Saturday, 10 April 2021

प्रत्यक्षवाद का असली प्रवर्तक

प्रत्यक्षवाद का असली प्रवर्तक
अभी तक हम किताबों में यह पढ़ते आये हैं कि प्रत्यक्षवाद का जनक आगस्ट काम्टे को माना जाता है। मेरा मत है कि यह सरासर झूठ है। विश्व में प्रत्यक्षवाद के सिद्धांत का प्रथम प्रतिपादन चार्वाक द्वारा किया गया। चार्वाक दर्शन में प्रत्यक्षवाद के प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित हैं। जैसे -
1- चार्वाक दर्शन में शरीर का निर्माण 4 महाभूतों - पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु से माना जाता है। यानी शरीर निर्माण के पंचमहाभूत सिद्धांत में आकाश तत्व जो कि प्रत्यक्षतः ज्ञेय नहीं है उसे शरीर के निर्माण का घटक नहीं माना गया है।
2- चार्वाक दर्शन का प्रसिद्ध कथन - "यावत जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनः कुतः॥" अर्थात् जब तक जीओ सुख से जिओ भले ही उधार लेकर घी पीओ, क्योंकि शरीर के जल जाने के बाद पुनः आगमन कहाँ होता है?" इस पंक्ति से प्रत्यक्षवाद का स्पष्ट प्रमाण प्राप्त होता है। इसका मानना है "जो है अभी है, बाद में कौन देखता है, कौन जानता है।"
3- चार्वाक दर्शन में ज्ञान के दो प्रकार भी बताये गये हैं -
• बाह्य प्रत्यक्ष
• मानस प्रत्यक्ष
यानी हम किसी चीज के बारे में दो तरह से जान सकते हैं एक तो प्रत्यक्ष देखकर और दूसरा उसके बारे में अनुमान करके। जैसे -
• पर्वत पर आग है। (अनुमान)
• क्योंकि वहाँ धुआं है। (प्रत्यक्ष)
• जहां आग होता है वहाँ धुआं होता है (निष्कर्ष)
• पर्वत पर धुआं है (प्रत्यक्ष)
• अतः वहाँ आग है (अनुमान)
उपर्युक्त 5 कथनों से यह निष्कर्ष निकलता है कि
• एक प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर हम निष्कर्ष निकालते हैं।
• कुछ अनुमानों के आधार पर हम निष्कर्ष निकलाते हैं।
इस सिद्धांत में चार्वाक दर्शन ने प्रत्यक्ष ज्ञान को ही ज्ञान असली आधार मानने पर जोर दिया है।
4- चार्वाक के अनुसार - शब्द ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं है क्योंकि वह या विश्वसनीय पुरुष के वचनों पर आधारित है या फिर विश्वसनीय शास्त्र पर। किंतु शब्द श्रवण का विषय है और श्रवण विभिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसके अलावा विश्वसनीय पुरुष या शास्त्र भी महज एक अनुमान है। आखिर इनकी विश्वसनीयता का आधार क्या है। यह महज एक अनुमान है। अतः शब्द प्रत्यक्ष ज्ञान का उपाय नहीं है।
5- इन्होंने इसी आधार पर स्वर्ग, नर्क, ईश्वर, वेद आदि को अप्रामाणिक माना है।

अस्तु उक्त तर्काधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षवाद का जनक कांट नहीं बल्कि चार्वाक हैं। क्योंकि कांट (18वीं शदी) से बहुत पहले चार्वाक (चौथी शदी ई. पू.) ने प्रबल रूप से प्रत्यक्षवाद को परिभाषित वा स्पष्ट किया था।

©विन्ध्येश्वरी

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