Tuesday, 13 July 2021

सत्य क्या है?

आप न तो पूरा सच जानते हैं और न ही पूरा झूठ कह पाते हैं। वास्तविक सत्य, आपके द्वारा कहे गये झूठ और सच के बीच कहीं होता है। मान लो आपसे किसी ने पूछा कितना समय हुआ। आप बोले कि 12 बजकर 15 मिनट। क्या आप दावा कर सकते हैं कि आपने सच बोला या झूठ? सामान्यतया आप कहेंगे हां सही है। घड़ी में इतना ही बज रहा था। नहीं। इतना ही नहीं बज रहा था। कुछ सेकेंड जरूर आगे पीछे रहा होगा। अब आप कहेंगे कि सेकेंड कौन देखता है? मेरा मत है कि आपने जितना सेकेंड या फिर नैनो सेकेंड छोड़ा होगा आप उतनी मात्रा में झूठे हो गये। लेकिन आप पूरी तरह झूठे भी नहीं है। वास्तविक सत्य कहीं इसके मध्य में है।

चलिए मान लेते हैं कोई पूरा सच कहने की कोशिश करने वाला सत्यवादी है। क्या वह कह सकता है? ऊपर के ही उदाहरण को देखते हैं। मान लो कि उस सत्यवादी ने नैनौ सेकेंड या इससे भी छोटी इकाई तक समय बताने के बारे में वीणा उठाया है। उसने बताया भी। 12 बजकर 15 मिनट 10 सेकेंड और फलां नैनो सेकेंड। क्या वह पूरा सच है? नहीं। वह मेरे पास तक पहुंचते-पहुंचते झूठा हो गया। उसने जब कहा था तब वह सच था लेकिन अब झूठा। वह उसका सच हो सकता है मेरा नहीं। वास्तविक सत्य भी छूट गया।

यह अनादि काल से होता आ रहा है कि लोग सच कहने की कोशिश करते हैं लेकिन वह कभी कह नहीं पाते। सच हमेशा छूट जाता है। कहने के बाद जो बचा रह जाता है वही सदासत्य है। वह अज्ञेय ज्ञेय है। वही ईश्वर है।

लोग कहते हैं कि सच कड़वा होता है। नहीं सच न तो कड़वा होता है न मीठा। सच सिर्फ सच होता है। ऊपर के समय वाले उदाहरण को देखते हैं। समय का सच कड़वा है या मीठा? आप कहेंगे नहीं, न मीठा न कड़वा। नहीं, आप पूरा सच नहीं कह रहे हैं। मान लो किसी को 12 बजकर 12 मिनट वाली ट्रेन पकड़ना है। आपने उसे 12 बजकर 15 मिनट बता दिया। सच बता दिया। यानि उसकी ट्रेन छूट गयी। अब उसके लिये यह सच कड़वा हो गया। इसी तरह रात के 12 बजकर 12 मिनट पर किसी की हसीं रात (सुहागरात) का मुहुर्त है और आपने उसे बताया दिया। उसके लिये यह सच मीठा हो गया। लेकिन झोपड़ी में पड़े दादा जी के लिए दोनों में से कोई भी स्थिति नहीं है। न मीठा न तीखा। तात्पर्य यह है कि किसी सत्य के प्रति हमारा झुकाव क्या है? हमारा स्वार्थ क्या है? हमारी धारणा क्या है? इससे तय होता है कि सच कड़वा है या मीठा या फिर तटस्थ।

@विनय नमन 🙏🙏🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

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