Monday, 30 June 2025

धर्म एक धंधा है

भगवान शिव की कृपा से आज मैं अकबरपुर के निकटस्थ पवित्र, प्रसिद्ध, सिद्ध धार्मिक स्थल शिव बाबा के स्थान पर गया था। शिव बाबा का धाम मेरे ख्याल से कोई सौ सवा सौ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ। हर तरफ आदमी थे। जिस समय (सुबह 10.30 बजे) मैं गया था, उस समय लगभग चार-पांच हजार की भीड़ तो रही होगी। अगर गणना करूं तो सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक तकरीबन 50 हजार लोग दर्शन पूजन करेंगे ही। यह आज के सोमवार की बात है हर सोमवार यही होता होगा। आम दिनों में भी चार-छः हजार लोग आ ही जाते होंगे। श्रद्धा, भक्ति, आस्था, विश्वास अपनी जगह है। आज मैं बात करूंगा धर्म के धंधे की। हर तरफ दूकानें सजी हैं - फूल-माला, पूजन सामग्री, मूर्ति-चित्र-डमरू-त्रिशूल, मिठाई, जलेबी, लइया, रेवड़ी, झाल-पूड़ी, नमकीन, मूंगफली, रामदाना, चिक्की, खिलौना, चाट-फुलकी-टिक्की, समोसा-पकौड़ा-चाय, चाउमीन-बर्गर, कपड़ा, बर्तन, शृंगार, हंसिया-खुरपी-चाकू-छूरी, गन्ने का रस, कुल्फी-आइसक्रीम, कोल्ड-ड्रिंक, घोड़ा-झूला, चकरी-झूला, स्लाइडर, छुकछुक रेल, जम्पर, नाई, पार्किंग वाले, चंदन लगाने वाले, रक्षासूत्र बांधने वाले, कथा बांचने वाले (पंडित), फोटो खींचने वाले, गोदना गोदने वाले, रिक्शा वाले आदि। मुख्य प्रवेशद्वार वाले मार्ग के एक ओर की पटरी पर लगी दूकानों को मैंने गिना कुल 36 दूकानें लगीं थीं। दूसरी पटरी पर भी कमोबेश 30 दुकानें तो रहीं ही होगी। इस तरह की 20 गलियां बनी हैं जहाँ दूकानें लगी थीं। हर गली में औसतन मैं 30 दूकान भी मान लूं तो करीब 600 दूकानें लगी होगीं। 600 दूकान बराबर 600 परिवार। हर परिवार से यदि 2 व्यक्ति भी वहाँ लगे हों तो 1200 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। अकेले मैंने ही कुल 9 दूकानों से 720 रूपये की खरीददारी किया। मैं यह मानकर चलता हूँ कि हर व्यक्ति न अधिक पांच सौ रूपये खर्च करें। और सभी न खर्च करें केवल दो हजार लोग ही खर्च करें तो पांच सौ के हिसाब उस दो घंटे में 10 लाख की खरीदारी हुई होगी। एक घंटे के लिहाज से 5 लाख। यदि शिव बाबा का धाम केवल 12 घंटे ही खुला रहे तो पूरे दिन में 60 लाख का धंधा होगा। हर दूकान पर न्यूनतम 5 हजार का व्यापार होगा। जिसमें से हजार-बारह सौ मुनाफा तो बनेगा ही। यह न्यूनतम अनुमान है। इतनी गणना करने और इतना बोर करने के पीछे मेरा एक उद्देश्य है कि धर्म धंधा तो है। इतना अच्छा धंधा कि एक क्षेत्र के करीब बारह सौ लोगों को रोजगार मिला हुआ। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उद्योग में संलग्न कर्मचारियों की संख्या के आधार (सूक्ष्म उद्योग 1-9, लघु उद्योग 10-49, मध्यम उद्योग 50-249, बृहद उद्योग 250 से अधिक) यह शिव बाबा का धाम बृहद उद्योग से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। और आश्चर्य की बात यह कि न्यूनतम निवेश में। शिव बाबा के रूप में एक पीपल का पेड़ है। उसी के इर्द-गिर्द यह सारा धंधा फैला हुआ है। है किसी व्यवस्था में दम जो एक पेड़ के सहारे एक दिन में न्यूनतम 60 लाख का धंधा करके दिखा दे? दूसरा आश्चर्य यह है कि यहाँ केवल ब्राह्मणों की दुकानें नहीं हैं बल्कि हर जाति बिरादरी की दुकानें हैं। मैंने मिठाई यादव दूकान की से, नारियल, फूल, माला, अगरबत्ती की डलिया वर्मा की दुकान से, माला-फूल की छोटी डलिया सैनी की दूकान से, लइया, पेठा, चिक्की प्रजापति की दूकान से, डमरू, माला और कटोरी ब्रिजेश नामक व्यक्ति के यहाँ से खरीदा। गन्ने का रस पिया था अमन हरिजन के यहाँ, झूला और स्लाइडर वाले भी हरिजन थे। बेलन और एक खिलौना लिया अग्रवाल के यहाँ से। तो जातीय समीकरण के हिसाब से भी लगभग सभी जातियों की भागीदारी रही होगी। नजरी तौर पर मेरा अनुमान है कि 8-10 पंडित जी कथा का सेटअप बनाकर रखे थे कुछ लोग खाली बैठे थे कुछ के यहाँ 2-4 लोग बैठकर कथा सुन रहे थे। 4-5 लोग चंदन लगाने का का भी कम कर रहे थे। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि धर्म (यहाँ धर्म का वही अर्थ ग्राह्य है जो लोग समझते हैं मेरी दृष्टि में यह धर्म नहीं, कर्मकांड है धर्म का आभास है) एक धंधा है लेकिन जैसाकि मूढ़ लोग कहते हैं वैसा नहीं। यह सतत, संधृत, सम्यक धंधा है। न किसी को कोई नुकसान न ज्यादा मुनाफा। सबकी रोजी रोटी चलती रहे। हाँ बेशक यहाँ से कुछ उत्पादन नहीं हो रहा है लेकिन इस बाजार के भरोसे कितनी फैक्टारियां खड़ी होंगी, अंदाजा भी है किसी वामी, कामी, मतिभ्रष्ट पथभ्रष्ट हिन्दू को? याद रखना भारतीय चिन्तन का जोर मुनाफा कमाने पर नहीं है सबकी आजीविका चलते रहने पर है वह भी बिना किसी बाधा, अवरोध, प्रतिरोध, प्रतिस्पर्धा के, बिना किसी तनाव-दबाव-दुराव के, बिना किसी विद्वेष-ईर्ष्या के। हमारा उद्देश्य मोटा माल बनाना नहीं प्रेम, शांति, सौहार्द्य, समरसता, बंधुत्व बनाये रखना था, समाज और देश को एकजुट रखना था। संसार की कोई भी व्यवस्था ले आइये वह उपर्युक्त बातों के साथ ही हर हाथ को काम, हर मुंह को निवाला और हर व्यक्ति को उसकी न्यूनतम आवश्यकता पूर्ति का साधन नहीं दे सकती। कोई कितना भी विकसित देश क्यों क्यों न हो कुछ न कुछ बेरोजगारी वहाँ होती ही है (जैसे- अमेरिका 4.2%, चीन 5.1% भारत 4.9 %, जापान 2.5%, जर्मनी 6.3%, यूनाइटेड किंगडम 4.5%, फ़्रांस 7.3%, ब्राजील 7.2% आदि)। लेकिन हमारी व्यवस्था ने यह कर दिखाया था जिसे लूट के चक्कर में मुस्लिम तथा ब्रिटिश काल में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया और स्वतंत्र भारत में तो उसकी चूलें तक हिला दी गयीं। हाँ इस व्यवस्था के दोष भी बहुत हैं। दोष यह है कि हमारी भौतिक प्रगति बाधित हो जाती है, हम कोई मल्टीनेशनल कम्पनी नहीं खड़ा कर सकते, हम बिलगेट्स, वारेन बफेट, जेफ़ बेजोस, मार्क जुकरबर्ग, कोलम्बस, वास्कोडीगामा, राबर्ट क्लाइब नहीं पैदा कर सकते। हम विश्व को उपनिवेशवाद के चंगुल में नहीं जकड़ सकते। हम विश्व के संसाधनों को लूटने के लिए नये-नये तरीके नहीं ढूढ़ सकते। अफ्रीकी देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों, भारत सहित तमाम दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों, आस्ट्रेलिया आदि को रौंद नहीं सकते। वहाँ के मूलनिवासियों का सफाया नहीं कर सकते। रबर का कोटा न पूरा होने पर हम बेल्जियम की तरह कांगो में नरसंहार तथा लोगों के हाथ नहीं काट सकते। स्पेनियों की तरह अजटेक, माया और इंका लोगों का समूल नाश नहीं कर सकते। अफ्रीकी गुलामों को लैटिन अमेरिका में बेंच नहीं सकते। हम तेल के लिए ईरान, इराक, यमन आदि पर झूठा युद्ध नहीं थोप सकते। हम विश्व को नव उपनिवेशवाद में नहीं जकड़ सकते। चूँकि मुनाफा कमाने पर हमारा बहुत जोर नहीं है, जीवन चल ही रहा है, शांति है संतोष है, तो नवाचार, खोज, आविष्कार नहीं होगा, तकनीकी क्रांति, मोबाईल क्रांति, ए आई क्रांति नहीं होगा। धरती का सीना चीरकर खनिज नहीं निकाला जायेगा, पेड़ नहीं कटेगा, पहाड़ नहीं टूटेगा, हवा, पानी, नदियाँ, भूमि नहीं दूषित होंगी। वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन नहीं होगा। सामाजिक प्रदूषण, वैचारिक प्रदूषण, पारिवारिक प्रदूषण नहीं होगा। समाज देश जैसा चल रहा था वैसा ही सहस्राबदियों तक चलता रहेगा, अपनी धुन में मस्त।

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