1- "पत्नी और पति शब्द"-
पत्नी का व्युत्पत्ति मूलक अर्थ है - पत् (गिरना) +नी (ले जाना)। यानि पतन की ओर ले जाने वाली। पति शब्द भी पत् धातु में ई प्रत्यय लगाकर बना इसका अर्थ है गिरने वाला। यह शब्द कितना सही? ऎसा क्यों कहा गया? दरअसल समाज में आम अवधारणा है कि पत्नी काम वासना में डुबाकर पति को ईश्वर से दूर करती है। यह मोक्ष के मार्ग में बाधक है। इसी लिये कबीरदास जैसे भक्त कवि व क्रांतिकारी समाज सुधारक भी कहते हैं -
कबीर नारि की प्रीति से, केते गये गरंत।
केते और जाहिंगे, नरक हसंत हसंत॥
अर्थात नारी को प्रेम करने से कितने ही लोग गर्त में जा चुके हैं और कितने ही लोग अभी हंसते-हंसते नरक में जायेंगे।
इसके अलावा वे कहते हैं कि नारी की छाया मात्र पड़ने से सांप तक अंधा हो जाता है। उनकी क्या गति होती होगी जो हमेशा स्त्री के साथ रहते हैं।
"नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।
कबीरा तिनकी का गति, जिन नित नारी संग॥"
वस्तुतः यहाँ नारी विरोध की जगह काम का विरोध अधिक है। अधिकांश समाजों और लोगों का मानना है कि स्त्री ही पुरुष को काम के गर्त में ढकेलती है। जबकि बायोलॉजिकली यह सरासर गलत है। हालांकि यह बात विषयेतर है तथापि यह जानना आवश्यक है कि स्त्री की कामेच्छा (Sexuality) पुरुषों की तुलना में दबी हुई होती है। एक स्त्री बिना संबंध बनाये कई दिनों तक रह सकती है लेकिन पुरुष नहीं। पत्नी (स्त्री) पति (पुरुष) को पतन की ओर नहीं ले जाती बल्कि पुरुष स्त्री को काम वासना की ओर उद्वेलित करता है। किंतु इसी बिना पर काम को ही, न केवल घृणास्पद, बुरा, बेकार सिद्ध करने का यत्न किया बल्कि समाज में इसकी चर्चा करना भी पाप करार दिया गया।
2- क्या काम वासना पाप है?
कबीर नारि की प्रीति से, केते गये गरंत।
केते और जाहिंगे, नरक हसंत हसंत॥
अर्थात नारी को प्रेम करने से कितने ही लोग गर्त में जा चुके हैं और कितने ही लोग अभी हंसते-हंसते नरक में जायेंगे।
इसके अलावा वे कहते हैं कि नारी की छाया मात्र पड़ने से सांप तक अंधा हो जाता है। उनकी क्या गति होती होगी जो हमेशा स्त्री के साथ रहते हैं।
"नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।
कबीरा तिनकी का गति, जिन नित नारी संग॥"
वस्तुतः यहाँ नारी विरोध की जगह काम का विरोध अधिक है। अधिकांश समाजों और लोगों का मानना है कि स्त्री ही पुरुष को काम के गर्त में ढकेलती है। जबकि बायोलॉजिकली यह सरासर गलत है। हालांकि यह बात विषयेतर है तथापि यह जानना आवश्यक है कि स्त्री की कामेच्छा (Sexuality) पुरुषों की तुलना में दबी हुई होती है। एक स्त्री बिना संबंध बनाये कई दिनों तक रह सकती है लेकिन पुरुष नहीं। पत्नी (स्त्री) पति (पुरुष) को पतन की ओर नहीं ले जाती बल्कि पुरुष स्त्री को काम वासना की ओर उद्वेलित करता है। किंतु इसी बिना पर काम को ही, न केवल घृणास्पद, बुरा, बेकार सिद्ध करने का यत्न किया बल्कि समाज में इसकी चर्चा करना भी पाप करार दिया गया।
2- क्या काम वासना पाप है?
लगभग सभी सभ्य समाजों में काम को पाप की दृष्टि से ही देखा जाता है। इसे गंदी बात माना जाता है। क्या ऐसा सचमुच है? मेरा मानना है कि हम एक बहुत बड़े छल और झूठ में जी रहे हैं। एक बच्चा सबसे पहले अपने आपको लैंगिक पहचान से ही जानता है कि वह क्या है। जो लोग इसे पाप समझते हैं वे भी दबी जुबान यह स्वीकार ही करेंगे कि अगर किसी एक चीज से इस सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन हो रहा है तो वह काम है। पशु - पक्षी, पेड़ - पौधे, मनुष्य सभी में यह एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसीलिए प्रकृति ने इसे केंद्रीय अंग के रूप में बनाया है।
इतना ही नहीं योगशास्त्र के अनुसार शरीर में सात चक्र होते हैं। इसमें तीन चक्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, मूलाधार, आज्ञा और सहस्रसार। मूलाधार का केंद्र बिल्कुल लैंगिक स्थान के एकदम समीप है। इस केंद्र में कुंडलिनी शक्ति स्थिति होती है। इसी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर योगी त्रिकालदृष्टि (भूत, भविष्य, वर्तमान को जानना) अष्टसिद्धियों (1-अणिमा-अणु की तरह छोटा होना, 2-महिमा- बहुत विशाल होना, 3-गरिमा - बहुत वजनी होना, 4-लघिमा - बहुत हल्का होना, 5-प्राप्ति - कुछ भी पाने की क्षमता, 6-प्रकाम्य - किसी के मन की बात जानना, 7-ईशिता - दुनिया पर शासन, 8-वशिता - किसी को वश में करना ) और नवनिधियों (पद्म, महापद्म, नील, नंद, मुकुंद, मकर, कच्छप, शंख और खर्ब ) को प्राप्त करता है। योगी इसी कुंडलिनी शक्ति को सहस्रसार चक्र में स्थापित कर ईश्वर से साक्षात्कार करता है। यानि यह केंद्र अथाह, अपार ऊर्जा का केंद्र है। फिर यह घृणित कैसे हो सकता है?
3- कामशास्त्र की कोई पाठशाला नहीं-
इतना ही नहीं योगशास्त्र के अनुसार शरीर में सात चक्र होते हैं। इसमें तीन चक्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, मूलाधार, आज्ञा और सहस्रसार। मूलाधार का केंद्र बिल्कुल लैंगिक स्थान के एकदम समीप है। इस केंद्र में कुंडलिनी शक्ति स्थिति होती है। इसी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर योगी त्रिकालदृष्टि (भूत, भविष्य, वर्तमान को जानना) अष्टसिद्धियों (1-अणिमा-अणु की तरह छोटा होना, 2-महिमा- बहुत विशाल होना, 3-गरिमा - बहुत वजनी होना, 4-लघिमा - बहुत हल्का होना, 5-प्राप्ति - कुछ भी पाने की क्षमता, 6-प्रकाम्य - किसी के मन की बात जानना, 7-ईशिता - दुनिया पर शासन, 8-वशिता - किसी को वश में करना ) और नवनिधियों (पद्म, महापद्म, नील, नंद, मुकुंद, मकर, कच्छप, शंख और खर्ब ) को प्राप्त करता है। योगी इसी कुंडलिनी शक्ति को सहस्रसार चक्र में स्थापित कर ईश्वर से साक्षात्कार करता है। यानि यह केंद्र अथाह, अपार ऊर्जा का केंद्र है। फिर यह घृणित कैसे हो सकता है?
3- कामशास्त्र की कोई पाठशाला नहीं-
यह कितना अद्भुत है कि कामशास्त्र सिखाने की कोई पाठशाला नहीं है और न ही कोई खास किताब। ऊपर से इतना कठोर प्रतिबंध भी है। लेकिन हर व्यक्ति यही करता है, हमारे पूर्वज भी और हम भी। आखिर यह कैसे हो जाता है। दरअसल काम और कामेच्छा प्राकृतिक है। हम इसका दमन करते हैं और यह मान लेते हैं कि इसका दमन करके हम इसे शांत कर देंगे। यह ठीक वैसे है जैसे ज्वालामुखी का चैंबर पृथ्वी के गर्भ में सैकड़ों किमी. मोटी चट्टानी परत से ढंका होता है लेकिन मैग्मा (पृथ्वी के भीतर द्रव और गर्म रूप में इक्ट्ठा पदार्थ) की अधिकता हो जाने पर यह धरती की छाती को फाड़कर बाहर आ जाता है। हम कथित संस्कारों और ब्रह्मचर्य के नाम पर इस विशाल ऊर्जा भंडार को झुठलाने और दबाने का अनावश्यक और निरर्थक यत्न करते हैं। नतीजतन हमारे माँ-बाप और समाज को लगता है कि बच्चा/बच्ची बिगड़ गया/गयी है। इस प्रकार बिगड़ने वाला बच्चा/बच्ची प्रकृति के हाथ से मजबूर है। बाकी वह बेकसूर है।
4- एक हास्यास्पद सामाजिक प्रथा-
4- एक हास्यास्पद सामाजिक प्रथा-
विवाह- समाज में काम और कामेच्छा को दबाने और चर्चा का विषय न बनाये जाने के बावजूद माता-पिता और समाज पूरे विधि-विधान और गाजे बाजे के साथ से अपने बच्चे/बच्ची की शादी करते हैं। वे सभी यह भी जानते हैं कि आज क्या होने वाला है। वह समाज जहाँ काम की बात करना भी पाप है उसी समाज में इतने धूमधाम से काम का उत्सव मनाना आश्चर्य में डालता है। तरीके से अतार्किक भी। क्योंकि बिना किसी जानकारी के किसी को किसी विशेष पद पर बैठा देना, बंदर के हाथ में उस्तरा देने जैसा है। अगर प्रयोगात्मक जानकारी न सही कम से कम सैद्धांतिक जानकारी होनी ही चाहिए ताकि न्याय-निर्णयन में सुगमता हो। मुझे लगता है कि हम सभ्य लोगों से ज्यादा वैज्ञानिक वे आदिवासी (बैगा जनजाति) हैं जो विवाह पूर्व अपनी संतानों को एक साथ रहने की अनुमति देते हैं। फिर जब दोनों को लगता है कि साथ में निबाह हो सकता है तब माता-पिता और समाज धूमधाम से विवाह संपन्न कर देते हैं।
5- गाली-
5- गाली-
समाज में माँ, बहन की गाली दी जाती है। लेकिन यह गाली माँ, बहन से ज्यादा जननेंद्रियां और मलेंद्रिय (private part) को दी जाती है। ऐसा क्यों? समझ से परे है। जहाँ तक मैं समझता हूँ यह भी काम और कामेंद्रिय को घृणित बताने का ही दुष्प्रयत्न है।
6- गोपनीयता-
6- गोपनीयता-
कामेंद्रियों के प्रति घृणा भाव के कारण इतनी गोपनीयता बरती जाती कि उसे छूना भी पाप माना जाता है। जब बच्चा अपने जननेंद्रिय को हाथ लगाता है तब माँ-बाप उसे गंदा और बुरा अंग बताते हुए छूने से मना करते हैं। इसका सर्वाधिक बुरा परिणाम बच्चियों को भुगतना पड़ता है। वे अपने उस अंग की साफ-सफाई को उपेक्षित करती हैं जिससे उन्हें अनेक यौन - संक्रमण को झेलना पड़ता है। बच्चे भी एक खास दुष्परिणाम भुगतते हैं- हस्तमैथुन। जो उन्हें शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से कमजोर करता है। हम लाख छुपाने के बावजूद दिनरात सिर्फ काम का ही चिंतन करते हैं। यहाँ तक कि हमारे सपने भी इससे अछूते नहीं रह जाते। यह हमारे चेतन मन से निकल कर अवचेतन मन में घर कर जाता है। यही कारण है कि समाज में दुष्कर्म की घटनाएँ अधिक होती हैं।
7- समस्या कहाँ है?
असल समस्या है काम की ऊर्जा के महत्त्व को न समझने में और बिना समझे ही दमन करने में। समाज में काम की ऊर्जा और कामेंद्रिय का केवल एक मतलब लगाया जाता है - कामक्रीड़ा (sexual act) और संतानोत्पत्ति। जो सरासर गलत है। यह इस पवित्र और अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा का केवल एकमुखी प्रयोग है। आप इसकी तुलना विद्युत ऊर्जा से कर सकते हैं। विद्युत ऊर्जा सही भी हो सकती है और गलत भी। अगर आप विद्युत के खुले तार को पकड लेंगे तो मृत्यु तय है या कम से कम मरने जैसी अवस्था में अवश्य पहुंच जायेंगे। किंतु इस एक उपयोग के अलावा आप इसका और भी कई तरीकों से उपयोग कर सकते हैं। जैसे- प्रकाश, ए. सी., फ्रिज, कूलर, पंखा, हीटर, ओवन, उद्योग, विद्युत बैट्री, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम इस महान ऊर्जा का उपयोग कैसे करें। हमारे भीतर मौजूद काम की ऊर्जा इससे भी कहीं अधिक शक्तिशाली है। इसके कई सारे प्रमाण भी उपलब्ध हैं। जैसे- हनुमान, परशुराम, कृष्ण, कबीर, बुद्ध, महावीर, जीसस आदि।
8- समस्या का उपाय-
7- समस्या कहाँ है?
असल समस्या है काम की ऊर्जा के महत्त्व को न समझने में और बिना समझे ही दमन करने में। समाज में काम की ऊर्जा और कामेंद्रिय का केवल एक मतलब लगाया जाता है - कामक्रीड़ा (sexual act) और संतानोत्पत्ति। जो सरासर गलत है। यह इस पवित्र और अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा का केवल एकमुखी प्रयोग है। आप इसकी तुलना विद्युत ऊर्जा से कर सकते हैं। विद्युत ऊर्जा सही भी हो सकती है और गलत भी। अगर आप विद्युत के खुले तार को पकड लेंगे तो मृत्यु तय है या कम से कम मरने जैसी अवस्था में अवश्य पहुंच जायेंगे। किंतु इस एक उपयोग के अलावा आप इसका और भी कई तरीकों से उपयोग कर सकते हैं। जैसे- प्रकाश, ए. सी., फ्रिज, कूलर, पंखा, हीटर, ओवन, उद्योग, विद्युत बैट्री, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम इस महान ऊर्जा का उपयोग कैसे करें। हमारे भीतर मौजूद काम की ऊर्जा इससे भी कहीं अधिक शक्तिशाली है। इसके कई सारे प्रमाण भी उपलब्ध हैं। जैसे- हनुमान, परशुराम, कृष्ण, कबीर, बुद्ध, महावीर, जीसस आदि।
8- समस्या का उपाय-
• ध्यान- बच्चों को समय से पहले (14 वर्ष की आयु पूरा करने से पहले) ही ध्यान में उतरने की प्रेरणा दी जाये। दरअसल काम (sex) के समय हमें आनन्द इसलिए मिलता है कि हम "समय शून्यता (timelessness)" और "घंमड शून्यता (egolessness)" की स्थिति में पहुंच जाते हैं। यह दोनों स्थितियां परमशांति की स्थिति हैं। सही से ध्यान लगाने पर हम इन्हीं दोनों स्थितियों में पहुंच जाते हैं। फिर कामेच्छा उतनी प्रबल नहीं हो पाती जितनी की ध्यान गहराई में न जाने पर।
• ब्रह्ममुद्रा- यह मुद्रा काम ऊर्जा के ऊर्ध्व प्रवाह का एक बेहतरीन उपकरण है। इसमें हम सांस को बाहर छोड़कर, गुदाद्वार को ऊपर खींचते हैं। फिर पेट को नाभि से पीठ की तरफ दबाकर ऊपर खींचते हैं। इसके बाद ठुड्डी को कंठ-कूप में लगाते हैं। यह क्रिया 10-15 मिनट प्रतिदिन करने पर काम ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होने लगता है।
• सादा भोजन- गरिष्ठ, मांसाहार और तामसी भोजन काम विकार को उद्दीप्त करता है। अतः सादा भोजन करना काम ऊर्जा के नियमन का एक शानदार तरीका है।
• रचनात्मक श्रम- हमारे भीतर मौजूद ऊर्जा को किसी न किसी माध्यम से निकलना चाहिये। संभोग के माध्यम से निकलता है तब वह हमारी जीवनी शक्ति का ह्रास करता है। अतः रचनात्मक कार्य जैसे- गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला, बागवानी, समाज सेवा आदि करने से वह ऊर्जा जो अधोमुखी गमन करती है ऊर्ध्वगमन करने लगती है।
• प्रार्थना - प्रार्थना एक ऐसी क्रिया है जो बड़े से बड़े संकट और समस्या का सरलतम निदान प्रस्तुत करती है। हमें अपने इस ऊर्जा के परम पवित्र और कल्याणकारी होने के बारे में सकारात्मक धारणा बनाने की आवश्यकता है। प्रार्थना के माध्यम से हम इसे शक्ति के रूप में बदल सकते हैं। "हे! शुद्ध, चैतन्य, दिव्य परमात्मा, मैं आपका अंश हूँ। आपसे ही मेरा जन्म हुआ है। आप मेरी शक्तियों को सकारात्मक, रचनात्मक दिशा प्रदान कीजिये। इसे ऊर्ध्वगामी बनाइये।"
• काम ऊर्जा के बारे में सही समय पर बच्चों को शुद्ध और सही जानकारी प्रदान करना। जैसे- यह क्या है?इसकी शक्ति क्या है? इससे क्या - क्या होता है? इसके साथ कौन सी अच्छाई या बुराई जुड़ी हुई है? इस ऊर्जा को कैसे सही दिशा दें? आदि।
©विन्ध्येश्वरी
• ब्रह्ममुद्रा- यह मुद्रा काम ऊर्जा के ऊर्ध्व प्रवाह का एक बेहतरीन उपकरण है। इसमें हम सांस को बाहर छोड़कर, गुदाद्वार को ऊपर खींचते हैं। फिर पेट को नाभि से पीठ की तरफ दबाकर ऊपर खींचते हैं। इसके बाद ठुड्डी को कंठ-कूप में लगाते हैं। यह क्रिया 10-15 मिनट प्रतिदिन करने पर काम ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होने लगता है।
• सादा भोजन- गरिष्ठ, मांसाहार और तामसी भोजन काम विकार को उद्दीप्त करता है। अतः सादा भोजन करना काम ऊर्जा के नियमन का एक शानदार तरीका है।
• रचनात्मक श्रम- हमारे भीतर मौजूद ऊर्जा को किसी न किसी माध्यम से निकलना चाहिये। संभोग के माध्यम से निकलता है तब वह हमारी जीवनी शक्ति का ह्रास करता है। अतः रचनात्मक कार्य जैसे- गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला, बागवानी, समाज सेवा आदि करने से वह ऊर्जा जो अधोमुखी गमन करती है ऊर्ध्वगमन करने लगती है।
• प्रार्थना - प्रार्थना एक ऐसी क्रिया है जो बड़े से बड़े संकट और समस्या का सरलतम निदान प्रस्तुत करती है। हमें अपने इस ऊर्जा के परम पवित्र और कल्याणकारी होने के बारे में सकारात्मक धारणा बनाने की आवश्यकता है। प्रार्थना के माध्यम से हम इसे शक्ति के रूप में बदल सकते हैं। "हे! शुद्ध, चैतन्य, दिव्य परमात्मा, मैं आपका अंश हूँ। आपसे ही मेरा जन्म हुआ है। आप मेरी शक्तियों को सकारात्मक, रचनात्मक दिशा प्रदान कीजिये। इसे ऊर्ध्वगामी बनाइये।"
• काम ऊर्जा के बारे में सही समय पर बच्चों को शुद्ध और सही जानकारी प्रदान करना। जैसे- यह क्या है?इसकी शक्ति क्या है? इससे क्या - क्या होता है? इसके साथ कौन सी अच्छाई या बुराई जुड़ी हुई है? इस ऊर्जा को कैसे सही दिशा दें? आदि।
©विन्ध्येश्वरी
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