Wednesday, 1 July 2020

किसने तोड़ा शिव - धनुष?

एक विद्यालय में एक इंस्पेक्टर निरीक्षण करने गया। वहाँ एक कक्षा में रामचरितमानस पढ़ाया जा रहा था। इंस्पेक्टर ने सोचा - "क्यों न बच्चों से रामायण के बारे में कुछ पूछा जाये।" उन्होंने बच्चों से पूछा- "बच्चों मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, तो मुझे यह बताइये कि शिव का धनुष किसने तोड़ा?" कक्षा में सन्नाटा पसर गया। कुछ क्षण के बाद एक बच्चे ने हाथ ऊपर उठाया। कक्षा अध्यापक ने उसे देखा तो उनका मुंह सूख गया। वह कक्षा का सबसे गधा विद्यार्थी था। लेकिन अब जब उसने हाथ उठा दिया है वह भी इंस्पेक्टर के सामने तब उसे मना करना मुनासिब न था। वे चुप रह गये।

इंस्पेक्टर ने कहा - "हाँ बेटा, बताओ। किसने तोड़ा शिव का धनुष?" बच्चा - "मुझे नहीं पता किसने तोड़ा लेकिन मैंने नहीं तोड़ा है।" इंस्पेक्टर हतप्रभ रह गया। उसने अध्यापक की ओर देखते हुए कहा - "देख रहे हैं मास्टर साहब, यह बच्चा क्या कह रहा है?"

"हाँ सर, देख रहा हूँ। यह चाहे जितना कहे कि इसने नहीं तोड़ा है तोड़ा इसी ने है। क्योंकि यह खिड़की के कांच, दरवाजे की कुंढी, इस कुर्सी का हत्था, और यहाँ तक कि मेरे चश्मे की एक डंडी इसी कमबख्त ने तोड़ा है। यह बहुत दुष्ट और पाजी है। आप इसकी बात में मत आइयेगा। तोड़ा इसी ने है।" मास्टर साहब ने बड़ी बेबाकी से अपना उत्तर पेश किया और फिर वे हौले से मुस्कराये। उन्होंने इतनी बड़ी समस्या का हल इतनी आसानी से जो दे दिया था।

इंस्पेक्टर का सिर चकराया। वह सीधे प्रधानाध्यापक के कमरे में गया। उसने कहा -"देखिये प्रिंसीपल सर, आपके ये अध्यापक क्या कह रहे हैं? मैंने कक्षा में पूछा कि शिव का धनुष किसने तोड़ा? तब एक बच्चे ने जवाब दिया कि किसी ने भी तोड़ा हो, मैंने नहीं तोड़ा। और ये महाशय कह रहे हैं कि इसी ने तोड़ा। आप बताइये? क्या किया जाये। इन्हें यह नहीं पता कि शिव का धनुष किसने तोड़ा?"

"अरे साहब, खामख्वाह परेशान हो रहे हैं आप, बच्चे हैं कुछ न कुछ तोड़ते फोड़ते रहते हैं। कितना ध्यान दिया जाये इन पर। तोड़ - फोड़ करने पर हम दंड भी बहुत देते हैं लेकिन फिर भी ये बाज नहीं आते। छोड़िये ये सब बेकार की झंझट, बताइये क्या लेंगे आप? कुछ चाय-काफी मंगवाये या सीधे मुद्दे पर आये?" - प्रधानाध्यापक ने मामले को हलके से निपटा दिया था। जिस तरह एक कुशल प्रधानाध्यापक गंभीर से गंभीर मामले भी चुटकियों में निपटा देता है। उनका गर्वित चेहरा बता रहा था कि कोई कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न बन जाये वह एक अध्यापक की बुद्धिमत्ता और समस्या समाधान क्षमता का कभी मुकाबला नहीं कर सकता, आखिर है तो किसी अध्यापक का ही पढ़ाया न! अध्यापक अध्यापक ही होता है। जगत को ज्ञान के दीपक से प्रज्ज्वलित करने वाला, अधिकारियों यहां तक कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और भगवान को भी को सिखाने - पढ़ाने वाला।

इंस्पेक्टर बौखलाया सा मालूम हो रहा था। उसने सोचा कि विद्यालय के प्रबंधन से इन सबकी शिकायत की जाये। फिर आगे की कार्यवाही किया जाये। वह सीधे प्रबंधन बोर्ड के पास गया। उसने पहले घटित सारी राम - कहानी कह सुनाया। प्रबंधक ने कहा - "आप भी इंस्पेक्टर साहब! छोटी सी बात का इतना बड़ा मुद्दा? तोड़ दिया होगा किसी ने। हमारे यहाँ एक बढ़ई लगा रहता है टूटी - फूटी चीजों की मरम्मत के लिये। आप परेशान न होइए। बनवा दिया जायेगा, शिव का धनुष। आप आराम से घर जाइये। अन्यथा विद्यालय के मामले में फालतू में टांग अटाने के चक्कर में आप नौकरी से भी हाथ धो बैठेंगे। अपनी बहुत ऊपर तक पहुंच है, सीधा मुख्ययमंत्री जी से। आखिर किसी ने शिव का धनुष ही तो तोड़ा है। किसी ने देश तो नहीं फूंका है न?"

इंस्पेक्टर को लग रहा था, वह पागल है। या नहीं है तो हो जायेगा। क्योंकि वह खुद दुविधा में पड़ चुका था कि शिव का धनुष है भी या नहीं? एक बारगी उसे लगा शायद शिव का कोई धनुष ही नहीं है। और अगर होगा भी तो किसी ने तोड़ा नहीं होगा।

कहानी का मंतव्य-
इस संसार में हर कोई यूँ ही कुछ न कुछ कहे जा रहा है। वास्तविकता क्या है, सत्य क्या है किसी को नहीं पता। हर कोई बस यूँ ही "टाइमपास" कर रहा है क्योंकि जीवन तो काटना है किसी न किसी तरह। सच तो यह है कि जीवन का असली सत्य क्या है, यह हम जानने की जरूरत ही नहीं महसूस करते। अगर सौभाग्य से किसी को यह सच्चाई पता चल जाती है तब भी हम उसे नहीं मान पाते। होता तो यहाँ तक कि सच जानने वालों को ताउम्र समाज की लानत - मलानत झेलनी पड़ती है। कइयों को तो जीवन से भी हाथ धोना पड़ता है। आखिर क्या हुआ बुद्ध, महावीर और विवेकानंद के साथ? जहर देकर मारा गया। क्या हुआ जीसस के साथ? सूली पर चढ़ा दिया गया। क्या हुआ मंसूर के साथ? उसका अंग-अंग बेहरमी से धीरे-धीरे अलग किया गया। क्या हुआ कबीर और मीरा के साथ? सामाजिक तिरस्कार और प्रताड़ना। क्या हुआ प्रेम और अहिंसा के पुजारी गांधी के साथ? हिंसात्मक तरीके से मृत्यु।

यह समाज एक अंधे कुएं की तरह सिर्फ अंधा ही बना रहना चाहता है। ज्ञान की ज्योति, परमात्मा की ज्योति इसे भयभीत करती है। वह बस यह दिखाना चाहता है कि परमात्मा, जीवन का सत्य है कोई अदृश्य, विशाल चीज जिसे वह पाने का यत्न कर रहा है। फालतू के ढोंग और आडंबरों को वह इसका जरिया बनाता है। जबकि परमात्मा और वास्तविक सत्य इतना सस्ता और आसान है कि पलक झपकते ही अंतस में उतर जाता है। उसके लिये चाहिये केवल प्रेम और निर्अहंकार….…………।

प्रेम का अर्थ केवल खुद से, और अपनों से प्रेम करना नहीं होता बल्कि जीवमात्र के लिये प्रेम होता है। प्रेम का अर्थ सिर्फ संबंध तक सीमित नहीं होता बल्कि यह "मन की दशा" होती है जिसमें हर किसी के लिये "समाने की जगह" होती है। आज का प्रेम सिर्फ यह है कि "मैं तुम्हारी माँ हूँ, मैं तुम्हारा पिता हूँ, मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, मैं तुम्हारा पति हूँ, मैं तुम्हारा पुत्र हूँ, मैं तुम्हारी पुत्री हूँ, मैं तुम्हारा प्रेमी हूँ, मैं तुम्हारी प्रेमिका हूँ, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ, इसलिए मुझे प्रेम करो। मैं तुमसे इतना प्रेम करता हूँ तुम मुझसे कितना करते हो?" यह प्रेम का सबसे निचला स्तर है। इस स्तर पर प्रेम का अर्थ है "केवल मुझसे प्रेम" और किसी से नहीं। इस तरह का प्रेम एक छल है। जो किसी खास से प्रेम करता है, 99.99% संभवाना है वह दूसरों के प्रति प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता।

जब तक हम दूसरों के लिए प्रेमपूर्ण नहीं होगें दूसरा हमारे लिये प्रेमपूर्ण कैसे हो सकता है। यही कारण है कि संसार अपने जन्म काल से ही तमाम उपदेशों, शास्त्रों, पोथियों और उसके विचारकों के बावजूद अनेक युद्ध और शत्रुताओं का सामना कर रहा और आज भी यह जारी है। जबकि प्रेम के उपदेशों का पहाड़ हमारे सामने खड़ा है।हमारा प्रेम मानवमात्र, जीवमात्र, पशु-पक्षी, चर - अचर, देशी - विदेशी, शत्रु - मित्र, अपना - पराया सबके लिये समान होना चाहिए। यह मन की दशा होनी चाहिए।

इसी प्रकार निर्अहंकार होना भी आवश्यक है। निर्अहंकार होने का अर्थ है - "मैं कुछ नहीं, मेरा कुछ नहीं।" जब तक भीतर "मैं" की दीवाल खड़ी रहेगी परमात्मा का प्रकाश, सत्य का प्रकाश भीतर के कमरे में प्रकट नहीं हो सकता। हमें परमात्मा इसलिये नहीं मिल पाता कि वह अदृश्य है, विशाल है, असीम है, बल्कि वह हमें इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि हम मिलना नहीं चाहते। हम यह दो चीज़ें नहीं कर पाते इसलिए नहीं मिल पाता। हम सिर्फ़ उसे पाने का ढोंग करते हैं। क्योंकि हमें कुछ करना है बस यूँ ही……………

©विन्ध्येश्वरी

2 comments:

  1. हो ना हो मास्टर जी कि मिली भगत रही होगी तभी नही बता रहे मास्टर जी 😂😂😂

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    1. या तो मास्टर जी की मिली भगत थी जैसे आज के मास्टर (पंडे, पुजारी, पुरोहित, मुल्ला, मौलवी, पादरी आदि) या फिर वह वास्तव में अज्ञानी है जैसे आज के हैं।

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