आज मैंने महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक छोटा सा कदम रखा। इस कदम का परिणाम क्या होगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है किंतु एक बात का अहसास जरूर हुआ कि अधिकांश महिलाओं में "अकेलेपन का डर", अपने ऊपर "अविश्वास", पुरुषों द्वारा थोपी गयी बाध्यताओं का सामना करने में "हिचक", अनिर्णय की स्थिति, भविष्य के आंकलन में अक्षमता आदि कुछ जन्मजात और ज्यादातर परिवार, समाज आदि द्वारा कूट -कूट कर भरा गया है। अपने भीतर एक विराट संभावना और क्षमता समेटे होने के बावजूद एक महिला अपने आपको जब असहाय और दीन समझती है तब मैं इसे सिर्फ उसकी नाकामी के रूप में नहीं देखता बल्कि आज भी "लगभग जड़ समाज" की नाकामी के रूप देखता हूँ। हे नारी! तुम बस अपने ऊपर लिपटे खोल को एक बार तोड़ भर दो, असीम संभावना को समेटे समस्त आकाश तुम्हारा है।
©विनय नमन🙏🙏
बहुत ही बढ़िया
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