मृत्यु से वही घबराता है जो जीवन को नहीं समझता, जो देह को ही जीवन समझता है। मृत्यु ही जीवन है और जीवन ही मृत्यु। देह जीवन नहीं है। जीवन इससे परे है। देह इस धरा का अंग था और यही रह जाता है। इसे जीवन समझने की भूल ही मृत्यु का कष्ट देती है। "जल में कुंभ कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, तत्व कहैं सब ज्ञानी।"
किस बात का रोना है? देह के लिये या उसके भीतर मौजूद परमात्मा के लिये। अगर देह के लिये रोना है तो वह तुम्हारे पास ही पड़ा है। अथवा इसके भीतर मौजूद परमात्मा के लिये रोना है? लेकिन जब वह इसमें मौजूद था तो आपने कभी सोंचा भी नहीं था उसके बारे में। फिर उसकी चिंता क्यों? यद्यपि वह अभी भी है, किसी और रूप में। क्यों रोते हैं फिर?
तुम इसलिए नहीं रोते कि अमुक मर गया बल्कि इसलिए रोते हो कि उसका मरना तुम्हें अपने मौत की आहट लगती है। तुम्हें लगता है "अब हमारी बारी है क्या?" मृत्यु के प्रति खौफ तुम्हें भयभीत करता है। फिर तुम उस परमात्मा को दोष देते हो, हे प्रभु रहम कर अब रुक जा! इतनी भी तल्खी क्यों है हम से……….
या फिर उससे जुड़ा स्वार्थ तुम्हें रुलाता है। अब मेरा क्या होगा रे? कौन ये करेगा? कौन वो करेगा? फिर धीरे-धीरे जब सब अपने ढर्रे पर आने लगता है तुम्हें उस अतीत में जाने वाले का ख्याल भी नहीं आता है। आता भी है तो फिर उस याद को झिड़क कर अलग खड़े हो जाते हो और अपने कार्य में मशरूफ।
@विनय नमन 🙏🙏🧘♂️🧘♂️
No comments:
Post a Comment