Sunday, 30 January 2022

सुख और दुख

दुनिया में अधिकांश लोग या तो दूसरे को खुश करने के फेर में है या फिर दुखी करने के. माता-पिता अपनी संतानों को खुश और सुखी करने के चक्कर में है. संतानों का मानना है वे भी अपने माता-पिता को दुख नहीं पहुंचाते और कोशिश करते हैं कि खुश रख सके. पति अपनी पत्नी को खुश करने के लिए परेशान है और पत्नी अपने पति को. मित्र एक दूसरे को प्रसन्न करने की जद्दोजहद कर रहे है. सरकारें अपनी जनता को खुश करना चाहती हैं और जनता अपनी-अपनी पसंद की सरकारों को. जिस व्यक्ति की किसी से दुश्मनी है वह उसे कभी खुश नहीं देखना चाहता बल्कि दुखी करने और उसकी सारी खुशियाँ छीनने की बेइन्तहा कोशिशें करता है, उसे मिटा ही देना चाहता है. संसार में यह कशमकश अनादि काल से होता चला आ रहा है. जिस तरह से दुनिया में लोग एक दूसरे को खुश और सुखी करने की कोशिश कर रहे हैं उससे तो संसार में सिर्फ शांति, ख़ुशी, आनन्द और सुख ही होना चाहिए. या फिर जिस तरह से लोग एक दूसरे के दुश्मन बने हैं उससे तो महज अशांति ही होनी चाहिए. लेकिन ऐसा है नहीं. न तो कहीं सुख है और ना ही कहीं दुख. ख़ुशी और दुख नितांत वैक्तिक चीज हैं. न तो कोई हमें खुश कर सकता है और न दुखी. यह दोनों ही भाव हमारे भीतर मौजूद हैं. अगर हम सुखी होना चाहते हैं तो किसी अजनबी व्यक्ति की छोटी सी मुस्कान ही हमारे भीतर पुलक भर देती है या फिर किसी को हम धन्यवाद बोलकर ही कृतकृत्य हो जाते हैं. अन्यथा इंद्र का सिंहासन मिलने के बाद भी चिंता बनी रहती है. व्यक्ति दुखी रहता है. नींद नहीं आती. छोटा बच्चा दस रूपये के छोटे से खिलौने से ही उतना खुश हो जाता है जितना कि हम बड़ी और महंगी कर खरीदकर भी खुश नहीं होते. दुख भी अपना ही है. अगर हम दुखी नहीं होना चाहते तो किसी की मजाल नहीं कि हमें दुखी कर दे. घनघोर मुसीबत भी भीतरी प्रासाद को विचलित नहीं कर सकती. किन्तु अगर हमने ठान लिया है कि हम सुखी नहीं होगें तो दुनिया की कोई ताकत हमें खुश नहीं कर सकती. दरअसल कल की चिंता और अपने अहंकार का पोषण ही सुख और दुख के जन्म का कारण है. हमारी सारी कोशिश होती है कि हमारा कल सुखी हो. हम आज में जीते ही नहीं. कल जिसका कभी पता ही नहीं हम उसके के लिए मरे जा रहे हैं. सुख और दुख से निवृति का पहला चरण है सिर्फ आज और इसी क्षण में जीना. पूरी शिद्दत से जीना. सौ प्रतिशत जीना. और दूसरा चरण है अहंकार से निवृति. अहंकार भी कहीं नहीं है. कभी देखा आपने अहंकार को? यह सिर्फ दूसरे को अपने से कमतर साबित करने का माजरा है. लेकिन आपने कभी सोचा कि आप सबसे बड़े कभी नही हो सकते? न धन में, न बल में, न बुद्धि में, न विद्या में, न ज्ञान में, न कीर्ति में और न ही किसी अन्य चीज में जिसे आप सोच सकते हों. हर जगह आपको आपसे बीस मिल जायेंगे और आप फिर उन्नीस ही रह जायेंगे. यह सिर्फ मानसिक विकृति है. रोग है. विकृति इस अर्थ में कि कई सारे फसाद खड़े करती है. जिन्दगी की सारी झंझट ही यही है कि मुझे उससे बड़ा बनना है या उस जैसा बनना है. फिर शुरू हो गयी भागमभाग, नींद-चैन हराम. सारी शांति, सारा शुकून खत्म. रोग इस अर्थ में कि अगर एक बार लग गया तो फिर जन्मजन्मान्तर साथ न छोड़े. मत करो किसी को खुश और मत करो किसी को दुखी. तुम न तो किसी को खुश कर सकते हो और न ही दुखी. और ध्यान रहे न ही तुम्हे कोई खुश कर सकता है और न ही दुखी. खुद को करो खुश, खुद को रखो सुखी, संभव है तुम्हारे आस-पास के लोग तुम्हारे प्रासाद को देख कर तुम्हारी कांति को देख कर आप ही आप खुश हो जायें. जियो सिर्फ आज अभी में सिर्फ अपने लिए किसी और के लिए नहीं. न तो किसी को प्रसन्न करने के लिए और न ही किसी को दुखी करने के लिए. @ विनय नमन 🙏🙏🙏🧘🧘🧘

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