Friday, 3 July 2020

सृष्टि निर्माण का सिद्धांत

शास्त्रों में वर्णित है कि सृष्टि के आरंभ में सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। कहीं कुछ नहीं था। इसी अंधकार से एक ज्योति प्रकट होती है जिसे तारा कहा गया। अघोर साधना में इन्हीं शक्ति को माँ तारा के नाम से पूजा जाता है। फिर इसी ज्योति पुंज तारे से सात अन्य ज्योति प्रकट हुईं।
1- परा
2- परात्परा
3- अतीता
4- चित्परा
5- तत्परा
6- तदतीता
7- सर्वातीता

फिर इन्हीं की सहायता से ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया।

यह कहानी कमोबेश "सौरमंडल निर्माण के वर्तमान सिद्धांतों" से मेल खाता है। सौरमंडल के निर्माण के संदर्भ में वर्तमान में मूलतः तीन सिद्धांत प्रचलित है -
1- एक तारक परिकल्पना
2- द्वै तारक परिकल्पना
3- महाविस्फोट सिद्धांत

सारी परिकल्पनाएं शुरू में यही कहती हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मांड में कुछ नहीं था सिर्फ़ अंधकार था। इसमें एक तारक परिकल्पना में कहा गया है कि दूर से आते एक तारे में विस्फोट हुआ जिससे सौरमंडल में ग्रहों और उपग्रहों का निर्माण हुआ।
द्वै तारक परिकल्पना में एक तारे की जगह दो तारे की बात है। इन्हीं दोनों तारों की टक्कर से ग्रहों का निर्माण हुआ। जबकि महाविस्फोट सिद्धांत में कहा गया है कि सृष्टि का निर्माण एक विशाल तारें में महाविस्फोट के कारण हुआ। यह तारा कहीं से आया नहीं था बल्कि इसी अंधकार में मौजूद था।

आपको इससे क्या लगता है? क्या भारतीय ग्रंथों में वर्णित सृष्टि के प्रारंभ में अंधकार और माँ तारा के जन्म से सृष्टि की उत्पत्ति की कथा महज कपोल कल्पना है? यद्यपि आज की पीढ़ी जो नवीन वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त कर चुकी है संभव है इसे ढोंग ही समझे। लेकिन जरा ठहर कर विचार कीजिये। सृष्टि उत्पत्ति की वर्तमान संकल्पनाएं और वह कथा कुछ मेल खाती है या नहीं। ये संकल्पनाएं 18वीं और 19वीं शताब्दी की हैं लेकिन ये पुरानी साधना पद्धतियां और कथा कम से कम दो हजार साल पुरानी है।

©विन्ध्येश्वरी

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