Wednesday, 2 July 2025

शास्त्रानुसार अग्राह्य, पतित ब्राह्मण

शास्त्रानुसार अग्राह्य ब्राह्मण, पतित ब्राह्मण इस समय लोग ब्राह्मण की पूजनीयता के संदर्भ में शास्त्रों से विविध प्रमाण दे रहे हैं। ध्यान रहे शास्त्र एकांगी निर्णय नहीं देते। जिन शास्त्रों में ब्राह्मणों की पूजनीयता का वर्णन है उन्हीं शास्त्रों ने इन्हें ब्राह्मणत्व के पालन का भी निर्देश किया है। ब्राह्मणत्व की कसौटी बताया है। तब क्यों भूल जाते हैं शास्त्र को? धर्मग्रंथों में ब्राह्मण का स्वरूप न केवल जन्म से, अपितु आचरण, ज्ञान, तप, शुचिता और वेदाध्ययन से निर्धारित किया गया है। यदि कोई ब्राह्मण शास्त्रीय नियमों की अवहेलना करता है, तो उसे धार्मिक कार्यों से वर्जित भी घोषित किया गया है, यहाँ तक कि कुछ विशेष स्थितियों में उसे 'चाण्डाल' के समान भी कहा गया है। "शिखाहीनं द्विजं विद्धि मन्त्रहीनं च पार्थिव। यज्ञोपवीतहीनं च तं मुन्याः चाण्डालसंज्ञितम्॥" (स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, 5.3.45) स्कन्दपुराण के अनुसार यदि ब्राह्मण शिखा, यज्ञोपवीत और तिलक धारण नहीं करता तो वह चाण्डालतुल्य होता है। "वेदवर्जितशौचाभ्यां पतितः स्यात् द्विजः खलु। न स धर्मेऽधिकारी स्यात् यज्ञादौ न च तर्पणे॥" (याज्ञवल्क्य स्मृति 1.158) याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि जो ब्राह्मण वेद, शौच, और आचार से भ्रष्ट हो गया हो, वह धर्मकार्य का अधिकारी नहीं होता। "शौचवर्जितं आचारहीनं वेदवर्जितं द्विजम्। चाण्डालतुल्यमेवं स्यात् यज्ञदानविवर्जितम्॥" (गौतम धर्मसूत्र 12.4) गौतम धर्मसूत्र में वर्णन है कि जो ब्राह्मण शास्त्रीय विधियों का त्याग करता है और शुचिता से रहित होता है, वह चाण्डाल के समान समझा जाता है। वेदबहिष्कृतं विप्रं मन्त्रहीनं शुचिं शुचिम्। शूद्रादधममिच्छन्ति क्रियतश्चानपात्रकः॥ जो ब्राह्मण वेदपाठ से रहित है, वह चाहे शुचि (पवित्र) दिखता हो, परंतु वह शूद्र से भी अधम है और दान आदि के लिए अपात्र माना गया है। शिखी सूत्री च यस्त्वेति तिलकं ललाटके स्थितम्। न तं दृष्ट्वा हविर्ग्राह्यं ब्राह्मणोऽपि च चाण्डालवत्॥ (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 62, श्लोक 28) जो ब्राह्मण शिखा, यज्ञोपवीत और ललाट पर तिलक धारण नहीं करता, उसे देखकर भी यज्ञ में आहुति ग्रहण नहीं करनी चाहिए; वह ब्राह्मण भी चाण्डाल के समान है। ब्राह्मणो वेदहीनो यो नास्तिको लौकिको नरः। स एव द्रव्यदानेषु यजनेषु च वर्जितः॥ (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 142, श्लोक 35) जो ब्राह्मण वेदविहीन, नास्तिक और केवल लौकिक दृष्टिकोण वाला है, वह दान और यज्ञादि धार्मिक कार्यों में वर्जित है। शाठ्यं मायां च दम्भं च केवलं याचकं तथा। निष्ठुरं नास्तिकं तीर्थं हन्तारं वर्जयेद्विपम्॥ (मनुस्मृति 4.80) जो ब्राह्मण कपटी, मायावी, ढोंगी, केवल याचना करने वाला, कठोर, नास्तिक, पवित्रता का अपमान करने वाला और हिंसक हो, ऐसे ब्राह्मण को वर्जित करना चाहिए। न स्नायाद्यो न जपते न हुतं यो न वेदपाठः। स ब्राह्मणोऽप्यधो गम्यः स चाण्डाल समो मतः॥ (कात्यायन स्मृति) जो ब्राह्मण न स्नान करता है, न जप, न हवन करता है, न वेद का स्वाध्याय करता है, वह ब्राह्मण होते हुए भी अधम गति को प्राप्त होता है और चाण्डाल के समान माना गया है। सुरापानं च गम्भीरं ब्राह्मणस्य विशेषतः। न देयं भोज्यं च तस्मै द्रव्यं चोक्तं च किञ्चन॥ (मनुस्मृति 11.60) जो ब्राह्मण मद्यपान करता है, उसे कोई भी दान, अन्न या धन नहीं देना चाहिए। वह विशेष रूप से पतित माना गया है। (महाभारत, शांति पर्व): जातिमात्रेण यो गर्वं कुरुते ब्राह्मणो द्विजः। न स विप्रः सुदुर्धर्षः पतितो जातिभाज्यतः॥ जो ब्राह्मण केवल जाति के आधार पर गर्व करता है, वह ब्राह्मण नहीं, बल्कि जाति के कारण पतित है। सारांश यह है कि यज्ञ, हवन एवं अग्निहोत्र — वेदहीन व अशुद्ध ब्राह्मण को यज्ञ में आहुति देना वर्जित है। दान देना या लेना — पतित ब्राह्मण को दान देना निषिद्ध है। श्राद्ध कार्य — शास्त्रों में कहा गया है कि यदि पतित ब्राह्मण को पिण्ड या तर्पण दिया जाए, तो पितरों को हानि होती है। पूजा-पाठ कराना — ऐसे ब्राह्मण द्वारा की गई पूजा स्वीकार्य नहीं होती। अस्तु यदि किसी ब्राह्मण के पास शिखा, सूत्र, संध्या, गायत्री का जप, पुरश्चरण, पंचबलि, भगवती की उपासना/साधना, कुलाचार अनुसार कुलदेवी/देवता की पूजा, गुरु दीक्षा, शौच-अशौच का विवेक, संयम, शील, संतोष, तपश्चर्या नहीं है तो मुझे आपके ब्राह्मण नामधारी होने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरी दृष्टि में आपमें और एक शूद्र में विशेष अंतर नहीं है। सिवाय एक अंतर के कि आपके पास अभी भी अपने मूल में वापस आने का विकल्प है। और ध्यान रहे मुझे यह कहने के लिये शंकराचार्य होने की आवश्यकता नहीं है, शास्त्रों का अध्ययन ही पर्याप्त है। सादर नमन

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