Sunday, 31 August 2025

विज्ञान की महिमा और महानता

विज्ञान की महिमा और महानता विज्ञान की महिमा और महानता जगजाहिर है। हवा दूषित है। क्यों? पानी दूषित है। क्यों? भूमि दूषित है। क्यों? भोजन दूषित है। क्यों? नित नई बीमारियाँ (औद्योगिक रसायन, रेडिएशन और प्रदूषण से कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, एलर्जी) पैदा हो रही हैं। क्यों? एंटीबायोटिक रेज़िस्टेन्स बढ़ रहा है। क्यों? मानसिक रोग (तकनीकी दबाव, सोशल मीडिया, तनाव और अवसाद की दर) बढ़ रहे हैं। क्यों? मोटापा और जीवनशैली रोग से पूरी दुनिया कराह रही है। क्यों? पालीथीन और प्लास्टिक धरती के सीने पर अमरबेल की तरह फैल रहे हैं। हजारों सालों के लिये। न नष्ट होने के लिये। क्यों? ई-बेस्ट जमीन, पानी, अंतरिक्ष हर जगह तहलका मचा रहे हैं। क्यों? आये दिन पहाड़ों पर ध्वंसकारी घटनाएं हो रही हैं। सैकड़ों लोग मर रहे हैं। हजारों घायल व लापता हो रहे हैं। अरबों का नुकसान हो रहा है। क्यों? करोड़ों की संख्या में हर साल पेड़ कट रहे हैं। क्यों? खनिजों के लिये धरती का सीना चीर का खोखला किया जा रहा है। जिससे भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। क्यों? संसार जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन की भट्टी में झुलसने को अभिशप्त है। क्यों? ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है। क्यों? वर्षा का प्रतिरूप बदल रहा है। मौसम का मिजाज़ बदल रहा है। क्यों? परमाणु हथियार, जैविक हथियार, डेटा हथियार आदि का भय व्याप्त है। क्यों? मानव की निजी जानकारी के लीक होने, दुरूपयोग होने, गोपनीयता का संकट है। क्यों? नशा (Addiction) – मोबाइल, इंटरनेट और गेमिंग पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती जा रही है। क्यों? साइबर क्राइम – हैकिंग, फ्रॉड और ऑनलाइन धोखाधड़ी तेजी से बढ़ा है। क्यों? डीपफेक टेक्नोलॉजी (गलत वीडियो और आवाज़ें बनाकर धोखाधड़ी व अपराध) का खतरा हर किसी के ऊपर मंडरा रहा है। क्यों? फेक न्यूज़ और गलत सूचना की भरमार हो रही है। क्यों? कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का खतरा बढ़ रहा है। मशीनों के निर्णय से नैतिक संकट, मानव स्वतंत्रता के ह्रास की सम्भावना बढ़ रही है। क्यों? क्लोनिंग और जेनेटिक इंजीनियरिंग के दुरूपयोग की पूरी सम्भावना है। क्यों? मानव संबंधों में दूरी, सामाजिक संवाद कम हो रहा है। क्यों? सामाजिक, पारिवारिक रूप से मनुष्य टूट रहा है। क्यों? मनुष्य व्यक्तिवाद और अकेलेपन का शिकार हो रहा है। क्यों? जनसंख्या बेतहाशा बढ़ती जा रही है। क्यों? लोगों की उपभोगवृत्ति बदल रही है। जरूरत से ज्यादा उत्पादन और खपत हो रहा है। क्यों? मानव का प्रकृति से अलगाव हो रहा है। वैज्ञानिक जीवनशैली ने प्राकृतिक जीवन को पीछे छोड़ दिया है। क्यों? फास्ट फूड और प्रोसेस्ड फूड का सेवन बढ़ा है जिससे लोगों में मोटापा, हृदय रोग और डायबिटीज़ का प्रसार हुआ है। क्यों? जीएम खाद्य पदार्थ (GM Crops) व इनके दीर्घकालिक प्रभाव अज्ञात, स्वास्थ्य और पर्यावरण संकट बना हुआ है। क्यों? प्राकृतिक संसाधनों की कमी हो रही है। पानी, ऊर्जा और भूमि पर दबाव बढ़ रहा है। क्यों? प्रयोगशाला में वायरस का निर्माण किया जा सकता है। क्यों? जैविक युद्ध और वैश्विक महामारी की आशंका है। क्यों? अंतरिक्ष कचरा (Space Debris) से पूरा आसमान भरा पड़ा है जिसके दिनोंदिन और भी बढ़ते जाने की सम्भावना है। क्यों? इसकी पूरी संभवना है कि मनुष्य को बचाने के लिए मनुष्य अगला विश्वयुद्ध पृथ्वी पर न लड़कर अन्तरिक्ष में लड़ेगा। इससे पूरे आकाशगंगा या कम से कम सौरमंडल के तंत्र में असंतुलन हो सकता है। क्यों? इन सबका एक उत्तर है "विज्ञान"। बन्दर के हाथ में उस्तरा देने का परिणाम है। जाहिर है अब हर कोई मेडिकल साइंस की उपलब्धियों का राग अलापेगा। क्योंकि प्रकट रूप से यही ज्यादा दिखता है। एक अनपढ़ आदमी भी बुखार से पीड़ित होने पर पैरासीटामाल खा कर आराम महसूस करता है। तो वह भी विज्ञान के चमत्कार को समझ सकता है। दूसरा उदाहरण लोगों की रफ़्तार भारी जिन्दगी का दिया जायेगा। आदमी कहाँ से कहाँ से पहुँच गया? आइये सबसे पहले मेडिकल साइंस की उपलब्धियों की पड़ताल करते हैं। क्या सचमुच में मेडिकल साइंस ने हमें वही दिया है जो दिखता है या दिखाया जाता है? आखिर मेडिकल साइंस ने हमें क्या दिया है? 1- हर व्यक्ति को दवा विज्ञानवादियों का दावा है कि अब हर किसी को दवा आसानी से उपलब्ध है। मेरा प्रश्न है कि हर किसी को दवा देना ही क्यों? उसे दीजिए साफ हवा, साफ पानी, साफ और साफ भोजन। 99 प्रतिशत दशाओं में वह स्वस्थ रहेगा। जो 1 प्रतिशत नहीं स्वस्थ हो पा रहे हैं। दरअसल वह स्वस्थ होने के लिये बने ही नहीं है। 2- हर मर्ज की दवा एक तर्क यह हो सकता है कि मेडिकल साइंस ने हर मर्ज की दवा ढूढ़ लिया है। क्या सच में? आइये देखते हैं- 1. जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ (Lifestyle Diseases) जैसे डायबिटीज़ (Type-1, Type-2), हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉल/ट्राइग्लिसराइड, फैटी लिवर (NAFLD) का आधुनिक मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं है, केवल दवा से रोग को दबाया जा सकता है। 2. इसी प्रकार श्वसन रोगों (respiratory diseases) जैसे अस्थमा, क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस, COPD (Chronic Obstructive Pulmonary Disease), एलर्जिक राइनाइटिस, नींद में सांस रुकना आदि का भी आधुनिक मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं है। 3. त्वचा और प्रतिरक्षा रोगों (Skin & Autoimmune Diseases) जैसे सोरायसिस, विटिलिगो (सफेद दाग), एक्ज़िमा (Chronic Eczema), ल्यूपस (SLE – Systemic Lupus Erythematosus), रूमेटाइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis), ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis), गाउट (Gout – दवा से कंट्रोल, पर जड़ से इलाज नहीं) आदि का भी इन विज्ञानवादियों के कोई विशिष्ट इलाज उपलब्ध नहीं है। 4. तंत्रिका एवं मानसिक रोग (Neurological & Psychiatric Diseases) जैसे माइग्रेन (Migraine), अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s disease), पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease), मिर्गी (Epilepsy – lifelong medicines, complete cure rare), मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS), ऑटिज़्म (Autism spectrum disorder), स्किज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia), बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar disorder), डिप्रेशन (कई बार lifelong therapy की ज़रूरत होती है) आदि का भी स्थायी इलाज नहीं है। 5. पाचन एवं मेटाबॉलिक रोग (Digestive & Metabolic Diseases) जैसे - क्रॉनिक गैस्ट्राइटिस / एसिडिटी, इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS), अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative colitis), क्रोहन डिज़ीज़ (Crohn’s disease), पाइल्स (बार-बार हो सकता है, सर्जरी के बाद भी), फैटी लिवर / लिवर सिरोसिस भी अभी लाइलाज हैं। 6. गुर्दा और हृदय रोग (Kidney & Heart Diseases) जैसे - क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD), नेफ्रोटिक सिंड्रोम (Nephrotic syndrome), हार्ट फेल्योर (Heart failure – lifelong management, cure नहीं), कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ (CAD – स्टेंट/बायपास से सुधार) आदि का स्थायी इलाज संभव नहीं है। 7. वायरल बीमारियाँ (Viral Diseases) जैसे - HIV/AIDS, हर्पीज़ (Herpes simplex virus), हेपेटाइटिस-B, कॉमन कोल्ड (Common Cold – अब तक कोई स्थायी दवा नहीं), चिकनपॉक्स/शिंगल्स (Varicella zoster virus latent रहता है) आदि का स्थायी इलाज संभव नहीं है। 8. इसी प्रकार कुछ अन्य अन्य आम बीमारियाँ (Other Common Diseases) जैसे - थायरॉयड रोग (Hypothyroidism / Hyperthyroidism), एनीमिया (कुछ प्रकार – जैसे Thalassemia, Sickle cell anemia), क्रॉनिक बैक पेन / सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, बांझपन (Infertility – कुछ केसों में), बाल झड़ना / गंजापन (Alopecia – स्थायी इलाज नहीं), दाँतों की बीमारियाँ (Pyorrhea, Gum disease – बार-बार लौट आती हैं) आदि का स्थायी इलाज संभव नहीं है। यहाँ लगभग 45 रोगों को बताया गया जिसका आधुनिक मेडिकल साइंस के पास कोई इलाज नहीं है सिवाय रोग को टालने के। अगर ढूढ़ा जाये तो और भी मिलेंगे। तो घमंड किस बात का है भाई? 3- कुछ लोग कह सकते हैं कि उपर्युक्त रोगों के रोगी ही कितने हैं? तो आप की खास जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया भर में लगभग 40% लोग (≈ 3.4 अरब लोग) मस्तिष्क-सम्बंधित रोगों जैसे एल्ज़ाइमर, स्ट्रोक, माइग्रेन आदि से प्रभावित हैं। 2022 तक दुनिया में 83 करोड़ लोग डायबिटीज से प्रभावित हैं, जो वयस्क आबादी का लगभग 1/7 (≈14%) हिस्सा है। 2021 में दुनिया में 55 मिलियन लोग डिमेंशिया से ग्रस्त थे। कुल जनसंख्या में इसका प्रतिशत कम दिखाई देता है (~0.7% वैश्विक स्तर पर), लेकिन 65+ आयु वालों में यह लगभग 7% है। अनुमान है कि दुनिया की 2/3 आबादी (≈ 4 अरब लोग) हर्पीज़ वायरस से संक्रमित हैं, हालांकि यह कई बार लक्षणहीन रहता है। लगभग 3.67 करोड़ लोग HIV/AIDS से ग्रस्त हैं। 213 मिलियन लोग (~2.7% वैश्विक जनसंख्या) COPD (जीर्ण श्वसन रोग) से ग्रस्त हैं। 67.3 करोड़ लोग, ~= 8.5% वैश्विक जनसंख्या क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD) से पीड़ित हैं। ~300 मिलियन लोग, लगभग 4.4% वैश्विक जनसंख्या अवसाद (Depression) से ग्रस्त है। वयस्कों का ≈43%, यानी लगभग 2.5 अरब लोग अस्वस्थ वज़न (Overweight) से ग्रस्त हैं। Hypertension (उच्च रक्तचाप) से लगभग 1.28 अरब वयस्क प्रभावित (~33%) है। यह तो कुछ रोगों के रोगियों की बानगी भर है। दुनिया की कुल आबादी 8 अरब से अधिक है। और उपर्युक्त डेटा के अनुसार 13.9 अरब लोग रोगी हैं। जितनी आबादी है उससे अधिक आबादी किसी न किसी रोग से ग्रस्त है। किसी को एक किसी को दो किसी को चार-छह रोग घेरे हैं। शायद ही कोई महापुरुष इस धरती पर हो जिसे कोई रोग न हो। भाई जब सभी रोगी ही हैं तो इलाज किसका हो रहा है? स्वस्थ कौन है? और यह झांसा किसे दे रहे हैं? कि आधुनिक मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर लिया है। फलाफला रोगों का इलाज हो रहा है। 4- आधुनिक मेडिकल साइंस की तरक्की का एक नमूना मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी के रूप में पेश किया जाता है। निश्चय ही दर में कमी आयी है। लेकिन जो कमी आयी है उससे जो संसाधनों और पृथ्वी पर जनसंख्या दबाव बढ़ा है उसका क्या? 2021 में वैश्विक स्तर पर करीब 2.6 लाख माताओं की मृत्यु प्रसव के दौरान या उसके कुछ समय बाद हुई है वहीँ 49 लाख शिशुओं की मृत्यु हुई है। जबकि 1901 में दस लाख माताओं की मृत्यु हुई थी वहीँ लगभग 3.9 करोड़ शिशुओं की मृत्यु हुई। एक अनुमान के आधार पर 1901 में लोगों का काम आधी धरती (0.50) में चल सकता था जबकि 1961 में यह आवश्यकता 0.75 पृथ्वी हो गयी। 2021 में अब लोगों को अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु 1.75 पृथ्वी चाहिए। अनुमान है कि वर्तमान जनसंख्या वृद्धिदर और उपभोग वृत्ति के अनुसार 2051 में हमें 2 पृथ्वी की जरुरत है। वहीँ सन 2100 में 3 पृथ्वी की जरूरत होगी। यह आधुनिक विज्ञान कहाँ से लायेगा 3 पृथ्वी? 5- दूसरी जो चीज विज्ञान की शानदार उपलब्धि के रूप में गिनाया जाता है वह है मनुष्य की तेज रफ़्तार जिन्दगी। जैसे जहाँ लोग पहले दिनों में पहुँचते हैं वहीँ अब घंटों में। जहाँ घंटों में पहुँचते थे अब मिनटों में। मेरा मूल प्रश्न फिर वही है कि कीमत क्या है? अख़बार पलटिये रोज दो-चार एक्सीडेंट की खबर होती है। भयानक ख़बरें जैसे मरने और गंभीर रूप से घायल होने वाली ही अख़बार में जगह बना पति हैं। सामान्य लड़ने-भिड़ने की ख़बरों का पता भी नहीं चलता। 2021 में सड़क दुर्घटनाओं में विश्व में 11.9 लाख लोग मारे गये। भारत में 2023 में 1.74 लोग मारे गये। मतलब प्रतिदिन 474 मौतें और हर 3 मिनट में एक मौत। इन मारे गये 60 प्रतिशत 10-25 आयु वर्ग वाले युवाओं का है। 6- इसके साथ ही वाहन चलाने से मस्कुलो-स्केलेटल समस्याएँ (पीठ, गर्दन और कंधे में दर्द (long sitting posture, vibrations), आंखों की थकान, मानसिक तनाव (ट्रैफिक जाम, हॉर्न, प्रदूषण और दुर्घटना का डर), हृदय रोग का खतरा (लगातार बैठे रहने से हाई BP, मोटापा, कोलेस्ट्रॉल बढ़ना) प्रदूषण जनित रोग (फेफड़ों पर असर, अस्थमा/ब्रॉन्काइटिस का खतरा) होने की भी सम्भावना रहती है। 7- परिवहन से तीसरा खतरा प्रदूषण का है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 16% है। यह 8.4 गीगाटन सीओ2 का उत्सर्जन करता है। शहरी क्षेत्रों में, सड़क-वाहन 50–90% एयर पॉल्यूशन के उत्तरदायी होते हैं। वाहन उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा non-exhaust (गैस के अलावा) पार्टिकुलेट मैटर (PM) जैसे टायर, ब्रेक, रोड़ स्लाइड आदि का है। यह कुछ स्थानों पर 60–73% तक भाग होता है। 8- विज्ञान की तीसरी उपलब्धि के रूप कम्प्यूटर, मोबाईल आदि क्रांतियों की चर्चा की जाती है। जाहिर है पहला आक्षेप मुझ पर ही होगा कि आपने इसे मोबाइल या कंप्यूटर पर ही लिखा होगा। नहीं लिखना था। आदि। अभियोग स्वीकार है। लेकिन फिर वही प्रश्न कीमत क्या है? 1. पर्यावरणीय समस्याएँ कम्प्यूटर, मोबाईल के उपयोग से E-waste (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) उत्पन्न होता है। पुराने मोबाइल, कंप्यूटर और उपकरणों का निपटान न होने से भारी धातुएँ (lead, mercury, cadmium) मिट्टी और पानी को प्रदूषित करती हैं। भारत दुनिया में e-waste उत्पादन में तीसरे स्थान पर है। इंटरनेट सर्वर, डेटा सेंटर और डिवाइस चार्जिंग से भारी बिजली की खपत होती है। यह अप्रत्यक्ष रूप से कार्बन उत्सर्जन बढ़ाती है। मोबाइल टावर और डिवाइस लगातार electromagnetic field (EMF) पैदा करते हैं। इसका लंबी अवधि में जैव विविधता (विशेषकर मधुमक्खियों और पक्षियों) पर असर देखा गया है। 2. स्वास्थ्य समस्याएँ कम्प्यूटर, मोबाईल के उपयोग से आंखों की समस्या (Computer Vision Syndrome) जैसे जलन, धुंधलापन, सूखापन, मांसपेशियों और हड्डियों की समस्या जैसे गर्दन दर्द, पीठ दर्द, “Text neck syndrome”, मानसिक स्वास्थ्य तनाव, नींद की कमी, कार्य थकान होता है। इन इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के उपयोग से रेडिएशन प्रभाव उत्पन्न होता है जिससे मस्तिष्क पर असर, नींद की गड़बड़ी आदि समस्याएं देखी जाती हैं। यह उपकरण एक तरीके से लत (Addiction) का भी कार्य करते हैं। इससे चिंता, अवसाद, “Nomophobia” (फोन न होने पर डर)। इनके लगातार उपयोग से शारीरिक समस्याएँ जैसे उंगलियों में दर्द (Texting thumb), गर्दन दर्द आदि हो सकता है जो आगे चलकर सर्वकाइल के रूप में बदल सकता है। अंत में वही प्रश्न है कि हम अपना समय बचाकर कर क्या रहे हैं? कीमत क्या चुका रहे हैं? स्वस्थ होने के लिए बीमार क्नयों हो रहे हैं? विज्ञान हमारे लिए, हमारे समाज के लिए बहुत जरुरी है लेकिन क्या हम उसे प्राप्त कर पा रहे हैं? और सबसे बड़ा प्रश्न भविष्य क्या है? हम क्या बनने जा रहे हैं? मानव से मशीन? डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी

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