जब रियो ओलंपिक के लिए भारत ने सबसे अधिक ऊर्जावान युवाओं का जत्था रवाना किया तब लगा था कि इस बार देश की झोली में कम-से-कम दहाई के अंक में तो पदक आएंगे ही लेकिन सप्ताहांत जिस तरह से सुखा गया और भारत से पदक के लिए प्रबल दावेदार सुरमा जिस तरह से खाली हाथ रहे उस से निराशा ही हुई। यद्यपि ओलंपिक एक कठिन प्रतिस्पर्धा है, जिसमें 206 देशों के तकरीबन 11000 से अधिक खिलाड़ी अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करते हैं; फिर भी भीड़ को देखते हुए यह नहीं कहा जाना चाहिए कि पदक जीतना नामुमकिन है। क्योंकि कई देश जैसे अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस आदि अपना स्वर्णिम सफर जारी रखे हुए हैं और इनके खिलाड़ी लगातार पदक जीत रहे हैं जबकि भारत का अभी तक खाता भी नहीं खुला। जबकि यह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और उसमें भी 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु तथा 20% आबादी 10 से 19 वर्ष के बीच है। वहीं अमेरिका जिसकी आबादी भारत की आबादी की एक चौथाई है पदक तालिका में शीर्ष पर है जबकि चीन दूसरे स्थान पर है। इसके अलावा जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, आदि भी अच्छी स्थिति में है। इस परिदृश्य को देखते हुए एक बात स्पष्ट है कि खेलों के विकास में कहीं न कहीं आर्थिक विकास का महत्तवपूर्ण योगदान है। आखिर वही देश अंकतालिका में शीर्ष पर क्यों हैं जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं। किंतु यहां एक विचारणीय प्रश्न यह है कि भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश तथा लगभग 8% की दर से विकास करने वाला देश है, फिर ऐसा क्या है कि खिलाड़ी भी कम हैं और पदक तालिका में भी हमारा स्थान निचला ही है? ऐसा इसलिए है क्योंकि सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश होना या 8% की दर से विकास करना ही पदक तालिका में शीर्ष स्थान हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है। आर्थिक विकास की धारा को देश के आखिरी छोर पर बैठे वर्ग तक भी जाना चाहिए अर्थात प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होनी चाहिए। क्योंकि जितने भी देश पदक तालिका में शीर्षस्थ देश हैं उनके यहां भारत की अपेक्षा प्रति व्यक्ति आय उच्च है। यद्यपि यह एक सिद्धांत नहीं है क्योंकि भारत से भी कम विकसित और कम आय वाले देश क्यूबा (208 पदक), केन्या (86 पदक) आदि भारत के पदों की संख्या (26) से आगे हैं।
वैश्विक खेल प्रतिस्पर्धा में भारत के लचर प्रदर्शन के पीछे सिर्फ आर्थिक कारण ही जिम्मेदार नहीं है, देश में खेलों के विकास के लिए आधारभूत संरचना का भी अभाव है। खेलों की आधारभूत संरचना से आशय खेल के लिए स्टेडियम, जिम, खेल की सामग्री, कोचिंग की सुविधा, कोच की पर्याप्त उपलब्धता तथा स्कूल स्तर से खेल ढांचे के विकास से है। भारत में इन सब का अभाव है। जहां चीन के पास लगभग 15 लाख खेल के मैदान व स्टेडियम, 44000 स्पोर्ट्स स्कूल, 46000 प्रोफेशनल एथलीट, 25000 कोच तथा 4 लाख के करीब छात्र ट्रेनिंग प्राप्त करते हैं। वही भारत में 100 से कुछ अधिक SAI सेंटरों में 1154 कोचों के द्वारा तकरीबन 11000 एथलीटों को कोचिंग दी जाती है। जबकि हजार से अधिक कोचों के पद खाली हैं। चीन का खेल बजट 3216 करोड़ है जबकि भारत का बजट चीन के बजट का मात्र 20% है। इसी प्रकार साई सेंटर में खिलाड़ियों को ₹175 प्रतिदिन दिया जाता है तथा कंपटीशन, किट, पढ़ाई, मेडिकल इंश्योरेंश आदि के लिए 12000 सालाना मिलता है। इस मामूली सी रकम से ओलंपिक जैसे कठिन प्रतिस्पर्धा में मेडल जीतने वाले खिलाड़ी कैसे तैयार किए जा सकते हैं? रही सही कसर खेल संघों की राजनीति ने निकाल दिया है।
भारतीय में खेल संघों का तिलिस्मी ढांचा है। हर खेल के अलग-अलग संघ और उनमें अलग-अलग विवाद और तुर्रा संघों पर राजनेताओं तथा नौकरशाहों की मजबूत केकड़ा पकड़। जिन्हें खेलों के बारे में शायद abcd भी मालूम नहीं है। यह भारतीय खेलों का दुर्भाग्य ही है, जिन संस्थानों पर देश में खेल के विकास का जिम्मा है उनकी कार्यकारिणी या गवर्निंग बॉडी में खिलाड़ियों की संख्या नगण्य होती है। इन संघों की संरचना का सबसे बड़ा खोट यह है कि इनके अध्यक्ष का कार्यकाल असीमित होता है तथा उनका खिलाड़ी होना भी आवश्यक नहीं है। यह संघ स्वायत्त हैं और यह अपनी स्वायत्तता का मनमाना अर्थ लगाते हैं, जो खेलों के बंटाधार का प्रमुख कारण है। इस संदर्भ में हमें चीन और अमेरिका से सीख लेने की आवश्यकता है। चीन में सारा खेल ढांचा सरकारी तंत्र के आधीन है जबकि अमेरिका में खेल संघ है लेकिन उन पर युक्ति युक्त सरकारी अंकुश है। अमेरिका में किसी भी पदाधिकारी को अपने पद पर 4 साल से अधिक रहने का अधिकार नहीं है।
इसके अलावा संघों के भीतर किसी खिलाड़ी विशेष से अतिशय लगाव तथा दूसरे के प्रति घृणा का भाव भी खेलों के विकास में बाधक है। यह अनायास नहीं है कि पहलवान नरसिंह यादव को अंत तक रियो जाने से रोकने का प्रयास किया गया। हालांकि कुछ खिलाड़ी अज्ञानतावश या डाइटिशियन की लापरवाही के शिकार हो जाते हैं।
अपने देश में खेल संस्कृति का भी अभाव है। यहां आज भी "खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब" की परिपाटी चल रही है। अमेरिका के दो विशेषज्ञों मेगन बुसे तथा डेन जॉनसन ने यह पुष्टि की है कि "देश में खेल परंपरा और माहौल भी बहुत हद तक तय करते हैं कि कोई देश कितने पदक जीतेगा"। जिस देश में नौजवान पढ़ाई लिखाई और कैरियर बनाने की चिंता में ही डूबे रहते हैं वहां पदक विजेता खिलाड़ी बमुश्किल तैयार होते हैं। जरूरत इस बात की है कि खेलों को भी कैरियर के विकल्प के रुप में विकसित किया जाये। चीन में 4 साल की उम्र से ही बच्चे की खेल प्रतिभा को पहचान कर स्पोर्ट्स स्कूलों में भेज दिया जाता है, जबकि भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। ऐसा करना भारत के लिए एक कठिन चुनौती भी है क्योंकि भारत में 5 साल से कम उम्र के 20% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं तथा 43% का वजन अपनी उम्र के अनुसार कम होता है। अतः सरकार को चाहिए कि वह अच्छी खेल नीति के साथ ही अच्छी स्वास्थ्य और शिक्षा नीति भी बनाये। यद्यपि यहां अच्छी योजनाओं की कोई कमी नहीं है तथापि उसके अच्छे क्रियान्वयन की दरकार है।
इन सारी दुश्वारियों, दुष्चिंताओं और समस्याओं के बावजूद भी भारतीय खिलाड़ियों ने अपनी अप्रतिम जीवटता का परिचय दिया है और सफलता की गाथा भी लिखा है। इस बार भी उर्जा से लबरेज युवा अपनी उसी जीवटता का परिचय देंगे और सफलता की गाथा लिखेंगे।
लेखक
विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
सहायक प्रवक्ता भूगोल
के. पी. उच्च शिक्षा संस्थान झलवा इलाहाबाद