श्रीकृष्ण कहते हैं -
"नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेद्येन्तयापो, न शोषयति मारुतः॥"
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृहणाति नरोपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाती नवानि देही॥
अर्थात् आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकता, न पानी गला सकता है और न ही पवन सुखा सकता है।
जिस प्रकार मनुष्य अपने पुराने वस्त्र छोड़कर नये वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण कर लेती है।
बात तो वही है। खतां सिर्फ इतनी है कि संस्कृत में है। पंडितों और पोंगापंथियों की भाषा में। शोषितों की भाषा में। इतिहास को काले अक्षरों में लिखने वालों की भाषा में।
और दूसरी खतां ये कि भारतीय मनीषा ने कभी अपने ज्ञान पर कापीराइट का दावा नहीं किया। ज्ञान सबका है। हर किसी को मिलना चाहिए। क्या तेरा क्या मेरा।
ऊर्जा का मुख्य उपयोग है "कार्य का होना"। जब यह ऊर्जा नहीं होती तब हम निष्क्रिय हो जाते हैं। आत्मा भी ऊर्जा का एक रूप है। आत्मा के न रहने पर हम मृत हो जाते हैं। फिर वह आत्मा नये शरीर (दूसरे रूप) में चली जाती है।
©विन्ध्येश्वरी
ऊर्जा का मुख्य उपयोग है "कार्य का होना"। जब यह ऊर्जा नहीं होती तब हम निष्क्रिय हो जाते हैं। आत्मा भी ऊर्जा का एक रूप है। आत्मा के न रहने पर हम मृत हो जाते हैं। फिर वह आत्मा नये शरीर (दूसरे रूप) में चली जाती है।
©विन्ध्येश्वरी
No comments:
Post a Comment