आइंस्टीन के "सापेक्षता सिद्धांत" के अनुसार - "अगर कोई प्रकाश की गति से यात्रा करे तो सामान्य मनुष्य के समय की तुलना में उसका समय काफी धीमा हो जायेगा यानि पृथ्वी के सामान्य समय का उस पर बहुत कम प्रभाव पड़ेगा। या यूं कहें कि वह एक ही समय में दो जगह भी हो सकता है।"
अब असली बात। हमने पढ़ा है कि अभी भी हनुमान, परशुराम, विभीषण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, व्यास, बलि आदि चिरजीवी है।
कृष्ण ने "महारास" के समय एक ही समय सभी गोपिकाओं के साथ नृत्य किया था।
शास्त्रीय कथाओं के अनुसार - देवता प्रकट होकर अन्तर्ध्यान हो जाते थे।
तो प्रश्न उठता है कि
क्या इनकी गति प्रकाश की गति से तेज थी या है?
जैसाकि कथा कहती है हनुमान और परशुराम की गति तो तीव्र है। दोनों की गति मन के वेग से भी तीव्र है। अगर यह सच है तब ये जीवित होंगे। क्योंकि ये दो ऐसे व्यक्तित्व हैं जो त्रेतायुग और द्वापर में भी थे। संभव है कलयुग में भी हों। और अन्य लोग कैसे जीवित हैं? यह अभी शोध का विषय है। संभव है इनकी भी गति प्रकाश के गति से तेज हो।
अब दूसरी अवधारणा
अगर चिरंजीवी होने, रास प्रसंग और अन्तर्ध्यान होने की बात कपोलकल्पित है तब भी यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि ऐसी कहानी आइंस्टीन के कम से कम दो हजार साल पहले लिखी गयी। तो वास्तव में कायदे से "सापेक्षता के सिद्धांत" पर भारत का © कापीराइट होना चाहिए।
©विन्ध्येश्वरी
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