इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई सड़क पर दायें (जैसा कि अमेरिका में) चलता है या कोई बायें (जैसा कि भारत में)। मार्ग पर दायें या बायें चलना महत्त्वपूर्ण नहीं है और न ही मार्ग। तुम वाममार्गी हो या दक्षिण, यह महत्त्वपूर्ण नहीं।अगर वाममार्गी हुए तो तुम्हारा दायां मेरे लिए बायां है और अगर मैं दक्षिणमार्गी हूँ तो मेरा मेरा बायां तुम्हारे लिये दायां। मैं दक्षिणमार्गी होते हुए भी तुम्हारे लिये वामपंथी हुआ और तुम वामपंथी होते हुए भी मेरे लिये दक्षिणपंथी। लेकिन हम अपने आप में दक्षिणपंथी ही हैं या फिर इसका उल्टा भी। पंथ या दिशा महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण है पंथ पर चलना। सत्य तो अंततः एक ही है। और वह है "तुम्हारा सत्य"। बाकी सब सत्य तुम्हारे लिये असत्य हैं। वह किसी और का सत्य हो सकता है आपका नहीं।
अगर हम निश्चित तरफ से और निश्चित तरीके से चले तो आप अपने गंतव्य/सत्य तक पहुंच जायेगें। सत्य जानने के कई मार्ग हैं। आप शून्य से शुरू करके अनन्त तक पहुंच सकते हैं या फिर अनन्त से शुरु करके शून्य तक। अनन्त शून्य है और शून्य अनन्त। आगमनिक या निगमनिक कोई भी विधि अपनाइये। संसार वर्तुलाकार है। सूर्य, चंद्रमा, तारे, ग्रह, उपग्रह, जन्म-मृत्यु, हमारी संरचना सब कुछ। आप वर्तुल में चलकर सत्य को जान सकते हैं।
@विनय नमन 🙏🏻🧘🏻♂️
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