Monday, 30 June 2025
धर्म एक धंधा है
भगवान शिव की कृपा से आज मैं अकबरपुर के निकटस्थ पवित्र, प्रसिद्ध, सिद्ध धार्मिक स्थल शिव बाबा के स्थान पर गया था। शिव बाबा का धाम मेरे ख्याल से कोई सौ सवा सौ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ। हर तरफ आदमी थे। जिस समय (सुबह 10.30 बजे) मैं गया था, उस समय लगभग चार-पांच हजार की भीड़ तो रही होगी। अगर गणना करूं तो सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक तकरीबन 50 हजार लोग दर्शन पूजन करेंगे ही। यह आज के सोमवार की बात है हर सोमवार यही होता होगा। आम दिनों में भी चार-छः हजार लोग आ ही जाते होंगे। श्रद्धा, भक्ति, आस्था, विश्वास अपनी जगह है। आज मैं बात करूंगा धर्म के धंधे की।
हर तरफ दूकानें सजी हैं - फूल-माला, पूजन सामग्री, मूर्ति-चित्र-डमरू-त्रिशूल, मिठाई, जलेबी, लइया, रेवड़ी, झाल-पूड़ी, नमकीन, मूंगफली, रामदाना, चिक्की, खिलौना, चाट-फुलकी-टिक्की, समोसा-पकौड़ा-चाय, चाउमीन-बर्गर, कपड़ा, बर्तन, शृंगार, हंसिया-खुरपी-चाकू-छूरी, गन्ने का रस, कुल्फी-आइसक्रीम, कोल्ड-ड्रिंक, घोड़ा-झूला, चकरी-झूला, स्लाइडर, छुकछुक रेल, जम्पर, नाई, पार्किंग वाले, चंदन लगाने वाले, रक्षासूत्र बांधने वाले, कथा बांचने वाले (पंडित), फोटो खींचने वाले, गोदना गोदने वाले, रिक्शा वाले आदि। मुख्य प्रवेशद्वार वाले मार्ग के एक ओर की पटरी पर लगी दूकानों को मैंने गिना कुल 36 दूकानें लगीं थीं। दूसरी पटरी पर भी कमोबेश 30 दुकानें तो रहीं ही होगी।
इस तरह की 20 गलियां बनी हैं जहाँ दूकानें लगी थीं। हर गली में औसतन मैं 30 दूकान भी मान लूं तो करीब 600 दूकानें लगी होगीं। 600 दूकान बराबर 600 परिवार। हर परिवार से यदि 2 व्यक्ति भी वहाँ लगे हों तो 1200 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। अकेले मैंने ही कुल 9 दूकानों से 720 रूपये की खरीददारी किया।
मैं यह मानकर चलता हूँ कि हर व्यक्ति न अधिक पांच सौ रूपये खर्च करें। और सभी न खर्च करें केवल दो हजार लोग ही खर्च करें तो पांच सौ के हिसाब उस दो घंटे में 10 लाख की खरीदारी हुई होगी। एक घंटे के लिहाज से 5 लाख। यदि शिव बाबा का धाम केवल 12 घंटे ही खुला रहे तो पूरे दिन में 60 लाख का धंधा होगा। हर दूकान पर न्यूनतम 5 हजार का व्यापार होगा। जिसमें से हजार-बारह सौ मुनाफा तो बनेगा ही। यह न्यूनतम अनुमान है।
इतनी गणना करने और इतना बोर करने के पीछे मेरा एक उद्देश्य है कि धर्म धंधा तो है। इतना अच्छा धंधा कि एक क्षेत्र के करीब बारह सौ लोगों को रोजगार मिला हुआ। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उद्योग में संलग्न कर्मचारियों की संख्या के आधार (सूक्ष्म उद्योग 1-9, लघु उद्योग 10-49, मध्यम उद्योग 50-249, बृहद उद्योग 250 से अधिक) यह शिव बाबा का धाम बृहद उद्योग से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। और आश्चर्य की बात यह कि न्यूनतम निवेश में। शिव बाबा के रूप में एक पीपल का पेड़ है। उसी के इर्द-गिर्द यह सारा धंधा फैला हुआ है। है किसी व्यवस्था में दम जो एक पेड़ के सहारे एक दिन में न्यूनतम 60 लाख का धंधा करके दिखा दे?
दूसरा आश्चर्य यह है कि यहाँ केवल ब्राह्मणों की दुकानें नहीं हैं बल्कि हर जाति बिरादरी की दुकानें हैं। मैंने मिठाई यादव दूकान की से, नारियल, फूल, माला, अगरबत्ती की डलिया वर्मा की दुकान से, माला-फूल की छोटी डलिया सैनी की दूकान से, लइया, पेठा, चिक्की प्रजापति की दूकान से, डमरू, माला और कटोरी ब्रिजेश नामक व्यक्ति के यहाँ से खरीदा। गन्ने का रस पिया था अमन हरिजन के यहाँ, झूला और स्लाइडर वाले भी हरिजन थे। बेलन और एक खिलौना लिया अग्रवाल के यहाँ से। तो जातीय समीकरण के हिसाब से भी लगभग सभी जातियों की भागीदारी रही होगी। नजरी तौर पर मेरा अनुमान है कि 8-10 पंडित जी कथा का सेटअप बनाकर रखे थे कुछ लोग खाली बैठे थे कुछ के यहाँ 2-4 लोग बैठकर कथा सुन रहे थे। 4-5 लोग चंदन लगाने का का भी कम कर रहे थे।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि धर्म (यहाँ धर्म का वही अर्थ ग्राह्य है जो लोग समझते हैं मेरी दृष्टि में यह धर्म नहीं, कर्मकांड है धर्म का आभास है) एक धंधा है लेकिन जैसाकि मूढ़ लोग कहते हैं वैसा नहीं। यह सतत, संधृत, सम्यक धंधा है। न किसी को कोई नुकसान न ज्यादा मुनाफा। सबकी रोजी रोटी चलती रहे। हाँ बेशक यहाँ से कुछ उत्पादन नहीं हो रहा है लेकिन इस बाजार के भरोसे कितनी फैक्टारियां खड़ी होंगी, अंदाजा भी है किसी वामी, कामी, मतिभ्रष्ट पथभ्रष्ट हिन्दू को?
याद रखना भारतीय चिन्तन का जोर मुनाफा कमाने पर नहीं है सबकी आजीविका चलते रहने पर है वह भी बिना किसी बाधा, अवरोध, प्रतिरोध, प्रतिस्पर्धा के, बिना किसी तनाव-दबाव-दुराव के, बिना किसी विद्वेष-ईर्ष्या के। हमारा उद्देश्य मोटा माल बनाना नहीं प्रेम, शांति, सौहार्द्य, समरसता, बंधुत्व बनाये रखना था, समाज और देश को एकजुट रखना था। संसार की कोई भी व्यवस्था ले आइये वह उपर्युक्त बातों के साथ ही हर हाथ को काम, हर मुंह को निवाला और हर व्यक्ति को उसकी न्यूनतम आवश्यकता पूर्ति का साधन नहीं दे सकती। कोई कितना भी विकसित देश क्यों क्यों न हो कुछ न कुछ बेरोजगारी वहाँ होती ही है (जैसे- अमेरिका 4.2%, चीन 5.1% भारत 4.9 %, जापान 2.5%, जर्मनी 6.3%, यूनाइटेड किंगडम 4.5%, फ़्रांस 7.3%, ब्राजील 7.2% आदि)। लेकिन हमारी व्यवस्था ने यह कर दिखाया था जिसे लूट के चक्कर में मुस्लिम तथा ब्रिटिश काल में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया और स्वतंत्र भारत में तो उसकी चूलें तक हिला दी गयीं। हाँ इस व्यवस्था के दोष भी बहुत हैं।
दोष यह है कि हमारी भौतिक प्रगति बाधित हो जाती है, हम कोई मल्टीनेशनल कम्पनी नहीं खड़ा कर सकते, हम बिलगेट्स, वारेन बफेट, जेफ़ बेजोस, मार्क जुकरबर्ग, कोलम्बस, वास्कोडीगामा, राबर्ट क्लाइब नहीं पैदा कर सकते। हम विश्व को उपनिवेशवाद के चंगुल में नहीं जकड़ सकते। हम विश्व के संसाधनों को लूटने के लिए नये-नये तरीके नहीं ढूढ़ सकते। अफ्रीकी देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों, भारत सहित तमाम दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों, आस्ट्रेलिया आदि को रौंद नहीं सकते। वहाँ के मूलनिवासियों का सफाया नहीं कर सकते। रबर का कोटा न पूरा होने पर हम बेल्जियम की तरह कांगो में नरसंहार तथा लोगों के हाथ नहीं काट सकते। स्पेनियों की तरह अजटेक, माया और इंका लोगों का समूल नाश नहीं कर सकते। अफ्रीकी गुलामों को लैटिन अमेरिका में बेंच नहीं सकते। हम तेल के लिए ईरान, इराक, यमन आदि पर झूठा युद्ध नहीं थोप सकते। हम विश्व को नव उपनिवेशवाद में नहीं जकड़ सकते।
चूँकि मुनाफा कमाने पर हमारा बहुत जोर नहीं है, जीवन चल ही रहा है, शांति है संतोष है, तो नवाचार, खोज, आविष्कार नहीं होगा, तकनीकी क्रांति, मोबाईल क्रांति, ए आई क्रांति नहीं होगा। धरती का सीना चीरकर खनिज नहीं निकाला जायेगा, पेड़ नहीं कटेगा, पहाड़ नहीं टूटेगा, हवा, पानी, नदियाँ, भूमि नहीं दूषित होंगी। वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन नहीं होगा। सामाजिक प्रदूषण, वैचारिक प्रदूषण, पारिवारिक प्रदूषण नहीं होगा। समाज देश जैसा चल रहा था वैसा ही सहस्राबदियों तक चलता रहेगा, अपनी धुन में मस्त।
Saturday, 28 June 2025
क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है?
क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है?
हम अपने आसपास देखते हैं कि कई सारे ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत कथा, श्रीमद्भागवत कथा, रामायण कथा, पूजा-पाठ भी आदि करते करवाते हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या यह ब्राह्मणों का कार्य है?
इसके पहले कि मैं इस बात का उत्तर दूँ, एक जिज्ञासा है कि क्या भगवान परशुराम, इनके पिता महर्षि जमदग्नि, इनके पिता महर्षि भृगु, महर्षि जाबालि, महर्षि वसिष्ठ, महर्षि भारद्वाज, महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि अत्रि, महर्षि अगस्त्य, महर्षि दुर्वासा, महर्षि असित, महर्षि देवल, महर्षि कश्यप, महर्षि कणाद, महर्षि पतंजलि, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग, भगवान कपिल, ऋषि गालव, ऋषि उद्दालक, ऋषि शांडिल्य, ऋषि गौतम, ऋषि च्यवन आदि ने किसी के यहाँ कथावाचन किया, यजमानी किया, पूजा-पाठ करवाया? जैसाकि शास्त्रों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनका मुख्य काम तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, शास्त्र का अध्ययन करना, यज्ञ करना व करवाना आदि था। इन्होंने आजन्म यही किया। कभी-कभी किसी के विशेष आग्रह पर इन्होंने पूजा-पाठ, करवाया होगा। उसमें भी यज्ञ को वरीयता देते थे।
हाँ, महर्षि वशिष्ठ, देवगुरु बृहस्पति, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग आदि ने देवताओं तथा भगवान राम व भगवान कृष्ण के कुल में उनके दर्शनार्थ उनका कुलगुरु व कुलपुरोहित होना स्वीकार किया। उन्होंने भगवान से नीचे कुछ भी स्वीकार नहीं किया। और हम आज के ब्राह्मण क्या कर रहे हैं? एक झोले में पोथीपत्तरा रखकर घर-घर सीधा उगाह रहे हैं? शालिग्राम पर अक्षत-फूल-फल-दक्षिणा चढ़वा रहे हैं? रामायण गाते फिर रहे हैं? मारे-मारे फिर रहे हैं?
दूसरी बात ब्राह्मणों का कर्तव्य स्वयं वेदाध्ययन करना, सुयोग्य पात्र शिष्य को वेदाध्ययन, शास्त्राध्ययन करवाना, यज्ञ करना व करवाना, दान लेना व देना है। इन सबसे ऊपर उनका मूल कर्तव्य तपस्या है, शक्तियों की उपासना-साधना करना है। न भागवत या रामायण या सत्यनारायण कथा एक कथा करना है। यह कब से धर्म हो गया? यह कब से ब्राह्मण का कर्म हो गया? व्यास जी ने पुराणों का सृजन इसलिये किया था कि जिन्हें वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है वे भी भगवत प्रीत्यर्थ कार्य कर सकें, वे भी भगवत भक्ति कर सकें।
यह ब्राह्मणों का दुर्भाग्य है, उनकी असफलता है कि उन्हें अपने कर्तव्यों को छोड़कर नाचनौटंकी करना शुरु कर दिया। चंद सिक्कों के लिये शक्ति की उपासना छोड़कर सत्यनारायण कथा, भागवत कथा कहना शुरु कर दिया। "गंगधाम को छोड़कर दुरमति कूप खनवा रहा है।"
यह सब हुआ। तो कुछ कारण हैं -
1- हर ब्राह्मण तपस्या नहीं कर सकता था। उसकी क्षमता नहीं रही उतनी। तो उसने अपने मूल कर्म को छोड़कर नौटंकी-नाच करना शुरू कर दिया। यह ब्राह्मणत्व की असफलता है।
2- समय बदला चीजें बदलीं। मनुष्यों की आवश्यकताएं बदलीं। ब्राह्मणों की भी। उन्होंने उन चीजों को भी समाज में प्रतिष्ठित करना शुरु कर दिया जो चीजें गौण हुआ करती थीं। नतीजा दुर्दिन तो होगा ही।
3- पहले लोग इतने सुशिक्षित होते थे कि वे अपना पूजा-पाठ स्वयं कर सकें। लेकिन धीरे-धीरे उनके जीवन में आपाधापी, भौतिकता का समावेश इतना जबर्दस्त हुआ कि वे सब इसे छोड़ते गये। लेकिन संस्कार मन में वही था कि पूजा-पाठ करना है तो फिर ब्राह्मणों को ढूंढा गया जो यह सब करवा सकते थे। फिर यह रीति बन गया।
मैं यह बात कहने का जोखिम ले रहा हूँ कि ब्राह्मण का कर्तव्य वास्तव में यह सब करना नहीं है। उसका कर्म है तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, वेदों का अध्ययन उसके नये-नये अर्थों की निष्पत्ति करना था। और ध्यान रखना यदि ब्राह्मण अपने मूल धर्म से विरत होगा तो उसका अधःपतन निश्चित है, निश्चित है, निश्चित है। उसे कोई बचा नहीं सकता।
जो ब्राह्मण अपना कल्याण चाहते हैं वे सारी नौटंकी, कक्थकड़ी छोड़ शक्ति की शरण में आयें। अपने कुलाचार का पालन करें। कुलदेवी की आराधना उपासना करें। सर्वप्रथम तो संध्यावंदन करें हीं। गायत्री का जप करें। उसका पुरश्चरण करें। दुर्गासप्तशती का पारायण करें। नवार्ण दीक्षा लेकर उसका पुरश्चरण करें। विभिन्न तंत्र ग्रंथों का अध्यवसाय करें। योग्य तंत्राचार्यों का शरण ग्रहण कर कुछ सिद्धियां-शक्तियां प्राप्त करें। आयुर्वेद, ज्योतिष आदि का गहन अध्ययन करें। और इनमें से कुछ भी न हो सके तो दुर्गा चालीसा/दुर्गा/बंगलामुखी/काली/पीतांबरा आदि नामों का ही 21, 51,, सवा लाख, 5 लाख, 11 लाख का जप करें पुरश्चरण करें। फिर देंखे अपने जीवन में घट रहे अप्रत्याशित, चमत्कारिक परिणाम को।
Friday, 27 June 2025
ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया?
ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया?
हमने कुछ लोगों को पकड़ा 10, 20, 50, 100, 1000 आदि गायें दिया, बना दिया यादव। काहे कि हम दूध, घी बहुत पीते-खाते थे? हमने कुछ लोगों को बंधक बनाया और भैंसे दिया बना दिया महिषवाल। हमने फिर कुछ लोगों को पकड़ा, भेड़ दिया, बना दिया गड़रिया। क्योंकि हम लोग ऊन के कपड़े बहुत ज्यादा पहनते थे फिर भी अधनंगे रहते थे? कुछ को बकरी दिया बना दिया बकरवाल, गुज्जर। क्योंकि हम बकरी का मांस भी खाते थे? हमने फिर कुछ मजलूमों को जबरन पकड़ा और चमड़ा दिया, बना दिया चमार। क्योंकि हम लोग चमड़े का जूता सिर से पैर तक खूब पहनते थे? कुछ को पहले से बने जूतों की मरम्मत का काम जबरन सौंपा वे बने मोची। क्योंकि ज्यादा चलने के कारण हमारे जूते टूटते बहुत थे?
कुछ लोगों को फिर दबोच लिया उन्हें सुअर दिया, बना दिया डोम/भंगी। क्योंकि सुअर का मांस भी हमें खाना पसंद था? इनसे हमने शवों को जलाने तथा विष्ठा साफ करवाने का घृणित कार्य भी करवाया क्योंकि हमारे यहाँ पहले से ही शौचालय बना होता था। हम लोग बाहर लैट्रिन करने नहीं जाते थे और विष्ठा भी बहुत ज्यादा करते थे न?
कुछ लोगों को ताड़ी के पेड़ पर चढ़ा कर ताड़ी लाने और बेचने का काम सौंपा वे बन गये पासी। भाई हम रात दिन ताड़ी पीकर टुन रहते थे, तभी हमें मानवता नहीं दिखती थी और दलितों को लूटने का काम आसानी से हो जाता था। कुछ लोगों को नाव दिया, बना दिया केवट व मल्लाह क्योंकि हम नदी मार्ग से बहुत आते-जाते थे। दिन में दस बीस चक्कर तो ही जाता था? कुछ लोगों को जाल पकड़ाकर नदी या ताल में धकेल दिया वे बन गये निषाद, मछुआरा क्योंकि हमें मछली खाना बहुत भाता था? बिना मछली के हमारा आहार सूना रहता था? कुछ लोगों को जमीन दिया, हल बैल दिया, बीज दिया बना दिया मौर्य। कुछ को कहा कि तुम केवल इन मौर्यों के यहाँ उगी सब्जी का व्यापार करोगे, वे बन गये कुजड़ा। हम कभी-कभी सब्जी भी खा लिया करते थे? कुछ बेहद मासूम लोगों को जमीन देकर कहा कि तुम केवल अनाज उगाओ, वे कुर्मी बन गये। कुछ को धागा बनाने की मशीन दिया बना दिया जुलाहा, कुछ को रुई धुनने का काम दिया बना दिया धुनिया। महाराज हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कपड़े पहनने का बेहद शौक था?
कुछ को लकड़ी बसुली, रुखान, दिया बना दिया बढ़ई। क्योंकि हम दिन भर लकड़ी के सामानों में ही घुसे पड़े रहते थे। कुछ लोहा और निहाई देकर विश्वकर्मा बना दिया। लोहे के हथियार भी हमारे बहुत काम आते थे। मजलूमों दलितों का वध करने में बड़ा उपयोगी होता था लोहे का हथियार। कुछ को उस्तरा और नहन्नी देकर नाई बना दिया। काहे कि हमारे दाढ़ी, बाल बहुत जल्दी-जल्दी उग आते थे। दिन में चार-छः बार बाल बनवाना पड़ता था?
कुछ से कहा कि तुम लोग फूल तोड़ो माला बनाओ और माली बनो। हम फूलों की माला पहनने के भी बड़े शौकीन थे? कुछ बांस और मूंज का ढकिया, मौनी बनाने का काम दिया वे बने धरिकार। कुछ को रस्सी में बांधा और उन्हें लोटा, गगरा व उबहन (पानी निकालने की रस्सी) दे, पानी भरने का काम सौंपा वे बेचारे दलित बने महार। कुछ को पालकी ढोने का काम दिया वे बने कहार। अब पैदल कौन आये जाये जब मानवयान की सवारी मिल जाती है? कुछ को चाक और मिट्टी देकर कुम्हार बना दिया। क्योंकि हमें रोज मिट्टी के बर्तनों की आवश्यकता पड़ती थी?
कुछ लोगों से हमने कहा कि तुम लड्डू व मिठाई बनाओ वे बेचारे बन गये मोदनवाल। भई हमें मिठाई खाना बेहद पसंद था? कुछ को कपड़ा बेचने का धंधा दिया वे बन गये बजाज, कुछ को चूड़ियां बेचने का काम सौंपा वे बने चूड़ीवाल।
कुछ हमारे बड़े अजीज थे उन्हें हमने सोना-चांदी का काम सौंपा दिया वे बने सोनार। कुछ लोगों को फरसा, भाला, तलवार, धनुष-बाण सौंपा और कहा कि तुम क्षत्रिय बन गये। जाओ सबको मारो काटो।
और खुद अधनंगा बदन लेकर सिर पर शिखा, माथे पर चंदन, कांधे पर जनेऊ और बगल में पोथी दबा लगे भागवत बांचने, कथा सुनाने, ज्ञान बघारने, मासूम निरीह, लोगों को लूटने, मूर्ख बनाने।
और इतिहास में हमने एकबार यह व्यवस्था बैठा दिया तो फिर बैठा दिया, हजारों साल तक कोई चूं नहीं बोला। सिर नहीं उठाया। बस दुम दबाकर फाओअप करते रहे। ऐसा फाओअप कर रहे हैं कि अब भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। है कि नहीं।
देख रहा विनोद कैइसा गोल-गोल घुमा रहा है ई लोग।
या तो आप हमें मूर्ख समझ रहे या फिर खुद हैं और हमें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। या फिर यह बहुत बड़ा खेल है, जिसके हाथ की हम आप सब कठपुतली बन रहे हैं और वह मजे लेकर खेल रहा है।
@ डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
क्या सच में ब्राह्मणों ने जाति बनाया?
समाज में कुछ थ्योरियां प्रचलित है कि
1- "ब्राह्मणों ने समाज को जातियों में बांट दिया।"
2- "ब्राह्मणों ने शूद्रों को लूट लिया।"
3- "उन्होंने शुद्रों को पढ़ने नहीं दिया।"
मेरा प्रश्न यह है कि
1- इस सिद्धांत के पक्ष में क्या कोई साक्ष्य है? आप में से जितने भी पढ़े लिखे बुद्धिमान, विद्वान, वैज्ञानिक लोग हों कोई शास्त्रीय, अभिलेखीय, शिलालेखीय, ताम्रपत्रीय प्रमाण ले आना जिसमें ब्राह्मणों द्वारा विभाजित जातियों का उल्लेख हो, उस क्रूर ब्राह्मण का नाम हो, मैं पहला ब्राह्मण होऊंगा जो उसका पुतला दहन कर ब्राह्मणत्व का त्याग करूंगा। वर्ण की बात मत करना क्योंकि ब्राह्मणों ने अपनी कुटिलता से उसे ईश्वरीय घोषित कर दिया है। उसमें उनकी कोई खतां नहीं है। भगवान जाने उसकी बात।
2-दूसरा प्रश्न यह है कि जब मुट्टी भर (3-5%) अधनंगे तिलक, चुटिया, जनेऊ, खड़ाऊं और पोथी-पत्तरा धारी ब्राह्मण समाज को बांट रहे थे तब सिकंदर जैसे विश्व विजेता को धूल चटाने वाले, मछली से तेल निकाल देने वाले, लट्ठ को तेल पिलाकर चिकना करने वाले, धरती का सीना चीर कर सोने की फसल निकाल देने वाले वीर बांकुरे, उनके राजा, उनकी सेना, उनके हथियार, क्या कर रहे थे? क्यों बंटने दिया समाज को?
3- तीसरा प्रश्न यह है कि उन ब्राह्मणों के पास ऐसा क्या था कि वे इतनी आसानी से 80-90% प्रतिशत धाकड़, जांबाज, बुद्धिजीवी आबादी को बांटने में सफल हो गये?
4-चौथा प्रश्न जब मनुवादी ब्राह्मण फर्जी (?) मनुस्मृति लिखकर समाज को तोड़ रहे थे, आप लोगों को दबाने, कुचलने, सताने की साजिश रच रहे थे तब आप क्या कर रहे थे? कहाँ सो रहे थे?
5- ऐसा कैसे हो सकता है कि 3-5% प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी वाले लोग 80-90% बहुसंख्यक आबादी वाले लोगों को पढ़ने न दें? क्या आपके पास इतनी अक्ल, क्षमता, साहस, संसाधन नहीं था कि आप अपनी समानान्तर शिक्षण व्यवस्था खड़ी कर सकें, अपनी पाठशाला, अपनी भाषा, अपना पुस्तक, अपना ज्ञान, अपना वेद, अपना शास्त्र रच सकें?
6- या इन सबमें आपकी भी मिलीभगत थी अथवा यह अब तक सबसे बड़ा प्रोपेगेंडा है?
@ डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
प्रवक्ता भूगोल
जी आई सी दोस्तपुर सुलतानपुर
Thursday, 26 June 2025
ब्राह्मण होना पाप है
रावण को सीता का हरण करना था उसने वेष बनाया ब्राह्मण का। हनुमानजी को राम का भेद लेना हुआ उन्होंने वेष बनाया ब्राह्मण का। कालनेमी को हनुमानजी को उनसे मार्ग से भटकाना हुआ उसने वेष बनाया ब्राह्मण का। कर्ण को परशुराम जी से धनुर्वेद का ज्ञान लेना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। श्रीकृष्ण को कर्ण को छलना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। श्रीकृष्ण सहित भीमादि पांडवों को छल से जरासंध का वध करना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। वरुण को राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। विश्वामित्र को राजा हरिश्चंद्र को छलना को हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। विष्णु को राजा बलि को छलना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। अश्विनी कुमारों को च्यवन ऋषि की पत्नी सत्यवती की परीक्षा लेना हुआ वेश बनाया ब्राह्मण का। अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव सहित कुंती तथा द्रौपदी ने कई बार ब्राह्मण का वेश धारण किया।
जब जब किसी को कोई क्रूर कर्म करना हुआ उसने ब्राह्मण का वेश धारण किया। क्यों? क्योंकि ब्राह्मण नाम है एक भरोसे का। ब्राह्मण नाम है एक विश्वास का। ब्राह्मण नाम है सत्य का। ब्राह्मण नाम है धर्म का। ब्राह्मण नाम है त्याग, तप, शील और संयम का। इसलिए उसके नाम का फायदा उठाना बहुत आसान था। उसके वेश से, उसके नाम से लोगों को मूर्ख बनाना आसान था। उसके नाम से लोगों को ठगना आसान था। आज भी यही हो रहा है। हालांकि अब ब्राह्मण नाम ब्रांड नहीं धब्बे जैसा लगता है। ब्राह्मण होना पाप जैसा लगता है।
आखिर हम इतने कुकर्मी हैं? हमने सदियों तक मौर्यवंशी सम्राटों, चंवर वंशी क्षत्रिय राजाओं (अब चमार), अहीर-यदुवंशी राजाओं, महार-कहार-कुर्मी-पासी-मल्लाह-निषाद जाति के राजाओं, नाई जाति के राजाओं, डोम राजाओं, नागवंशी राजाओं, हैहय वंशी राजाओं, जाट-गुर्जर-पाल-परमार-प्रतिहार राजाओं, चोल-चालुक्य-वेंगी-वर्मन वंशी राजाओं, सूर्यवंशी, चंद्रवंशी राजाओं का शोषण किया? उन्हें दबाया कुचला, पीड़ित और प्रताड़ित किया। वे 80-90% और हम 3-5%। उनके हाथ में सेना, उनके हाथ में शस्त्र, उनके हाथ में खजाना, उनके हाथ में ताकत, उनकी बिरादरी का बल और अल्पसंख्यक होते हुए भी हमने एक धोती, चुटिया, जनेऊ, तिलक धारण कर उन्हें लूट लिया? बर्बाद कर दिया है? तबाह कर दिया? और इस कदर तबाह किया वे अपना सिर ही न उठा सके? अब इतिहास का बदला लिया जा रहा है?
अफसोस।
लेकिन, लेकिन रुको
या तो तुम इतने अंधे, मूर्ख, बकलोल, निर्बुद्धि, कायर, निर्बल थे कि तुम्हें हमारा कमीनापन दिखा नहीं अथवा हम लोग वाकई इतने काबिल, योग्य, सामर्थ्यवान थे कि तुम लोग चकरघिन्नी की तरह सहस्राब्दियों तक नाचते रहे, नट-मरकट की तरह अथवा यह अब तक सबसे बड़ा झूठ है, षड्यंत्र है, धोखा है।
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