चालाक लोमड़ी और भगवान के ठेकेदार
एक घना जंगल था उस जंगल में एक शेर रहता था। शेर बहुत ही खूंखार और ताकतवर था। जंगल के सभी जानवर उससे थर-थर कांपते थे। उसी जंगल में एक लोमड़ी रहती थी लोमड़ी बहुत चालक थी। एक बार लोमड़ी जंगल में अपना शिकार तलाश रही थी कि अचानक ही शेर उसके सामने आ गया और उसने लोमड़ी पर हमला कर उसे दबोच लिया। लोमड़ी ने जैसे-तैसे अपने आप को संभाला और शेर से बोली - "शेर भाई मुझे इस जंगल में भगवान ने भेजा है और अगर तुम ने मुझे मारा तो वो तुम्हे इसकी सजा भी देंगें।"
लोमड़ी कि बात सुनकर शेर कुछ असमंजस में पड़ गया और लोमड़ी से बोला- "मैं तुम्हारी बातों पर कैसे विश्वास कर लूँ और भला तुमें भगवान ने यहाँ क्यूँ भेजा है?"
लोमड़ी बोली- "यह जंगल बहुत बड़ा है और इस जंगल में आपका राज है। आप इस जंगल का संचालन अच्छी तरह से कर सकें इस कारण आपकी सहायता के लिए भगवान ने मुझे भेजा है।"
शेर बोला- "हो सकता है तुम अपनी जान बचाने के लिए झूंठ बोल रही हो, इस बात का क्या प्रमाण है कि तुम्हे भगवान ने ही भेजा है?"
लोमड़ी बोली - "मैं एक लोमड़ी हूँ और जंगल के अधिकांश जानवर लोमड़ी से नहीं डरते किन्तु मुझे देखकर जंगल का बड़े से बड़ा जानवर भी भाग जाता है अगर आपको यकीन ना हो तो आप मेरे पीछे-पीछे आइये और खुद ही देख लीजिये।"
शेर लोमड़ी कि बातों पर यकीन कर उसके पीछे-पीछे चलने लगा और जैसे ही कोई जानवर मिलता वो लोमड़ी को देख कर भाग जाता। अब शेर को यकीन हो गया कि इस लोमड़ी को भगवान ने ही भेजा है। असल में हुआ यह कि लोमड़ी के पीछे शेर था जंगल के जानवर शेर को देख कर भाग रहे थे जबकि शेर समझ रहा था कि जानवर लोमड़ी को देखकर भाग रहें हैं।
अब शेर भी लोमड़ी को सम्मान देने लगा और उसे अपना प्रमुख सलाहकार बना लिया।लोमड़ी को अब भोजन के लिए भटकना भी नहीं पड़ता था क्यूंकि शेर लोमड़ी को भगवान द्वारा भेजा गया प्राणी समझकर जो शिकार करता था उसी में से कुछ हिस्सा भी दे देता था।इस प्रकार लोमड़ी अपनी चालाकी से ना सिर्फ अपनी जान बचाई अपितु शेर कि सलाहकार बनकर आनन्द पूर्वक जीवन यापन करने लगी।
कुछ कुछ हाल धर्म के ठेकेदारों का भी है। उन्होंने खुद को भगवान के द्वारा भेजा हुआ, पैदा किया हुआ उनका बेटा घोषित कर धर्म की सारी ठेकेदारी खुद ले ली, और दूसरों की कमाई और साधन पर गुल छर्रे उड़ाने लगे।
Thursday, 24 June 2021
Saturday, 12 June 2021
दरिद्र नारायण
आप कहते हैं "भारत के लोग सदियों से गुलाम और गरीब रहने के कारण भयानक हीनता के भाव से पीड़ित हैं...।''
मैं कहता हूँ कि कौन इन्हें गरीब कर रहा है ???
कौन इन्हें दीन कर रहा है ???
कौन इन्हें दास बना रहा है ???
आपकी मनोवृत्ति अभी भी पीछा नहीं छोड़ रही।
महात्मा गांधी दरिद्रों को नया नाम दे गए--दरिद्रनारायण।
अब जब दरिद्र नारायण हो तो दरिद्र को मिटाना कैसे ?
नारायण को मिटाओगे क्या ?
नारायण की तो पूजा होती है। मंदिर में स्थापित करो गरीब को, पूजा करो इसकी! धन्यभागी है, गरीब है!
अछूतों को हरिजन कह गए। कहां तो हम हरिजन कहते थे उन लोगों को जिन्होंने परमात्मा को पा लिया। हरि को तो जाना नहीं और हरिजन हो गए! इससे तो अछूत शब्द अच्छा था। उसमें दंश था, पीड़ा थी। हरिजन शब्द तो बड़ा मिठास भरा हो गया। भीतर जहर है, ऊपर थोड़ी-सी चासनी है। अब गटक जाओ। अब तो हरिजन होने में बड़ा मजा आ गया!
दरिद्रता को मिटाना है कि पूजा करनी है उसकी ???
दरिद्रनारायण! तो मंदिर बनाओ!
रवींद्रनाथ ने कहा है, मेरा परमात्मा तो वहां है जहां मजदूर पत्थर तोड़ रहा है। मेरा परमात्मा तो वहां है जहां किसान भरी दुपहरी में जब सूरज आग बरसाता है तो अपने खेत में बीज बो रहा है।
तो ठीक है, फिर जितने ज्यादा लोग सड़कों पर बैठ कर पत्थर तोड़ें, उतने ज्यादा भगवान। फिर जितनी धूप तेज बरसे और जितने लोगों का पसीना बहे, जितने लोगों का खून पसीना बने, उतने ज्यादा भगवान।
इस सारी रुग्ण अवस्था को शृंगार दे-देकर सजा-सजा कर बचा रहे हो!
और कौन है जिम्मेवार इसके लिए ???
जिम्मेवार है तुम्हारा भाग्यवाद।
सदियों से तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरु और तुम्हारे पावन शास्त्र तुम्हें समझा रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जैसा है वह भाग्य से निर्मित है। गरीब है तो भाग्य से और अमीर है तो भाग्य से। करने को तो कुछ बचता नहीं। भाग्य ही सब कुछ है तो पुरुषार्थ मर जाता है। पुरुषार्थ के लिए उपाय नहीं बचता।
और संपदा पैदा होती है पुरुषार्थ से, भाग्य से नहीं। शक्ति पैदा होती है पुरुषार्थ से, भाग्य से नहीं।
यह भाग्यवादी देश गरीब और गुलाम न होता तो क्या होता!
@विनय नमन 🙏🙏🧘♂️🧘♂️
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