कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक।होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥(रामचरित मानस-उत्तरकांड,118 ख)
भावार्थ
पहले तो ज्ञान/विवेक/बात कहना ही कठिन है क्योंकि जो हम सोंचते हैं जरूरी नहीं है उसे सही तरह,सही शब्द,सही रूप में प्रकट कर सकें।फिर अगर किसी तरह से कह भी दिया जाये तो समझना कठिन है क्योंकि आदमी वही समझता है जितना वह समझना चाहता है,जितना उसका विवेक,ज्ञान,अनुभव,संस्कार आदि होता है।किंतु अगर समझ भी लिया तो फिर उसे साधना कठिन है।यानि उसका कार्य रूप में परिणत होना कठिन है और यदि संयोगवश(घुणाक्षर न्याय से)कभी हो भी जाये तो हूबहू होना तो बिल्कुल ही कठिन है।@विनय नमन 🙏🏻🧘🏻♂️
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