता, अभिनेता, खिलाड़ी आदि हैं, इसलिये जिंदा हैं? क्या आप इसलिये जिंदा हैं कि आपके पास कुछ नहीं है और आप गरीब हैं या फिर इसलिये कि अमीर हैं? क्या आप इसलिये जिंदा हैं कि आप बहुत दयालु-कृपालु, ईर्ष्यालु-झगड़ालू, दानी-मानी-अभिमानी हैं, या फिर भक्त हैं, कवि हैं, गायक हैं, इसलिये जिंदा हैं? आप सुंदर हैं, विश्व-सुंदरी/सुंदर या ब्रह्मांड-सुंदरी/सुंदर हैं, इसलिये जिंदा हैं या बदसूरत हैं, इसलिये जिंदा हैं? मुझे लगता है, आप इसमें से किसी भी कारण जिंदा नहीं हैं। आप जिंदा हैं क्योंकि हवा बह रही है और हवा में विभिन्न गैसों का संघटन उचित मात्रा में बना हुआ है। आप जिंदा हैं क्योंकि पानी मौजूद है, पीने योग्य, दैनिक क्रियाकलापों के लायक। आप जिंदा हैं क्योंकि धरती का उपजाऊपन बरकरार है। आप जिंदा हैं क्योंकि मौसम और जलवायु आपके अनुकूल है। आप जिंदा हैं क्योंकि आपकी सांसें और शरीर की सारी गतिविधियां सुचारू रूप से चल रही हैं। आप जिंदा है क्योंकि ब्रह्मांडीय पिंडों का गुरुत्वाकर्षण बल काम कर रहा है। आप जिंदा हैं क्योंकि पृथ्वी घूम रही है, ग्रह-उपग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। ध्यान दीजियेगा उपर्युक्त में वे सभी बातें जिनके कारण आप-हम सब जिंदा हैं कोई भी काम खुद नहीं कर रहे हैं। ये सभी गतिविधियां स्वयं हो रही हैं, बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के। और वे सभी काम जिनके कारण हमारे जीने या न जीने पर कोई फर्क नहीं पड़ता, उसमें दिन-रात बैलों की तरह, गधों की तरह मरे-खपे जा रहे हैं। फिर आपको, हम सबको लगता है, हम ही वह एकमात्र प्राणी हैं जो धरती को धारण किये हुए हैं, अन्यथा अब तक प्रलय हो गया होता। हम ही वह प्राणी हैं जो विकास कर रहे हैं, नव-निर्माण कर रहे हैं, सृजन कर रहे हैं। नाहक भ्रम में हैं। एक पल को सोंचिये क्या आप वाकई जिंदा हैं? क्या आप वाकई बुद्धिमान हैं? क्या आप वाकई चेतनाशील प्राणी हैं? जवाब जरुर लिखियेगा..................................? @विनय नमन 🙏🙏🙏🧘🧘🧘

Monday, 11 July 2022

एहसान और सुख

संभव है आप में से कई लोगों को मेरी बात बुरी लगे लेकिन यह संसार की एक कड़वी सच्चाई है। जीवन में खुश रहने के कई सारे सूत्रों में से एक सूत्र यह है कि "लोगों से कम से कम एहसान लेने की कोशिश करो।" एहसान आदमी को कमजोर बनाता है। छोटी-छोटी चीजों के लिये या जिसके बिना आपका काम चल सकता है या जिसे आप स्वयं कर सकते हों उसके लिये तो कतई किसी से कोई सहायता नहीं लेना चाहिए। अगर आप पर कोई एहसान करेगा तो संभव है वह इसलिये करे कि भविष्य में आपसे उसे किसी एहसान या सहायता की उम्मीद हो। यकीन मानिये एहसान करने वाला हमेशा इसका हिसाब रखेगा। और समय आने पर चुकता करने की कोशिश करेगा। नहीं चुकाने पर यकीनन संबंध खराब कर लेगा। मैंने संसार में ऐसे सैकड़ों बनते-बिगड़ते रिश्तों को देखा है। एहसान करने के नाम पर लोगों को घुड़काते-धमकाते देखा है, गर्दन झुकाये हुए देखा है। संभवतः आपका भी अनुभव हो। यद्यपि मैं यह नहीं कहता कि एहसान या सहायता लेना बुरी बात है लेकिन कम से कम। और उसी समय जब बहुत जरूरी हो या जिसके बिना जीवन असंभव सा हो। हाँ, अगर हो सके तो लोगों की सहायता जरूर करें और वह भी बिना किसी कारण, बिना किसी अपेक्षा के। एहसान कम लेने और दूसरों की निस्वार्थ सहायता से आप सदैव हल्के बने रहेंगे और आप खुश भी रहेंगे क्योंकि आप एहसान के बोझ तले दबे नहीं होंगे। @विनय नमन 🙏🙏🙏🧘🧘🧘

Saturday, 25 June 2022

कल का मोह

मैं विकासमान प्रकृति का उपासक हूँ। मेरी इसमें कदापि रुचि नहीं है कि सब कुछ यथावत रहे या पूर्ववत रहे। जब कुछ लोग कहते हैं कि कल ऐसा था आज ऐसा क्यों? ऐसा नहीं होना चाहिए। यह कल जैसा ही होना चाहिए। यकीन मानिये वे प्रकृति की धारा को रोकने का दुष्प्रयत्न कर रहे होते हैं। कल जैसा आज कदापि नहीं हो सकता। कल कल था और आज आज रहेगा। कल की तो बात छोड़िये, विगत एक पल भी आगामी एक पल जैसा नहीं होगा। अभी एक क्षण पूर्व जो नदी थी वही नदी नहीं है। अभी एक क्षण पूर्व जो सूर्य था वही नहीं है। कल जो सूर्य था आज वही नहीं। पृथ्वी क्षण प्रतिक्षण बदल रही है। हम जो कल थे वहु आज नहीं हैं। फिर कल को रोक कर, थाम कर रखने का दुराग्रह क्यों? कल को जाने दो आज का स्वागत करो। भारत अपनी परिवर्तनशीलता के कारण ही वैविध्यपूर्ण है। इसी कारण यह अनूठा है। इसी कारण यहाँ प्रायः सभी प्रकार के जलवायु, भौतिक उच्चावच, वनस्पति, मृदा, अन्न, मनुष्य, जीव-जंतु आदि पाये जाते हैं। किंतु इस देश का भी दुर्भाग्य है कि यहाँ कुछ ऐसी प्रजाति के लोग पाये जाते हैं जो पुरातनता का मोह नहीं छोड़ पाते। आखिर कृष्ण मूर्ख तो नहीं रहेंगे जिन्होंने "वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि" का उद्घोष किया होगा। उनका यह कथन, मात्र मनुष्य देह के संदर्भ में नहीं है बल्कि ये पूरी सृष्टि पर लागू होता है। लेकिन मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी कमी यही है कि यह कल में कोई परिवर्तन होता हुआ देखकर परेशान हो जाता है। छोड़ो कल की बातें। आज को देखो। यह हमेशा सुंदर लगेगा। आप हमेशा चिंता-मुक्त रहेंगे। @विनय नमन 🙏🙏🙏🧘🧘🧘

Sunday, 19 June 2022

एक पिता और पुत्र के बीच हमेशा एक अदृश्य सी सीमा रेखा खिंची रहती है. हमारे बीच भी यह रेखा थी. बचपन में बाबू (मैं अपने पिताजी को बाबू कहता हूँ) का खौफ दिलोदिमाग पर हावी रहता था. घर में आपकी मौजूदगी से मेरे लिए कर्फ्यू का माहौल रहता था जबकि न रहने पर लगता था कि जल्दी से आप घर आ जायें. अजीब से डर के साथ अजीब सा शुकून होता था. यह ठीक वैसा था जैसे – "मिलो न तुम तो हम घबराएं, मिलो तो आँख चुरायें हमें क्या हो गया है." मुझे नहीं पता कि मैं एक अच्छा बेटा बन पाया या नहीं. सच पूछिए तो मुझे यही नहीं पता है कि अच्छा बेटा कहते किसे हैं? लेकिन अब तक के अनुभव से जो थोड़ा बहुत समझ पाया हूँ वह है – "पिता के पितृत्व को समझने वाला, उसके संघर्षों को समझने वाला, पिता को गर्वानुभूति के क्षण उपलब्ध कराने वाला, उसकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने वाला लड़का ही अच्छा माना जा सकता है." पिता के लिए विडम्बना यह है कि प्रथम तो बिना पिता बने उसे कोई समझ ही नहीं सकता. दूसरे गर्वानुभूति कराने के लिए अच्छी नौकरी, अच्छे रैंक, अच्छे काम की जरूरत होती है. इसमें समय लगता है. मैं इस मामले में खुद को अभागा मानता हूँ कि जब तक मेरे जीवन में आपको समझने का वक्त आया, आपको गर्व करने का वक्त आया आप नहीं रहे. मैंने आपको तब समझना शुरू किया जब मैं खुद पिता बना. मैंने समझना शुरू किया कि क्यों आप हमें अहक से, बाँहों में भरकर सीने से नहीं चिपकाते थे. एक माँ अपनी बिटिया या बेटे को आकंठ सीने से लगा सकती है लेकिन एक पिता के ऊपर नैतिकता का पहाड़ धरा होता है. मन तो मेरा भी करता है लेकिन मैं पहाड़ तले दबा रहता हूँ. आप भी दबे ही रहे होंगे. मैंने समझना शुरू किया कि क्यों आप होटल पर बैठकर कभी चाय पीकर, कभी बिना पिए रह जाते थे जबकि मुझे पूछ-पूछ कर खिलाते थे. जब मैं प्रज्ञा और बिभू के साथ होता हूँ तब इन्हें खिलाने के चक्कर में मेरा खाने का मन ही नहीं करता. जबकि इनके बारे में मन करता है क्या-क्या खिला दूँ. आप भी यही अनुभव करते रहे होंगे. आपका वह दर्द "मैं अपने बच्चों को वह कमी नहीं होने दूंगा जो मैंने खुद झेला है" मुझे बहुत बाद में समझ आया जब मैंने भी यही सोचना शुरू किया. जीवन में बहुत कुछ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सिर्फ आपका है. सच कहूँ तो मैं ऐसा कुछ भी नहीं हूँ जो आप नहीं थे. मै कवि हूँ तो आप भी कविता करते थे, मुझे गाने पसंद हैं तो आप भी गायक थे, मैं पढ़ने में ठीक हूँ तो आप भी अपने समय के टॉपर थे, मैं आध्यात्म में रूचि रखता हूँ तो आप भी भक्त हृदय और आध्यात्मिक थे, मैं क्रिकेट खेलता था तो आप भी वालीबाल के खिलाडी थे. मेरे सभी गुणावगुण आप से ही है. आपने खुलकर कोई भी सपना नहीं देखा. लेकिन मैं अभी तक आपके ही सपने को जीने की कोशिश कर रहा हूँ. यद्यपि बाल्यकाल से लेकर आज तक आपने कभी भी मेरे ऊपर अपने सपनों के बोझ को नहीं लादा बल्कि मुझे मुक्त उड़ान की पूरी छूट दे रखी थी. तथापि बचपन में जब आप मेरे सामने दूसरे बच्चों के नेट/जे आर एफ पास होने का जिक्र करते थे तो आपकी आँखों में आशा भरी शून्यता मेरे भीतर तक चुभती थी. मैंने अनजाने ही नेट/जे आर एफ उत्तीर्ण करने को अपने जीवन का लक्ष्य निश्चित कर लिया, आपने कहा नहीं था. मैंने किया. 5-5 बार किया. पता नहीं आपको मैं गर्व करने का क्षण दे पाया या नहीं क्योंकि आपने मुंह से कुछ नहीं कहा था लेकिन आपकी आँखें गीली थी. मैं समझता हूँ कि उन शून्य आँखों में कुछ तो आया था. शायद यह गर्व ही रहा होगा जो चुपके से पानी बनकर निकला था.
बचपन में ही आप मेरे सामने यदा-कदा आई ए एस (यू. पी. एस. सी.), पी सी एस (यू. पी. पी. एस. सी.) के बारे में चर्चा करते थे. उस समय भी वही शून्यभाव झलकता था. मैंने इसे भी अपना जीवन ध्येय बना लिया. हालाँकि अभी मैं इस लक्ष्य से बहुत दूर हूँ लेकिन चल जरूर रहा हूँ. इस सफर का एक पड़ाव (यू.पी.पी.एस.सी. - जी.आई.सी.) अभी-अभी आया है. इस पड़ाव पर ठहर कर मैं आपकी आँखों में झांकने की कोशिश करता लेकिन दुर्भाग्य से आपकी भौतिक उपस्थिति नहीं है. शायद एक दिन आई ए एस/पी सी एस भी हो जाये किन्तु तब भी मैं आपकी आँखों में देख ना पाउँगा कि शून्यतासिक्त आँखों में गर्व और ख़ुशी के आँसूं हैं या नहीं. मैंने लक्ष्य तो निश्चित कर लिया था. लेकिन मेरे पास साधन की कमी थी. आपकी आर्थिक स्थिति बहुत ठीक नहीं थी इसी कारण आप मुझे बाहर भेज कर पढ़ाने में असमर्थ थे. इस असमर्थता का कसक मैंने कई बार आपकी बातों और आँखों में महसूस किया. जब मैं इलाहाबाद आ रहा था तब आपने अपने पसीने की कमाई से मुझे दस हजार रूपये दिया था. उसी दस हजार में तीन हजार और मिलाकर मैंने मौर्या लाज में कमरा लिया था. आपका वह दस हजार मेरे पास 240 गुना ज्यादा होकर वापस आया था. वह रुपया नहीं आशीर्वाद था. आप विषम से विषम परिस्थिति में भी या तो मुस्कराते थे या फिर मौन हो जाते थे. आपका यह attitude मेरा भी attitude बन गया. जीवन में संघर्षों का दौर कभी थमता नहीं. इस दौरान कुछ लोग उपहास उड़ाते हैं, कुछ ताने कसते हैं, कुछ नसीहतें देते हैं, कुछ किनारा कर लेते हैं, कुछ घृणा और वितृष्णा से भर जाते हैं लेकिन डटे रहने वाले डटे रहते हैं. मेरे भी जीवन में यह दौर आया. लेकिन आपने "काजी की घोड़ी" वाली जो कहानी सुनाया था न वह संबल का काम करती रही. सुनो सबकी करो अपनी. लोगों का काम है कहना. लोग कुछ तो कहेंगें. मैं अभी वहाँ नहीं पहुंचा पाया जहाँ पहुँचने का स्वप्न आपने और मैंने अनजाने ही देखा था, लेकिन चलते-चलते कहीं तो पहुंचा हूँ. बस इसे देखने के लिए आप यहाँ नहीं हैं. मैं जीवन में क्या करूंगा, कहाँ जाऊंगा, क्या पाउँगा, क्या खोऊंगा इसे भी देखने के लिए आप नहीं होगें. लेकिन आप हैं. मैं आपसे हूँ और आप मुझमें हैं. मैं आपको याद करने के लिए कोई एक दिन मुफ़ीद नहीं मानता. मेरा हर दिन, हर क्षण, हर साँस सिर्फ आपकी है. @ विनय नमन 🙏🙏🙏🧘🧘🧘

Sunday, 30 January 2022

सुख और दुख

दुनिया में अधिकांश लोग या तो दूसरे को खुश करने के फेर में है या फिर दुखी करने के. माता-पिता अपनी संतानों को खुश और सुखी करने के चक्कर में है. संतानों का मानना है वे भी अपने माता-पिता को दुख नहीं पहुंचाते और कोशिश करते हैं कि खुश रख सके. पति अपनी पत्नी को खुश करने के लिए परेशान है और पत्नी अपने पति को. मित्र एक दूसरे को प्रसन्न करने की जद्दोजहद कर रहे है. सरकारें अपनी जनता को खुश करना चाहती हैं और जनता अपनी-अपनी पसंद की सरकारों को. जिस व्यक्ति की किसी से दुश्मनी है वह उसे कभी खुश नहीं देखना चाहता बल्कि दुखी करने और उसकी सारी खुशियाँ छीनने की बेइन्तहा कोशिशें करता है, उसे मिटा ही देना चाहता है. संसार में यह कशमकश अनादि काल से होता चला आ रहा है. जिस तरह से दुनिया में लोग एक दूसरे को खुश और सुखी करने की कोशिश कर रहे हैं उससे तो संसार में सिर्फ शांति, ख़ुशी, आनन्द और सुख ही होना चाहिए. या फिर जिस तरह से लोग एक दूसरे के दुश्मन बने हैं उससे तो महज अशांति ही होनी चाहिए. लेकिन ऐसा है नहीं. न तो कहीं सुख है और ना ही कहीं दुख. ख़ुशी और दुख नितांत वैक्तिक चीज हैं. न तो कोई हमें खुश कर सकता है और न दुखी. यह दोनों ही भाव हमारे भीतर मौजूद हैं. अगर हम सुखी होना चाहते हैं तो किसी अजनबी व्यक्ति की छोटी सी मुस्कान ही हमारे भीतर पुलक भर देती है या फिर किसी को हम धन्यवाद बोलकर ही कृतकृत्य हो जाते हैं. अन्यथा इंद्र का सिंहासन मिलने के बाद भी चिंता बनी रहती है. व्यक्ति दुखी रहता है. नींद नहीं आती. छोटा बच्चा दस रूपये के छोटे से खिलौने से ही उतना खुश हो जाता है जितना कि हम बड़ी और महंगी कर खरीदकर भी खुश नहीं होते. दुख भी अपना ही है. अगर हम दुखी नहीं होना चाहते तो किसी की मजाल नहीं कि हमें दुखी कर दे. घनघोर मुसीबत भी भीतरी प्रासाद को विचलित नहीं कर सकती. किन्तु अगर हमने ठान लिया है कि हम सुखी नहीं होगें तो दुनिया की कोई ताकत हमें खुश नहीं कर सकती. दरअसल कल की चिंता और अपने अहंकार का पोषण ही सुख और दुख के जन्म का कारण है. हमारी सारी कोशिश होती है कि हमारा कल सुखी हो. हम आज में जीते ही नहीं. कल जिसका कभी पता ही नहीं हम उसके के लिए मरे जा रहे हैं. सुख और दुख से निवृति का पहला चरण है सिर्फ आज और इसी क्षण में जीना. पूरी शिद्दत से जीना. सौ प्रतिशत जीना. और दूसरा चरण है अहंकार से निवृति. अहंकार भी कहीं नहीं है. कभी देखा आपने अहंकार को? यह सिर्फ दूसरे को अपने से कमतर साबित करने का माजरा है. लेकिन आपने कभी सोचा कि आप सबसे बड़े कभी नही हो सकते? न धन में, न बल में, न बुद्धि में, न विद्या में, न ज्ञान में, न कीर्ति में और न ही किसी अन्य चीज में जिसे आप सोच सकते हों. हर जगह आपको आपसे बीस मिल जायेंगे और आप फिर उन्नीस ही रह जायेंगे. यह सिर्फ मानसिक विकृति है. रोग है. विकृति इस अर्थ में कि कई सारे फसाद खड़े करती है. जिन्दगी की सारी झंझट ही यही है कि मुझे उससे बड़ा बनना है या उस जैसा बनना है. फिर शुरू हो गयी भागमभाग, नींद-चैन हराम. सारी शांति, सारा शुकून खत्म. रोग इस अर्थ में कि अगर एक बार लग गया तो फिर जन्मजन्मान्तर साथ न छोड़े. मत करो किसी को खुश और मत करो किसी को दुखी. तुम न तो किसी को खुश कर सकते हो और न ही दुखी. और ध्यान रहे न ही तुम्हे कोई खुश कर सकता है और न ही दुखी. खुद को करो खुश, खुद को रखो सुखी, संभव है तुम्हारे आस-पास के लोग तुम्हारे प्रासाद को देख कर तुम्हारी कांति को देख कर आप ही आप खुश हो जायें. जियो सिर्फ आज अभी में सिर्फ अपने लिए किसी और के लिए नहीं. न तो किसी को प्रसन्न करने के लिए और न ही किसी को दुखी करने के लिए. @ विनय नमन 🙏🙏🙏🧘🧘🧘