Wednesday, 21 April 2021

ईश्वर नियम है या नियम ही ईश्वर है

ईश्वर नियम है या नियम ही ईश्वर


ईश्वर नियम है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाये तो नियम ही ईश्वर है। प्रकृति में सर्वत्र नियम ही कार्य करते हैं। हम उसे जाने या न जाने, हम उसे अनुभव करें या न करें। नियम से परे इस ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है। सत्य जानने के हमेशा कई मार्ग रहे हैं। धर्म और विज्ञान इन्हीं नियमों की खोज में अपने-अपने तरीके से संलग्न हैं। ये भी महज एक मार्ग हैं। एक अंतर्मुखी (धर्म) है और दूसरा बहिर्मुखी (विज्ञान) है। दोनों एक ही सत्य तक पहुंचे हैं और पहुंचेंगे भी।

आप दीवार पर जिस बल से गेंद मारते हैं दीवार उसी गति से गेंद हमारी तरफ वापस मारता है। इसे "क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया का नियम" कह लीजिये। धर्म इसे "करनी-भरनी" का नियम कहता है। इसी से पुण्य-पाप भी सिद्ध होता है। आप कुछ भी करेंगे सद या असद आपको उसका प्रतिफल भुगतना ही पड़ेगा। विज्ञान कहता है कि ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। धर्म कहता है - "नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि.………" । विज्ञान कहता है कि संसार "जैव भू रासायनिक चक्र" से काम करता है और धर्म कहता है कि संसार में "आवागमन" लगा रहता है। विज्ञान कहता है कि संसार "इलेक्ट्रान, प्रोटाॅन और न्यूट्रॉन" से बना है और इनमें सदैव परिवर्तन होता रहता है। धर्म कहता है कि जगत का "सृजन, पालन पोषण और संहार" "ब्रह्मा, विष्णु और महेश" करते हैं। दोनों अंततः एक ही जगह पहुंचते हैं। इससे कतई फर्क़ नहीं पड़ता कि आप धर्म को नहीं मानते या विज्ञान को नहीं मानते। किसी को भी मत मानिये (यानि नास्तिक) आप नियम से परे नहीं जा सकते।

अगर आप संभलकर नहीं चलते तो इसके लिये गुरुत्वाकर्षण या फिर ईश्वर दोषी नहीं है। अगर आप बिना तैरने का नियम समझे नदी में तैरने जाते हैं और डूब जाते हैं तो दाब उत्प्लावकता का बल या फिर वरुण देवता दोषी नहीं हैं। अगर आप चाकू को जोर से अपनी छाती में घोंपते हैं तो आप उसे बनाने वाला पुर्तगाली मनुष्य या फिर शनि देवता को अपराधी नहीं ठहरा सकते।

सारांश यह है कि नियम सर्वत्र कार्य कर रहे हैं। नियमों/ईश्वर को इससे कतई असर नहीं पड़ेगा कि हम उससे अंजान हैं या फिर उसे कितने मूल्य का चढ़ावा चढ़ाते हैं। वह अपनी गति से कार्य करेगा। फिर क्यों लड़ते हो फर्जी भगवानों, अल्लाहों और गाॅडों के नाम पर? क्यों माथा रगड़ते हो मुर्दा कब्रों के सामने? अपने हृदय में करुणा का बीज बोओ, प्रेम का फूल खिलाओ और भाईचारे की लहलहाती फसल को देखकर आनन्दित होओ। अगर कहीं ईश्वर है तो वह तुम्हारी इस प्रसन्नता को देखकर फूला न समायेगा। उसकी अजस्र करूणा, प्रेम और कृपा तुम पर बरसेगी। तुम फिर से ईश्वरत्व से सराबोर हो जाओगे।तुम भी ईश्वरमय हो जाओगे।

@विनय नमन🙏🧘‍♂️

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