हमारे अंदर एक सामान्य आदत है कि हम किसी चीज के "घटित होने से" ज्यादा "घटित न होने" के बारे में सोचते हैं। जैसे - अगर हम कहीं जा रहे हैं, तब हम यह नहीं सोचते कि हमें जल्दी पहुंचना है बल्कि हम हम सोचते हैं कहीं देर न हो जाये। या हम अपने बच्चों को यह नहीं बताते कि क्या सही है बल्कि यह सिखाते हैं कि क्या गलत है। अथवा उन्हें सही चीज करने के लिए प्रेरित करने के बजाय गलत काम न करने से रोकते हैं। या हम परीक्षा में उत्तीर्ण होने की चिंता से ज्यादा अनुत्तीर्ण होने को लेकर सोचते हैं।
इस तरह हम सकारात्मक "घटित होने" के बारे में न सोंच कर नकारात्मक "न घटित होने" के बारे में सोचते हैं। ऐसा सोंच कर हम दरअसल अशुभ को ही सोंच रहे होते हैं। और वैसा हो भी जाता है। तब हम यही कहते हैं "मैं जानता था कि ऐसा ही होगा।" वास्तव में आप जानते थे कि वैसा ही होगा क्योंकि आप ही वैसा सोंच रहे थे। और पुरानी कहावत है - "जो जैसा सोचता है वैसा हो जाता है।" यह फिजूल नहीं है। हम वास्तव में वही हो जाते हैं जैसा सोंचते हैं। कैसे? आइये विचार करते हैं।
एक गेंद लीजिये और उसे धीरे से धरती पर पटकिये। आप देखेंगे कि गेंद धीरे से उछली। आप उसे दुगनी तेजी से पटकिये आप देखेंगे कि इस बार गेंद पहले की अपेक्षा ज्यादा उछली है। अब आप बार बार यही दुहरा सकते हैं। हाथ से गेंद को धरती पर मारिये उछालिये। यह क्रिया कितनी देर चल सकती है। जब तक आप मारते और उछालते रहेेंगे। यह क्या है?………
एक काम और कीजिये किसी को अनायास गंदी सी गाली दीजिये या एक चाटा मारिये। आप पायेंगे कि एक गंदी सी गाली या एक झन्नाटेदार चाटा आपको भी मिल चुका है। अगली प्रतिक्रिया में आप फिर उसे मारते हैं। वह फिर पुनरावृत्ति करता है। क्या लगता है यह सीन कितना लंबा खिंच सकता है? जब तक कि आप बंद नहीं करते। यह क्या है?………
अथवा आप एक बार जोर से चीखिये। क्या होगा? आपकी प्रतिध्वनि आपको सुनायी पड़गी। आप फिर चीखिये। और बार बार चीखिये। यह चीख आपको कब तक सुनायी देगी। जब तक आप ऐसा करते रहेंगे। क्यों हुआ ऐसा?………
यह क्या है? यह सिर्फ इतना है कि प्रकृति हमें वही चीज वापस करती है जो हम उसे देते हैं। अगर हम प्रकृति में एक बुरा विचार भेजते हैं तब बदले में वह भी हमें बुरा विचार भेजती है। फिर हम और बुरा विचार भेजते हैं फिर वह हमें और बुरा विचार भेजती है। और यह सिलसिला अंतहीन चलता रहता है। नतीजा वही होता जो आप सोंच रहे हैं। आपकी भविष्यवाणी सच हो गयी है। किसी फिल्म का डायलॉग है - "अगर तुम किसी चीज को शिद्दत से चाहोगे तो पूरी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की साजिश में लग जााती है।" यह साजिश इसी सिद्धांत पर कार्य करता है।
इसका एक अर्थ यह भी है कि अगर बुरी चीज प्रकृति वापस करती है तो संभव है अच्छी चीज भी वापस करती होगी। आपने किसी भूखे को भरपेट खाना खिलाया। खाया तो उसने लेकिन तृप्ति आपको अनुभव हुआ। आप आनन्द से भर उठे। किसी फूल को आपने प्यार से सहलाया और आपको ऐसा लगा कि वह फूल प्यार से आपको देख रहा है। एक कुत्ते को आपने पुचकारा और वह आपके पैरों के पास आकर लोटने लगा। क्यों हुआ ऐसा?………
यहाँ भी प्रकृति का वही नियम कार्य कर रहा है। "जो चीज आप प्रकृति को देते हैं, प्रकृति आपको वही चीज लौटाती है।" इसका अर्थ है कि यदि हम प्रकृति में एक अच्छा विचार संप्रेषित करते हैं तब प्रकृति भी हमें उतनी ही शक्ति का एक अच्छा विचार संप्रेषित करेगी। हम फिर से उसे संप्रेषित करते हैं। वह पुनः ऐसा ही करेगी। आप पायेंगे कि "इसबार भी आपकी भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। लेकिन अच्छा घटने के बारे में।"
हमें अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति का आभारी होना चाहिए कि उसने इस विधा को न केवल खोजा था बल्कि बहुत गहरे तक आत्मसात भी किया था। प्रकृति के हर एक अवयव में देवत्व की कल्पना प्रकृति को सदसंप्रेषण की कला थी। सारगर्भित मंत्रों का जाप केवल ढोंग या पोंगापंथ नहीं था बल्कि प्रकृति को शक्ति भेजकर पुनः वही शक्ति स्वयं में आत्मसात करने की प्रक्रिया थी। (क्योंकि हर मंत्र अपने आप में गूढ़ अर्थ और शक्ति लिये हुए है। जैसे गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र आदि) इससे जीवन में सकारात्मकता का, दिव्यता का संचार होता था। हालाांकि ये मंत्र कुछ नहीं हैं सिवाय एक शक्तिशाली विचार के।
यदि हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में सकारात्मक घटित हो तो हमें अपने विचार की धारा को बदलना होगा। हमें प्रकृति में केवल सद संदेश भेजना होगा। जैसे-
"मैं एक सज्जन व्यक्ति हूँ, बजाय इसके कि मैं बुरा नहीं हूँ।"
"मैं एक सफल आदमी हूँ, बजाय इसके कि मैं असफल नहीं हूँ।"
"मैं आनन्द स्वरूप हूँ, बजाय इसके कि मैं दुखी नहीं हूँ।"
©विन्ध्येश्वरी

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