Saturday, 25 June 2022

कल का मोह

मैं विकासमान प्रकृति का उपासक हूँ। मेरी इसमें कदापि रुचि नहीं है कि सब कुछ यथावत रहे या पूर्ववत रहे। जब कुछ लोग कहते हैं कि कल ऐसा था आज ऐसा क्यों? ऐसा नहीं होना चाहिए। यह कल जैसा ही होना चाहिए। यकीन मानिये वे प्रकृति की धारा को रोकने का दुष्प्रयत्न कर रहे होते हैं। कल जैसा आज कदापि नहीं हो सकता। कल कल था और आज आज रहेगा। कल की तो बात छोड़िये, विगत एक पल भी आगामी एक पल जैसा नहीं होगा। अभी एक क्षण पूर्व जो नदी थी वही नदी नहीं है। अभी एक क्षण पूर्व जो सूर्य था वही नहीं है। कल जो सूर्य था आज वही नहीं। पृथ्वी क्षण प्रतिक्षण बदल रही है। हम जो कल थे वहु आज नहीं हैं। फिर कल को रोक कर, थाम कर रखने का दुराग्रह क्यों? कल को जाने दो आज का स्वागत करो। भारत अपनी परिवर्तनशीलता के कारण ही वैविध्यपूर्ण है। इसी कारण यह अनूठा है। इसी कारण यहाँ प्रायः सभी प्रकार के जलवायु, भौतिक उच्चावच, वनस्पति, मृदा, अन्न, मनुष्य, जीव-जंतु आदि पाये जाते हैं। किंतु इस देश का भी दुर्भाग्य है कि यहाँ कुछ ऐसी प्रजाति के लोग पाये जाते हैं जो पुरातनता का मोह नहीं छोड़ पाते। आखिर कृष्ण मूर्ख तो नहीं रहेंगे जिन्होंने "वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि" का उद्घोष किया होगा। उनका यह कथन, मात्र मनुष्य देह के संदर्भ में नहीं है बल्कि ये पूरी सृष्टि पर लागू होता है। लेकिन मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी कमी यही है कि यह कल में कोई परिवर्तन होता हुआ देखकर परेशान हो जाता है। छोड़ो कल की बातें। आज को देखो। यह हमेशा सुंदर लगेगा। आप हमेशा चिंता-मुक्त रहेंगे। @विनय नमन 🙏🙏🙏🧘🧘🧘

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