Saturday, 17 April 2021

शेरों की सभ्यता


शेर को आदमियों ने पिंजरे में कैद कर दिया। उसे बिजली के झटके दे दे कर सभ्य बनाया। कैसे उठना है, कैसे बैठना है, कैसे चलना है, कैसे खाना है आदि। बच्चे पैदा करने के लिये शेर का प्राकृतिक सहवास छीन कर कृत्रिम गर्भ धारण कराया गया। जिस तरह से शेरों की आबादी खत्म होने की ओर है, उस अनुपात में अगर यह मान लिया जाये कि आने पांच-छः सौ सालों में शेर खत्म हो जायें। केवल चिड़ियाघरों, सर्कसों में पाले गये शेर ही बचे। तो आप किस प्रकार के शेर होने की उम्मीद करते हैं?

लेकिन आपने किताबों में एक ऐसे शेर के बारे में लिखा है जो आक्रामक, शिकारी और जंगल का राजा हुआ करता था। जब आपका बच्चा छः सौ साल या हजार साल बाद आपकी इस बात को पढ़ेगा तब वह आपके बारे में, आपकी इस किंवदन्ती के बारे में क्या सोंचेगा? उसे यह सब एक दंतकथा लगेगी। उसे शेर-सभ्यता के पतन की कहानी नहीं मालूम है। क्योंकि उसके सामने दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाला शेर, पिंजरे में भीगी बिल्ली सा शेर, हंटर की मार से मिमियाने वाला शेर, लोगों के लिये तमाशा बना, शेर दिख रहा है।

ठीक इसी तरह हमारी भारतीय सभ्यता का हाल है। मुसलमानों, मुगलों, गोरों ने हमें गुलाम बनाकर, पिंजरे में कैद करके रखा। हंटर, चाबुक की मार से हमें विवश किया। हमारी सभ्यता की निशानियों को गिन गिन कर मिटाया। हमें एक शेर से भीगी बिल्ली बना दिया। हजारों सालों की गुलामी ने उस सभ्यता का पतन कर दिया, जो आज की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक विकसित थी। जिसमें आज की तुलना सैकड़ों गुना अधिक घातक अस्त्र-शस्त्र थे, हजार गुना अधिक विकसित तकनीक थी और वो सभ्यता विकास के चरम पर थी। आज जब किताबों में हम और हमारे बच्चे, तथाकथित आधुनिक और सभ्य लोग जब इन आख्यानों को पढ़ते हैं तब उन्हें यह दंतकथा प्रतीत होती है। बौद्धिक जुगाली और ब्राह्मणों का प्रपंच प्रतीत होता है। लेकिन उन्हें कौन समझाये कि यह दंतकथा नहीं तुम्हारी और तुम्हारे पूर्वजों के कृत्यों की महागाथा है। तुम भीगी बिल्ली नहीं शेर हो।

इस महापरिवर्तन के लिये, पिंजरे में कैद शेरों को उनका शेरत्व याद कराने के लिये एक ऐसे शेर की आवश्यकता जो सचमुच जंगल का राजा हो। शिकार करता हो। उसकी शक्ल भी शेरों से मिलती हो। फिर वह उन्हें उन पिंजरों से मुक्त कराये। उन्हें जंगल में ले जाये और दिखाये यह है तुम्हारा साम्राज्य, यह तुम्हारे शिकार का हुनर।

भारतीयों को भी उनका गौरवशाली इतिहास याद दिलाने, उन्हें फिर वही उन्नत तकनीक, मंत्र-यंत्र विज्ञान समझाने उसकी प्रासंगिकता को सिद्ध करने वाले, एक महापुरुष की जरूरत है। जो खुद भी इन सबको बखूबी जानता है। जो सिद्ध कर सके अपने आपको, अपनी भारतीय तकनीकी को। लेकिन दुर्भाग्य यही है कि अभी तक कोई ऐसा शेर नहीं आया। जो आये भी वे खुद ही भ्रमित हैं। आधे-अधूरे ज्ञान वाले हैं। वे भारतीयता की प्रासंगिकता को सिद्ध करने में असमर्थ हैं। भारतीयता और उसकी गौरवशाली परंपरा को दिखाने, समझाने, बताने वाले करोड़ में से निन्यानबे लाख निन्यानबे हजार नौ सौ निन्यानबे लोग फर्जी हैं। धोखेबाज हैं। इससे हमारी गौरवशाली परंपरा, उन्नत तकनीक, विलक्षण विज्ञान और भी कलुषित, दूषित और निंदा का पात्र हुआ है। यह लोग गौरवमयी भारतीयता के दुश्मन ही सिद्ध हुए हैं और हो रहे हैं। इन विकट परिस्थितियों में आशा की एक ज्योति तो जलनी चाहिये लेकिन कहाँ से? और कब?……………

©विन्ध्येश्वरी

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