Friday, 27 June 2025
ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया?
ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया?
हमने कुछ लोगों को पकड़ा 10, 20, 50, 100, 1000 आदि गायें दिया, बना दिया यादव। काहे कि हम दूध, घी बहुत पीते-खाते थे? हमने कुछ लोगों को बंधक बनाया और भैंसे दिया बना दिया महिषवाल। हमने फिर कुछ लोगों को पकड़ा, भेड़ दिया, बना दिया गड़रिया। क्योंकि हम लोग ऊन के कपड़े बहुत ज्यादा पहनते थे फिर भी अधनंगे रहते थे? कुछ को बकरी दिया बना दिया बकरवाल, गुज्जर। क्योंकि हम बकरी का मांस भी खाते थे? हमने फिर कुछ मजलूमों को जबरन पकड़ा और चमड़ा दिया, बना दिया चमार। क्योंकि हम लोग चमड़े का जूता सिर से पैर तक खूब पहनते थे? कुछ को पहले से बने जूतों की मरम्मत का काम जबरन सौंपा वे बने मोची। क्योंकि ज्यादा चलने के कारण हमारे जूते टूटते बहुत थे?
कुछ लोगों को फिर दबोच लिया उन्हें सुअर दिया, बना दिया डोम/भंगी। क्योंकि सुअर का मांस भी हमें खाना पसंद था? इनसे हमने शवों को जलाने तथा विष्ठा साफ करवाने का घृणित कार्य भी करवाया क्योंकि हमारे यहाँ पहले से ही शौचालय बना होता था। हम लोग बाहर लैट्रिन करने नहीं जाते थे और विष्ठा भी बहुत ज्यादा करते थे न?
कुछ लोगों को ताड़ी के पेड़ पर चढ़ा कर ताड़ी लाने और बेचने का काम सौंपा वे बन गये पासी। भाई हम रात दिन ताड़ी पीकर टुन रहते थे, तभी हमें मानवता नहीं दिखती थी और दलितों को लूटने का काम आसानी से हो जाता था। कुछ लोगों को नाव दिया, बना दिया केवट व मल्लाह क्योंकि हम नदी मार्ग से बहुत आते-जाते थे। दिन में दस बीस चक्कर तो ही जाता था? कुछ लोगों को जाल पकड़ाकर नदी या ताल में धकेल दिया वे बन गये निषाद, मछुआरा क्योंकि हमें मछली खाना बहुत भाता था? बिना मछली के हमारा आहार सूना रहता था? कुछ लोगों को जमीन दिया, हल बैल दिया, बीज दिया बना दिया मौर्य। कुछ को कहा कि तुम केवल इन मौर्यों के यहाँ उगी सब्जी का व्यापार करोगे, वे बन गये कुजड़ा। हम कभी-कभी सब्जी भी खा लिया करते थे? कुछ बेहद मासूम लोगों को जमीन देकर कहा कि तुम केवल अनाज उगाओ, वे कुर्मी बन गये। कुछ को धागा बनाने की मशीन दिया बना दिया जुलाहा, कुछ को रुई धुनने का काम दिया बना दिया धुनिया। महाराज हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कपड़े पहनने का बेहद शौक था?
कुछ को लकड़ी बसुली, रुखान, दिया बना दिया बढ़ई। क्योंकि हम दिन भर लकड़ी के सामानों में ही घुसे पड़े रहते थे। कुछ लोहा और निहाई देकर विश्वकर्मा बना दिया। लोहे के हथियार भी हमारे बहुत काम आते थे। मजलूमों दलितों का वध करने में बड़ा उपयोगी होता था लोहे का हथियार। कुछ को उस्तरा और नहन्नी देकर नाई बना दिया। काहे कि हमारे दाढ़ी, बाल बहुत जल्दी-जल्दी उग आते थे। दिन में चार-छः बार बाल बनवाना पड़ता था?
कुछ से कहा कि तुम लोग फूल तोड़ो माला बनाओ और माली बनो। हम फूलों की माला पहनने के भी बड़े शौकीन थे? कुछ बांस और मूंज का ढकिया, मौनी बनाने का काम दिया वे बने धरिकार। कुछ को रस्सी में बांधा और उन्हें लोटा, गगरा व उबहन (पानी निकालने की रस्सी) दे, पानी भरने का काम सौंपा वे बेचारे दलित बने महार। कुछ को पालकी ढोने का काम दिया वे बने कहार। अब पैदल कौन आये जाये जब मानवयान की सवारी मिल जाती है? कुछ को चाक और मिट्टी देकर कुम्हार बना दिया। क्योंकि हमें रोज मिट्टी के बर्तनों की आवश्यकता पड़ती थी?
कुछ लोगों से हमने कहा कि तुम लड्डू व मिठाई बनाओ वे बेचारे बन गये मोदनवाल। भई हमें मिठाई खाना बेहद पसंद था? कुछ को कपड़ा बेचने का धंधा दिया वे बन गये बजाज, कुछ को चूड़ियां बेचने का काम सौंपा वे बने चूड़ीवाल।
कुछ हमारे बड़े अजीज थे उन्हें हमने सोना-चांदी का काम सौंपा दिया वे बने सोनार। कुछ लोगों को फरसा, भाला, तलवार, धनुष-बाण सौंपा और कहा कि तुम क्षत्रिय बन गये। जाओ सबको मारो काटो।
और खुद अधनंगा बदन लेकर सिर पर शिखा, माथे पर चंदन, कांधे पर जनेऊ और बगल में पोथी दबा लगे भागवत बांचने, कथा सुनाने, ज्ञान बघारने, मासूम निरीह, लोगों को लूटने, मूर्ख बनाने।
और इतिहास में हमने एकबार यह व्यवस्था बैठा दिया तो फिर बैठा दिया, हजारों साल तक कोई चूं नहीं बोला। सिर नहीं उठाया। बस दुम दबाकर फाओअप करते रहे। ऐसा फाओअप कर रहे हैं कि अब भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। है कि नहीं।
देख रहा विनोद कैइसा गोल-गोल घुमा रहा है ई लोग।
या तो आप हमें मूर्ख समझ रहे या फिर खुद हैं और हमें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। या फिर यह बहुत बड़ा खेल है, जिसके हाथ की हम आप सब कठपुतली बन रहे हैं और वह मजे लेकर खेल रहा है।
@ डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
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