Sunday, 20 July 2025
धर्म क्यों जरूरी है?
धर्म क्यों जरूरी है?
पहले ससुराल वाले मिलकर पत्नी/बहू/भाभी आदि को जला देते थे, मार डालते थे। यह लालच और लोभ की लड़ाई थी। इस कहानी में प्रायः पति निर्दोष ही होता था। बेचारा होता था। असली खलनायक प्रायः सास, ननद या कभी-कभी ससुर और जेठ हुआ करते थे। कहावत चलती थी कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु है। समय बदला किस्सा बदला।
आजकल खबरों में पति-पत्नी के मध्य द्वंद्व के कई सारे किस्से हैं। एक में पत्नी पति को काटकर नीले ड्रम में भर देती है और सीमेंट से ढक देती है। एक कहानी में पत्नी हनीमून पर जाकर अपने प्रेमी संग मिलकर पति को मार देती है। एक कहानी में लगभग 10 साल पुराने संबंध को एक पत्नी श्रद्धांजलि दे देती है।
एक कहानी मेरे मित्र की है। पत्नी उससे विवाह ही इसलिए करती है ताकि बाद में उसे दहेज आदि के मामले में फंसाया जा सके। एक कहानी मेरे एक और मित्र की है। उसमें पिता और बेटियों का काम ही यही है कि विवाह करके पति को फंसाओ और फिर पैसा बनाओ।
कुछ कहानी मेरे भुक्तभोगी मित्र ने सुनाया। उनकी एक कहानी में पत्नी विवाह के बाद अपने प्रेमी संग जाने की जिद करती है। सब राजी भी हो जाते हैं। लेकिन प्रेमी अपनाने से मना कर देता है। पत्नी फिर पति के पास जाना चाहती है लेकिन इस बार पति मना कर देता है।
उन्होंने ही एक कहानी और बताया। शादी हल्दी से पहले ही टूट जाती है। कारण वही प्रेमी-प्रेमिका।
ऐसे सैकड़ों नहीं लाखों-करोड़ों किस्से होंगे। कुछ जगजाहिर कुछ अभी भी दबे हुए।
क्या हो गया है आजकल लोगों? यही प्रश्न होगा न? नहीं अतीत में भी ऐसी कहानियां घटित हुई होंगी। यह कोई नई कहानियां नहीं हैं। लेकिन इन कहानियों को पाप की दृष्टि से देखा जाता रहा है। इसे धर्म का लोप माना जाता है।
धर्म क्यों? धर्म का कार्य है लोगों को जीवन दृष्टि प्रदान करना, जीवन जीने का सही मार्ग दिखाना, सिखाना। इसे भगवान व धार्मिक कथाओं के माध्यम से लोगों के मध्य स्थापित किया गया है। भगवान और नरक का भय लोगों को अनीति, अनाचार, पापाचार करने से रोकता है। सदवृत्ति पर जोर देने का तात्पर्य यह है कि लोग ईश्वर को डर के कारण नहीं प्रेम के कारण भजें। पुराण, महाभारत, रामायण आदि में कहानियों के माध्यम से लोगों को धर्म और नीति का प्रयोगात्मक पहलू समझाया गया है। यह ग्रंथ धर्म और नीति के केस स्टडी हैं। इन्हें पढ़ने से जीवन दृष्टि मिलती है।
लेकिन आज तो आदमी तरक्की कर गया। उसे पता चल गया कि चंद्रमा एक देवता नहीं है, बल्कि पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उपग्रह है। उसे पता चल गया है कि धरती माँ नहीं एक ग्रह है। उसे पता चल गया है कि यह ब्रह्माण्ड किसी शेषनाग ने नहीं बल्कि गुरुत्वाकर्षण ने धारण किया है। आज आदमी पक्षियों से तेज उड़ सकता है, मछली से तेज तैर सकता है, घोड़े से तेज दौड़ सकता है। आज आदमी स्वयं आकाशवाणी कर सकता है। आज दो दिन पहले मौसम की झूठी-सच्ची भविष्यवाणियां हो सकती हैं। आज हम मोबाइल हाथ में लेकर दुनिया को मुट्ठी में कर सकते हैं। आज हम चैट जीपीटी, ए आई तकनीक आदि के कारण झूठ को सच व सच को झूठ में बदल सकते हैं। हमारे खाने-पीने का तरीका, सलीका, जायका सब आधुनिक हो गया है। आज हम वर्षों का काम घंटों या मिनटों में कर लेते हैं। मनोजवं मारुततुल्य वेगं, बुद्धिमतां वरिष्ठं हो गये हैं।
इतनी तरक्की, इतना उत्थान, इतना विकास, इतना धन, ऐसे में धर्म का क्या काम? भगवान का क्या काम? धार्मिक कथाओं का क्या काम? इसे कहने-सुनने वाले पोंगापंथी, ढोंगी, ब्राह्मणों, पंडितों का क्या काम? और यह भी तो उसी भौतिकतावाद और आधुनिकीकरण के वशीभूत हो गये हैं। इनका भी तो प्रभाव क्षीण से क्षीणतम हो रहा है।
तो याद रखना, अभी तो कहानी शुरू भी नहीं हुई है। आरंभ है प्रचंड है। अभी आगाज है तेरा अभी अंजाम बाकी है। यदि समाज से ईश्वर, धर्म, नीति, सदाचार का लोप होगा तो अभी इतना सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक आर्थिक, विघटन, अनाचार, कदाचार, भ्रष्टाचार, पतन देखना पड़ेगा कि रूह कांप जायेगी। अभी इससे भी जघन्यतम और वीभत्स दौर देखना बाकी है। और याद रखना इसे कोई विज्ञान, कोई संविधान, कोई कानून, कोई सरकार, कोई प्रशासन, कोई सत्ता नहीं रोक सकती, सिवाय धर्म और बिजूका (हमारे यहाँ इसे वूढ़ कहते हैं) ईश्वर के।
समाज, परिवार, देश, संबंध, प्रेम को बांधे रखने के लिए जिंदा रखने के लिए अधिकार बोध नहीं कर्त्तव्य बोध जरूरी है। नैतिकता और सदाचार जरूरी है। और यह बात कोई विज्ञान, कोई संविधान, कोई कानून नहीं सिखा सकता। कोई आर्थिक, वैज्ञानिक तरक्की इसे नहीं मुहैया करा सकती। इसे सिर्फ धर्म और अज्ञात ईश्वर के नाम से उपलब्ध कराया जा सकता है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment