Saturday, 28 June 2025
क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है?
क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है?
हम अपने आसपास देखते हैं कि कई सारे ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत कथा, श्रीमद्भागवत कथा, रामायण कथा, पूजा-पाठ भी आदि करते करवाते हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या यह ब्राह्मणों का कार्य है?
इसके पहले कि मैं इस बात का उत्तर दूँ, एक जिज्ञासा है कि क्या भगवान परशुराम, इनके पिता महर्षि जमदग्नि, इनके पिता महर्षि भृगु, महर्षि जाबालि, महर्षि वसिष्ठ, महर्षि भारद्वाज, महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि अत्रि, महर्षि अगस्त्य, महर्षि दुर्वासा, महर्षि असित, महर्षि देवल, महर्षि कश्यप, महर्षि कणाद, महर्षि पतंजलि, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग, भगवान कपिल, ऋषि गालव, ऋषि उद्दालक, ऋषि शांडिल्य, ऋषि गौतम, ऋषि च्यवन आदि ने किसी के यहाँ कथावाचन किया, यजमानी किया, पूजा-पाठ करवाया? जैसाकि शास्त्रों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनका मुख्य काम तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, शास्त्र का अध्ययन करना, यज्ञ करना व करवाना आदि था। इन्होंने आजन्म यही किया। कभी-कभी किसी के विशेष आग्रह पर इन्होंने पूजा-पाठ, करवाया होगा। उसमें भी यज्ञ को वरीयता देते थे।
हाँ, महर्षि वशिष्ठ, देवगुरु बृहस्पति, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग आदि ने देवताओं तथा भगवान राम व भगवान कृष्ण के कुल में उनके दर्शनार्थ उनका कुलगुरु व कुलपुरोहित होना स्वीकार किया। उन्होंने भगवान से नीचे कुछ भी स्वीकार नहीं किया। और हम आज के ब्राह्मण क्या कर रहे हैं? एक झोले में पोथीपत्तरा रखकर घर-घर सीधा उगाह रहे हैं? शालिग्राम पर अक्षत-फूल-फल-दक्षिणा चढ़वा रहे हैं? रामायण गाते फिर रहे हैं? मारे-मारे फिर रहे हैं?
दूसरी बात ब्राह्मणों का कर्तव्य स्वयं वेदाध्ययन करना, सुयोग्य पात्र शिष्य को वेदाध्ययन, शास्त्राध्ययन करवाना, यज्ञ करना व करवाना, दान लेना व देना है। इन सबसे ऊपर उनका मूल कर्तव्य तपस्या है, शक्तियों की उपासना-साधना करना है। न भागवत या रामायण या सत्यनारायण कथा एक कथा करना है। यह कब से धर्म हो गया? यह कब से ब्राह्मण का कर्म हो गया? व्यास जी ने पुराणों का सृजन इसलिये किया था कि जिन्हें वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है वे भी भगवत प्रीत्यर्थ कार्य कर सकें, वे भी भगवत भक्ति कर सकें।
यह ब्राह्मणों का दुर्भाग्य है, उनकी असफलता है कि उन्हें अपने कर्तव्यों को छोड़कर नाचनौटंकी करना शुरु कर दिया। चंद सिक्कों के लिये शक्ति की उपासना छोड़कर सत्यनारायण कथा, भागवत कथा कहना शुरु कर दिया। "गंगधाम को छोड़कर दुरमति कूप खनवा रहा है।"
यह सब हुआ। तो कुछ कारण हैं -
1- हर ब्राह्मण तपस्या नहीं कर सकता था। उसकी क्षमता नहीं रही उतनी। तो उसने अपने मूल कर्म को छोड़कर नौटंकी-नाच करना शुरू कर दिया। यह ब्राह्मणत्व की असफलता है।
2- समय बदला चीजें बदलीं। मनुष्यों की आवश्यकताएं बदलीं। ब्राह्मणों की भी। उन्होंने उन चीजों को भी समाज में प्रतिष्ठित करना शुरु कर दिया जो चीजें गौण हुआ करती थीं। नतीजा दुर्दिन तो होगा ही।
3- पहले लोग इतने सुशिक्षित होते थे कि वे अपना पूजा-पाठ स्वयं कर सकें। लेकिन धीरे-धीरे उनके जीवन में आपाधापी, भौतिकता का समावेश इतना जबर्दस्त हुआ कि वे सब इसे छोड़ते गये। लेकिन संस्कार मन में वही था कि पूजा-पाठ करना है तो फिर ब्राह्मणों को ढूंढा गया जो यह सब करवा सकते थे। फिर यह रीति बन गया।
मैं यह बात कहने का जोखिम ले रहा हूँ कि ब्राह्मण का कर्तव्य वास्तव में यह सब करना नहीं है। उसका कर्म है तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, वेदों का अध्ययन उसके नये-नये अर्थों की निष्पत्ति करना था। और ध्यान रखना यदि ब्राह्मण अपने मूल धर्म से विरत होगा तो उसका अधःपतन निश्चित है, निश्चित है, निश्चित है। उसे कोई बचा नहीं सकता।
जो ब्राह्मण अपना कल्याण चाहते हैं वे सारी नौटंकी, कक्थकड़ी छोड़ शक्ति की शरण में आयें। अपने कुलाचार का पालन करें। कुलदेवी की आराधना उपासना करें। सर्वप्रथम तो संध्यावंदन करें हीं। गायत्री का जप करें। उसका पुरश्चरण करें। दुर्गासप्तशती का पारायण करें। नवार्ण दीक्षा लेकर उसका पुरश्चरण करें। विभिन्न तंत्र ग्रंथों का अध्यवसाय करें। योग्य तंत्राचार्यों का शरण ग्रहण कर कुछ सिद्धियां-शक्तियां प्राप्त करें। आयुर्वेद, ज्योतिष आदि का गहन अध्ययन करें। और इनमें से कुछ भी न हो सके तो दुर्गा चालीसा/दुर्गा/बंगलामुखी/काली/पीतांबरा आदि नामों का ही 21, 51,, सवा लाख, 5 लाख, 11 लाख का जप करें पुरश्चरण करें। फिर देंखे अपने जीवन में घट रहे अप्रत्याशित, चमत्कारिक परिणाम को।
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