Friday, 30 April 2021

क्यों रोते हो


मृत्यु से वही घबराता है जो जीवन को नहीं समझता, जो देह को ही जीवन समझता है। मृत्यु ही जीवन है और जीवन ही मृत्यु। देह जीवन नहीं है। जीवन इससे परे है। देह इस धरा का अंग था और यही रह जाता है। इसे जीवन समझने की भूल ही मृत्यु का कष्ट देती है। "जल में कुंभ कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, तत्व कहैं सब ज्ञानी।"

किस बात का रोना है? देह के लिये या उसके भीतर मौजूद परमात्मा के लिये। अगर देह के लिये रोना है तो वह तुम्हारे पास ही पड़ा है। अथवा इसके भीतर मौजूद परमात्मा के लिये रोना है? लेकिन जब वह इसमें मौजूद था तो आपने कभी सोंचा भी नहीं था उसके बारे में। फिर उसकी चिंता क्यों? यद्यपि वह अभी भी है, किसी और रूप में। क्यों रोते हैं फिर?


तुम इसलिए नहीं रोते कि अमुक मर गया बल्कि इसलिए रोते हो कि उसका मरना तुम्हें अपने मौत की आहट लगती है। तुम्हें लगता है "अब हमारी बारी है क्या?" मृत्यु के प्रति खौफ तुम्हें भयभीत करता है। फिर तुम उस परमात्मा को दोष देते हो, हे प्रभु रहम कर अब रुक जा! इतनी भी तल्खी क्यों है हम से……….

या फिर उससे जुड़ा स्वार्थ तुम्हें रुलाता है। अब मेरा क्या होगा रे? कौन ये करेगा? कौन वो करेगा? फिर धीरे-धीरे जब सब अपने ढर्रे पर आने लगता है तुम्हें उस अतीत में जाने वाले का ख्याल भी नहीं आता है। आता भी है तो फिर उस याद को झिड़क कर अलग खड़े हो जाते हो और अपने कार्य में मशरूफ।

@विनय नमन 🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️

ईश्वर निर्दोष है

ईश्वर किसी भी कृत्य के लिये निर्दोष है

ईश्वर एक नियम है। प्राकृतिक नियम। प्राकृतिक नियम सदा सर्वदा तटस्थ होते हैं। वे समदर्शी होते हैं। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। वह न तो किसी पर कोई विपत्ति थोपता है और न ही दूर करता है। न तो वह किसी के खरबों चढ़ावे से प्रसन्न होता है, न दीनता, दुखता या प्रार्थना से द्रवित होता है। उसे इससे भी फर्क नहीं पड़ता किसको पुत्र पैदा हुआ किसको पुत्री और किसका कौन सगा-संबंधी-अपना-पराया मरा। मनुष्य का आज का कर्म ही उसका प्रारब्ध है। मनुष्य अपने चयन का उत्पाद है। ईश्वर सदैव तटस्थ था, है और रहेगा।

यह हम ही होते हैं जो अपने समाज की बुराइयों, उसकी समस्याओं का समाधान करने हेतु प्रतिबद्ध हो जाते हैं। अगर हम उसे दूर ले जाते हैं तब यही समाज उस अमुक को महापुरुष या भगवान का दर्जा दे देता है। ये वही लोग होते हैं जो आम आदमी की क्षमता, कल्पना और शक्ति से परे काम कर जाते हैं। इनमें जो खास बात होती है वह है साहस, धैर्य, लगनशीलता। और सबसे बड़ी बात समाज के बुराई की समझ, संवेदना और उसे दूर करने की ललक। जो जितना ज्यादा अपने इस अभियान में सफल होता है वह उतना बड़ा और महान भगवान बना दिया जाता है।

कल्पना कीजिये कि राम ने अपने समय की अहम बुराई "रावण" और उससे संबंधित अन्य बुराइयों को न खत्म किया होता तो राम क्या होते? महज, एक था राजा और उसकी तीन रानियां। उनसे चार लड़के हुए लड़कों की शादी हुई, बच्चे पैदा किये, राज्य पर शासन किया और फिर सामान्य तरीके से प्राकृतिक मौत मर गये। कौन याद करता इस कहानी को? एक व्यक्ति भी नहीं। इतिहास में कहीं राम का नाम भी न होता। ऐसे हजारों राजा हुए, आये और गये। कहीं जिक्र तक नहीं है। 

ऐसे ही कृष्ण की कहानी ले लीजिये। कृष्ण को राम से भी बड़ा यानि 16 कला संपन्न भगवान क्यों कहा जाता है? क्योंकि उन्होंने समाज के लिये वह सब कुछ किया जो नहीं भी किया जा सकता था। उन्होंने लोगों को नयी जिंदगी देने के लिये, उन्हें सबक सिखाने के लिये, समाज में नयी मिसाल खड़ी करने के लिये हर सीमा को तोड़ दिया। हो गये वे भारतीय इतिहास के सबसे बड़े भगवान।

बुद्ध, महावीर, मुहम्मद, ईसा, गांधी, अंबेडकर, तिलक, भगतसिंह, आजाद आदि को कौन पूछता अगर उन्होेंने अपनी सीमाओं को नहीं तोड़ा होता? ये सभी इंसान ही थे। जब इंसान अपनी सीमा को लांघ जाता है तब वह भगवान हो जाता है और जब उसका पतन हो जाता है तब वह राक्षस हो जाता है।

हमारे आसपास हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं जो इंसान पैदा होने के बाद राक्षस हो गये। हिटलर, मुसोलिनी, रावण, कंस, लादेन आदि ऐसे ही राक्षस हैं। इनका विनाश हुआ। आज भी हमारे बीच लाखों - करोड़ों राक्षस, महाराक्षस घूम रहे हैं। बर्बरता की सारी हदें पार कर रहे हैं। आॅक्सीजन, जरूरी दवाइयों, दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुओं आदि की कालाबाजारी कर रहे हैं। लाश पर राजनीति कर रहे हैं।
हम ही लोग भगवान हैं और हम ही राक्षस। यह हमारे ऊपर निर्भर है हमें क्या बनना है। हम जो भी बने राक्षस या भगवान, उस परम शक्ति को रंचमात्र भी फर्क नहीं पड़ता। वह अपने तरीके से काम करती रही है, कर रही है और करेगी भी। वह कोई कार्य स्वयं करता ही नहीं। फिर दोष किस बात का? करते हम हैं। चाहे हम भगवान बने या राक्षस। हमें हमारी सारी प्रभुता छोड़कर यहीं जाना है। हम उसमें से बाल की नोक बराबर भी कुछ नहीं ले जा पायेंगे। हम भगवान बनकर जिस संसार या समाज के लिये अच्छा करेंगे वह भी हमें दफना या जला देगा या फिर राक्षस बनकर जिस समाज को नुकसान पहुंचा कर हम जिन अपनों का पोषण करेंगे, उनकी जिंदगी सुखी बनायेंगे वे भी हमें दफना या जला ही देंगे।

सारांशतः मनुष्य हैं हम, हम भगवान बनकर भी तुच्छ रहेंगे और राक्षस बनकर भी। फर्क बस इतना है कि अच्छा बनकर स्वयं को अच्छा लगता है और बुरा बनकर आत्मा पर एक बोझ बना रहता है। यही बोझ या खुशी लेकर हम मरते हैं। मरते समय अगर प्रसन्न चित्त मरे तो वही स्वर्ग का सुख मिल जाता है या फिर अगर ग्लानि से भरकर मरे तो मरते समय नर्क जैसा अनुभव होता है।

@विनय नमन 🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️

Friday, 23 April 2021

परतंत्रता प्रिय मनुष्य


मनुष्य स्वभावतः परतंत्रता प्रिय है।वह बातें तो स्वतंत्रता की करता है लेकिन परतंत्रता उसे सुखकर लगती है,सुरक्षा का भान करवाती है। उसने स्वयं को एक घर में कैद कर लिया और सुरक्षित अनुभव करने लगा।वह जिसे भी प्रेम(भौतिक स्तर)करता है उसे कैद करने की कोशिश करता है।पत्नी अगर पति को प्रेम करने लगी तो पति को शाम ढलने से पहले घर आ जाना चाहिए,किसी अन्य स्त्री से बात नहीं करना चाहिए।पति भी स्त्री के विषय में यही सोंचता है।माता-पिता पुत्र-पुत्री के विषय में यही सोंचते हैं।मनुष्य जब पशु-पक्षियों को प्रेम करता है तब उन्हें पिंजरे या जंजीर में जकड़ देता है।अगर वह ईश्वर को मानता है तो उन्हें भी मंदिर/मस्जिद/चर्च/गुरुद्वारा बना सलाखों के पीछे डाल देता है।आजादी का स्वाद न खुद चखा,न औरों को चखने दिया।@विनय नमन🙏🏻🧘🏻‍♂️

Wednesday, 21 April 2021

ईश्वर नियम है या नियम ही ईश्वर है

ईश्वर नियम है या नियम ही ईश्वर


ईश्वर नियम है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाये तो नियम ही ईश्वर है। प्रकृति में सर्वत्र नियम ही कार्य करते हैं। हम उसे जाने या न जाने, हम उसे अनुभव करें या न करें। नियम से परे इस ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है। सत्य जानने के हमेशा कई मार्ग रहे हैं। धर्म और विज्ञान इन्हीं नियमों की खोज में अपने-अपने तरीके से संलग्न हैं। ये भी महज एक मार्ग हैं। एक अंतर्मुखी (धर्म) है और दूसरा बहिर्मुखी (विज्ञान) है। दोनों एक ही सत्य तक पहुंचे हैं और पहुंचेंगे भी।

आप दीवार पर जिस बल से गेंद मारते हैं दीवार उसी गति से गेंद हमारी तरफ वापस मारता है। इसे "क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया का नियम" कह लीजिये। धर्म इसे "करनी-भरनी" का नियम कहता है। इसी से पुण्य-पाप भी सिद्ध होता है। आप कुछ भी करेंगे सद या असद आपको उसका प्रतिफल भुगतना ही पड़ेगा। विज्ञान कहता है कि ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। धर्म कहता है - "नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि.………" । विज्ञान कहता है कि संसार "जैव भू रासायनिक चक्र" से काम करता है और धर्म कहता है कि संसार में "आवागमन" लगा रहता है। विज्ञान कहता है कि संसार "इलेक्ट्रान, प्रोटाॅन और न्यूट्रॉन" से बना है और इनमें सदैव परिवर्तन होता रहता है। धर्म कहता है कि जगत का "सृजन, पालन पोषण और संहार" "ब्रह्मा, विष्णु और महेश" करते हैं। दोनों अंततः एक ही जगह पहुंचते हैं। इससे कतई फर्क़ नहीं पड़ता कि आप धर्म को नहीं मानते या विज्ञान को नहीं मानते। किसी को भी मत मानिये (यानि नास्तिक) आप नियम से परे नहीं जा सकते।

अगर आप संभलकर नहीं चलते तो इसके लिये गुरुत्वाकर्षण या फिर ईश्वर दोषी नहीं है। अगर आप बिना तैरने का नियम समझे नदी में तैरने जाते हैं और डूब जाते हैं तो दाब उत्प्लावकता का बल या फिर वरुण देवता दोषी नहीं हैं। अगर आप चाकू को जोर से अपनी छाती में घोंपते हैं तो आप उसे बनाने वाला पुर्तगाली मनुष्य या फिर शनि देवता को अपराधी नहीं ठहरा सकते।

सारांश यह है कि नियम सर्वत्र कार्य कर रहे हैं। नियमों/ईश्वर को इससे कतई असर नहीं पड़ेगा कि हम उससे अंजान हैं या फिर उसे कितने मूल्य का चढ़ावा चढ़ाते हैं। वह अपनी गति से कार्य करेगा। फिर क्यों लड़ते हो फर्जी भगवानों, अल्लाहों और गाॅडों के नाम पर? क्यों माथा रगड़ते हो मुर्दा कब्रों के सामने? अपने हृदय में करुणा का बीज बोओ, प्रेम का फूल खिलाओ और भाईचारे की लहलहाती फसल को देखकर आनन्दित होओ। अगर कहीं ईश्वर है तो वह तुम्हारी इस प्रसन्नता को देखकर फूला न समायेगा। उसकी अजस्र करूणा, प्रेम और कृपा तुम पर बरसेगी। तुम फिर से ईश्वरत्व से सराबोर हो जाओगे।तुम भी ईश्वरमय हो जाओगे।

@विनय नमन🙏🧘‍♂️

Sunday, 18 April 2021

पंथ

इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई सड़क पर दायें (जैसा कि अमेरिका में) चलता है या कोई बायें (जैसा कि भारत में)। मार्ग पर दायें या बायें चलना महत्त्वपूर्ण नहीं है और न ही मार्ग। तुम वाममार्गी हो या दक्षिण, यह महत्त्वपूर्ण नहीं।अगर वाममार्गी हुए तो तुम्हारा दायां मेरे लिए बायां है और अगर मैं दक्षिणमार्गी हूँ तो मेरा मेरा बायां तुम्हारे लिये दायां। मैं दक्षिणमार्गी होते हुए भी तुम्हारे लिये वामपंथी हुआ और तुम वामपंथी होते हुए भी मेरे लिये दक्षिणपंथी। लेकिन हम अपने आप में दक्षिणपंथी ही हैं या फिर इसका उल्टा भी। पंथ या दिशा महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण है पंथ पर चलना। सत्य तो अंततः एक ही है। और वह है "तुम्हारा सत्य"। बाकी सब सत्य तुम्हारे लिये असत्य हैं। वह किसी और का सत्य हो सकता है आपका नहीं।

अगर हम निश्चित तरफ से और निश्चित तरीके से चले तो आप अपने गंतव्य/सत्य तक पहुंच जायेगें। सत्य जानने के कई मार्ग हैं। आप शून्य से शुरू करके अनन्त तक पहुंच सकते हैं या फिर अनन्त से शुरु करके शून्य तक। अनन्त शून्य है और शून्य अनन्त। आगमनिक या निगमनिक कोई भी विधि अपनाइये। संसार वर्तुलाकार है। सूर्य, चंद्रमा, तारे, ग्रह, उपग्रह, जन्म-मृत्यु, हमारी संरचना सब कुछ। आप वर्तुल में चलकर सत्य को जान सकते हैं।


@विनय नमन 🙏🏻🧘🏻‍♂️

स्वयं की खोज

न तो आज जमीन पर हिंदू हैं, न मुसलमान, न बौद्ध। आज कैदी हैं। कोई हिंदू कैदखाने में है, कोई मुसलमान कैदखाने में है, कोई जैन कैदखाने में है।
कैदखाना इसलिए कहता हूं कि आपने कभी सोचा ही नहीं कि आपको जैन होना है, कि हिंदू होना है, कि मुसलमान होना है। आपने चुना नहीं है। यह आपकी गुलामी है। लेकिन गुलामी इतनी सूक्ष्म है कि आपको पता नहीं चलता, क्योंकि आपके होश में नहीं डाली गई है। जब आप बेहोश थे, तब यह गुलामी, यह जंजीर आपके हाथ में पहना दी गई। जब आपको होश आया तो आपने जंजीर अपने हाथ में ही पाई। और इसे जंजीर भी नहीं कहा जाता है। इसे आपके मां बाप ने, परिवार ने, समाज ने समझाया है कि यह आभूषण है! आप इसको सम्हालते हैं, कोई तोड़ न दे। यह आभूषण है और बड़ा कीमती है, आप इसके लिए जान लगा देंगे।

एक बड़े मजे की घटना घटती है। अगर हिंदू धर्म पर खतरा हो तो आप अपनी जान लगा सकते हैं। आप हिंदू धर्म, मुसलमान या ईसाई, किसी भी धर्म के लिए मर सकते हैं, लेकिन जी नहीं सकते। अगर आपसे कहा जाए कि जीवन हिंदू की तरह जीयो, तो आप जीने को राजी नहीं हैं। मुसलमान की तरह जीयो, जीने को राजी नहीं हैं। लेकिन अगर झगड़ा-फसाद हो तो आप मरने के लिए राजी हैं! वह आदमी हिंदू धर्म के लिए मरने के लिए राजी है, जो हिंदू धर्म के लिए जीने के लिए कभी राजी नहीं था! क्या मामला है?

कहीं कोई रोग है, कहीं कोई बीमारी है। जीने के लिए हमारी कोई उत्सुकता नहीं है। मार-काट के लिए हम उत्सुक हो जाते हैं। क्योंकि जैसे ही कोई हमारे धर्म पर हमला करता है, हमें होश ही नहीं रह जाता। वह हमारा बेहोश हिस्सा है, जिस पर हमला किया जा रहा है।

इसलिए जब भी हिंदू-मुसलमान लड़ते हैं, तो आप यह मत समझना कि वे होश में लड़ रहे हैं। वे बेहोशी में लड़ रहे हैं। बेहोशी में वे हिंदू-मुसलमान हैं, होश में नहीं हैं। इसलिए कोई भी उनके अचेतन मन को चोट कर दे, तो बस वे पागल हो जाएंगे। न तो हिंदू लड़ते हैं, न मुसलमान लड़ते हैं-पागल लड़ते हैं। कोई हिंदू मार्का पागल है। कोई मुसलमान मार्का पागल है। यह मार्कों का फर्क है, लेकिन पागल है।

और आपके भीतर धर्म उस समय डाला जाता है, जब तर्क की कोई क्षमता नहीं होती।

इसलिए मैं कहता हूं कि यह सबसे बड़ा पाप है। और जब तक यह पाप बंद नहीं होता, जब तक हम प्रत्येक व्यक्ति को अपने मार्ग की खोज की स्वतंत्रता नहीं देते, तब तक दुनिया धार्मिक नहीं हो सकेगी। क्योंकि धार्मिक होने के लिए स्वयं का निर्णय चाहिए।

@विनय नमन🙏🧘‍♂️

Saturday, 17 April 2021

शेरों की सभ्यता


शेर को आदमियों ने पिंजरे में कैद कर दिया। उसे बिजली के झटके दे दे कर सभ्य बनाया। कैसे उठना है, कैसे बैठना है, कैसे चलना है, कैसे खाना है आदि। बच्चे पैदा करने के लिये शेर का प्राकृतिक सहवास छीन कर कृत्रिम गर्भ धारण कराया गया। जिस तरह से शेरों की आबादी खत्म होने की ओर है, उस अनुपात में अगर यह मान लिया जाये कि आने पांच-छः सौ सालों में शेर खत्म हो जायें। केवल चिड़ियाघरों, सर्कसों में पाले गये शेर ही बचे। तो आप किस प्रकार के शेर होने की उम्मीद करते हैं?

लेकिन आपने किताबों में एक ऐसे शेर के बारे में लिखा है जो आक्रामक, शिकारी और जंगल का राजा हुआ करता था। जब आपका बच्चा छः सौ साल या हजार साल बाद आपकी इस बात को पढ़ेगा तब वह आपके बारे में, आपकी इस किंवदन्ती के बारे में क्या सोंचेगा? उसे यह सब एक दंतकथा लगेगी। उसे शेर-सभ्यता के पतन की कहानी नहीं मालूम है। क्योंकि उसके सामने दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाला शेर, पिंजरे में भीगी बिल्ली सा शेर, हंटर की मार से मिमियाने वाला शेर, लोगों के लिये तमाशा बना, शेर दिख रहा है।

ठीक इसी तरह हमारी भारतीय सभ्यता का हाल है। मुसलमानों, मुगलों, गोरों ने हमें गुलाम बनाकर, पिंजरे में कैद करके रखा। हंटर, चाबुक की मार से हमें विवश किया। हमारी सभ्यता की निशानियों को गिन गिन कर मिटाया। हमें एक शेर से भीगी बिल्ली बना दिया। हजारों सालों की गुलामी ने उस सभ्यता का पतन कर दिया, जो आज की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक विकसित थी। जिसमें आज की तुलना सैकड़ों गुना अधिक घातक अस्त्र-शस्त्र थे, हजार गुना अधिक विकसित तकनीक थी और वो सभ्यता विकास के चरम पर थी। आज जब किताबों में हम और हमारे बच्चे, तथाकथित आधुनिक और सभ्य लोग जब इन आख्यानों को पढ़ते हैं तब उन्हें यह दंतकथा प्रतीत होती है। बौद्धिक जुगाली और ब्राह्मणों का प्रपंच प्रतीत होता है। लेकिन उन्हें कौन समझाये कि यह दंतकथा नहीं तुम्हारी और तुम्हारे पूर्वजों के कृत्यों की महागाथा है। तुम भीगी बिल्ली नहीं शेर हो।

इस महापरिवर्तन के लिये, पिंजरे में कैद शेरों को उनका शेरत्व याद कराने के लिये एक ऐसे शेर की आवश्यकता जो सचमुच जंगल का राजा हो। शिकार करता हो। उसकी शक्ल भी शेरों से मिलती हो। फिर वह उन्हें उन पिंजरों से मुक्त कराये। उन्हें जंगल में ले जाये और दिखाये यह है तुम्हारा साम्राज्य, यह तुम्हारे शिकार का हुनर।

भारतीयों को भी उनका गौरवशाली इतिहास याद दिलाने, उन्हें फिर वही उन्नत तकनीक, मंत्र-यंत्र विज्ञान समझाने उसकी प्रासंगिकता को सिद्ध करने वाले, एक महापुरुष की जरूरत है। जो खुद भी इन सबको बखूबी जानता है। जो सिद्ध कर सके अपने आपको, अपनी भारतीय तकनीकी को। लेकिन दुर्भाग्य यही है कि अभी तक कोई ऐसा शेर नहीं आया। जो आये भी वे खुद ही भ्रमित हैं। आधे-अधूरे ज्ञान वाले हैं। वे भारतीयता की प्रासंगिकता को सिद्ध करने में असमर्थ हैं। भारतीयता और उसकी गौरवशाली परंपरा को दिखाने, समझाने, बताने वाले करोड़ में से निन्यानबे लाख निन्यानबे हजार नौ सौ निन्यानबे लोग फर्जी हैं। धोखेबाज हैं। इससे हमारी गौरवशाली परंपरा, उन्नत तकनीक, विलक्षण विज्ञान और भी कलुषित, दूषित और निंदा का पात्र हुआ है। यह लोग गौरवमयी भारतीयता के दुश्मन ही सिद्ध हुए हैं और हो रहे हैं। इन विकट परिस्थितियों में आशा की एक ज्योति तो जलनी चाहिये लेकिन कहाँ से? और कब?……………

©विन्ध्येश्वरी

Saturday, 10 April 2021

कहत कठिन समुझत कठिन

कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक।होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥(रामचरित मानस-उत्तरकांड,118 ख)
भावार्थ
पहले तो ज्ञान/विवेक/बात कहना ही कठिन है क्योंकि जो हम सोंचते हैं जरूरी नहीं है उसे सही तरह,सही शब्द,सही रूप में प्रकट कर सकें।फिर अगर किसी तरह से कह भी दिया जाये तो समझना कठिन है क्योंकि आदमी वही समझता है जितना वह समझना चाहता है,जितना उसका विवेक,ज्ञान,अनुभव,संस्कार आदि होता है।किंतु अगर समझ भी लिया तो फिर उसे साधना कठिन है।यानि उसका कार्य रूप में परिणत होना कठिन है और यदि संयोगवश(घुणाक्षर न्याय से)कभी हो भी जाये तो हूबहू होना तो बिल्कुल ही कठिन है।@विनय नमन 🙏🏻🧘🏻‍♂️

युद्ध क्यों होते हैं?

युद्ध क्यों होते हैं?




दो दुनियाएं हैं। जहां दो व्यक्ति मिलते हैं, वहां दो संसार मिलते हैं। और जब दो संसार करीब आते हैं, तो उपद्रव होता है; क्योंकि दोनों भिन्न हैं।

मुल्ला नसरुद्दीन का छोटा बच्चा जिसका नाम रमजान है, घर के लोग उसे रमजू कहते हैं वह इतिहास की किताब पढ़ रहा था। अचानक उसने आंख उठाई और अपने पिता से कहा, “पापा, युद्धों का वर्णन है इतिहास में…युद्ध शुरू कैसे होते हैं?’

पिता ने कहा, “समझो कि पाकिस्तान हिंदुस्तान पर हमला कर दे। मान लो……।’

इतना बोलना था कि चौके से पत्नी ने कहा, “यह बात गलत है। पाकिस्तान कभी हिंदुस्तान पर हमला नहीं कर सकता और न कभी पाकिस्तान ने हिंदुस्तान पर हमला करना चाहा है। पाकिस्तान तो एक शांत इस्लामी देश है। तुम बात गलत कह रहे हो।’

मुल्ला थोड़ा चौंका। उसने कहा कि मैं कह रहा हूं, सिर्फ समझ लो। सपोज…। मैं कोई यह नहीं कह रहा हूं कि युद्ध हो रहा है और पाकिस्तान ने हमला कर दिया है; मैं तो सिर्फ समझाने के लिए कह रहा हूं कि मान लो…।

पत्नी ने कहा, “जो बात हो ही नहीं सकती, उसे मानो क्यों? तुम गलत राजनीति बच्चे के मन में डाल रहे हो। तुम पहले से ही पाकिस्तान विरोधी हो, और इस्लाम से ही तुम्हारा मन तालमेल नहीं खाता। तुम ठीक मुसलमान नहीं हो। और तुम लड़के के मन में राजनीति डाल रहे हो, और गलत राजनीति डाल रहे हो। यह मैं न होने दूंगी।’

वह रोटी बना रही थी, अपना बेलन लिए बाहर निकल आई। उसे बेलन लिए देखकर मुल्ला ने अपना डंडा उठा लिया। उस छोटे बच्चे ने कहा, “पापा रुको, मैं समझ गया कि युद्ध कैसे शुरू करते हैं। अब कुछ और समझाने की जरूरत नहीं है।’

जहां दो व्यक्ति हैं, जैसे ही उनका करीब आना शुरू हुआ कि युद्ध की संभावना शुरू हो गई। दो संसार हैं; उनके अलग अलग सोचने के ढंग हैं; अलग अलग देखने के ढंग हैं; अलग उनकी धारणाएं हैं; अलग परिवेश में वे पले हैं; अलग अलग लोगों ने उन्हें निर्मित किया है; अलग अलग उनके धर्म हैं, अलग अलग राजनीति है; अलग अलग मन हैं सारसंक्षिप्त। और जहां अलग अलग मन हैं, वहां प्रेम संभव नहीं वहां कलह ही संभव है।

 इसलिए तो संसार में इतनी कठिनाई है प्रेमी खोजने में। मित्र खोजना असंभव मालूम होता है। मित्र में भी छिपे हुए शत्रु मिलते हैं। और प्रेमी में भी कलह की ही शुरूआत होती है।

दो संसार कभी भी शांति से नहीं रह सकते।

उसका कारण?

एक संसार भी अपने भीतर कभी शांति से नहीं रह सकता; दो मिलकर अशांति दुगुनी हो जाती है।

तुम अकेले भी कहां शांत हो? तुम्हारा मन वहां भी अशांति पैदा किए हुए है। फिर जब दोनों मिलते हैं तो अशांति दुगुनी हो जाती है।

जितनी ज्यादा भीड़ होती जाती है उतनी अशांति सघन होती जाती है, क्योंकि उतने ही कलह में पड़ जाते हैं।

जिस दिन तुम इस सत्य को देख पाओगे कि तुम्हारा संसार तुम्हारे भीतर है और तुम उसी संसार के आधार पर बाहर की खूंटियों पर संसार निर्मित कर रहे हो। इसलिए सवाल बाहर के संसार को छोड़कर भाग जाने का नहीं है; भीतर के संसार को छोड़ देने का है तब तुम कहीं भी रहो, तुम जहां भी होओगे, तुम वहीं सन्यस्थ हो। तुम कैसे भी रहो महल में या झोपड़ी में, बाजार में या आश्रम में, कोई फर्क न पड़ेगा। तुम्हारे भीतर से जो भ्रांति का सूत्र था, वह हट गया।

@विनय नमन 🙏🧘‍♂️

प्रत्यक्षवाद का असली प्रवर्तक

प्रत्यक्षवाद का असली प्रवर्तक
अभी तक हम किताबों में यह पढ़ते आये हैं कि प्रत्यक्षवाद का जनक आगस्ट काम्टे को माना जाता है। मेरा मत है कि यह सरासर झूठ है। विश्व में प्रत्यक्षवाद के सिद्धांत का प्रथम प्रतिपादन चार्वाक द्वारा किया गया। चार्वाक दर्शन में प्रत्यक्षवाद के प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित हैं। जैसे -
1- चार्वाक दर्शन में शरीर का निर्माण 4 महाभूतों - पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु से माना जाता है। यानी शरीर निर्माण के पंचमहाभूत सिद्धांत में आकाश तत्व जो कि प्रत्यक्षतः ज्ञेय नहीं है उसे शरीर के निर्माण का घटक नहीं माना गया है।
2- चार्वाक दर्शन का प्रसिद्ध कथन - "यावत जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनः कुतः॥" अर्थात् जब तक जीओ सुख से जिओ भले ही उधार लेकर घी पीओ, क्योंकि शरीर के जल जाने के बाद पुनः आगमन कहाँ होता है?" इस पंक्ति से प्रत्यक्षवाद का स्पष्ट प्रमाण प्राप्त होता है। इसका मानना है "जो है अभी है, बाद में कौन देखता है, कौन जानता है।"
3- चार्वाक दर्शन में ज्ञान के दो प्रकार भी बताये गये हैं -
• बाह्य प्रत्यक्ष
• मानस प्रत्यक्ष
यानी हम किसी चीज के बारे में दो तरह से जान सकते हैं एक तो प्रत्यक्ष देखकर और दूसरा उसके बारे में अनुमान करके। जैसे -
• पर्वत पर आग है। (अनुमान)
• क्योंकि वहाँ धुआं है। (प्रत्यक्ष)
• जहां आग होता है वहाँ धुआं होता है (निष्कर्ष)
• पर्वत पर धुआं है (प्रत्यक्ष)
• अतः वहाँ आग है (अनुमान)
उपर्युक्त 5 कथनों से यह निष्कर्ष निकलता है कि
• एक प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर हम निष्कर्ष निकालते हैं।
• कुछ अनुमानों के आधार पर हम निष्कर्ष निकलाते हैं।
इस सिद्धांत में चार्वाक दर्शन ने प्रत्यक्ष ज्ञान को ही ज्ञान असली आधार मानने पर जोर दिया है।
4- चार्वाक के अनुसार - शब्द ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं है क्योंकि वह या विश्वसनीय पुरुष के वचनों पर आधारित है या फिर विश्वसनीय शास्त्र पर। किंतु शब्द श्रवण का विषय है और श्रवण विभिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसके अलावा विश्वसनीय पुरुष या शास्त्र भी महज एक अनुमान है। आखिर इनकी विश्वसनीयता का आधार क्या है। यह महज एक अनुमान है। अतः शब्द प्रत्यक्ष ज्ञान का उपाय नहीं है।
5- इन्होंने इसी आधार पर स्वर्ग, नर्क, ईश्वर, वेद आदि को अप्रामाणिक माना है।

अस्तु उक्त तर्काधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षवाद का जनक कांट नहीं बल्कि चार्वाक हैं। क्योंकि कांट (18वीं शदी) से बहुत पहले चार्वाक (चौथी शदी ई. पू.) ने प्रबल रूप से प्रत्यक्षवाद को परिभाषित वा स्पष्ट किया था।

©विन्ध्येश्वरी