Friday, 30 April 2021

ईश्वर निर्दोष है

ईश्वर किसी भी कृत्य के लिये निर्दोष है

ईश्वर एक नियम है। प्राकृतिक नियम। प्राकृतिक नियम सदा सर्वदा तटस्थ होते हैं। वे समदर्शी होते हैं। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। वह न तो किसी पर कोई विपत्ति थोपता है और न ही दूर करता है। न तो वह किसी के खरबों चढ़ावे से प्रसन्न होता है, न दीनता, दुखता या प्रार्थना से द्रवित होता है। उसे इससे भी फर्क नहीं पड़ता किसको पुत्र पैदा हुआ किसको पुत्री और किसका कौन सगा-संबंधी-अपना-पराया मरा। मनुष्य का आज का कर्म ही उसका प्रारब्ध है। मनुष्य अपने चयन का उत्पाद है। ईश्वर सदैव तटस्थ था, है और रहेगा।

यह हम ही होते हैं जो अपने समाज की बुराइयों, उसकी समस्याओं का समाधान करने हेतु प्रतिबद्ध हो जाते हैं। अगर हम उसे दूर ले जाते हैं तब यही समाज उस अमुक को महापुरुष या भगवान का दर्जा दे देता है। ये वही लोग होते हैं जो आम आदमी की क्षमता, कल्पना और शक्ति से परे काम कर जाते हैं। इनमें जो खास बात होती है वह है साहस, धैर्य, लगनशीलता। और सबसे बड़ी बात समाज के बुराई की समझ, संवेदना और उसे दूर करने की ललक। जो जितना ज्यादा अपने इस अभियान में सफल होता है वह उतना बड़ा और महान भगवान बना दिया जाता है।

कल्पना कीजिये कि राम ने अपने समय की अहम बुराई "रावण" और उससे संबंधित अन्य बुराइयों को न खत्म किया होता तो राम क्या होते? महज, एक था राजा और उसकी तीन रानियां। उनसे चार लड़के हुए लड़कों की शादी हुई, बच्चे पैदा किये, राज्य पर शासन किया और फिर सामान्य तरीके से प्राकृतिक मौत मर गये। कौन याद करता इस कहानी को? एक व्यक्ति भी नहीं। इतिहास में कहीं राम का नाम भी न होता। ऐसे हजारों राजा हुए, आये और गये। कहीं जिक्र तक नहीं है। 

ऐसे ही कृष्ण की कहानी ले लीजिये। कृष्ण को राम से भी बड़ा यानि 16 कला संपन्न भगवान क्यों कहा जाता है? क्योंकि उन्होंने समाज के लिये वह सब कुछ किया जो नहीं भी किया जा सकता था। उन्होंने लोगों को नयी जिंदगी देने के लिये, उन्हें सबक सिखाने के लिये, समाज में नयी मिसाल खड़ी करने के लिये हर सीमा को तोड़ दिया। हो गये वे भारतीय इतिहास के सबसे बड़े भगवान।

बुद्ध, महावीर, मुहम्मद, ईसा, गांधी, अंबेडकर, तिलक, भगतसिंह, आजाद आदि को कौन पूछता अगर उन्होेंने अपनी सीमाओं को नहीं तोड़ा होता? ये सभी इंसान ही थे। जब इंसान अपनी सीमा को लांघ जाता है तब वह भगवान हो जाता है और जब उसका पतन हो जाता है तब वह राक्षस हो जाता है।

हमारे आसपास हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं जो इंसान पैदा होने के बाद राक्षस हो गये। हिटलर, मुसोलिनी, रावण, कंस, लादेन आदि ऐसे ही राक्षस हैं। इनका विनाश हुआ। आज भी हमारे बीच लाखों - करोड़ों राक्षस, महाराक्षस घूम रहे हैं। बर्बरता की सारी हदें पार कर रहे हैं। आॅक्सीजन, जरूरी दवाइयों, दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुओं आदि की कालाबाजारी कर रहे हैं। लाश पर राजनीति कर रहे हैं।
हम ही लोग भगवान हैं और हम ही राक्षस। यह हमारे ऊपर निर्भर है हमें क्या बनना है। हम जो भी बने राक्षस या भगवान, उस परम शक्ति को रंचमात्र भी फर्क नहीं पड़ता। वह अपने तरीके से काम करती रही है, कर रही है और करेगी भी। वह कोई कार्य स्वयं करता ही नहीं। फिर दोष किस बात का? करते हम हैं। चाहे हम भगवान बने या राक्षस। हमें हमारी सारी प्रभुता छोड़कर यहीं जाना है। हम उसमें से बाल की नोक बराबर भी कुछ नहीं ले जा पायेंगे। हम भगवान बनकर जिस संसार या समाज के लिये अच्छा करेंगे वह भी हमें दफना या जला देगा या फिर राक्षस बनकर जिस समाज को नुकसान पहुंचा कर हम जिन अपनों का पोषण करेंगे, उनकी जिंदगी सुखी बनायेंगे वे भी हमें दफना या जला ही देंगे।

सारांशतः मनुष्य हैं हम, हम भगवान बनकर भी तुच्छ रहेंगे और राक्षस बनकर भी। फर्क बस इतना है कि अच्छा बनकर स्वयं को अच्छा लगता है और बुरा बनकर आत्मा पर एक बोझ बना रहता है। यही बोझ या खुशी लेकर हम मरते हैं। मरते समय अगर प्रसन्न चित्त मरे तो वही स्वर्ग का सुख मिल जाता है या फिर अगर ग्लानि से भरकर मरे तो मरते समय नर्क जैसा अनुभव होता है।

@विनय नमन 🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️

No comments:

Post a Comment