आप कहते हैं "भारत के लोग सदियों से गुलाम और गरीब रहने के कारण भयानक हीनता के भाव से पीड़ित हैं...।''
मैं कहता हूँ कि कौन इन्हें गरीब कर रहा है ???
कौन इन्हें दीन कर रहा है ???
कौन इन्हें दास बना रहा है ???
आपकी मनोवृत्ति अभी भी पीछा नहीं छोड़ रही।
महात्मा गांधी दरिद्रों को नया नाम दे गए--दरिद्रनारायण।
अब जब दरिद्र नारायण हो तो दरिद्र को मिटाना कैसे ?
नारायण को मिटाओगे क्या ?
नारायण की तो पूजा होती है। मंदिर में स्थापित करो गरीब को, पूजा करो इसकी! धन्यभागी है, गरीब है!
अछूतों को हरिजन कह गए। कहां तो हम हरिजन कहते थे उन लोगों को जिन्होंने परमात्मा को पा लिया। हरि को तो जाना नहीं और हरिजन हो गए! इससे तो अछूत शब्द अच्छा था। उसमें दंश था, पीड़ा थी। हरिजन शब्द तो बड़ा मिठास भरा हो गया। भीतर जहर है, ऊपर थोड़ी-सी चासनी है। अब गटक जाओ। अब तो हरिजन होने में बड़ा मजा आ गया!
दरिद्रता को मिटाना है कि पूजा करनी है उसकी ???
दरिद्रनारायण! तो मंदिर बनाओ!
रवींद्रनाथ ने कहा है, मेरा परमात्मा तो वहां है जहां मजदूर पत्थर तोड़ रहा है। मेरा परमात्मा तो वहां है जहां किसान भरी दुपहरी में जब सूरज आग बरसाता है तो अपने खेत में बीज बो रहा है।
तो ठीक है, फिर जितने ज्यादा लोग सड़कों पर बैठ कर पत्थर तोड़ें, उतने ज्यादा भगवान। फिर जितनी धूप तेज बरसे और जितने लोगों का पसीना बहे, जितने लोगों का खून पसीना बने, उतने ज्यादा भगवान।
इस सारी रुग्ण अवस्था को शृंगार दे-देकर सजा-सजा कर बचा रहे हो!
और कौन है जिम्मेवार इसके लिए ???
जिम्मेवार है तुम्हारा भाग्यवाद।
सदियों से तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरु और तुम्हारे पावन शास्त्र तुम्हें समझा रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जैसा है वह भाग्य से निर्मित है। गरीब है तो भाग्य से और अमीर है तो भाग्य से। करने को तो कुछ बचता नहीं। भाग्य ही सब कुछ है तो पुरुषार्थ मर जाता है। पुरुषार्थ के लिए उपाय नहीं बचता।
और संपदा पैदा होती है पुरुषार्थ से, भाग्य से नहीं। शक्ति पैदा होती है पुरुषार्थ से, भाग्य से नहीं।
यह भाग्यवादी देश गरीब और गुलाम न होता तो क्या होता!
@विनय नमन 🙏🙏🧘♂️🧘♂️
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