Thursday, 9 July 2020

"ढोल, गंवार, सूद्र, पसु, नारी" चौपाई की नयी व्याख्या

तुलसीदास जी लिखते हैं - "ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥"
यह चौपाई सुंदरकांड की है। राम समुद्र से लंका जाने के लिए मार्ग मांगते हैं लेकिन वह नहीं देता। फिर राम को क्रोध आता है और वे समुद्र को सोखने के लिये बाण का संधान करते हैं। फिर समुद्र डर से कांपता हुआ आता है। वही राम से यह चौपाई कहता है।

इस चौपाई को लेकर दो अर्थ लगाये जाते हैं-
एक अर्थ वह है जिसमें "ताड़ना" शब्द का अर्थ "मारना" या "प्रताड़ित" करना लगाया जाता है। यह अर्थ वे लोग लगाते हैं जो मानते हैं कि तुलसीदास की दृष्टि स्त्री और शूद्रों के प्रति दोषपूर्ण है। यह वर्ग प्रायः दलितों और दलित चिंतकों का है।

दूसरा अर्थ वह है जिसमें "ताड़ना" शब्द का अर्थ "अच्छे से देखना" या "निगरानी" करना लगाया जाता है। इस वर्ग का मानना है कि जो तुलसी स्त्री को देवी मानते हैं, वे इस अर्थ में यह चौपाई नहीं लिखेंगे। साथ ही इनका यह भी दावा है कि जो राम निषाद जोकि एक शूद्र है उसे गले लगाते हैं, शबरी के जूठे बेर खाते हैं, तो वे शूद्रों के बारे में इस कुत्सित अर्थ में यह चौपाई नहीं लिखेंगे।

इसका सही अर्थ क्या हो सकता है? यद्यपि इसका सही अर्थ तो केवल ईश्वर या तुलसी को पता है बाकी अटकलें हैं। हम भी एक अटकल लगाते हैं।

वस्तुतः ताड़ना शब्द के दोनों ही अर्थ सही हैं और अलग - अलग संदर्भों में इसके अलग - अलग अर्थ लगाये जाते हैं। अगर आप किसी को ध्यान से देख रहे हैं तब उसे "ताड़ना" कहते हैं। जैसे - "क्या ताड़ रहे भाई?" या जब कोई किसी को बहुत सताता या मारता है तब कहा जाता है कि उसे प्रताड़ित किया जा रहा है। "प्रताड़ना" में "प्र" उपसर्ग के साथ "ताड़ना" शब्द जुड़ा है। इसमें "प्र" उपसर्ग विशेषार्थक है। "प्र" का अर्थ होता "भलीभांति", "अच्छे से" और "ताड़ना" शब्द का अर्थ "मारना" है। यानि ठीक तरीके से मारना।

हालांकि उपसर्ग के आधार पर शब्द का अर्थ निकालना युक्ति पूर्ण नहीं है। क्योंकि उपसर्ग शब्दों के अर्थ बदल देते हैं। जैसे एक शब्द है - "प्रहार"। प्रहार में "प्र" उपसर्ग के साथ "हार" शब्द जुड़ा हुआ है। "हार" शब्द का अर्थ "माला" और "हारना" दोनों है। लेकिन "प्र" उपसर्ग जुड़ने से इसका अर्थ होता है "वार करना" या "मारना"। यानी शब्दार्थ के आधार पर पर हम इस चौपाई की सही व्याख्या नहीं कर सकते। जो लोग केवल शब्दार्थ से किसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं/पहुंचते हैं वे एकांगी दृष्टिकोण वाले हैं।

एक दृष्टिकोण तुलसी के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझ कर अर्थ निकालना है। तुलसी का मूल व्यक्तित्व सवर्णवादी, वर्णव्यवस्था को मानने वाला, और प्रायः स्त्री के प्रति कुंठाग्रस्त है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिये क्योंकि तुलसी उच्च जाति में जन्मे। उनका लालन-पालन भी उच्च जाति और ब्राह्मणधर्मी आश्रमों में हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा भी शास्त्रीय पद्धति से हुई। एतदर्थ वे सवर्णवादी मानसिकता और वर्णाश्रम धर्म को मानने वाले हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

"पूजिय विप्र ग्यान गुनहीना। सूद्र नहीं गुन ग्यान प्रवीना॥"

अर्थात गुण और ज्ञान से हीन होने पर भी ब्राह्मण पूज्य है किंतु तमाम गुण और ज्ञान होने पर भी शूद्र पूज्य नहीं है। यह बात सवर्णवादी मानसिकता वाला व्यक्ति ही कह सकता है।

वर्णाश्रम धर्म के समर्थन में वे कहते हैं-

"बरनाश्रम निज निज धरम, निरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं, नहिं भय सोक न रोग॥"


अर्थात रामराज्य में हर कोई अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करता है। वेद के पथ पर चलता है। इससे सभी सुख प्राप्त करते हैं। किसी को कोई रोग-शोक नहीं है। यद्यपि तुलसीदास को स्वयं भी सवर्णवाद और वर्णाश्रम व्यवस्था का दंश झेलना पड़ा। जिसकी पीड़ा उनके रचनाकर्म में झलकती भी है। जैसे-

"धूत कहौं, अवधूत कहौं, रजपूत कहौं, जुलहा कहौ कोई। 
काहू की बेटी सो बेटा न ब्याहब, काहु की जाति न बिगारबो सोई॥"

तुलसीदास नारी के प्रति कुंठा से भी ग्रस्त हैं (इसका मूल कारण पत्नी से दुत्कारा जाना है)। जगह-जगह उनकी रचनाओं में यह कुंठा झलकती है। जैसे -

"नारि सुभाव सत्य कवि कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं॥
साहस, अनृत, चपलता, माया। भय अबिबेक, असौच, अदाया॥"


अर्थात कवि लोग सत्य ही कहते हैं कि नारियों के भीतर आठ प्रकार के अवगुण - साहस, झूठ बोलना, चंचलता, भ्रमित करना, डर, बुद्धिहीनता, अपवित्रता और निर्दयता आदि सदा रहते हैं।

स्त्री की तुच्छता के बारे में उन्हें राम के मुख से भी कहलवाने में कोई संकोच नहीं हुआ -

"जस अपजस सहतेउं जग माहीं। नारि हानि विशेष छति नाहीं॥

अर्थात मैं संसार में स्त्री को खोने का अपयश सह लेता क्योंकि स्त्री की हानि को विशेष क्षति नहीं है।

हालांकि वे कई जगह स्त्री को सम्मान भी देते हैं। वे स्त्रियों की दुर्दशा के प्रति चिंता भी प्रकट करते हैं। जैसे - "कति बिधि सृजी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं॥"

उपर्युक्त विवेचन से भी हम किसी खास निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाते क्योंकि तुलसीदास के साहित्य में इसके पक्ष - विपक्ष में बहुतायत रचनाएं मिल जाती हैं।

एक तीसरा दृष्टिकोण ऐतिहासिक हो सकता है। यदि साहित्य समाज का दर्पण है तब तुलसी के साहित्य में सम्मिलित ये सारी बातें एकदम सच हैं। क्योंकि समाज में स्त्रियों और शूद्रों की दशा जग विदित है। इन्हें हमेशा समाज के निचले पायदान पर रखने के साथ ही दास्तान-ए-जुल्म-ओ-सितम भी खूब रहा है। ऐसे में यह मानने में कतई संकोच नहीं है कि यदि तुलसी ने यह लिखा "ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥" तो हम इसमें मार-पीट, प्रताड़ना, दमन और उत्पीड़न वाला अर्थ - पक्ष अधिक प्रबल है।

जब ढोल पर थाप पड़ती है तब क्या ढोल यह दावा कर सकता है कि उसे मारा नहीं जा रहा बल्कि बजाया जा रहा है। वह मारे जाने पर ही बजता है। कक्षा में सबसे भोंदू टाइप बच्चे को मास्टर साहब घंटों मुर्गा बना के रखतें हैं। मास्टर साहब यह दावा जरूर कर सकते हैं कि वे उसे सुधार रहे हैं लेकिन जो दर्द उसे सहना पड़ रहा है उसका क्या? शूद्रों के गले में मटका लटकाना (ताकि अगर उन्हें थूकना हो तो उसी में थूके बाहर नहीं) और पीछे झाड़ू बांधना (ताकि जिस रास्ते से वे जा रहे हैं उसे बुहारते जायें जिससे अपवित्र हुआ मार्ग साफ हो सके और सवर्णों को पवित्र रास्ता मिले सके) यह कौन सा सुधारवादी कदम था? एक पशु को हांकने के लिये गाड़ीवान के हाथ में बड़ा सा चाबुक होता है। थोड़ा सा भी धीमा चलने या दायें-बायेंं करने पर पीठ पर पड़े चाबुक की मार उसमें किस पुनर्जजागरण का प्रयत्न है? इससे किस सुधार और कौन सा ज्ञान प्रदान करने का दावा किया जाता है? जब एक स्त्री को पैर की जूती, पति की दासी, नरक का द्वार कहा जाता है, उसके उग्रता को दबाने के लिये विभिन्न आभूषणों का जाल पहनाया जाता है तो यह केवल पातिव्रत्य धर्म निभाने का उपक्रम मात्र नहीं है। यह पातिव्रत्य धर्म भी उसके साथ एक छल है। इसी धर्म के कारण उसे सहचरी से परिचरी (दासी) बनाया गया।
 
हम इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि यह तुलसी का मत नहीं हो सकता, अतः वे निर्दोष हैं। क्योंकि वे स्वयं कहते हैं - "नाना पुराण निगामागम सम्मतं यत, रामायणे निगदितं क्वचिदन्नयतोपि॥" अर्थात विभिन्न पुराणों, वेदों, शास्त्रों आदि से सम्मत तथ्य रामायण में लिखा गया है लेकिन इसमें कुछ मेरे भी मत शामिल हैं। क्या पता कि इस चौपाई में भी क्वचिदन्नयतोपि हो? इसके अलावा हम इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी का देखभाल, संस्कार नहीं होना चाहिए। निश्चित रूप से होना चाहिए। हालांकि मैं कोई निष्कर्ष नहीं देने जा रहा। निष्कर्ष निकालने का कार्य आप स्वयं कर लेंगे।

©विन्ध्येश्वरी

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